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भारतीय फिल्म संगीत पर एक जरूरी पुस्तक

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भारतीय स्वभाव मूलतः आख्यानमूलक होने से यहाँ बातों के विस्तार में जाने की प्रवृत्ति तो खूब है, पर तह में जाने की प्रवृत्ति कम पाई जाती है। उदाहरण के लिए हमारे पास इसकी तो बहुत सी कहानियाँ हैं कि कैसे भारतीय फिल्म संगीत ने दुनिया भर में नाम कमाया, लेकिन इस लोकप्रियता के मूल में कौन-सा व्याकरण है इसपर तवज्जो ज्यादा नहीं दिखाई देती। अभिषेक त्रिपाठी की पुस्तक ‘ इंडियन फिल्म म्यूजिक एंड द एस्थेटिक्स ऑफ कॉर्ड्स ’ इस लिहाज से काफी महत्त्वपूर्ण है। इसका उपशीर्षक है ‘ डिकोडिंग द थॉट्स ऑफ अ कंपोज़र ’ । दुनियाभर के संगीत की तुलना में भारतीय संगीत की क्या विशेषता है और संगीत कैसे अपने सुनने वाले पर असर करता है आदि विषयों की बारीकी और गहराई को उन्होंने इतना सरल तरह से बताया है कि तकनीकी गरिष्ठता भी यहाँ काफी सुपाच्य हो गई है। कॉर्ड का अर्थ है स्वर-संघात। यह कम से कम तीन स्वरों से मिलकर बनी स्वर-संगति ( Harmony ) की सबसे छोटी और आरंभिक इकाई है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल वाले प्यारेलाल शर्मा के मुताबिक- ‘ संगीत के क्षेत्र में दाखिल हो रहे व्यक्ति के लिए कॉर्ड के सिस्टम को समझना जरूरी है। जितना आप उन्हे

बैठने का झगड़ा और इंतकाम की आग

लॉकडाउन के बाद पहला नाटक पिछले हफ्ते ग्वालियर में देखना नसीब हुआ। वहाँ के मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय के थिएटर-ग्रेजुएट प्रमोद पाराशर ने यह फेस्टिवल ‘भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान’ (IITTM) के सहयोग से और उन्हीं के प्रेक्षागृह में आयोजित किया। समारोह के दोनों नाटक प्रमोद के ही निर्देशन में थे। पहली प्रस्तुति ‘पार्क’ में पार्क की एक बेंच पर बैठने का झगड़ा है। अलग-अलग कारणों से नाटक के तीनों पात्र एक ही खास जगह पर बैठना चाहते हैं। अपने को सही साबित करने के लिए वे यहूदी, इजराइल और कश्मीर आदि का उदाहरण देते हैं। इस तरह झगड़े की मार्फत विस्थापन और बेदखली का डिस्कोर्स नाटक में खोंस दिया गया है। एक ही दृश्य-स्थिति, सतत मौजूद तीन पात्र, और बेंच का झगड़ा—यह है इस घटनाविहीन और शब्दबहुल नाटक का कुल ढाँचा। रंगकर्मी आसान मंचीय ढाँचे के कारण इसे बार-बार खेलते जरूर हैं, पर इसकी नाटकीयता वैसी आसान नहीं है। मैंने इस नाटक की तीन-चार प्रस्तुतियाँ पहले भी देखी हैं, लेकिन यह प्रस्तुति इस नाटकीयता को ज्यादा अच्छी तरह पहचान पाई है। इसके किरदारों में अपने मूड की शिद्दत कहीं ज्यादा है। अपनी जिद या खब्