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बनारस में मैकबेथ

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व्योमेश शुक्ल की नई प्रस्तुति ‘बरनम वन’ का कलेवर मैकबेथ की तमाम होती रही प्रस्तुतियों में काफी मौलिक और नया है। यह खाली-मंच पर पश्चिमी ऑपेरा की मानिंद एक कास्ट्यूम ड्रामा है। अभिनेतागण यहाँ पारंपरिक एंट्री-एग्जिट के बजाय अचानक किसी भी छोर से नमूदार पाए जाते हैं। म्यूजिक और कोरियोग्राफी का खेल भी इसमें निरंतर चलता रहता है। फिर तुर्रा यह कि ये म्यूजिक भी रोमन दौर पर बनी हॉलीवुड फिल्मों की तर्ज का है। ‘कामायनी’, ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘चित्रकूट’ जैस ी बैले प्रस्तुतियों से बनी छवि से व्योमेश का ये एक करारा शिफ्ट है। लेकिन प्रस्तुति की समस्या है उसका आलेख। रघुवीर सहाय के ‘तदनंदर संगति का लाभ सुखकर होगा’ जैसे विशुद्ध गद्य-संवादों वाले इस अनुवाद की एक प्रस्तुति मैंने पहले भी देखी है—इसमें कथावस्तु और पात्रों की कोई स्पष्टता नहीं बन पाती। इस तरह प्रस्तुति निरंतर एक ‘अमूर्त कथानक’ का बोरियत भरा सत्यापन करने में गर्क हो सकती थी। पर वैसा नहीं हुआ तो इसका कारण था उसमें नई-नई चीजों से खेलने की अच्छी एनर्जी। यहाँ मैकबेथ अपनी कशमकश को स्टाइलाइज्ड करता है। गहरा तनाव उसके चेहरे पर है, पर अगला पाप उसे