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इस्लाम और ईसाइयत

अल बरूनी से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना तक ने यह माना है कि इस्लाम और हिंदुत्व एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि उनमें कोई तुलना संभव नहीं। लेकिन इस्लाम की तुलना ईसाइयत के साथ संभव है। क्योंकि दोनों में ही एक किताब, एक पैगंबर, धर्मांतरण, ईशनिंदा आदि एक जैसे कांसेप्ट मौजूद होने के साथ-साथ दोनों का ऐतिहासिक स्रोत भी एक ही है। पर इस्लामी समाजों में जहाँ ये कांसेप्ट हड़कंप का सबब बन जाते हैं वहीं ईसाई समाजों में इनका अक्सर उल्लंघन होता है और किसी को खास परवाह नहीं होती, जिसकी वजह है व्यक्ति की आजादी के सवाल को सबसे ऊपर रखना। दारियो फो के नाटक ‘कॉमिकल मिस्ट्री’ और टीवी शो ‘फर्स्ट मिरेकल ऑफ इन्फैंट जीसस’ को वेटिकन द्वारा सबसे भयंकर ब्लाशफेमी करार देने के बावजूद कई दशकों तक उनके प्रदर्शन वहाँ होते रहे। वहीं एक जमाने में धरती को ब्रह्मांड का केंद्र मानने की बाइबिल की धारणा से उलट राय व्यक्त करने पर गैलीलियो को जिस चर्च ने हाउस अरेस्ट की सजा सुनाई थी उसी चर्च ने अभी कुछ साल पहले कबूल किया कि ईश्वर जादूगर नहीं है और ‘बिग बैंग’ और ‘थ्योरी ऑफ ईवोल्यूशन’ दोनों ही अपनी जगह सही हैं। चर्च बदलते वक्त के मुताब

बैठने का झगड़ा और इंतकाम की आग

लॉकडाउन के बाद पहला नाटक पिछले हफ्ते ग्वालियर में देखना नसीब हुआ। वहाँ के मानसिंह तोमर विश्वविद्यालय के थिएटर-ग्रेजुएट प्रमोद पाराशर ने यह फेस्टिवल ‘भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंधन संस्थान’ (IITTM) के सहयोग से और उन्हीं के प्रेक्षागृह में आयोजित किया। समारोह के दोनों नाटक प्रमोद के ही निर्देशन में थे। पहली प्रस्तुति ‘पार्क’ में पार्क की एक बेंच पर बैठने का झगड़ा है। अलग-अलग कारणों से नाटक के तीनों पात्र एक ही खास जगह पर बैठना चाहते हैं। अपने को सही साबित करने के लिए वे यहूदी, इजराइल और कश्मीर आदि का उदाहरण देते हैं। इस तरह झगड़े की मार्फत विस्थापन और बेदखली का डिस्कोर्स नाटक में खोंस दिया गया है। एक ही दृश्य-स्थिति, सतत मौजूद तीन पात्र, और बेंच का झगड़ा—यह है इस घटनाविहीन और शब्दबहुल नाटक का कुल ढाँचा। रंगकर्मी आसान मंचीय ढाँचे के कारण इसे बार-बार खेलते जरूर हैं, पर इसकी नाटकीयता वैसी आसान नहीं है। मैंने इस नाटक की तीन-चार प्रस्तुतियाँ पहले भी देखी हैं, लेकिन यह प्रस्तुति इस नाटकीयता को ज्यादा अच्छी तरह पहचान पाई है। इसके किरदारों में अपने मूड की शिद्दत कहीं ज्यादा है। अपनी जिद या खब्

मुसलमान माँ

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  नि चले हिमालय में उत्तर भारत की खास आरामगाहें मसूरी और लैंडोर शिमला के मुकाबले कहीं ज्यादा खूबसूरत हैं। यहाँ से दिखने वाला देहरादून सिंप्लान की चढ़ाई से दिखने वाले इटली के मैदानी इलाके जैसा लगता है—भले ही वो सिंप्लान से ज्यादा बड़ा और विस्तृत है। मसूरी के माल पर शाम की गहमागहमी देखने लायक होती है। कोई घोड़े पर , कोई पहाड़ी टट्टू पर , कोई पैदल , और कुछ लोग पालकी पर। बड़ा ही खुशनुमा मंजर     होता है। हर कोई अपने पड़ोसी को जानता है , और संकरी सड़क से गुजरते हुए लोगबाग बार-बार दुआ-सलाम और चल रही खबरों या स्कैंडल पर चर्चा के लिए रुकते हुए चलते हैं। कभी आप कुर्सी-पालकी में सवार किसी सनाका खाई औरत को   ‘ बेशर्म कहीं के !’   कहकर चीखते सुनेंगे, क्योंकि   कोई प्रेमी जोड़ा सरपट अपने फुर्तीले अरब घोड़ों पर वहाँ से गुजरा होगा। कभी एक घबराई हुई माँ की तेज चीख घाटी में गूँजती हुई आएगी   जिसने अचानक देखा होगा कि उसका बच्चा इस बेपरवाह जोड़े के रास्ते में आ गया है। कभी-कभी हादसे भी होते हैं। कुछ साल पहले एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा   ‘ कैमल्स बैक ’   कही जाने वाली जगह के पास इसी तरह सवारी कर रहे थे कि