संदेश

अपने जैसे अजनबियों में

युवा रंगकर्मी हैप्पी रंजीत के लिखे और निर्देशित किए नाटक  ‘ फैमिलियर   स्ट्रेंजर ’  का पुरुष  अपनी लिवइन पार्टनर से संबंध को प्यार के बजाय  ‘ ग्रेट फ्रेंडशिप ’  कहता है । फिर एक रोज वह अपनी फिल्म में काम कर रही हीरोइन यानी एक अन्य स्त्री से पूछता है- तुम मेरे होने वाले बच्चे की मां बनोगी ?  उसके मुताबिक हर इंसान, जानवर, पेड़-पौधे की लाइफ का एक ही मकसद होता है- प्रोक्रिएशन। वह कहता है- मेरे लिए कुछ भी सही और गलत नहीं....एक रिश्ते के होते हुए अगर मेरे मन में तुम्हारे लिए अट्रैक्शन आ गया है तो यह भी गलत है, पर यह तो हो गया है। इस पुरुष को हर आदर्श चीज से नफरत होती है,  ‘ क्योंकि वो झूठ है और मुझे सच्चाई से प्यार है ’ । उसका मानना है कि कोई रिश्ता जब तक काम कर रहा है तब तक ठीक, वरना उससे अलग हो जाना चाहिए। इसमें अच्छे-बुरे का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि जो मेरे लिए अच्छा है वह शायद दूसरे के नजरिए से बुरा हो। वह एक मुकम्मल आजादी का कायल है, जो तभी मिलती है जब आप किसी से जुड़े नहीं होते। ऐसी आजादी होगी तभी आप समाज के लिए कुछ कर पाएँगे.  उसे एक अपने...

फैज के बारे में

फैज अहमद फैज की जन्मशताब्दी के प्रसंग से पिछले एक-डेढ़ सालों में उनपर केंद्रित कई नाटक खेले गए हैं ;  बावजूद इसके कि फैज के किरदार में कोई  ‘ नाटकीय ’  पहलू खास नजर नहीं आता। इन प्रस्तुतियों को देखने से जितना समझ आता है वह ये कि वे कोट-पैंट पहनने वाले और अमूमन सुलझी शख्सियत के इंसान थे। न कि दुनिया की बेढंगी चालों से बेजार पी-पी कर अपना कलेजा गर्क करने वाले  मंटो की तरह के  शख्स। फैज की शायरी भी- जितना मालूम देता है- उदभावनाओं की शायरी है। न वे मजाज हैं, न शमशेर...और भुवनेश्वर तो बिल्कुल ही नहीं ;  संयोग से जिनकी जन्म शताब्दियाँ भी इधर हाल में बगैर किसी संस्मरण के चुपचाप गुजरी हैं। अपनी रौ में सांसारिकता से बेखुद अदीबाना शख्सियत फैज की नहीं थी। वे एक चुस्त, चौकन्ने, जुझारू, प्रगतिशील और रोमांटिक तबियत के व्यक्ति थे। रामजी बाली लिखित, निर्देशित, अभिनीत प्रस्तुति  ‘ मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग ’  फैज के जीवन पर देखी कुछ पिछली प्रस्तुतियों से ज्यादा चुस्त मालूम देती है। उन्हें इस साल संगीत नाटक अकादेमी ने नाट्य लेखन के लिए उस्ताद बिस्मि...

बात पाँचवें वेद की

रंगकर्मी दंपती वीके और किरण की रंग शैली का प्रवाह देखने ही बनता है। अपनी नई प्रस्तुति ‘ रहस्य पंचम वेद का ’ में उन्होंने नाटक के इतिहास और सिद्धांत को मंच पर पेश किया है, और वो भी बच्चो के एक खासे बड़े दल के साथ। रामजस स्कूल , पूसा रोड के छात्रों की इस प्रस्तुति में मंच पर जमा बच्चे नाटक खेलने के बारे में बात कर रहे हैं। उनका टीचर एक चीनी कहावत के बारे में बताता है कि सुनी हुई बातें भूल जाती हैं , देखी हुई याद रहती हैं , और की हुई समझ आती हैं। एक बच्चा बताता है कि उसके पुराने स्कूल के प्रिंसिपल नाटक के खिलाफ थे कि इससे पढ़ाई का हर्जा होता है। नाटक बनाम पढ़ाई के इस झगड़े में मूँछ लगाए बाप बेटे को डाँट रहा है, पर बेटा भी गुस्सैल तेवरों वाला है। उसके गुस्से में कहे ‘ ...पापा !’ के साथ सीन कट हो जाता है, और पात्रों का हुजूम एक कोरस के लिए प्रस्तुत हो जाता है : ‘ रंगमंच है दुनिया सारी / हम सब केवल अभिनेता ’ । पीछे स्क्रीन पर शेक्सपीयर की तस्वीर उभरी हुई है। शेक्सपीयर ने ही दुनिया को एक स्टेज बताया था, जहां बच्चा पैदा होते ही तरह-तरह के ड्रामे देखने लगता है। एक सास-बहू गोद में एक नवज...

दोहराव और रूपांतरण

शायद सरकारी धन पर निर्भरता के कारण या जिस भी वजह से हिंदी रंगमंच का परिदृश्य कई बार एक रस्मी कवायद जैसा लगता है। वही पुराने नाटक बार-बार खेले जाते हैं, जिनके निर्देशकीय में निर्देशकगण बताते हैं कि कैसे यह फलां नाटक आज के यथार्थ के लिए भी उतना ही समीचीन है। इस दोहराव के अलावा हिंदी रंगमंच का दूसरा प्रतिनिधि तत्त्व  ‘ रूपांतरण ’  है। कोई किसी कहानी का रूपांतरण कर रहा है, कोई उपन्यास का, कोई किसी पुराने नाटक का ही। पिछले दिनों देखी कुछ प्रस्तुतियां भी इसी सिलसिले में थीं।  खूबसूरत बला  :    राधेश्याम कथावाचक लिखित इस पारसी नाटक का यह ताजा संस्करण मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के सौजन्य से था। भोपाल के रवींद्र भवन में हेमा सिंह के निर्देशन में यह वहाँ के छात्रों की प्रस्तुति थी। संयोग से इसी नाटक की अतीत में देखी दो अन्य प्रस्तुतियाँ भी हेमा सिंह के निर्देशन में अलग-अलग छात्र समूहों की ही थीं। इस नाटक के कुल गठन में संप्रेषण की कोई बुनियादी खामी है। नाटक में कथानक का कोई ठोस याकि समेकित प्रभाव नहीं बन पाता ;  और अंत में सिवाय शम्सा के चरित्र के कुछ भी याद...

युद्ध के विरोध में ब्रह्मचर्य

वरिष्ठ नाट्य निर्देशक वामन केंद्रे लिखित और निर्देशित प्रस्तुति ‘ नो सेक्स प्लीज ’ एक काल्पनिक कथावस्तु पर आधारित प्रहसन है। एक राजा है जो युद्ध का प्रणेता है। दर्शक शुरू के दृश्यों में उसके द्वारा लड़े गए युद्धों पर उसका हास्यजनक संभाषण सुनते हैं, जिसमें वह हर चौराहे पर युद्ध देवता के पुतले खड़े कर देने का आह्वान करता है और अपने सैनिकों से कहता है- घाव तुम झेलोगे, वेदना हम झेलेंगे ; खून तुम्हारा निकलेगा, आँसू हमारे। लेकिन चूँकि युद्ध हमेशा ही विभीषिका को जन्म देता है, जिसकी शिकार बनती हैं स्त्रियाँ. नगर की स्त्रियाँ तय करती हैं कि अब वे ऐसा नहीं होने देंगी ; और संगठित गृहणियाँ और गणिकाएँ मिलकर पुरुषों से कह देती हैं- नो सेक्स प्लीज। नाटक का कथासूत्र एरिस्टोफेनस के लिखे एक प्राचीन ग्रीक प्रहसन से लिया गया है ; ऐसा छोटा  प्रहसन जिसे प्रसिद्ध ग्रीक त्रासदियों के मध्य कॉमिक रिलीफ के तौर पर पेश किया जाता था। इसे पूरी लंबाई के नाटक में तब्दील करते हुए वामन केंद्रे ने दृश्यात्मकता के एक पारंपरिक मुहावरे में आबद्ध किया है. उनके पात्र मंच पर चटक रंग वाले कास्ट्यूम में नजर आते ...

कुछ पुराने अनुवाद

मैं भी जिन दि नों... कुल्यीन कुल्यीयेव मैं भी जिन दिनों मेरी कच्ची उम्र थी बेफिक्र गीत गुनगुनाता था बेपरवाह- ‘ अंतहीन खुशियों से भरी है ये जिंदगी नहीं वजह खेद करें और भरें आह ’ यूँ ही ताकता था नीले आसमाँ का नूर झरनों का पानी पिया मैंने कई बार पपड़ाई रोटी मेरे स्वाद से थी दूर ताजा रोटी के लिए नहीं था आभार अब तो मेरे भीतर भी आ गई है समझ-बूझ छूट चुके रास्तों पर लौटता हूँ बार-बार अरे कैसी हो सुबह, लेता हूँ रोज पूछ ओ झरने के निर्मल जल, तुम्हें मेरा नमस्कार आकाश, हरे खेत और पैड़ी शुभकामना सुप्रभात, ओ खरीदी हुई हमारी पावरोटी जानता हूँ कभी-कभी है ये संभावना हो सकती हो तुम दुर्लभ और बहुत सूखी भी मैंने समझ-बूझ पाई जीकर ये लंबा जीवन गरिमा से फिर कहता हूँ शुभकामना मेरे विवेक की जगह लेगा जिनका यौवन उन नौजवानों को जो छुएँगे आसमाँ रसूल हमजातोव 1 गाँव के एक आदमी की बीवी के आबनूसी बाल थे दोनों थे बीस के कि बिछड़ गए उनकी खुशियों में आए युद्ध के ये साल थे एक नायक की पके हुए बालों वाली विधवा बैठी हुई रोती है सोचती-सिसकती ...

ऊबे हुए सुखी

पोलैंड की रहने वाली तत्याना षुर्लेई से मैंने पूछा कि उन्हें भारत में सबसे अनूठी बात क्या लगती है। उन्होंने   ‘ मुश्किल सवाल है ’   कहकर आधे मिनट तक सोचा , फिर बोलीं-   ‘ यहां कोई किसी नियम-अनुशासन की परवाह नहीं करता , फिर भी सब कुछ चलता रहता है , यह बहुत यूनीक है... लेकिन अच्छा है। ’   मुझे याद आया कि कुछ सप्ताह पहले दफ्तर में आए एक अमेरिकी गोरे युवक जॉन वाटर ने भी कहा था-   ‘ वस्तुनिष्ठता फालतू चीज है ’।  मैंने तत्याना से कहने की कोशिश की कि अपने समाज की नियमबद्धताओं की ऊब के बरक्स वे दिल्ली के एक छोटे से हिस्से की जिंदगी के सहनीय केऑस को देखकर मुग्ध न हों , क्योंकि परवाह न करने की आदत से पैदा हुए नरक उन्होंने अभी नहीं देखे हैं। उदाहरण के लिए मैं उन्हें बताना चाहता था कि मैं जिस रिहायशी कॉम्प्लेक्स में रहता हूं वहां काम करने वाले गार्डों को साढ़े पांच हजार रुपए वेतन में रोज बारह घंटे और सातों दिन नौकरी करनी होती है ;   और यह कि ऐसे सैकड़ों परिसरों , दफ्तरों , फैक्ट्रियों में हजारों की तादाद में ऐसे गार्ड और गार्डनुमा लोग काम करते हैं और इस मुल्क में...