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कलावाद की कवायद

हिंदी थिएटर में हर कोई प्रभावात्मक किस्म के प्रयोग करने पर उतारू है। युवा रंगकर्मी राजकुमार रजक निर्देशित इलाहाबाद के थिएटर ग्रुप एक्स-ट्रा की प्रस्तुति 'सूरज का सातवां घोड़ा' कुछ इस तरह की है कि उसमें इस उपन्यास की जगह कोई भी कविता, कहानी, उपन्यास, आख्यान फिट किया जा सकता है। प्रस्तुति नैरेटिव का कोई प्रकार पेश नहीं करती, क्योंकि नैरेटिव का यहां कोई मूल्य ही नहीं है। वह एक दृश्यात्मक कलावाद में नौकर की तरह मौजूद है। एक जैसी पोशाक में छह अभिनेता मंच पर किसी शास्त्रीय ऑपेरा जैसे दृश्य निर्मित करते हैं। ये देहगतियों की लय से बनने वाले दृश्य हैं। इनमें कास्ट्यूम और प्रकाश योजना के रंग हैं। बुल्ले शाह के बोलों की सूफियाना रंगत से लेकर केसरिया बालमा आवो मोरे देस तक के आलाप हैं। दो लाठियों को पालकी में बदल देने जैसी दृश्य युक्तियां हैं। तरह-तरह की बुदबुदाहटें हैं। लेकिन कुछ नहीं है तो पाठ का संप्रेषण। प्रस्तुति के डिजाइन में संप्रेषण किसी प्रयोजन की तरह नजर ही नहीं आता। पूरी प्रस्तुति एक वायवीयता की शिकार मालूम देती है। उसके प्रभावात्मक प्रयोग में उपन्यास का एक सहयोगी इस्तेमाल भर हो ...