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कला दृष्टियों का फर्क

भारतीय और पश्चिमी कला-दृष्टियों के फर्क को अमूमन प्रस्तुति-विन्यास के अर्थ में देखा जाता है। इसीलिए इसका ज्यादातर जिक्र संगीत, नृत्य, चित्रकला अथवा नाट्य शैलियों के संदर्भ में ही होता है। विभिन्न सेमिनारों, पुस्तकों और पाठ्यक्रमों में इन दो कला-दृष्टियों की चर्चा होती है, उनके फर्कों को समझाया जाता है, लेकिन मैंने ऐसी कोई व्याख्या कहीं नहीं देखी जो वास्तव में यह बता पाए कि ये दो दृष्टियाँ अपने मूल रूप में हैं क्या, और एक समाज के रूप में हमें उन्हें किस तरह लेना चाहिए। इसकी वजह शायद यह है कि ये दृष्टियाँ जिन जीवन प्रणालियों से उद्भूत होती हैं वे हेड और टेल की तरह सिक्के के दो ऐसे सर्वथा विपरीत छोर हैं कि कभी एक-दूसरे को देख नहीं पाते। इसीलिए भारत और पश्चिम दोनों ही ओर के बड़े से बड़े विद्वान कुछ लक्षणों की चर्चा करके ही रह जाते हैं। लेकिन वहीं राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के स्तर पर पिछले ढाई-तीन सौ सालों से ऐसी प्रक्रियाएँ सघन से सघनतर और सघनतम होती गई हैं कि भारतीय और पश्चिमी जीवन प्रणाली में एक गहरा अंतर्ग्रंथन होता गया है। लेकिन क्या यह अंततः दो अपरिचितों का सहवास ही नहीं है? कभी ...

जैकुब स्जेला की अमूर्त कहानी

भारत रंग महोत्सव में पिछले साल देखी एक लाजवाब पोलिश प्रस्तुति 'इन द नेम ऑफ जैकुब स्जेला ' की याद आती है।  जैकुब स्जेला  उन्नीसवीं शताब्दी का किसान विद्रोही था, जिसने पड़ोसी देश आस्ट्रिया की मदद से पोलैंड के ताल्लुकेदारों के खिलाफ रक्तरंजित विद्रोह किया था। प्रस्तुति की निर्देशिका मोनिका स्त्र्जेप्का के मुताबिक आज का पोलिश मध्यवर्ग उसी जैकुब स्जेला  का वंशज है। लेकिन जैसा कि शीर्षक से भी जाहिर है, प्रस्तुति का उसके किरदार से कोई लेना-देना नहीं है। यह उसके नाम के बहाने इंप्रेशनिज्म का एक प्रयोग थी। प्रस्तुति में एक अमूर्त सिलसिले में बहुत सी स्थितियां लगातार घट रही हैं। यह एक बर्फीली जगह का दृश्य है। पूरे मंच पर 'बर्फ' फैली हुई है। बिजली या टेलीफोन के खंबे लगे हुए हैं। पीछे की ओर टूटे फर्नीचर वगैरह का कबाड़ पड़ा है। दाहिने सिरे पर एक कमरा है जो नीचे की ओर धंसा हुआ है। पात्र उसमें जाते ही किसी गहरे की ओर फिसलने लगते हैं। मंच के दाहिने हिस्से के फैलाव में पड़ा गाढ़े लाल रंग का परदा है, जो बर्फ की सफेदी में और ज्यादा सुर्ख लगता है। यह घर से ज्यादा घर के पिछवाड...

बनारस में मैकबेथ

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व्योमेश शुक्ल की नई प्रस्तुति ‘बरनम वन’ का कलेवर मैकबेथ की तमाम होती रही प्रस्तुतियों में काफी मौलिक और नया है। यह खाली-मंच पर पश्चिमी ऑपेरा की मानिंद एक कास्ट्यूम ड्रामा है। अभिनेतागण यहाँ पारंपरिक एंट्री-एग्जिट के बजाय अचानक किसी भी छोर से नमूदार पाए जाते हैं। म्यूजिक और कोरियोग्राफी का खेल भी इसमें निरंतर चलता रहता है। फिर तुर्रा यह कि ये म्यूजिक भी रोमन दौर पर बनी हॉलीवुड फिल्मों की तर्ज का है। ‘कामायनी’, ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘चित्रकूट’ जैस ी बैले प्रस्तुतियों से बनी छवि से व्योमेश का ये एक करारा शिफ्ट है। लेकिन प्रस्तुति की समस्या है उसका आलेख। रघुवीर सहाय के ‘तदनंदर संगति का लाभ सुखकर होगा’ जैसे विशुद्ध गद्य-संवादों वाले इस अनुवाद की एक प्रस्तुति मैंने पहले भी देखी है—इसमें कथावस्तु और पात्रों की कोई स्पष्टता नहीं बन पाती। इस तरह प्रस्तुति निरंतर एक ‘अमूर्त कथानक’ का बोरियत भरा सत्यापन करने में गर्क हो सकती थी। पर वैसा नहीं हुआ तो इसका कारण था उसमें नई-नई चीजों से खेलने की अच्छी एनर्जी। यहाँ मैकबेथ अपनी कशमकश को स्टाइलाइज्ड करता है। गहरा तनाव उसके चेहरे पर है, पर अगला पाप उसे ...

बुंदेलखंड का नया सितारा-- विश्वनाथ पटेल

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रिहर्सल के बाद मंच के पास बनी कुटिया में सुबह देर तक सोए कलाकार अगर संगीत नाटक अकादमी में जुझारू लोगों के लिए कोई पुरस्कार हो तो वो सबसे पहले नौजवान विश्वनाथ पटेल को मिलना चाहिए। विश्वनाथ का गाँव महलवारा दमोह से 40 किलोमीटर दूर है। मध्यप्रदेश ड्रामा स्कूल से पास होकर निकले विश्वनाथ ने दो-तीन साल पहले एक संस्था बनाकर यहाँ रंगमंच का काम शुरू किया। ऐसी सांस्कृतिक वीरानी थी कि इस पहलकदमी से जुड़ने को आतुर सैकड़ों युवाओं का प्रबंधन एक समस्या बन गई। उन्होंने नदी के किनारे और खेत में दो-तीन हजार लोगों की भीड़ के सामने नाटक किए। पर तब जो समस्या सामने आई वह थी बुंदेलखंड का प्रसिद्ध जातिवाद। विश्वनाथ ने पारंपरिक गीत गाने वाली गाँव की कुछ बुजुर्ग महिलाओं को भी जब मंच पर उतारा तो कुछ लोगों को यह मंजूर नहीं हुआ कि चमार जाति की महिलाओं को कला के नाम पर सिर चढ़ाया जाए। धमकी से डरी महिलाओं ने संगत छोड़ दी, और उन्हें फिर से अपने साथ लाने में काफी पापड़ बेलने पड़े।....धीरे-धीरे काम ने असर दिखाया, अब एक शुभचिंतक ने एक बड़ी जमीन संस्था को दान में दे दी है, जहाँ कँटीले तारों की फेंसिंग में एक ओपन स...

मेघदूत में ‘राम की शक्तिपूजा’

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कथक नृत्यांगना प्रतिभा सिंह निर्देशित प्रस्तुति ‘राम की शक्तिपूजा’ में सबसे ज्यादा जो चीज दिखती है वो है मनोयोग। उनके नाट्यग्रुप ‘कलामंडली’ में शास्त्र-निपुण कलाकारों से लेकर दिल्ली की कठपुतली कालोनी के उजाड़ दिए गए परिवारों के प्रशिक्षु युवा तक शामिल हैं। करीब 45 कलाकारों की इस प्रस्तुति में कई बड़े पैमाने की दृश्य योजनाएँ शामिल थीं। शक्तिरूपा देवी दुर्गा यहाँ एक विशाल पुतुल आकृति के तौर पर मौजूद हैं। देवी के वाहन को दर्शाने  के लिए एक व्यक्ति एक लाठी के मुहाने पर बँधे शेर के सिर को लिए आगे-आगे चलता है। इसी तरह राम, रावण और हनुमान बने पात्रों का वैभव अपने मेकअप में देखने लायक है। वानर सेना या कोरस के तौर पर माइम वेशधारी समूह है, जिसमें अपना मुखौटा पकड़े जामवंत भी शामिल हैं। इसके अलावा बीच-बीच में कुछेक स्थितियों को कथक के टुकड़ों में भी भावाभिव्यक्त किया गया है। प्रस्तुति में निराला की दुरूह कविता के लाइव वाचन जैसे मुश्किल काम को भी अंजाम दिया गया है, जिसके डिजाइन में चंद तात्कालिक त्रुटियों के बावजूद भाव वैविध्य का अच्छा लालित्य है। इसके लिए सुमन कुमार, विजय सिंह और योगेश पांड...

विकास बाहरी की 'खिड़की'

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विकास बाहरी के नाटक ‘खिड़की’ में कथानक के भीतर घुसकर उसकी पर्तें बनाने और खोलने की एक युक्ति है। यह मंच पर मौजूद मुख्य पात्र के भ्रम और यथार्थ का एक खेल है, जिसमें दर्शक फँसा रहता है। यह पात्र एक लेखक है, जो अपनी खिड़की से सामने की खिड़की में मोबाइल पर बात करती एक लड़की को देखता है। ऐन इसी वक्त अपने फटेहाल हालात से जूझते हुए वह एक कहानी की तलाश भी कर रहा है। मोबाइल पर बात करती लड़की के चेहरे के बदलते भावों से वह एक कहानी बनाता है। कमा ल की बात है कि यह कहानी अपने पात्रों के रखे गए नामों सहित पूरी सही साबित होती है।  सिर्फ दो पात्रों के एक घंटे के नाटक में दूसरी पात्र खिड़की वाली लड़की है। प्रस्तुति में बयान की नाटकीयता है, और साथ ही आशय की एक दिशा भी। विकास बाहरी में चीजों को फ्रेम के भीतर ही बरतने की अच्छी आदत है। वरना थोड़ी सी ढील से मानव कौल के नाटकों की तरह यह प्रस्तुति भी साहित्यिक शब्दों का गट्ठर बन सकती थी। रंगमंचीय वक्रता साहित्यिक जुमले से अलग चीज होती है, इस बात की समझ इस प्रस्तुति में है, जो कि अपने यहाँ कम ही दिखाई देती है। स्थितियों के ट्रीटमेंट में भी दृश्य काफी...

रीवा में रंग-अलख

रीवा में मनोज मिश्रा ने एक बैंक्वेट हॉल को प्रेक्षागृह की शक्ल दे दी है। मशक्कतों से तैयार किया गया इसका स्टेज अच्छा-खासा किंतु अस्थायी है। शादियों के सीजन में उसे उखाड़ देना पड़ता है। रंग-अलख नाट्य उत्सव में इसी स्टेज पर मंडप आर्ट्स की प्रस्तुति ‘एक विक्रेता की मौत’ देखने को मिली। कुछ साल पहले बघेली में ‘वेटिंग फॉर गोदो’ कर चुके मनोज ने आर्थर मिलर के इस नाटक को भी बघेली भाषा में ही मंचित किया है। मुख्य किरदार का नाम यहाँ रमधरिया है और उसके बेटों  का बुधी और सुक्खी। यह एक शहरी हकीकत की आंचलिक भाषा में प्रस्तुति ही नहीं है, बल्कि आज की उत्तरआधुनिकता में एक खारिज होती जा रही जीवन शैली के मूल्यों का पाठ भी है। अपने बारे में जरूरत से ज्यादा सोच रहा आज का इंसान अचानक से रिश्तों की एक दुनिया में जा पहुँचता है, जहाँ हालात के अपने बहुत से द्वंद्व एक मारक यथार्थ रचते हैं। अमरीकियों द्वारा लिखे गए नाटकों में जॉन स्टीनबैक के ‘ऑफ माइस एंड मेन’ की तरह ही ‘डेथ ऑफ ए सेल्समैन’ भी यथार्थ की उन अंतर्भूत त्रुटियों को दिखाता है जहाँ से एक नियति गहरे संवेदनात्मक रूप में प्रकट होती है। यह प्रस्तुति का ...

ग्वालियर में तीन नाटक

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ग्वालियर के नाट्य मंदिर प्रेक्षागृह में जाने से लगता है मानो आप वक्त के किसी लंबे वक्फे का हिस्सा हों। यहाँ की दीवारों, कुर्सियों, पंखों तक में कई दशक पुराना माहौल आज भी अक्षुण्ण है। प्रेक्षागृह का स्वामित्व आर्टिस्ट कंबाइन नाम की जिस 75 साल पुरानी संस्था के पास है उसके साथ मिलकर योगेन्द्र चौबे ने यहाँ तीन नाटकों का एक समारोह आयोजित किया। योगेन्द्र चौबे अभी डेढ़ साल पहले ही शहर की मानसिंह तोमर यूनीवर्सिटी के ड्रामा विभाग प्रमुख मुकर्रर हुए हैं। वे जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में छात्र थे तब उनका जो काम देखा था वह अब तक भूल भाल गया था। लेकिन इस समारोह में अपने छात्रों के लिए निर्देशित दो नाटकों में योगेन्द्र डिजाइन के बिल्कुल नए तेवरों के साथ नमूदार हुए। पहली प्रस्तुति ‘युगद्रष्टा’ में उन्होंने हिंदी की कुछ कविताओं को एक थीम में बाँधा है। प्रारंभिक दृश्य में लंबे सफेद कपड़े के आरपार व्यास जी और गणेश जी बैठे हैं। इस तरह शुरू हुई कथा चीरहरण के दृश्य की उत्तेजक बहस ‘उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएँगे‘ की काव्यात्मकता तक पहुँचती है। संवादों में अच्छी वक्रोक्तियाँ हैं, जिनमें ...

वसंत काशीकर की प्रस्तुतियाँ

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जबलपुर के दिनेश ठाकुर स्मृति प्रसंग में वसंत काशीकर की प्रस्तुति ‘खोया हुआ गाँव’ देखी। वसंत काशीकर में आंचलिकता की अच्छी सूझ है। उनकी पिछली प्रस्तुति ‘मौसाजी जैहिंद’ में तो फिर भी पड़ोस के बुंदेलखंड का परिवेश था, पर इस बार तो बिल्कुल ही बेगानी जगह कश्मीर को दिखाया गया है। मोतीलाल केमू के इस नाटक में पाँच गाँवों के डाकघर में सारंगी का शौकीन एक नया डाकिया आया है। डाकिए की लोककलाकारों के उस गाँव में बड़ी रुचि है जहाँ कोई चिट्ठी नह ीं आती। वह वहाँ जाने की तरकीब निकालता है। इसी बीच एक प्रेम कहानी भी नत्थी होती है। कहानी तो जो है सो है, पर असली चीज है उसकी छवियाँ। प्रस्तुति के पात्र कुछ लोककथानुमा हैं। डाक को इकट्ठा करने में तन्मय डाक बाबू उम्र की ताजगी लिए नए डाकिये को चारों गाँवों के बारे में बता रहा है। फिर रास्ते में डाकिये को भेड़ों का रेवड़ लिए आ रहा एक चरवाहा मिलता है। चरवाहे को आँख मिचमिचाने की आदत है। कपड़ों के मुखौटों के पीछे उसकी भेड़ों की व्यग्रता भी देखते ही बनती हैं। चरवाहा जब उन्हें समेटकर विंग्स की तरफ ले जा रहा है तो एक उनमें से निकलकर औचक भाग खड़ी हुई है। साइकिल पर जा रह...

मल्लाह टोली

मल्लाह टोली ========= नीलेश दीपक की प्रस्तुति ‘मल्लाह टोली’ एक बस्ती का वृत्तचित्र है। ‘कैमरा’ यहाँ ठहर-ठहरकर कई घरों के भीतर जाता है, और एक छोटे से परिवेश में तरह-तरह के किरदारों से बनी एक दुनिया को दिखाता है। यह मिथिलांचल के तीन बड़े कथाकारों में से एक राजकमल चौधरी की कहानी है, जिसमें एक आम यथार्थ के भीतर कुछ खास पात्र दिखाई देते है। ये पात्र अचानक कोई ऐसी हरकत कर बैठते हैं कि उससे एक घटना पैदा होती है। हट्टा-कट्टा महंता अपने खास दोस्त से मारपीट कर उसकी नई ब्याहता को हड़प ल ेता है। सब शराब के साथ मछली खाते हुए जश्न मना रहे हैं कि उसकी उपेक्षित हस्ती ऐसा उबाल मारती है कि वो जाकर पिरितिया से लिपट जाता है और छुड़ाने आए उसके पति को उठाकर पटक देता है। ऐसी एक्शनपैक्ड स्थितियों से जो रुचि बनती है उसे नीलेश ने लोक संगीत के साथ नत्थी कर एक निरंतरता बनाए रखी है। कहानी में एक ओर दबंग की बीवी होने को मजबूर पिरितिया है, तो वहीं अपने अशक्त पति की सेवा-सुश्रूषा में पूरी मोहब्बत से जुटी केतकी भी है, जो काफी लंबे अंतिम दृश्य में तिरपित मिसिर की गुप्ती उसी के पेट में उतार देती है। प्रस्तुति में नए-नए...

रायपुर में सखाराम बाइंडर

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रायपुर में 20 से 23 मई तक आयोजित ‘रंग-जयंत’ में शामिल प्रस्तुतियों में ‘सखाराम बाइंडर’ सबसे नई थी। यह इसका दूसरा ही शो था। निर्देशक जयंत देशमुख ‘आधे अधूरे’ के बाद एक बार फिर इसमें मंच-सज्जा की एक विशद विवरणात्मकता के साथ मौजूद थे। सखाराम के घर में दो कमरे हैं। छोटा कमरा रसोई है। वहाँ रखी लोहे की अँगीठी में छोटी-छोटी लकड़ियाँ ठुँसी हुई हैं, जिसपर रखे भगोने से धुआँ उठ रहा है। लक्ष्मी जब जलती हुई तीली लकड़ियों में डालती है तो अँगीठी में हिलती हुई लाल रोशनी दिखने लगती है। मैंने विदेशी नाटकों में तो देखा है, पर हिंदुस्तानी थिएटर में इस किस्म की डिटेलिंग एक दुर्लभ चीज है। रसोई में घड़ा, ड्रम, डालडे का पुराना डिब्बा, थाली-बर्तन आदि बहुत कुछ है। एक मुख्य दरवाजा और उसके बाहर एक टप्पर है, जहाँ बारिश की एक रात लक्ष्मी आसरा पाती है। एक लंबे अरसे में इकट्ठा हुआ बहुत सा जरूरी-गैरजरूरी सामान सखाराम के इस घर में पैबस्त है, और इस सज्जा का प्रस्तुति के कुल यथार्थ में एक गहरा दखल है। कमरे और रसोई की खिड़कियों के बाहर भी एक बस्ती, लोग और चिड़िया-कौए आदि हैं, जिनके आभास अनायास (और कई बार प्रत्यक्ष) प्रस...

भीष्म साहनी के नाटक

हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैं, वहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान ‘कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आजादी का एजेंडा हासिल हो जाने से आधुनिकता की नई प्रवृत्तियाँ सामने आईं। एकाएक व्यक्ति यहाँ प्रमुख हो गया था। वह व्यक्ति जो खुद को दूसरों से खास समझता था पर था उनके जैसा ही। फिर यह आधुनिकता कई तरह के प्रयोग करना चाहती थी। मंच को दर्शक दीर्घा तक ले जाया गया, या दर्शकों को मंच पर उतार दिया गया।....वगैरह। इस सारे कोलाहल के बीच भीष्म साहनी को हम एक ऐसे रचनाकार के रूप में पाते हैं जिनकी आधुनिकता ठेठ भारतीय परंपरा से उपजी है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि पश्चिम में दो-दो महायुद्धों ने व्यक्ति और उसके अस्तित्व के सवाल को जिस तरह केंद्र में ला दिया था वह उस तरह हमारी समस्या नहीं थी। (बावजूद इसके कि इन पश्चिमी प्रवृत्तियों का प्रभाव हिंदी में कई रचनाकारों पर काफी गहरा था; और कुछ ने इसे फैशनेबल ढंग से भी पकड़ा हुआ थ...

न्यायप्रियता जहाँ ले जाती है

अल्बेयर कामू के नाटक  ‘ जस्ट एसेसिन ’  उर्फ  ‘ जायज़ हत्यारे ’  को परवेज़ अख्तर ने  ‘ न्यायप्रिय ’  शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय  ‘ एब्सर्ड ’  की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से जुड़ी एक वास्तविक घटना पर आधारित है, पर प्रस्तुति में इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा गया है। एक अंग्रेज अफसर की हत्या की जानी है। लेकिन ऐन बम फेंके जाने के वक्त दो बच्चे वहाँ मौजूद होने से क्रांतिकारी मस्ताना बम नहीं फेंक सका। ग्रुप के एक क्रांतिकारी तेजप्रताप को ऐतराज है कि उद्देश्य की राह में भावुकता को आड़े क्यों आने दिया गया। लेकिन मस्ताना के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह बच्चों के ऊपर बम फेंक पाए। बहरहाल दूसरी कोशिश में अफसर मार दिया जाता है, और मस्ताना जेल में है। यहाँ एक दूसरा एब्सर्ड अफसर की बीवी के आगमन के रूप में पेश आता है। वह अपने मार दिए गए अफसर पति के कई मानवीय पक्षों के बारे में बताती है, और उसका यह बताना एक नया विरोधाभास पैदा करता है। उसके जाने के बाद एक सरकार...

दारियो फो : एक खरे मसखरे का जाना

अभी तीन साल पहले जीवन और रंगमंच में 60 साल तक उनकी सहचर रहीं पत्नी फ्रांका रेमे का निधन हुआ था, और अब इस 13 अक्तूबर को इतालवी नाटककार दारियो फो भी 90 साल की उम्र में दुनिया को विदा कह गए। फो अपने जीते-जी रंगमंच में प्रतिरोध की बहुत बड़ी आवाज थे। उनके लिखे 80 नाटक दुनिया की तीस से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद होकर खेले गए, जिनके कारण उन्हें भरपूर मात्रा में प्रशंसक और दुश्मन दोनों मिले और 1997 में नोबल प्राइज भी। फो के नाटकों की विशेषता थी- समकालीन मुद्दों से उनका जुड़ाव, अपने वक्त की तल्खियों पर तीखी व्यंग्यात्मकता और नाटकीयता का एक ऐसा ढाँचा जिसमें स्थितियाँ अपनी विचित्रताओं में बहुत तेजी से घटित होती हैं। उनके दो नाटक पूरी दुनिया में (और हिंदी में भी) सबसे ज्यादा खेले गए— ‘ एक्सीडेंटल डेथ ऑफ एन एनार्किस्ट ’ और ‘ चुकाएँगे नहीं ’ ( ‘can’t pay? won’t pay!’ )। इनमें ‘ चुकाएँगे नहीं ’ महँगाई के विषय पर केंद्रित नाटक है। शहर में बढ़ती कीमतों के बीच किसी स्टोर पर खाद्य पदार्थों की लूट हो गई है। एंटोनिया भी इस लूट में सामान ले आई है। अब उसे इस बात को अपने पति से छिपाना है, जो चुराए गए ...