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ढाई साल का युग

राजेन्द्र जी से मेरा साथ उनकी 84 बरस की उम्र के अंतिम ढाई सालों में रहा. इन ढाई में से बाद वाले एक-डेढ़ साल में हमारी अच्छी घनिष्ठता हो गई थी. यानी वह खुलापन और भरोसा आ गया था कि हम आपस में दुनियाभर के संदर्भों पर बेलाग हो सकें. राजेन्द्र जी खुलेपन के बगैर नहीं रह सकते थे, और बढ़ती उम्र और शारीरिक असमर्थताओं ने उनके भरोसे की एक भावनात्मक परिधि बना दी थी. इस परिधि में बहुत से लोग अपनी-अपनी वजहों से घुसना चाहते थे, पर जिसपर वस्तुतः दो एक लोगों का ही ठोस ढंग से कब्जा था. राजेन्द्रजी इन घुसने वालों और कब्जा बनाए रखने वालों के रोमांचक खेल में अंपायरिंग करते हुए लगभग हमेशा ही गलत फैसले लिया करते थे. ऐसा वे जानबूझकर नहीं करते थे, बल्कि ये गलत फैसले उनमें ‘ इनहेरेंट ’ थे. उनमें उलझावों में जीवन गुजारने की एक अदभुत क्षमता थी. इस तरह वे विपत्तियों से घबराए बगैर निरंतर सक्रिय बने रहते थे. इस लिहाज से यह उपयुक्त ही था कि मैं भावनात्मक के बजाय उनके ज्ञानात्मक भरोसे की परिधि में ही कहीं रहता था. वैसे जहाँ तक भरोसे की बात है, तो राजेन्द्रजी के साथ जीवन का लंबा समय गुजार चुके बहुत से लोग खुद उन्हें...

जीवट के अरुणप्रकाश

हिंदी की प्रकाश प्रत्यय वाली कहानीकार त्रयी में से अरुण प्रकाश उस क्लासिक कथा-मुहावरे के शायद अंतिम लेखक थे जहां संवेदना की डिटेलिंग धीरे-धीरे पाठक को घेरती है। उनकी बहुत पहले पढ़ीं 'जलप्रांतर', 'भैया एक्सप्रेस' और 'बेला एक्का लौट रही है' आदि कहानियों का प्लॉट अब धुंधला ही याद है। लेकिन यह याद है कि उनकी कहानियों में सुख छोटे-छोटे थे, लेकिन दुख ज्यादा बड़ा था। स्थितियों के समांतर एक अप्रकट यथार्थ वहां पात्र के भीतर घटता हुआ महसूस होता था। उनके पात्र उस दुनिया के थे, जहां कुछ छोटी-छोटी उम्मीदें होती हैं, और कुछ है जो सालता रहता है। अरुणप्रकाश का अपना जीवन भी ऐसी ही कई सालती रहने वाली कहानियों से बना था। उस दौरान पढ़ी उनकी कई कहानियों में एक होटल के स्टीवर्ड के जीवन पर भी थी। बाद में कभी हंस के स्तंभ 'आत्मतर्पण' में उनके लिखे का यह अंश पढ़ते हुए यह अनुमान हुआ कि शायद उस कहानी के किरदार वे स्वयं ही थे : ''लोदी होटल में वुडलेंड्स रेस्त्रां में अज्ञेय इलाजी के साथ आए थे. मैंने भोजन परोसा, भोजन के बाद जब टिप के पैसे इलाजी ने छोड़े तो अज्ञेय जी ने धीमे...