संजय श्रीवास्तव की प्रस्तुति 'गुड़िया की शादी'
जब से शादियाँ बैंक्वेट हॉल में होने लगी हैं तब से उनमें पहले जैसी तासीर नहीं रही। न बिरादरी की वह रौनक, न रस्मो-रिवाज का वह माहौल, न भावजों का उलाहना, न फूफा जी की ऐंठ। लेकिन कोई अगर आज के वक्त में उस मंजर में जाना चाहे तो वो एमपीएसडी के निदेशक संजय श्रीवास्तव की प्रस्तुति ‘गुड़िया की शादी’ देख सकता है।
गुड़िया ने गलती से फेसियल क्रीम की जगह हेयर रिमूवर क्रीम लगा ली है, जिससे उसकी भौंहें उड़ गईं और अब ऐन शादी के रोज उसकी अजीबोगरीब शक्ल एक समस्या बन गई है। सारे रिश्तेदार घर में जमा है पर उसे किसी के सामने नहीं लाया जा रहा। घर के निचले आँगन में जमा चाची जी, मौसी जी उससे मिलने को लालायित हैं लेकिन भाभी और बहन किसी-किसी तरकीब से उन्हें ऊपर कमरे में जाने से रोक देती हैं। इससे उनके मन में शक पैदा हो गया है कि बात क्या है! उधर फूफा जी को कोई लेने नहीं गया और इस बेइज्जती से वो बुरी तरह खफा हैं और उल्टे पैर लौट जाने को उद्यत हैं।
सेट डिजाइन से लेकर पात्र चयन और चरित्रांकन तक पूरा माहौल इतनी शिद्दत से बनाया गया है कि इसकी डिटेलिंग को सौ में से सौ नंबर दिए जा सकते हैं। पुरानी बस्ती के दोमंजिला घर में नीचे आँगन में औरतें कई तरह के कामों में व्यस्त हैं, और ऊपर के कमरे में गुड़िया की भौंह की समस्या से निबटने की कोशिशें चल रही हैं। इस बीच ‘स्वागतम’ और ‘शुभ विवाह’ लिखने वाला आर्टिस्ट चुपचाप अपना काम कर रहा है; सही समय पर चूल्हा-कड़ाही न पहुंच पाने से खड़े हुए झंझट को सुलझाने के रास्ते निकाले जा रहे हैं। बीच-बीच में शादी के गीत भी हो रहे हैं। उधर भौंह वाली समस्या के लिए कई लोग अलग-अलग स्तरों पर जुटे हुए हैं, जिनमें एक घर के समधी संतोष दरोगा भी हैं, जिनके दबंग हावभाव देखते ही बनते हैं।
पूरी प्रस्तुति इतनी सघन और भरी-पुरी है कि एक मिनट हिलने-डुलने का मौका नहीं देती। लाइट्स वहाँ सिर्फ एक से दूसरे स्पॉट पर शिफ्ट होती हैं, पूरा अँधेरा कभी भी नहीं होता, ऐसी उसकी गति है। प्रस्तुति में गुड़िया के केंद्रीय पात्र को छोड़ दें तो उसका हर पात्र प्रमुख पात्र है। धीरे-धीरे उनके परस्पर रिश्ते, रिश्तों से जुड़ी रही कहानियाँ, छोटे-मोटे घरेलू प्रपंच सब एक सुघड़ आख्यानिक लय में स्पष्ट होते जाते हैं।
बाद में मैंने संजय श्रीवास्तव से कहा कि उन्हें इस प्रस्तुति के बहुत सारे शो करने चाहिए, क्योंकि इसमें वो चीज है जो सुख-सुविधा से परिपूर्ण आज के मध्यवर्गीय जीवन में मिसिंग है, जो है जीवन का राग। यह शायद इसका सातवाँ या आठवाँ प्रदर्शन था, जिसके बाद भोपाल के वरिष्ठ रंगकर्मी राजीव वर्मा ने बताया कि उन्होंने यह प्रस्तुति तीसरी बार देखी, और इस बार भी उतना ही आनंद आया।
‘गुड़िया की शादी’ युवा कथाकार समता सागर की कहानी है, और उसका यह नाट्य रूपांतरण भी उन्होंने ही किया है। विशेष बात यह है कि संजय श्रीवास्तव ने इसे अपनी मादरे ज़बान बुंदेलखंडी में प्रस्तुत किया है, जिसमें इसका देशज स्वरूप और निखर गया है। साथ ही तारीफ करनी होगी एमपीएसडी के प्रतिभाशाली छात्रों की, जिन्होंने छत्तीसगढ़ी और बुंदेलखंडी जैसी बोलियों में बखूबी प्रस्तुतियों को अंजाम तक पहुँचाया। सभी कलाकारों का अभिनय इतना अच्छा था कि किन्हीं एक-दो का नाम लेना उपयुक्त नहीं लगता। मंच परिकल्पना के लिए आकाश विश्वकर्मा और वेशभूषा के लिए एकता चौरसिया का नाम अलबत्ता इस क्रम में लिया जा सकता है।
संजय श्रीवास्तव ने अभी साल भर पहले ही एमपीएसडी की कमान सँभाली है। इस बीच इसके परिसर में निर्माण और विकास का काम तेजी से चल रहा है। यहाँ की कार्यप्रणाली की एक विशेष बात यह है कि विद्यालय ने रंगमंडल के बजाय ‘थिएटर लैब’ के कांसेप्ट को आकार दिया है, जिसमें दो साल के कोर्स के बाद पास हुए छात्रों को थिएटर के हर पक्ष में व्यावहारिक निपुणता हासिल करने का मौका मिलता है। इसे यहाँ के पूर्व निदेशक टीकम जोशी ने शुरू किया था, जिनकी प्रस्तुति ‘मृच्छकटिकम’ इस फेस्टिवल की चौथी प्रस्तुति थी। इसमें कोई शक नहीं कि मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय ने बहुत कम अंतराल में कई समकक्ष संस्थाओं के मुकाबले गुणवत्ता के ज्यादा ऊँचे मानक हासिल किए हैं। उम्मीद है यह परिपाटी आगे भी इसी तरह बनी रहेगी।
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