योगेन्द्र चौबे की प्रस्तुति 'रानी दाई'
कोई पूछे आधुनिक छत्तीसगढ़ी नाटक की परंपरा क्या है, तो वो है जीवन के चित्र-विचित्र रूपों का सहज चित्रण। उसके भदेस में कोई मिलावट नहीं है। भीषण, उदात्त, सरस, लोमहर्षक सब उसमें इतनी स्वाभाविकता से पेश होते हैं कि मानो कह रहे हों- देखो ये है हिंदुस्तानी लोकजीवन। योगेन्द्र चौबे ने हबीब तनवीर की शुरू की इस परंपरा का परचम फिलहाल अच्छी तरह थामा हुआ है। मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के स्थापना दिवस समारोह में उनकी प्रस्तुति 'रानी दाई' पुनः इसकी मिसाल थी। यह डभरा के राजा नारायण सिंह की कहानी है, जो छोटा-मोटा जमींदार नुमा राजा है जिसे कोर्ट-कचहरी के काम से शहर जाना पड़ता है। घर में बीवी लछमिन के होते हुए भी वहां एक अन्य औरत कार्तिकी से उसका संबंध है। इस दोहरी जिंदगी के द्वंद्व को पचाए हुए वह आराम से रह रहा है, जिस क्रम में पति-पत्नी की रूटीन नोंक-झोंक के कुछ दृश्यों से प्रस्तुति आगे बढ़ती है। लेकिन गड़बड़ तब होती है जब लछमिन अपने मैल से एक तोता बनाकर उसके पास संदेश भेजती है। तोते से दुनियादारी और नैतिकता की बातें सुनकर नारायण सिंह घबरा उठता है और उसी घबराहट में गला दबाकर कार्तिकी की हत्या कर...