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बैठने का झगड़ा और इंतकाम की आग

लॉकडाउन के बाद पहला नाटक पिछले हफ्ते ग्वालियर में देखना नसीब हुआ। वहाँ के मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय के थिएटर-ग्रेजुएट प्रमोद पाराशर ने यह फेस्टिवल ‘भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान’ (IITTM) के सहयोग से और उन्हीं के प्रेक्षागृह में आयोजित किया। समारोह के दोनों नाटक प्रमोद के ही निर्देशन में थे। पहली प्रस्तुति ‘पार्क’ में पार्क की एक बेंच पर बैठने का झगड़ा है। अलग-अलग कारणों से नाटक के तीनों पात्र एक ही खास जगह पर बैठना चाहते हैं। अपने को सही साबित करने के लिए वे यहूदी, इजराइल और कश्मीर आदि का उदाहरण देते हैं। इस तरह झगड़े की मार्फत विस्थापन और बेदखली का डिस्कोर्स नाटक में खोंस दिया गया है। एक ही दृश्य-स्थिति, सतत मौजूद तीन पात्र, और बेंच का झगड़ा—यह है इस घटनाविहीन और शब्दबहुल नाटक का कुल ढाँचा। रंगकर्मी आसान मंचीय ढाँचे के कारण इसे बार-बार खेलते जरूर हैं, पर इसकी नाटकीयता वैसी आसान नहीं है। मैंने इस नाटक की तीन-चार प्रस्तुतियाँ पहले भी देखी हैं, लेकिन यह प्रस्तुति इस नाटकीयता को ज्यादा अच्छी तरह पहचान पाई है। इसके किरदारों में अपने मूड की शिद्दत कहीं ज्यादा है। अपनी जिद या खब्