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सरनेम में क्या रखा है

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युवा रंगकर्मी फहद खान के नव-अन्वेषित थिएटर-स्पेस में पिछले सप्ताह अशोक लाल का नया नाटक ‘ह्वाट इज इन सरनेम’ देखा। उन्होंने हौज खास स्थित दृष्टिबाधित लड़कियों के हॉस्टल में उपलब्ध अपने ग्रुप के रिहर्सल-स्पेस को ही स्टूडियो थिएटर नुमा शक्ल दे दी है, जहाँ हुआ यह नाटक एक आधुनिक प्रहसन है। नाटक में जातिवाद और बेरोजगारी को एक मज़ाकिया थीम में पेश किया गया है। बैकस्टेज को स्टेज पर दिखाने की तरकीब भी इसमें आजमाई गई है, जिसमें एक पात्र दूसरे से कहता है-यह तो मेरा डायलाग था। इसके दोनों मुख्य पात्र आपस में दोस्त हैं, जिनके नाम हैं- अग्निहोत्री और परमार। एक ब्राह्मण, दूसरा शेड्यूल कास्ट। पहला दूसरे में ‘रिजर्व कोटा के कारण नौकरी मिलने के प्रबल आत्मविश्वास’ को देखकर कुंठित है, और सोचता है कि क्यों न वह खुद शेड्यूल कास्ट बन जाए। लेकिन उसकी माँ उसे बताती है कि उनके लिए अगर रिजर्वेशन है तो क्या हुआ, हम ऊँची जात वालों में भाई-भतीजावाद चलता है। उधर दूसरे की समस्या है कि उसकी एक ब्राह्मण लड़की से मोहब्बत है। अपनी-अपनी हसरतों को अंजाम तक पहुँचाने के लिए वे अपना सरनेम बदल लेते हैं। इस बीच दोनों लड़कों और लड

कहानी का रंगमंच : एक रंग प्रयोग

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वरिष्ठ रंग निर्देशक देवेंद्रराज अंकुर ने करीब तीस साल पहले ‘कहानी का रंगमंच’ नाम से एक कथित सिद्धांत प्रतिपादित किया था, जिसके अंतर्गत उन्होंने कहानी के मंचन को नाट्यालेख, चरित्रांकन, कास्ट्यूम, सेट और यहाँ तक कि निर्देशन आदि तमाम ‘बंधनों’ से मुक्त कर दिया। इसके पीछे उनका तर्क रहा है कि ‘यदि हम कहानी के साथ कोई छेड़छाड़ करते हैं तो फिर वह कहानी कहाँ रह जाएगी!’ बहुत सी आपत्तियों से अविचलित अपने इस सिद्धांत को वे निरंतर कार्यरूप में परिणत करते रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने खुद की भूमिका निर्देशक के बजाय परामर्शदाता की मुकर्रर की है। अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल ने एक प्रयोग के जरिए उनके सिद्धांत की असलियत परखने की कोशिश की है। रंगमंडल ने उनसे धर्मवीर भारती की कहानी ‘बंद गली का आखिरी मकान’ की दो प्रस्तुतियाँ एक साथ तैयार करवाई हैं। एक प्रस्तुति ठेठ अंकुर-शैली में है, लेकिन दूसरी में रंगमंच के अवयवों का इस्तेमाल किया गया है। ‘बंद गली का आखिरी मकान’ एक सघन कथानक वाली लंबी कहानी है, जिसमें कथोपकथन पर्याप्त मात्रा में है। इस आसानी के बावजूद प्रस्तुति देखकर एक बात तय मालूम देती है कि इसके

चार नाट्य प्रस्तुतियाँ

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बॉस जो प्यादा है  राजेश बब्बर निर्देशित प्रस्तुति ‘प्यादा’ एलटीजी में देखी। इसका मुख्य पात्र ‘आधे अधूरे’ के महेन्द्रनाथ से मिलता-जुलता है। उसमें आत्मविश्वास की कमी है और वह अपनी बात ठीक से कह नहीं पाता। लेकिन उसकी बीवी सावित्री से मिलती-जुलती नहीं है। यह अपने पति के दोस्त के साथ फ्लर्ट और हमबिस्तरी के रिलेशन में है। दूसरी अहम बात यह है कि ये कोई निम्म मध्यवर्गीय नहीं बल्कि उच्च वर्गीय पात्र हैं। पति एक कंपनी का बॉस है और बहुत से लोगों को नौकरी पर रखने और निकालने की हस्ती रखता है। लेकिन उसकी बीवी का अवैध रिलेशन उसकी दुनियावी हस्ती को धूल में मिला रहा है। अपमान और कुंठा से जूझता पति इससे उबरने की जो सूरतें निकालता है वे थोड़ी अटपटी हैं। जो भी हो, उसका फ्रस्ट्रेशन प्रस्तुति में बहुत अच्छी तरह सामने आया है। जिस क्रम में कुछ ऐसी उप-स्थितियाँ भी नत्थी कर दी गई हैं जिनमें एक तनावपूर्ण मेलोड्रामा है और जिस वजह से प्रस्तुति आखिर तक बाँधे रखती है। नौकरानी के पति का बखेड़ा और ऑफिस के कर्मचारी शर्मा के अन्यत्र संबंध के ये प्रसंग प्रस्तुति में डिजाइनर क्षेपक की तरह हैं। नाटक के लेखक जितेन्द्र म

अतुल कुमार की प्रस्तुति 'गोदे, गोदो, गोदिन'

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पाँच पात्रों का नाटक है ‘वेटिंग फॉर गोदो’। इसमें एनएसडी द्वितीय वर्ष के पूरे बैच को खपाने के लिए निर्देशक अतुल कुमार ने नौ शोरूम नुमा कमरों का एक कॉम्प्लेक्स खड़ा करवा दिया। इन कमरों में अलग-अलग डीडी और गोगो हैं। हैट लगाए डीडी और गोगो का प्रारूप दुनिया भर की प्रस्तुतियों में लगभग तय सा है। यहाँ इसी प्रारूप के भीतर कई तरह की रंगतें पैदा की गई हैं। कोई चेहरे पर रंग पोते है, किसी की पतलून नीचे खिसक जाती है, किसी का कोट ज्यादा फटीचर है, वगैरह। किसी सीढ़ी से होते हुए, कोई दरवाजा खोलकर ये स्लो मोशन में मंच पर नमूदार होते हैं। अक्सर इनका बर्ताव किसी कार्टून करेक्टर का सा है, जो नाटक के आखिरी हिस्से में बाकायदा ऐसा ही है। इस पूरे सेटअप में मूल नाटक कितना है यह तो अलग मुद्दा है, लेकिन लाइट्स और टाइमिंग की सटीकता कैसे खुद में एक खालिस दृश्य रचती है यह देखने लायक है। इस क्रम में पहले तो रोशनी किसी एक कमरे में केंद्रित होती है, फिर वहाँ के डीडी-गोगो की अधूरी बात में ही ऑफ होकर किसी दूसरे कमरे में ऑन होती है, और बाकी संवाद हम वहाँ मौजूद दूसरे डीडी और गोगो से सुनते हैं। चमकदार दृश्य कौंध की तरह ह

विंडरमेयर फेस्टिवल में 'अवेकनिंग्स'

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बरेली के विंडरमेयर फेस्टिवल में इधर कई वर्षों के बाद जाना हुआ। इसके सूत्रधार और संचालक डॉक्टर ब्रजेश्वर सिंह शहर के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं, जिनकी शख्सियत अपने में एक बायोपिक का विषय है। उनके थिएटर ग्रुप रंग विनायक ने इस बार उनके सुझाव पर ‘अवेकनिंग्स’ नाम की प्रस्तुति की, जो सन 1973 में लिखी गई इसी नाम की पुस्तक और बाद में उसपर बनी फिल्म से प्रेरित है। पुस्तक के लेखक डॉक्टर ओलिवर सैक्स ने इसमें अपने उन अनुभवों को लिखा है जो 1920 के दशक में फैली ‘स्लीपिंग सिकनेस’ नाम की बीमारी के मरीजों के इलाज के दौरान उन्हें हुए। इन मरीजों की चेतना एक लंबी नींद में ठहर गई है। उनमें एक खिलाड़ी है, एक म्यूजिक कंपोजर, एक नॉवलिस्ट, एक कवि। इन्हीं में से एक मरीज मिस रोज़ को गेंद कैच करते देख डॉक्टर सैक्स को उसमें ठीक होने की संभावना नजर आती है, क्योंकि बरसों से एक ‘स्टक पोजीशन’ में होने के बावजूद वह ऐसा कर पा रही है। वह अपने सीनियर डॉक्टर की दलील कि ‘यह महज एक रिफ्लैक्स है’ को यह कहकर खारिज करते हैं कि अगर वैसा होता तो वह गेंद से बचने की कोशिश करती न कि उसे पकड़ने की। एक मरीज है जिसके अंग-प्रत्यंग बु

पिता की याद

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मेरे पिता दुनियादारी के लिहाज से नितांत अव्यावहारिक इंसान थे। एक गृहस्थ की सलाहियत उनमें ज्यादा नहीं थी। दरअसल वे एक सुखवादी व्यक्ति थे। कोई भी समस्या उनके लिए बहुत बड़ी नहीं थी। इसीलिए आसन्न समस्याओं को लेकर भी उनके पास कोई योजना नहीं होती थी। कई बार समस्या जब बड़ी होकर सिर पर आ खड़ी होती तो वे अपने बिस्तर पर जाकर सो जाते। उनका यह स्वभाव उनके दांपत्य को निरंतर कलहपूर्ण बनाए रखता। मेरी माँ उनकी सनातन विरोधी थीं। असल में वो हर किसी की विरोधी थीं, और स्वयं की प्रबल समर्थक थीं। कलह का एक कारण उनके पास हमेशा मौजूद होता—अनियमित और अपर्याप्त आमदनी। पिता ज्यादातर समय अस्थायी नौकरियाँ या फ्रीलांस काम ही करते रहे। इस तरह किल्लत और कलह से युक्त हमारे घर के इस वातावरण में बीती 27 नवंबर को मेरी माँ के दिवंगत होने तक 60 साल पुराना उनका दांपत्य अटूट चलता रहा। 0000 सन 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के अगले से अगले रोज जब सिख विरोधी हिंसा भड़की हुई थी, एक घटना घटी। एक व्यक्ति साइकिल के कैरियर पर कपड़े धोने के पीले साबुन का 15-20 किलो का एक गट्ठा हमारे गेट पर रखकर हड़बड़ी में चला गया। किसी ने बताया

इतिहास से मुगलों और डार्विन को हटाए जाने की पूर्वकथा

  एस.एल. भैरप्पा (प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक) वर्ष 1969-70 में श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने नेहरू-गाँधी परिवार के करीबी राजनयिक जी. पार्थसारथी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया। कमेटी का काम था-- शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोना। उस समय मैं एनसीईआरटी में शैक्षणिक दर्शनशास्त्र विषय में रीडर था और समिति के पाँच सदस्यों में चुना गया था। हमारी पहली बैठक में श्री पार्थसारथी ने बतौर कमेटी चेयरमैन प्रायः एक कूटनीतिक भाषा में हमें समिति का उद्देश्य समझाया : "यह हमारा कर्तव्य है कि हम बढ़ते बच्चों के मन में ऐसे कांटे न बोएँ जो आगे चलकर राष्ट्रीय एकता में बाधा खड़ी करें। ऐसे काँटे ज्यादातर इतिहास के पाठ्यक्रमों में मिलते हैं, और कभी-कभी भाषा और समाज विज्ञान के पाठ्यक्रमों में भी। हमें उन्हें निकाल बाहर करना है। हमें केवल ऐसे विचारों को शामिल करना है जो हमारे बच्चों के मन में राष्ट्रीय एकता की अवधारणा को मजबूती से बिठाते हों। इस समिति को यह महती जिम्मेदारी दी गई है।”   बाकी चार सदस्य उनकी बात के समर्थन में सम्मान से अपना सिर हिला रहे थे। लेकिन मैंने कहा, "सर,