Sunday, April 2, 2017

भीष्म साहनी के नाटक


हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैंवहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आजादी का एजेंडा हासिल हो जाने से आधुनिकता की नई प्रवृत्तियाँ सामने आईं। एकाएक व्यक्ति यहाँ प्रमुख हो गया था। वह व्यक्ति जो खुद को दूसरों से खास समझता था पर था उनके जैसा ही। फिर यह आधुनिकता कई तरह के प्रयोग करना चाहती थी। मंच को दर्शक दीर्घा तक ले जाया गयाया दर्शकों को मंच पर उतार दिया गया।....वगैरह। इस सारे कोलाहल के बीच भीष्म साहनी को हम एक ऐसे रचनाकार के रूप में पाते हैं जिनकी आधुनिकता ठेठ भारतीय परंपरा से उपजी है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि पश्चिम में दो-दो महायुद्धों ने व्यक्ति और उसके अस्तित्व के सवाल को जिस तरह केंद्र में ला दिया था वह उस तरह हमारी समस्या नहीं थी। (बावजूद इसके कि इन पश्चिमी प्रवृत्तियों का प्रभाव हिंदी में कई रचनाकारों पर काफी गहरा था; और कुछ ने इसे फैशनेबल ढंग से भी पकड़ा हुआ था।) हमारी समस्या उस समाज की समस्या थी जिसे आजादी के बाद अभी एक रूप हासिल करना था। जिसे नागरिक समाज की बहुत सी बुनियादी समस्याओं को अभी हल करना बाकी था। भीष्म साहनी के नाटक इसी समाज के द्वंद्वों और सवालों के नाटक हैं। वह समाज जो सांप्रदायिकता और सत्ता के अतिचारों के सवाल से जूझ रहा था। जहाँ एक ओर अभी अतीत के सामंती मूल्य अपनी पकड़ बनाए थे, वहीं कई तरह के समांतर प्रतिरोध भी सक्रिय होने लगे थे। इस नजरिये से जब हम देखते हैं तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भीष्म साहनी के यहाँ कालजयी होने की कोई हसरत नहीं हैउनके नाटक पूरी तरह सार्वजनिक वर्तमान के नाटक हैं भले ही कई बार ये वर्तमान किसी ऐतिहासिकता के कलेवर में हों। उदहरण के लिए उनके प्रहसन मुआवजे’ को देखें। मुआवजे’ का हास्य रटंतू पात्रों के रवैये से निकलता है। इन पात्रों का अपने आचरण के बारे में कोई विचार नहीं हैलेकिन इस व्यवस्था की प्रक्रियाएँ उन्होंने सीख रखी हैं। नाटक में एक ही आदमी तमाम नेताओं के भाषण लिखता है। उसके भाषण राजनीति का एक कर्मकांड हैं जहाँ अंत्येष्टि के अवसर पर विवाह के श्लोक पढ दिए जाने जैसी गलतियाँ होती रहती हैं। लोकतंत्र के इस प्रहसन में दंगा होना एक दस्तूर है और अम्न की कार्रवाइयाँ भी एक दस्तूर हैं। यह लोकतंत्र प्रक्रियाओं को तो जानता है पर उनके प्रयोजन को नहीं। इसीलिए जो मुआवजा जिंदगी को बचाने के लिए दिया जाना चाहिए उस मुआवजे के लिए उल्टे लोग जिंदगियाँ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। भीष्म साहनी एक ओर व्यवस्था की मूर्खताओं की खिल्ली उड़ाते हुए एक हास्य रचते हैं वहीं वे उसकी अमानवीयता से बनते स्थिति के विद्रूप को सामने लाते हैं—जिस विद्रूप में एक जीता-जागता आदमी मुआवजे की रकम के लिए लाश हो जाने को तैयार है। नाटक 'मुआवजेएक बहुत संतुलित और तीखा हास्य है। समकालीन हिंदी नाटक में उसके मुकाबले की व्यंग्यात्मकता नजर नहीं आती। यह पोलिटिकली करेक्ट वो भारतीय यथार्थ है जहाँ भाड़े का हत्यारा आखिर खुद ही राजनेता बन जाता है। 1992 में लिखा गया यह नाटक हमारी परवर्ती राजनीति में से मानो एक बानगी पेश करता है। नाटक की भूमिका में भीष्म साहनी ने लिखा था- 'गंभीर विषयवस्तु और उसकी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। न तो हँसी-मजाक को इतना तूल दिया जाए कि नाटक प्रहसन न रहकर भड़ैती बन जाएऔर न ही उसकी गंभीर विषयवस्तु पर इतना अधिक बल दिया जाए कि वह सांप्रदायिकता पर लिखे एक दस्तावेज का रूप ले ले।' ऐसा कहकर वे समकालीन हिंदी रंगमंच की एक प्रवृत्ति को चिह्नित कर रहे थे। उनका नाटक उस प्रवृत्ति के लिए एक चुनौती खड़ी करता है।
उनका नाटक 'कबिरा खड़ा बजार में' रंगकर्मियों के बीच हमेशा से काफी लोकप्रिय रहा है। यों कबीर हमेशा से ही हिंदी साहित्य और नाटक की एक प्रिय शख्सियत रहे हैं, लेकिन भीष्म साहनी के कबीर में एक विलक्षण सादगी है। कबीर तो जैसे हैं वैसे हैं ही, लोई का उनके बारे में खयाल सुनिये- न घर, न दुआर, बापू ने हमें कहाँ लाकर झोंक दिया...एक पगलेट साधु के पास। नाटक में लोई की जिज्ञासाएँ इतनी मासूम और दिलचस्प है कि सुनने वाला सुनता ही रह जाए। लोई पूछती है- तुम झगड़ा-वगड़ा नहीं करते तो तुम्हें पीटते क्यों हैं? हमें कोई गाली दे तभी न हम उसे पीटते हैं! राह जाते को कोई थोड़े ही पीटता है। ......गली-बजार के लोग यह भी कहते हैं कि कबीर जोलाहा पगला गया है।’  और कबीर की सफाई कि मैं तुम्हें पागल नजर आता हूँ लोई कहती है- लोग-लुगाई यों ही थोड़े कहते फिरते हैं। पूरे पागल नहीं तो आधे पागल होगे। आधे पागल भी तो होते हैं। भीष्म साहनी की साहित्यिक अभिव्यक्ति में भले ही कमी-बेशी निकाली जा सकती हो, पर उनके यथार्थ में कोई खोट नहीं है। उनके कबीर ने अपने विचारों के लिए बहुत कुछ खोया और झेला है। उन्हें पानी में डुबोया गया, उनका घर जला दिया गया। नाटक के कबीर सब कुछ झेलते हुए भी मानो यह जानते हैं कि उनकी साधारणता ही उनकी असलियत है। उनकी ख्याति और वास्तविकता को आलेख में बहुत ही अच्छी तरह से बुना गया है। कबीर से कायस्थ का संवाद कथानक में नाटकीयता के लिहाज से एक काफी ठोस स्थिति है, जो कबीर को छंद-अलंकार सीखने की राय देता है; और कवि के रूप में अच्छा कैरियर बनाने के लिए बड़े-बड़े उमरा-वुजरा से मिलने की सलाह देता है। नाटक में कबीर की छवि एक ओर म्यूजिकल की संभावनाएँ लिये हुए है, वहीं उसे शहरी यथार्थवादी ढंग से भी बार-बार मंचित किया गया है।
भीष्म साहनी के रचनाकर्म में स्थितियों के विवरण काफी इत्मीनान से जगह बनाते हैं। इस महादेश में कहानी कहने की परंपरा के इस खास अवयव से वे आधुनिकता के आशयों को कहते हैं। लेकिन उनके दो नाटक हानूश और माधवी इस लिहाज से उल्लेखनीय हैं कि उनमें यह डिटेलिंग ही उनकी कमजोरी बन गई है। खास तौर से माधवी में एक छोटा कथ्य अपने दोहरावों और विस्तार में ऊब पैदा करता है, भले ही रंगकर्मी प्रायः आसान संरचना के कारण इस नाटक की ओर आकर्षित होते रहे हों। यों भी हिंदुस्तानी रंगमंच में पौराणिकता का आकर्षण हमेशा से रहा है। माधवी के कथा-बिंदुओं में ययाति का अहं भी एक कथा-बिंदु है, जो बहुत स्थूल ढंग से सामने आया है। ययाति वानप्रस्थ में भी इससे उबर नहीं पाए हैं। वे अपने शाही अहं की तुष्टि के लिए अपनी बेटी को दान में दे देते हैं। नाटक ययाति के अहं से शुरू होता है और गालव की लालसा तक को दिखाता है। माधवी चौतरफा पुरुष वर्चस्व की शिकार है, लेकिन नाटक का अंत उसके प्रतिकार को दिखाता है। नाटक की समस्या है कि उसकी विवरणात्मकता उसके रूपक पर हावी है और वह पौराणिक संदर्भ का एक साधारण आख्यान होकर रह जाता है। न सिर्फ इतना, बल्कि ययाति जैसा पात्र लेखकीय मंतव्य की पूर्ति के लिए इकहरे ढंग का किंचित बनावटी भी नजर आता है।  हालाँकि हानूश, जो एक चेक दंतकथा पर आधारित है, में यह समस्या उस स्तर पर नहीं है। हानूश ने वर्षों की मेहनत के बाद एक घड़ी बनाई है। यह घड़ी नगर की उपलब्धि है। पर्यटक इसे देखने आएँगे तो राज्य की आय बढ़ेगी; लेकिन निरंकुश राजा हानूश को अंधा करवा देता है। हानूश की अब एक ही चिंता है कि उसके आविष्कार के ज्ञान को उसी के साथ खत्म नहीं हो जाना है, कि कैसे इस ज्ञान को बाकी समाजों और पीढ़ियों के लिए बचाया जाए।  
नाटक में परिवेश की एक फाँक है, पर एक माहौल भी साथ-साथ विस्तार पाता है। नाटक में एक दंतकथा की जाहिर सरलता ही उसकी सीमा है। राजा हानूश को अंधा करवा देने का हुक्म देता है। उसके क्रूर आदेश में कोई युक्ति नहीं है, सिवाय उसकी जालिमाना मंशा के। हानूश में हम किसी जटिल या नई सच्चाई को नहीं देख रहे होते। उसका पूरा ढाँचा एक पुराने किस्म की कहानी के उतार-चढ़ावों से बना है। लेकिन भीष्म साहनी के अन्य नाटकों की तरह हानूश भी रंगकर्मियों को मंचीय यथार्थ में गहराई उत्पन्न करने के काफी मौके देता है। एक अपरिचित माहौल की इस कहानी से गुजरते हुए यह साफ देखा जा सकता है कि भीष्म साहनी मंचीय दृश्य के एक कुशल कारीगर हैं। उनके नाटक के पाठक को सहज ही यह महसूस होता है कि जिन दृश्यों से वह गुजर रहा है उनके विजुअल कितनी अच्छी तरह लेखक के दिमाग में बने हुए होंगे। हानूश का दृश्य विधान रंगकर्मियों के लिए निश्चित ही एक चुनौती पेश करता है।
भीष्म जी के नाट्यलेखन के सिलसिले में उनके एक कम चर्चित लेकिन महत्त्वपूर्ण नाटक रंग दे बसंती चोला की चर्चा भी जरूरी है। रंग दे बसंती चोला जालियाँवाला बाग की घटना पर आधारित नाटक है। नाटक में उक्त घटना से जुड़े तथ्यों, स्थितियों, मनोदशाओं और भावनाओं को एक कथात्मक सूत्र में बाँधा गया है, और यह एक बहुत ही कुशल और वस्तुनिष्ठ नैरेटिव का उदाहरण है। बावजूद इसके कि यह नाटक किसी वृत्त नाटक की तटस्थता में नहीं लिखा गया है यह महत्त्वपूर्ण है कि इसमें किसी तटस्थता का उल्लंघन भी नहीं किया गया है। नाटक से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है मानो जालियाँवाला बाग की घटना सत्ता और शासित के मध्य संघर्ष मात्र का नहीं बल्कि दो सभ्यताओं के संघर्ष का परिणाम हो। नाटक के किरदार डायर और ओड्वायर के तर्कों में जालियावालाँ बाग से दो रोज पहले एक क्रिश्चियन मिशनरी महिला पर हुए जानलेवा किस्म के हमले की घटना का हवाला भी है। वहीं हिंदुस्तानियों में तत्कालीन देशभक्ति के जज्बे के बहुत सुंदर चित्र नाटक में खींचे गए हैं। ये दो सभ्यताएँ हैं जिनके नुमाइंदों के ढंग बिल्कुल अलग हैं, जिन्हें नाटक साफ-साफ पेश करने की कोशिश करता है। नाटक में उल्लेख है कि उक्त घटना के बाद आठ साल जीवित रहे जनरल डायर ने बार-बार इस घटना को फर्ज को अंजाम देना बताया। आश्चर्य है कि यह नाटक अब तक अधिक क्यों नहीं खेला गया। जबकि यह भीष्म जी की नाट्य रचनाओं में एक पाए की कड़ी है।
भीष्म साहनी ने फूजियामा नाम के एक रूसी नाटक का अनुवाद भी किया था। यह कम्युनिस्ट नैतिकता का एक संवाद-बहुल नाटक है, जिसमें जटिल स्थितियों में निजी नैतिकता के सवाल की परख की गई है। लेकिन क्योंकि हर व्यक्ति में अलग-अलग डिग्री के स्वार्थ और आदर्श होते हैं इसलिए झूठ और सच की यह लड़ाई निरंतर पेचीदा होती जाती है। नाटक का मंच एक कृत्रिम संरचना है— एक पहाड़ का अलक्षित सुरम्य शिखर, जहाँ पात्रगण पिकनिक मनाने के लिए जमा हुए हैं; और अतीत वहाँ एक विसंगति के रूप में चला आया है। हर पात्र के अतीत में नैतिकता की कोई न कोई खोट है। सामान्य हिंदी दर्शकों के लिए यह नाटक इसलिए थोड़ा मुश्किल मालूम देता है कि निजी नैतिकताओं में झाँकने का इस तरह का चलन अपने यहाँ नहीं है। जे.बी. प्रीस्ले के एन इंस्पेक्टर काल्स की तरह फूजियामा के पात्रों की सफाइयाँ और द्वंद्व भी दरअसल उनकी अपनी नैतिक चूकों के वाकये हैं। यह हमसे आगे की सिविल सोसाइटी है जहाँ के मौकापरस्त पात्र भी दूसरों को सफाइयाँ देने से पहले खुद को उस सफाई से सहमत कराते हैं।
भीष्म जी के एक अन्य नाटक आलमगीर में वरिष्ठ नाट्य आलोचक जयदेव तनेजा ने प्रायः वही त्रुटि चिह्नित की है जिससे मिलता-जुलता जिक्र यहाँ ऊपर भी किया गया। उन्होंने इस नाटक को सूचनात्मक और शब्दाश्रित बताया है, जिस वजह से इसे नहीं खेला गया। हमें यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि एक नाटक में नाटकीयता का बाहरी तामझाम तब तक असर नहीं करता जब तक कि भीतरी द्वंद्व ठीक से पैबस्त न किए गए हों, जिस वजह से अंधा युग जैसा रेडियो नाटक भी भारतीय रंगमंच की शीर्ष कृतियों में शुमार हुआ। अगर विहंगम रूप से देखें तो भीष्म साहनी के नाटकों की सबसे बड़ी खूबी और सीमा यही है कि उनमें समकालीन यथार्थ की फिक्रें हमेशा दिखाई देती हैं। वे एक हिंदुस्तानी दारियो फो हैं। क्या नाटक मुआवजे का व्यंग्य किसी भी तरह दारियो फो के चुकाएँगे नहीं से कम है? हालाँकि भीष्म जी अपने व्यक्तित्व में उतने तीखे नहीं हैं, पर उनकी रचनाएँ हमेशा तीखी हकीकतों को उठाती रही हैं। उनके नाटक उन दर्शकों के लिए लिखे गए हैं जिन्हें किस्सागोई में बातें सुनने-पढ़ने का लंबा अभ्यास है। यही वजह है कि उनके नाटक लगातार खेले जाते हैं और लंबे समय तक वे प्रासंगिक बने रहेंगे। 

Thursday, January 26, 2017

झाँसी की रानी से एक मुलाकात

इस संस्मरण के लेखक जॉन लैंग  (1816-1864) का जन्म सिडनी में हुआ था। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने के कुछ साल बाद सन 1842 में वह भारत आ गया। यहाँ आगरा कोर्ट में सन 1851 में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ कंपनी के ही एक कॉन्ट्रैक्टर रहे लाला जोती प्रसाद के मुकदमे में बतौर वकील उसे बड़ी सफलता मिली। मुकदमे में जीत ने उसे हिंदुस्तानियों के बीच प्रसिद्ध कर दिया। रानी झाँसी द्वारा अपने राज्य के अधिकार पुनः हासिल करने की कोशिशों के सिलसिले में उसकी राय जानने के लिए उसे बुलाया जाना उसी प्रसिद्धि का नतीजा था। रानी से उसकी मुलाकात का यह वाकया 1854 का है, जिसपर लिखे संस्मरण को उसने 1859 में प्रकाशित अपनी पुस्तक वांडरिंग्स इन इंडिया में शामिल किया।  

छोटे से राज्य झाँसी को कब्जे में लेने का आदेश दिए जाने के करीब महीने भर बाद, और कब्जे के लिए 13वीं नेटिव इन्फेन्ट्री की एक टुकड़ी के रवाना होने के थोड़ा पहले मुझे रानी झाँसी का एक पत्र मिला। स्वर्ण-पृष्ठ पर फारसी भाषा में लिखे इस पत्र में निवेदन किया गया था कि मैं झाँसी में एक बार उनसे मिल लूँ। पत्र लाने वाले दोनों लोग हैसियतदार हिंदुस्तानी थे। एक दिवंगत राजा का वित्त मंत्री रहा था, दूसरा रानी का मुख्य वकील था।
झाँसी का राजस्व करीब छह लाख सालाना था। सरकार के खर्चे और दिवंगत राजा की सेवा में रहे सैन्य दल का वेतन देने के बाद करीब ढाई लाख बच जाते थे। सैन्य दल ज्यादा बड़ा नहीं, एक हजार के भीतर ही था, और ये मुख्यतः घुड़सवार ही थे। राज्य को कब्जे में लेने के बाद रानी को 60 हजार सालाना की पेंशन मासिक तौर पर दी जानी थी। 
रानी का मुझे मिलने के लिए बुलाने का उद्देश्य मुझसे यह सलाह करना था कि क्या कब्जे के आदेश को रद्द या वापस करवाया जा सकता है। मैं यहाँ जिक्र कर दूँ कि रानी ने मुझसे यह संपर्क राजकीय सेवा में रहे एक सज्जन के कहने पर किया था। ये सज्जन एक समय में ऊपरी प्रांत की एक स्थानीय अदालत में रेजीडेंट अथवा गवर्नर जनरल के एजेंट रहे थे, और भारत में ऊँची हैसियत के अन्य बहुतेरे अफसरों की तरह झाँसी पर कब्जे को अंततः एक बकवास कदम मानते थे —जो न सिर्फ अविवेकपूर्ण बल्कि अन्यायपूर्ण भी था और जिसका कोई तर्क नहीं दिया जा सकता था। कुल तथ्य संक्षेप में ये थे : दिवंगत राजा के अपनी एकमात्र पत्नी (वह महिला जो हमारे देश की औरतों, आदमियों और बच्चों की किले में मौत का कारण थी, और जिसे बाद में दी सलाहों के मुताबिक मार दिया गया*) से कोई संतान नहीं थी, और अपनी मौत से कुछ सप्ताह पहले अशक्त शरीर के बावजूद दृढ़ मस्तिष्क से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर एक उत्तराधिकारी गोद लिया, और झाँसी में गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि के उपयुक्त माध्यम को संबोधित करते हुए सरकार को ऐसा करने की सूचना दी। संक्षेप में, ऐसे मामलों में धोखेबाजी से बचने के लिए सरकार की ओर से निर्धारित सभी नियमों का अनुपालन किया गया था। राजा के जमा किए हुए लोगों और गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि की उपस्थिति में बच्चा राजा द्वारा गोद में लिया गया, और फिर इस सारी कार्रवाई का जिक्र करते हुए एक हस्ताक्षरित और सत्यापित दस्तावेज भी तैयार किया गया। राजा एक ब्राह्मण था, और गोद लिया लड़का उसके नजदीकी रिश्ते में था।
झाँसी का राजा ब्रिटिश सरकार का खास विश्वासपात्र रहा था। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने दिवंगत राजा के भाई** को एक ब्रिटिश चिह्न और राजा की पदवी देने वाले पत्र दिये थे। इस पत्र में सुनिश्चित किया गया था कि ब्रिटिश सरकार इस पदवी और इसमें निहित आजादी की उसे, यानी राजा को, और उसके वंशजों और (गोद लिए) उत्तराधिकारियों को गारंटी करती है। कोई शक नहीं किया जा सकता कि लॉर्ड विलियम बैंटिक के उस अनुबंध (जिस उद्देश्य के लिए यह कथित रूप से था) का बगैर किसी रत्ती भर दिखावे के उल्लंघन किया गया। पेशवा के वक्त में झाँसी का मरहूम राजा महज एक बड़ा जमींदार हुआ करता था, और अगर वह पदवी-हीन ही बना रहता तो उसकी अंतिम ख्वाहिशों में कम से कम उसकी संपत्ति के मामले को लेकर किसी सवाल से जूझना न पड़ता। यह तो राजा की पदवी को स्वीकारने के कारण ही था कि मामला उसकी संपत्तियों की ज़ब्ती, और ढाई लाख सालाना के बदले 60 हजार सालाना दिए जाने तक पहुँचा। हो सकता है यह पूरा बयान पाठकों को थोड़ा अविश्वसनीय मालूम दे, पर यह पूरी तरह सच है। 
मुझे जब रानी का पत्र मिला तब मैं आगरा में था, और आगरा वहाँ से दो दिन का रास्ता है। बावजूद इसके कि मैं झाँसी से ही आया था मेरी इस महिला से सहानुभूति थी। जिस लड़के को राजा ने गोद लिया था वह सिर्फ छह साल का था, और राजा की ख्वाहिश के मुताबिक उसके बालिग यानी 18 साल का होने तक रानी को ही शासक और लड़के के अभिभावक के तौर पर रहना था। और यह किसी महिला- वो भी हिंदुस्तानी कुलीन महिला- के लिए कोई छोटा मामला नहीं था कि वो ऐसी हैसियत को ठुकराकर एक पेंशनभोगी बन जाए—भले ही वो पेंशन 60 हजार सालाना की क्यों न हो। अब मैं झाँसी में रानी के निवास तक की अपनी यात्रा के विवरणों का वर्णन करता हूँ। मैं गोधूलि के वक्त पालकी में बैठा, और अगली सुबह उजाला होने के वक्त ग्वालियर पहुँच गया। झाँसी के राजा के पास यहाँ छावनी से करीब डेढ़ मील के फासले पर एक छोटा मकान पड़ाव के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। मेरे साथ चल रहे मंत्री और वकील मुझे वहीं ले गए। दस बजे, जब मैं नाश्ता करके अपना हुक्का गुड़गुड़ा चुका तो यह प्रस्ताव आया कि एक ही ठाँव में निकल लिया जाए। दिन बहुत गरम था, लेकिन रानी ने बड़ी ही सुविधाजनक पालकी-गाड़ी भेजी थी। थोड़े में कहें तो यह किसी सवारी से कहीं बड़ी और हर सुविधा से युक्त एक छोटे-से कमरे जैसी थी। यहाँ तक कि इसमें पंखे का इंतजाम भी था, जिसे बाहर फुट-बोर्ड पर बैठा एक नौकर झलता था। वाहन में मेरे, मंत्री और वकील के अलावा एक खानसामा या बावर्ची था, जो अपने घुटनों के बीच पात्रों में ठंडा पानी, और वाइन, और बीयर इस क्रम में रखे बैठा था कि जब भी मैं प्यास महसूस करूँ तो मुझे क्षण भर में ये चीजें मुहैया करा सके। इस विशाल वाहन को घोड़ों की एक जोड़ी पूरी ताकत और वेग से खींच रही थी। दोनों ही खूब ऊँचे घोड़े थे। स्वर्गीय राजा ने इन्हें फ्रांस से 15000 की कीमत पर आयात करवाया था। रास्ता कई जगह काफी ऊबड़खाबड़ था, लेकिन इन सबसे गुजरते हुए हम करीब नौ मील प्रति घंटा की रफ्तार पर थे। दो बार घोड़े बदलने के बाद दिन के करीब दो बजे हमने झाँसी राज्य के क्षेत्र में प्रवेश किया। हमें अभी करीब नौ मील और जाना था। अब तक हमारे साथ महज चार घुड़सवार रक्षाकर्मी थे, पर अब उनकी तादाद बढ़कर करीब पचास हो गई। हर घुड़सवार एक बड़ी सी बर्छी लिए था, और ईस्ट इंडिया कंपनी के अनियमित अश्वारोही दल से काफी कुछ मिलती-जुलती वेशभूषा में था। सड़क के किनारे कुछ-कुछ सौ गज के अंतराल पर घुड़सवार मौजूद थे, और जैसे ही हम गुजरते वो भी इस दल में शामिल हो जाते। इस तरह जब हम किले- यदि निम्न कोटि की नौ तोपों के उस पार की उन कमजोर दीवारों को किला कहा जा सके- के करीब पहुँचे तो झाँसी की कुल अश्वारोही सेना वहाँ उपस्थित थी। सवारी को राजा का बगीचा कही जाने वाली एक जगह की ओर ले जाया गया, जहाँ मैं उतरा, और वित्त मंत्री, वकील और अन्य राज्य कर्मचारियों द्वारा आम के विशाल पेड़ों के झुरमुट के नीचे लगे एक बड़े से तंबू की ओर ले आया गया। यह वही तंबू था जिसमें कि मरहूम राजा ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक और सैन्य अफसरों से मिला करता था। तंबू सलीके से लगाया गया था और उसमें कालीन बिछा था, और कम से कम दर्जन भर घरेलू नौकर मेरे आदेशों को पूरा करने के लिए वहाँ तत्पर थे। मुझे यहाँ यह जिक्र नहीं भूलना चाहिए कि मेरी यात्रा के साथी- मंत्री और वकील- दोनों ही योग्य और खुशनुमा सलीके वाले लोग थे। इसके अलावा वे पढ़े-लिखे जानकार लोग थे, लिहाजा सफर में मेरा समय बहुत ही सुखद ढंग से गुजरा।
रानी ने उनके द्वारा प्रश्रय पाने वाले बहुतेरे ब्राह्मणों में से एक से सलाह की थी कि उस परदे, जिसके दूसरी ओर वे बैठती हैं, पर मेरे आने का सबसे अनुकूल समय क्या होगा;  और ब्राह्मण ने उन्हें बताया था कि यह अवश्य ही सूर्य के अस्त होने और चाँद, जो कि अपनी पूर्ण अवस्था में हो, के उदित होने का समय होना चाहिए। दूसरे शब्दों में साढ़े पाँच और साढ़े छह के बीच का समय।
यह महत्त्वपूर्ण मामला मुझे बता दिया गया था, मैंने मिलने के समय को लेकर अपना पूर्ण संतोष जताया, और उसी अनुरूप रात के खाने का आदेश दे दिया। यह होने के बाद वित्त मंत्री ने थोड़ा झेंपते हुए कहा कि वे मुझसे एक नाजुक विषय पर कुछ बात करना चाहते हैं। और कि, अगर मेरी इजाजत हो तो वे मेरे निजी सेवक सहित मेरी आवभगत में लगे नौकरों को तंबू से थोड़ा दूर होकर खड़े होने के लिए आदेश दें। जाहिर ही मैंने हाँ कहा और पाया कि कि मैं छोटे से झाँसी राज्य के केवल आधिकारिक लोगों (आठ या नौ की संख्या में) के साथ वहाँ अकेला रह गया हूँ। वित्त मंत्री मुझसे जो पूछना चाहते थे वह यह था कि क्या मैं इस बात पर सहमत हूँ कि रानी के कक्ष में प्रवेश से पहले मुझे जूते बाहर ही उतार देने होंगे! मैंने पूछा कि क्या गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि ने ऐसा किया था? उन्होंने जवाब दिया कि गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि की रानी से कभी कोई मुलाकात नहीं हुई; और दिवंगत राजा ने कभी किसी यूरोपीय जेंटलमैन की अपने महल के निजी कक्ष में अगवानी नहीं की, बल्कि इसके लिए अलग से एक कक्ष तय था, या इस तंबू में जहाँ इस वक्त हम बात कर रहे थे। मैं थोड़ी मुश्किल में था और नहीं जानता था कि क्या कहूँ, जैसा कि कुछ साल पहले मैंने दिल्ली के बादशाह के यहाँ उपस्थित होने से इनकार कर दिया था, जिसका आग्रह था कि यूरोपियन उसके यहाँ जूते उतारकर आएँ। जूते उतारने का विचार मुझे बहुत गैरवाजिब लग रहा था और मैंने यह बात दिवंगत राजा के मंत्री से स्पष्ट रूप से कही भी। मैंने उससे पूछा कि क्या वह इंग्लैंड की रानी के महल की राजसभा में शामिल होगा, अगर उसे पता हो कि वहाँ उसे अपना सिर (बिना पगड़ी के) खुला रखना होगा, क्योंकि ऐसा ही नियम छोटे से बड़े तक सबके लिए है? इस सवाल का उसने मुझे सीधा जवाब नहीं दिया, बल्कि कहा- आप अपना हैट पहन सकते हैं साहब। रानी उसका बुरा नहीं मानेंगी। बल्कि उल्टे वे तो इसे उनके प्रति सम्मान जताने का एक अतिरिक्त चिह्न मानेंगी। अब यही वो बात थी जो मैं नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि मान लो मैं अपने जूते उतारने पर सहमत हो जाता हूँ तो वो मेरे हैट पहनने को अपनी ओर से, और मेरी ओर से भी, एक किस्म का समझौता मानें। खैर, यह मोलभाव जैसा भी था, मुझे इससे खुशी हुई और उसपर मैंने स्पष्ट रूप से उन्हें यह समझाते हुए सहमति जता दी कि इस सहमति को उनके पद और महिमा के प्रति नहीं बल्कि उनके महिला और सिर्फ महिला होने के प्रति शुभकामना के रूप में माना जाए। इस तरह यह महती मुद्दा तय हुआ। मैंने मेरे लिए तैयार किया गया आलीशान भोजन ग्रहण किया, और सूर्य के अस्त या चाँद के उदय होने की धैर्यपूर्वक लेकिन इस दृढ़ता के साथ प्रतीक्षा करने लगा कि मैं काले रंग के निचले हिस्से और सफेद रंग के ऊपरी हिस्से वाली अपनी हैट निश्चय ही पहनूँगा।
आखिर वो वक्त आया, और अपनी विशाल पीठ पर लाल रंग के मखमल से सजा हुआ चाँदी का हौदा लिए एक सफेद हाथी (एक अलबीनो, जो कि पूरे भारत में कुछ ही हैं) तंबू की ओर लाया गया। मैं लाल मखमल से ही सजाए स्टेप्स से ऊपर चढ़ा और अपनी जगह बैठ गया। महावत बहुत ही अच्छी वेशभूषा में था। हाथी के दोनों ओर राज्य के मंत्री सफेद अरबी घोड़ों पर सवार खड़े थे। झाँसी का घुड़सवार दल महल की ओर जाने वाली सड़क पर पंक्तिबद्ध खडा होकर एक वीथिका बनाए हुए था। महल मेरे शिविर की जगह से करीब आधे मील की दूरी पर था।
शीघ्र ही हम मुख्य द्वार पर आ गए, जिसे पैदल अर्दलियों ने जोरदार तरह से खटखटाना शुरू किया। एक छोटा दरवाजा खुला, और फौरन ही बंद हो गया। रानी को सूचना भिजवाई गई, और करीब दस मिनट के विलंब के बाद द्वार को खोलने का हुकुम आया। मैंने हाथी पर बैठे-बैठे भीतर प्रवेश किया, और एक प्रांगण में जाकर उतरा। शाम बहुत ही गर्म थी, और मुझे लगा कि मैं मेरे आसपास जमा हो गए देसी लोगों (आश्रितों) में घुट जाऊँगा। मेरी बेचैनी को देख मंत्री ने उन्हें जोरदार तरह से पीछे ही रहने का आदेश दिया। फिर एक और अदना-सी देरी के बाद मुझसे एक बहुत ही सँकरे पत्थर के जीने पर चढ़ने के लिए कहा गया, और वहाँ ऊपर पहुँचने पर मुझे एक देसी सज्जन मिले, जो कि रानी के कोई रिश्तेदार थे। वे मुझे पहले एक कक्ष में फिर दूसरे में ले गए। ये सभी (छह या सात) एक जैसे कक्ष फर्श पर पड़े कालीन को छोड़कर बिना किसी साज-सज्जा के थे। लेकिन छत पर पंखा और झूमर लटके हुए थे, और दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें और यहाँ-वहाँ विशाल दर्पण थे। थोड़ी देर में मैं एक कमरे के दरवाजे पर ले जाया गया, जिसपर देसी सज्जन ने दस्तक दी। एक स्त्री-स्वर ने भीतर से पूछा- कौन है वहाँ?’
साहब हैं जवाब दिया गया। फिर एक और मुख्तसर देरी के बाद दरवाजा किन्हीं अदृश्य हाथों से खोला गया, और देसी सज्जन ने मुझसे भीतर प्रवेश करने के लिए कहा, और साथ ही बताया कि वह अब वहाँ से जा रहे हैं। इस बार एक तनिक विलंब मेरी ओर से हुआ। मैं बहुत मुश्किल से खुद को जूते उतारने की स्थिति तक लाया; तथापि कुछ देर में यह कार्य संपादित कर मोज़े पहने पैरों के साथ मैं कक्ष में दाखिल हुआ। कक्ष, जिसमें बहुत सुंदर कालीन बिछा हुआ था, के बीचोबीच यूरोप में बनी एक आरामकुर्सी (आर्म चेयर) रखी थी और इसके चारों ओर फूलों की मालाएँ बिखरी हुई थीं (झाँसी अपने सुंदर और सुगंधित फूलों के लिए मशहूर है)। कक्ष के दूसरे सिरे पर एक परदा था, और इसके पीछे कुछ लोग बात कर रहे थे। मैं आर्म चेयर पर बैठ गया, और आदतन अपनी हैट उतार ली; पर अपने निश्चय का खयाल आते ही उसे पुनः पहन लिया—बल्कि इस बार इसे इतनी अच्छी तरह खींचकर पहना कि मेरा माथा ही पूरी तरह इसमें छुप गया। यह शायद मेरी ओर से एक मूर्खतापूर्ण निश्चय था, क्योंकि हैट ने पंखे की हवा को मेरी कनपटियों तक ठंडक पहुँचाने से रोक लिया था।
मैं एक बच्चे से कहे जा रहे स्त्री-स्वरों जाओ साहब के पास को सुन सकता था, और सुन सकता था कि बच्चा ऐसा करने से इनकार कर रहा है। आखिरकार उसे कक्ष में भेज ही दिया गया। मेरे द्वारा बच्चे से सहृदयतापूर्वक बात करने पर उसने मेरी ओर रुख किया, पर बहुत ही संकोच के साथ। उसकी वेशभूषा और पहने हुए जवाहरात से मैं आश्वस्त हुआ कि यह बच्चा दिवंगत राजा का गोद लिया बेटा और झाँसी के छोटे से राजमुकुट का ठुकराया हुआ उत्तराधिकारी ही है। वह एक सुंदर, लेकिन अपनी उम्र के लिहाज से काफी ठिगना और जैसा कि मैंने ज्यादातर मराठा बच्चों में देखा है चौड़े कंधों वाला बच्चा था।
जब मैं बच्चे से बात कर रहा था, एक महीन और बेमेल आवाज पर्दे के पीछे से सुनाई दी, और मुझे बताया गया कि लड़का महाराजा है और हाल ही में भारत के गवर्नर जनरल द्वारा उसके अधिकारों को हथिया लिया गया है। मुझे लगा कि आवाज किसी बहुत वृद्ध महिला की है—शायद किसी सेविका या उत्साही आश्रिता की; लेकिन बच्चे ने अनुमान लगाकर कि उससे ही बोला जा रहा है, जवाब दिया- महारानी!’ और इस तरह मुझे मेरे निष्कर्ष की गलती बताई गई।
और अब रानी ने मुझे परदे के करीब आने के लिए आमंत्रित कर अपनी शिकायतें बताना शुरू किया। जब वह रुकतीं, तो उन्हें घेरकर बैठी औरतों का एक तरह का का कोरस शुरू हो जाता-- उदास उद्गारों, मसलन मैं कितनी दुखी हूँ, कैसा अत्याचार है की एक श्रृंखला। इससे मुझे किसी तईं एक ग्रीक ट्रैजेडी का एक दृश्य याद हो आया—ऐसी हास्यप्रद स्थिति थी।
मैंने वकील से सुना था कि रानी करीब छह या सात और बीस साल*** की उम्र की एक बहुत खूबसूरत महिला हैं और मैं उनकी एक झलक पाने के लिए निस्संदेह बहुत उत्सुक था। मुझे नहीं पता कि यह दुर्घटनावश हुआ याकि यह रानी की ओर से योजनाबद्ध था कि मेरी उत्सुकता शांत हो पाई। छोटे लड़के द्वारा परदा एक ओर को हटाया गया और मैंने उन्हें ठीक से देखा। यह सही है कि यह सिर्फ क्षण भर के लिए था, पर फिर भी मैंने उन्हें इतना पर्याप्त देखा था उनके व्यक्तित्व का निरूपण कर पाऊँ। वो मँझोले कद की महिला थीं—थोड़ी बलिष्ठ, पर बहुत बलिष्ठ नहीं। उनका चेहरा अपनी कम उम्र में काफी सुंदर रहा होगा, और बल्कि अभी भी उसमें काफी आकर्षण था—फिर भी, सौंदर्य के मेरे नजरिये से, यह काफी गोल था। मुखमुद्रा भी बहुत अच्छी, और बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण थी। आँखें विशेष रूप से सुंदर थीं और नाक भी बहुत सुघड़ सुकुमार थी। उनका रंग बहुत गोरा नहीं था, लेकिन काले से भी बहुत दूर था। अजीब था कि उन्होंने सिवाय कानों में सोने की बालियों के कोई आभूषण नहीं पहना हुआ था। उनके वस्त्र अच्छी बुनावट वाले साधारण सफेद मलमल के और इस तरह के टाइट सिले हुए थे कि उनकी देहयष्टि का पता चलता था, और वे यकीनन एक सुंदर देहयष्टि वाली महिला थीं। जो चीज बिगाड़ करती थी वो थी उनकी आवाज, जो थोड़ी फटी हुई थी और उसमें कराहट थी। जब परदा एक ओर को हुआ तो वो बहुत गुस्से में थीं, या ऐसा उन्होंने दिखावा किया। लेकिन अपने प्रस्तुत व्यवहार में वो हँसीं, और खुशमिजाजी के साथ यह आशा व्यक्त की कि उनका दिखना उनकी व्यथाओं के प्रति मेरी सहानुभूति को कम नहीं करेगा, ना ही उनके कारण के प्रति किसी पूर्वाग्रह को जन्म देगा।
मैंने जवाब दिया, उल्टे, यदि गवर्नर जनरल महज उतने भी भाग्यशाली हो सकें जितना कि मैं रहा हूँ, और वो भी सिर्फ पल भर के लिए, तो मैं यह पक्का महसूस करता हूँ कि वो तुरंत झाँसी को इसकी खूबसूरत रानी को शासन के लिए लौटा देंगे।   
उन्होंने भी मेरी प्रशंसा पर कुछ कहा, और अगले दस मिनट इसी किस्म के वार्तालाप में व्यतीत हुए। मैंने उनसे कहा कि पूरी दुनिया में उनकी सुंदरता और महान बुद्धिमत्ता की गूँज है। और उन्होंने मुझे कहा कि इस धरती पर कोई कोना नहीं है जहाँ मेरे अच्छे के लिए प्रार्थना न की गई हों।
फिर हम मुद्दे पर वापस आए—उनका मामला। मैंने उन्हें बताया कि गवर्नर जनरल के पास बगैर इंग्लैंड को बताए कोई अधिकार नहीं है कि वे राज्य को पुनः बहाल कर सकें, और गोद लिए बेटे के दावे को मान्यता दे सकें; और कि उनके लिए सबसे उपयुक्त तरीका यही होगा कि गोद लिया बेटा राजगद्दी के लिए दरखास्त लगा दे और इस बीच वो 60 हजार सालाना की पेंशन इस विरोध के साथ लेती रहें कि यह गोद लिए बेटे के अधिकार को कोई हानि नहीं पहुँचाएगी। पहले तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया, और बल्कि जोर से चिल्लाईं—‘मेरा झाँसी नहीं दूँगी। तब मैंने जितना संभव था उतनी सलाहियत से उन्हें यह बताने की कोशिश की कि किसी भी तरह का विरोध कितना व्यर्थ होगा, और उन्हें वो बताया जो कि सच था कि एक देसी रेजीमेंट की टुकड़ी और कुछ तोपखाने महल से तीन कदम की दूरी पर थे। और मैंने पुनः यह प्रभाव बनाने की कोशिश की कि उनकी बढ़ती का हल्का-सा भी विरोध रानी की हर आशा को मिट्टी में मिला देगा-- और थोड़े शब्दों में उनकी आजादी को जोखिम में डाल देगा। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि उनसे, और उनके वकील से भी, बात करके मुझे यह समझ आया (और मुझे लगा कि वे सच बोल रहे थे) कि झाँसी की जनता ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अधीन नहीं होना चाहती थी।
यह रात के दो बजे का वक्त था जब उस रात मैं महल से निकला। निकलने से पहले मैंने अपनी समझ के मुताबिक रानी को सलाहें दीं। 
अगले रोज मैं आगरा के रास्ते पर ग्वालियर लौट गया। रानी ने मुझे एक हाथी, एक ऊँट, एक अरबी घोड़ा, एक फुर्तीला शिकारी कुत्ता, (झाँसी में बने) रेशम के कुछ कपड़े और भारतीय दुशाले का एक एक जोड़ा भेंट किया। मैंने काफी ना-नुकुर के बाद इन्हें स्वीकार किया। वित्त मंत्री ने काफी अनुनय की कि अगर मैंने इन्हें न लिया तो इससे रानी के मन को चोट पहुँचेगी। रानी ने एक हिंदू देसी व्यक्ति द्वारा बनाया अपना एक चित्र भी मुझे भेंट किया।
झाँसी राज्य में रानी को शासन का पुनराधिकार नहीं दिया गया, और हम जानते हैं कि बाद में उन्होंने परम क्रूर व्यक्ति नाना साहब, जिनके कष्ट उनसे मिलते-जुलते थे, के साथ विद्रोह कर दिया था। सरकार ने नाना साहब को पेशवा के गोद लिए बेटे और उत्तराधिकारी के तौर पर मान्यता नहीं दी थी, जबकि झाँसी की रानी दिवंगत राजा के गोद लिए बेटे की अवयस्कता के दौरान उसकी संरक्षक-शासक के तौर पर मान्यता चाहती थीं।
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*झाँसी के जोखनबाग में 7 जून 1857 को हुई इस घटना में 60 अंग्रेज स्त्री-पुरुष मारे गए थे। यह कृत्य बंगाल इन्फेन्ट्री की विद्रोही टुकड़ी ने उसके एक कमांडर काला खान के कहने पर किया था। अंग्रेजों के आधिपत्य वाले किले में फँसे गोरे लोगों को रानी लक्ष्मीबाई से मदद की उम्मीद थी, जो वे उन्हें मुहैया नहीं करा पाईं। इसका कारण यह था कि वे खुद असहाय स्थिति में थीं।  
** रानी के पति गंगाधर राव के भाई और उनके ठीक पहले राजा रहे रघुनाथ राव तृतीय
*** प्रायः रानी का जन्म 1835 और उस लिहाज से उनकी मृत्यु 23 साल की उम्र में मानी जाती है। पर कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक उनका जन्म 1828 का होना चाहिए। इसका एक प्रमाण ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित झाँसी के खजाने से गंगाधर राव की शादी के लिए किए गए 40 हजार रुपए के भुगतान की एक प्रविष्टि का दस्तावेज है। वैसे में क्या लक्ष्मीबाई की गंगाधर राव से सिर्फ सात साल की उम्र में शादी हो जाना व्यवहार्य माना जा सकता है? अगर वैसा था भी, तो वे अपने से उम्र में 15 साल ज्यादा ठहरने वाले नाना साहब के साथ बिठूर मेंबरछी, ढाल, कृपाण, कटारी से कब खेलीं? स्वयं लैंग इस संस्मरण में उनके कम उम्र में ज्यादा सुंदर रहे होने का अनुमान करता है। अगर 1854 में रानी के वकील के मुताबिक वे 20 साल की थीं, तो सवाल है कि कम उम्र से लैंग का आशय क्या था?

(अनुवाद एवं प्रस्तुति- संगम पांडेय)

Sunday, December 25, 2016

न्यायप्रियता जहाँ ले जाती है

अल्बेयर कामू के नाटक जस्ट एसेसिन उर्फ जायज़ हत्यारे को परवेज़ अख्तर ने न्यायप्रिय’ शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय एब्सर्ड’ की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से जुड़ी एक वास्तविक घटना पर आधारित है, पर प्रस्तुति में इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा गया है। एक अंग्रेज अफसर की हत्या की जानी है। लेकिन ऐन बम फेंके जाने के वक्त दो बच्चे वहाँ मौजूद होने से क्रांतिकारी मस्ताना बम नहीं फेंक सका। ग्रुप के एक क्रांतिकारी तेजप्रताप को ऐतराज है कि उद्देश्य की राह में भावुकता को आड़े क्यों आने दिया गया। लेकिन मस्ताना के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह बच्चों के ऊपर बम फेंक पाए। बहरहाल दूसरी कोशिश में अफसर मार दिया जाता है, और मस्ताना जेल में है। यहाँ एक दूसरा एब्सर्ड अफसर की बीवी के आगमन के रूप में पेश आता है। वह अपने मार दिए गए अफसर पति के कई मानवीय पक्षों के बारे में बताती है, और उसका यह बताना एक नया विरोधाभास पैदा करता है। उसके जाने के बाद एक सरकारी एजेंट का प्रवेश होता है जो एक कबूलनामे के एवज में उसे और उसके साथियों के फायदे का एक प्रस्ताव, और न मानने पर उसे एक विश्वासघाती के तौर पर प्रचारित करने की धमकी, देता है। लेकिन मस्ताना के लिए इन सब प्रलोभनों का कोई अर्थ नहीं। उसने अगर अपने किए की सजा को नहीं भुगता तो खुद को हत्यारे के रूप में देखने के अलावा कोई रास्ता उसके लिए नहीं होगा।
कामू ने यह नाटक 1949 में लिखा था। यह वही वक्त था जब मार्क्सवाद के मुद्दे पर सार्त्र से उनके स्थायी मतभेद सामने आए थे। वही सार्त्र जिनके नाटक मेन विदाउट शेडो में भी कुछ क्रांतिकारी कैद में एक ऐसी ही दुविधापूर्ण स्थिति का सामना कर रहे हैं-- उनके साथ का एक कमउम्र लड़का उनके सीक्रेट्स को उजागर करके संभावित सजा से बच निकलने की धमकी देता है। लेकिन उस नाटक का एक विद्रोही अपने कॉज के लिए लड़के की हत्या कर देता है। जबकि इसीसे मिलते-जुलते कारण से मस्ताना पहली बार में बम नहीं फेंक पाया था।
कामू ने अपने पहले नाटक कालिगुला में इसी नाम के रोमन बादशाह का चरित दिखाया था, जिसका जीवन सबसे बड़ी समस्या एब्सर्ड को जीवनशैली के रूप में चुनने का उदाहरण था, जिस वजह से उसकी हत्या कर दी गई थी। क्या वह एक तरह की आत्महत्या ही नहीं थीबाद में अपनी किताब मिथ ऑफ सिसिफस में जीवन के व्यर्थताबोध की मीमांसा करते हुए कामू आत्महत्या को एक नतीजे के रूप में चुनने के विचार को खुद ही एब्सर्ड मानते हुए ठुकरा चुके थे। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि जीवन की असंगति का समाधान है उसे कबूल कर लेना। इससे जीवन जीने के लिए एक उद्देश्य का चुनाव किया जा सकता है। नाटक जस्ट एसेसिन का नायक इसी विचार का प्रतिनिधि है। उसने जीवन को मृत्यु के आमंत्रण के तौर पर आत्मसात कर एक उद्देश्य का चुनाव किया है, और इसी क्रम में उद्देश्य से जुड़ी गतिविधि और नतीजे का भी। लेकिन मुश्किल यही है कि जो तार्किक समाधान है वह मानवीय समाधान साबित नहीं हो पा रहा।
प्रस्तुति न्यायप्रिय में स्थितियों का एक साफ-सुथरा किंतु भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया है। कामू के नाटक में उद्देश्य एक पात्र की समस्या के तौर पर है, पर हिंदुस्तानी परिवेश में उच्चतर भावना की चीज समझा जाता है। यह फाँक प्रस्तुति में निरंतर दिखाई देती है। पात्रों की भावनाएँ कई बार इतनी प्रत्यक्ष हैं कि इससे बात का तनाव डाइल्यूट होता है। मस्ताना की प्रेमिका रही दमयंती का दर्द में डूबा चेहरा इतनी देर तक दृश्य में दिखाई देता है कि एक आनुषंगिक संदर्भ प्रमुख प्रसंग की तरह उभरा दिखाई देने लगता है। बम फेंकने जैसी कार्रवाई में असमर्थ यूसुफ का भी यही हाल है। इतने भावुक लोगों में तेजप्रताप का किरदार कुछ विलेन जैसा होकर रह जाता है। ऐसा होने की एक वजह शायद यह है कि अपने आइडिये में आश्वस्त पात्र हमारे परिवेश की चीज ही नहीं हैं। बहरहाल प्रस्तुति की अच्छी बात ये ही किभावना के अतिरिक्त और कुछ भी उसमें बाहरी नहीं है—न रंगमंचीय युक्तियाँ, न संगीत का शोर। उस अर्थ में यह एक ठोस यथार्थवादी नाट्य प्रस्तुति है। यानी मंच पर दृश्य का कोई अतिरिक्त तामझाम नहीं है। बस उतनी ही चीजें हैं कि लोकेशन का संकेत हो जाए, और पूरा नाटक पात्रों के परस्पर व्यवहार से ही निकलता है। यह यथार्थ हिंदी नाटक में अब दुर्लभ हो चला है। हर फाँसी के बदले में सजा में एक साल की छूट पाने वाले जल्लाद कैदी का किरदार अच्छा बन पाया है। वैसे नाटक की एक अन्य समस्या शायद उसके अनुवाद में भी है, कई बार कुछ शब्द बनावटी मालूम देती है। 

Saturday, December 24, 2016

तोलस्तोय, भारत और गांधी

तोलस्तोय को हमारे देश में अक्सर गांधी के प्रसंग से याद किया जाता है। गांधी अपने आरंभिक दौर में उनसे गहरे प्रभावित रहे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक तोलस्तोय आश्रम भी बनाया। ईश्वर, अहिंसा, निजी संपत्ति और शाकाहार पर गांधी के विचार लगभग वही थे जो तोलस्तोय के थे। इस अर्थ में गांधीवाद काफी हद तक तोलस्तोय के विचारों का ही राजनीतिक सूत्रीकरण मालूम देता है। तोलस्तोय हिंसा को सबसे बड़ी बुराई और ईश्वर को मनुष्य का ध्येय मानते थे।
इस क्रम में जिस तरह वे राज्यसत्ता की हिंसा और अंततः राज्य के ही मुखर विरोधी थे, उसके कारण उनके विचारों को अराजकतावादी भी माना गया। तोलस्तोय का मानना था कि राज्य को बुरे लोग क्रूर ताकतों के समर्थन से चलाते हैं, और एक सुसंगठित राज्य लुटेरों से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है। अपने परवर्ती जीवन में वे विज्ञान और राज्य के पश्चिमी मॉडल के इस कदर खिलाफ थे कि भारत जैसे देश की ओर उम्मीद से देखते थे। हालांकि उनकी यह उम्मीद भारत की परिस्थितियों के बारे में उनकी कम जानकारी और संभवतः बुद्ध की जन्मभूमि के रूप में कुछ ज्यादा ही ऊंची धारणा पर आधारित थी। उन्होंने बुद्ध के विचारों का बहुत गहराई से अध्ययन किया था और भारत को वे एक परंपरानिष्ठ और ऐसे देश के रूप में देखते थे, जहां से उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का कोई सूत्र मिल सकता था।
भारत के बारे में तोलस्तोय की सारी समझ या तो किताबों से बनी थी या भारत में रह चुके कुछ लोगों से सुनी बातों के आधार पर। जाहिर है कि भारतीय जीवन के असंख्य विरोधाभास उनकी निगाह में नहीं आ पाए थे। लेकिन भारतीय दर्शन और विचार पद्धति के विरोधाभास उनकी पैनी निगाह- गोर्की के मुताबिक जिससे कुछ भी छिपा नहीं रह सकता था- ने जरूर देखे थे। उन्हें शंकराचार्य की जीवन के बारे में मूलभूत आध्यात्मिक कल्पना ठीक लगती थी, पर कुल मिलाकर उन्हें उनमें बहुत सारे अंतर्विरोध दिखाई देते थे। तोलस्तोय को वेदों के ज्ञान की जानकारी थी और रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का लेखन भी उन्होंने पढ़ा था। वे ज्ञान की इस परंपरा के प्रशंसक थे, और उन्हें इसमें बहुत कुछ अपने काम की बातें दिखाई देती थीं। लेकिन ऐसा लगता है कि तोलस्तोय के आत्मिक ज्ञान और भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के बीच कोई ऐसा बहुत बड़ा फर्क था, जो उन्हें असंतुष्ट करता था। उनका यह असंतोष शायद भारतीय ज्ञान परंपरा की अति व्यक्तिनिष्ठता से था। उन्हें परमात्मा में लीन हो जाने वाले एकांतिक अध्यात्म की नहीं, बल्कि समाज में सहज रूप से सम्मिलित और क्रियाशील व्यक्ति के आत्मबोध से उपजे अध्यात्म की तलाश थी। उन्हें लगता था कि भारतीयों ने सदियों में विज्ञान से दूर प्राकृतिक जीवन जीते हुए इसे हासिल कर लिया है। उन्हें भारत एक ऐसी जगह लगती थी जहां भले ही गरीबी थी, लेकिन जहां के लोगों में कृत्रिमता और बनावट नहीं थी, और विज्ञान से दूर वे उन्हें प्रकृति और ईश्वर के ज्यादा निकट लगते थे। तोलस्तोय को यह भी लगता था कि अंग्रेज अपने लालच के लिए भारतीय जीवन प्रणाली को चौपट कर रहे हैं, और गुलाम होने के बावजूद भारतीय इस मायने में अंग्रेजों से श्रेष्ठ हैं कि 'वे अंग्रेजों के बिना जी सकते हैं, लेकिन अंग्रेज उनके बिना नहीं।' ऐसे में तोलस्तोय को भारतीय विद्वानों के बताए अध्यात्म के फार्मूले विचित्र लगते थे। उन्हें उच्च समाधि अवस्था तक पहुंचने के लिए बताई गई भारतीय पद्धति में- पीठ सीधी रखते हुए बैठना, दोनों आंखें नासिकाग्र पर एकाग्र करना और ओम् शब्द जपना मूर्खतापूर्ण लगता था।  अपने एक परिचित के साथ भारत संबंधी चर्चा में उन्होंने कहा था- 'भगवान करे वहां विज्ञान का विकास न हो।'
तोलस्तोय का अहिंसा का विचार सर्वसमन्यवयवादी भारतीय मानस से मेल खाता था। यही वजह रही कि गांधी उसे एक राजनीतिक थ्योरी में बदलने में कामयाब रहे। अहिंसा को एक पूर्ण राजनीतिक विचार के रूप में लागू करने पर गांधी को अपने देशवासियों के बीच ही भारी आलोचनाएं भी सहनी पड़ीं। गांधी और तोलस्तोय में यह मूल अंतर है कि गांधी जहां अपने विचारों को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं, वहीं तोलस्तोय में खुद अपनी ही धारणाओं को लेकर सर्वत्र एक बेचैनी दिखाई देती है। वे अपने हर विचार को कई कोणों से परखते हैं, और एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद भी मानो संदेह से भरे रहते हैं। जीवन के प्रश्नों पर आत्मा, बुद्धि, हृदय के इतने बहुविध तर्कों से इतना स्पष्ट ढंग से संसार में शायद ही किसी और  ने सोचा हो। एक स्थान पर वे विचार को ही बुराई बताने वाली सूक्ति का इस वजह से समर्थन करते दिखाई देते हैं, कि विचार आस्था को नष्ट करता है। माना जाता है कि तोलस्तोय जीवन भर चीजों के औचित्य की खोज में जीवन के अपने ही अंतर्भूत अतर्कवाद से जूझते रहे।
तोलस्तोय के विचारों का सिद्धांतीकरण गांधीवाद में देखने पर सवाल खड़ा होता है कि ऐसा कैसे संभव हुआ? तोलस्तोय अपने जिन विचारों के लिए अराजकतावादी करार दिए गए, वही विचार गांधीवाद में आखिर कैसे स्वीकार्य हुए? इसकी दो वजहें हैं। पहली, गांधी अहिंसा पर आधारित अपनी थ्योरी का एक कहीं व्यावहारिक संस्करण तैयार करते हैं, जिसमें वे अराजकतावाद की एक मूलभूत स्थापना- राज्य के निषेध- पर एक ढीलाढाला परहेज बरतते हुए राज्य से न्याय और सत्य के पक्ष में खड़े होने की उम्मीद करते हैं।  इसके अलावा दूसरी वजह को समझने के लिए यहां जापानी विद्वान दाइसाकु इकेदा के उस विचार को उद्धृत करना उपयोगी होगा जिसमें वे भारत को एक अतर्कवादी समाज बताते हैं। अतर्कवाद की यह विशेषता होती है कि वहां प्रक्रिया और परिणाम में किसी समुचित सामंजस्य की जरूरत नहीं समझी जाती। गांधीवाद इस विशेषता को शुरू से अपने में समाहित किए रहा और सफल माना गया। भारत जैसी मुफीद जगह में गांधीवाद की सफलता दरअसल एक अतर्कवादी सफलता ही है, जहां प्रक्रिया और परिणाम में कोई भेद नहीं माना जाता, और हर अच्छा-बुरा एक निरंतरता में जीवन का हिस्सा भर होता है। नतीजा यह है कि दुनिया जितने ताज्जुब से गांधीवाद के प्रयोगों को देखती थी, उतने ही ताज्जुब से आज गरीबी रेखा कही जाने वाली मृत्यु रेखा के नीचे रह रहे देश की 37 फीसदी आबादी को देखती है। गोरों के रंगभेद के अलावा तमाम तरह के रंगभेद तरह तरह की नई नई शक्लों में भेस बदलते हुए यहां कायम ही हैं और हिंसा के तो कहने ही क्या!
दिलचस्प यह है कि तोलस्तोय की निगाह इस अतर्कवाद पर भी गई है। 'आन्ना कारेनिना' के एक पात्र स्वियाज्स्की के बारे में ये पंक्तियां पढ़ने लायक हैं- 'उसके लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं था कि उसका तर्क-वितर्क उसे किस नतीजे पर पहुंचाता है। उसे तो केवल तर्क-वितर्क की प्रक्रिया से ही मतलब था। उसका तर्क-वितर्क जब उसे अंध गली में ले जाता था, तो उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे यह पसंद नहीं था और वह इससे बचता था तथा बातचीत को किसी सुखद और मधुर दिशा में मोड़ ले जाता था।'
तोलस्तोय कम्युनिस्टों के खिलाफ उनके हिंसात्मक दर्शन की वजह से थे। उन्हें साम्यवाद का सदियों से चली आई व्यवस्था को आमूलचूल उलट देने का विचार भी अटपटा लगता था। लेकिन निजी संपत्ति के उन्मूलन के साम्यवादी विचार से वे खुद जीवन भर जूझते रहे। इस सवाल तक वे अपने मौलिक रास्ते से पहुंचे थे, न कि साम्यवाद के रास्ते। परवर्ती जीवन में अपनी निजी जायदाद को किसानों के नाम कर देने का उनका विचार उनके घर में निरंतर कलह का कारण बना रहा। उनके उपन्यासों 'आन्ना कारेनिना' का लेविन और 'पुनरुत्थान' का नेख्लूदोव भी निरंतर इस प्रश्न से जूझते दिखाई देते हैं। वे स्पेंसर और अमेरिकी विचारक हैनरी जॉर्ज के सिद्धांतों से प्रभावित हैं, जो कहता है- भूमि पर किसी का स्वामित्व नहीं हो सकता। जिस भांति जल, वायु तथा धूप का क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकता, उसी भांति जमीन को भी खरीदा और बेचा नहीं जा सकता।'
तोलस्तोय का मानना था कि राज्य समाज के संपन्न वर्ग के फायदे के लिए काम करता है, और सरकार का तो मतलब ही है सुसंगठित हिंसा। विडंबना यह है कि तोलस्तोय की मृत्यु के सौ साल बाद भी राज्य का कोई ऐसा मॉडल संसार में दिखाई नहीं दे रहा है, जिसपर आम लोगों की आजादी और व्यापक हितों के लिए यकीन किया जा सके। भारत जैसे देश में संसदीय लोकतंत्र से फायदा उठाने वाले लोग इसकी लोकप्रियता का तूमार खड़ा किया करते हैं, जबकि देश की तीन चौथाई आबादी को जीवन का न्यूनतम मुहैया कराने में भी यह तोलस्तोयकालीन रूसी राज्य से कहीं ज्यादा विफल है। यह अलग बात है कि तोलस्तोय जिसकी वकालत किया करते थे उस सरकार विहीन राज्य के अराजकतावाद के मॉडल की भी कोई स्पष्टता नहीं है, लेकिन ज्यादा बड़ी दिक्कत यह है कि आज हमारी दुनिया में कोई तोलस्तोय भी नहीं है जो राज्य की ज्यादतियों और विकास की विसंगतियों पर उसी शिद्दत से उंगली उठाए। जो कहे कि हमारे देश को राष्ट्रमंडल खेलों के दिखावे और मेट्रो ट्रेन जैसे महंगे और एकांगी विकास की नहीं, बल्कि एक समेकित और विकेंद्रीकृत विकास की जरूरत है, जिसका फायदा देश की बहुसंख्य आबादी को मिल सके। तोलस्तोय ने ऐसा ही विरोध जताया था, जब रूस के तूला प्रदेश में ट्रेन लाइन बिछाई जा रही थी। उनका मानना था कि रूस में रेल लाइन अर्थव्यवस्था के यूरोपीय पैटर्न को लागू करने के लिए बिछाई जा रही है। उन्होंने लिखा- 'रेलें प्रलोभन बढ़ाती हैं, जंगलों को नष्ट करती हैं, कामगार छीन लेती हैं, अनाज के भाव बढ़ा देती हैं और घोड़े पालने के धंधे को तबाह कर देती हैं।'
वर्जीनिया वुल्फ ने तोलस्तोय को दुनिया का महानतम लेखक माना, तो इसकी वजह फ्लाबेयर की उस राय में ढूंढ़ी जा सकती है, जिसमें वे उन्हें एक अद्भुत कलाकार और मनोविश्लेषक बताते हैं। तोलस्तोय के नैरेटिव और सच को देखने की उनकी निगाह का कोई सानी नहीं है। वे साहित्य में रूमानवाद को 'सच्चाई से आंखें न मिला पाने का साहस' मानते थे और अपने जीवन को भी उन्होंने उसी बेबाकी से परखा और कबूल किया था। 34 साल की उम्र में अपने विवाह से पहले उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी को वह डायरी दी थी जिसमें उनके 20 सालों तक बिताए 'पापपूर्ण जीवन' के ब्योरे दर्ज थे। यह पाप था उनकी जमींदारी में काम करने वाली किसान और मजदूर स्त्रियों से रहे उनके दैहिक संबंध। ऐसे एक संबंध से हुई एक संतान का भी इस डायरी में उल्लेख था। उनकी पत्नी इन ब्योरों को पढ़कर गहरे तक विचलित हुई थीं, पर फिर भी वे विवाह के लिए राजी हुईं। उस दौर के रूस के द्विवर्गीय जीवन में इस तरह के संबंध बहुत आम बात थे। यहां तक कि तोलस्तोय ने अपने पिता के इसी तरह के एक संबंध के नतीजे में हुए अपने एक 'भाई' का भी जिक्र किया है, जो दीन-हीन अवस्था में उनके पास कभी-कभार चंद रुपए मांगने आता था, और जिसे देखकर वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाया करते थे।
तोलस्तोय के पापबोध और पुनरुत्थान में ईसाइयत की गहरी झलक है। क्या गांधी का 'वैष्णव जन' भी उसीसे मिलती जुलती आस्था का ही एक भारतीय परावर्तन नहीं है?

Thursday, November 24, 2016

नरेंद्र मोदी के लिए छह सुझाव

नोटबंदी पर तमाम आलोचनाओं के कुल दो निचोड़ निकल रहे हैं—पहला, इससे लोगों को लाइन वगैरह में लगने की परेशानी हो रही है; दूसरा, बीजेपी ने अपने फायदे के सारे बंदोबस्त करने के बाद इसे लागू किया है। इन दोनों बातों को अगर बगैर किसी जिरह के मान भी लिया जाए तो भी नोटबंदी से होने वाले फायदों की तुलना में ये बहुत क्षुद्र किस्म के नुकसान हैं। 1991 के बाद बनी अर्थव्यवस्था बड़ी पूँजी की फूँक से फुलाई हुई अर्थव्यवस्था है। किसी भी अर्थव्यवस्था की जाँच का वास्तविक तरीका उसके सबसे गरीब लोग होते हैं। लेकिन इस फुलाई हुई अर्थव्यवस्था ने सिद्धांततः गरीबी को अप्रासंगिक और व्यवहारतः उसे ज्यादा दयनीय बनाया है। सबसे गरीब आदमी फटीचर यूनीफॉर्म पहने दफ्तरों और सोसाइटियों के बाहर गार्डगीरी करता दिखता है और दिन के बारह घंटे नौकरी में गिरवी रखने के बाद उतना गरीब मालूम नहीं देता; जबकि उसकी जिंदगी पहले की तुलना में बहुत कम उसकी अपनी है। भौतिक रूप से पुराने फुटपाथ के दिनों से उसकी हालत जितनी बेहतर हुई है उसकी तुलना में ऊपर वाले लोगों की हालत उनकी वर्गीय हस्तियों के हिसाब से कई-कई गुना ज्यादा बेहतर होती गई है—इसलिए अंततः उसकी स्थिति ज्यादा हीन ही हुई है। इसे संक्षेप में कहें तो वैश्वीकरण का फायदा उठाकर भारतीय राज्य-व्यवस्था ने यहाँ की प्रिय सामाजिक प्रवृत्ति हाइरारकी (ऊँच-नीच) को एक आर्थिक दिशा देकर उच्चतम अवस्था में पहुँचा दिया है। ऐसा विश्वपूँजी को छुट्टा छोड़ने और अपने तईं मुद्रास्फीति को बढ़ावा देने से हुआ है। विश्व पूँजी गैरजरूरी उत्पाद बनाती है और लोगों के पास मुद्रा का इजाफा उन्हें इन गैरजरूरी चीजों का ग्राहक बनाता है। भारत के दीन यथार्थ में कार से लेकर डियो तक जैसी चीजें अगर इसी क्रम में आवश्यक होती गईं, तो इसका कारण सरकारी प्रयत्नों से तैयार की गई एक कृत्रिम अमीरी थी। 1996 में लागू की गईं पाँचवें वेतन आयोग की बंपर सिफारिशें ऐसा पहला बड़ा प्रयत्न और देश के निचले तबके के लोगों के साथ की गई एक विलक्षण गद्दारी थी। जनता के टैक्स का पैसा एक तबके को उपभोक्ता बनाने के लिए खर्च किया जाने लगा। ऐसा वेतन जिसके लिए उत्पादकता का कोई लक्ष्य न हो एक कृत्रिम और अर्थव्यवस्था-घातक अमीरी रचता है, और अंततः सामाजिक ताने-बाने को भी नकली बना देता है, जिसकी असंख्य मिसालें हम आज देख सकते हैं। सन 1996-97 तक जिस मद में सरकारी कोष से 21,885 करोड़ खर्च होता था, 1999 में निन्यानबे फीसद बढ़कर 43,568 करोड़ हो गया। यह इतना खतरनाक कदम था कि विश्व बैंक ने इसे देश और यहाँ के सार्वजनिक वित्त के लिए अकेला सबसे बड़ा घातक झटका कहकर भर्त्सना की थी। लेकिन हमारे अनोखे देश की सरकारें कोई आत्मालोचना करने के बजाय सरकारी कर्मचारियों के अगले वेतन निर्धारणों में भी यह ज्यादती करती रहीं, और इस तरह एक ऐसी अर्थव्यवस्था आकार लेती रही जिसने पूरी दुनिया को ताज्जुब में डाल दिया कि ग्रोथ रेट ठीकठाक होने के बावजूद यहाँ गरीबी क्यों नहीं घट रही।
गरीबी इसलिए नहीं घट रही क्योंकि पूरा विकास बिना उत्पादकता के अमीर बनाने और फिर इन अमीरों के जरिए एक नकलची अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को बढाने की संभावना पर टिका है। यानी एक वस्तुस्थिति-निरपेक्ष मुनाफा शेयर बाजार के सूचकांक को तय करता है। यह महानगरमुखापेक्षी छद्म अर्थव्यवस्था है, जिसने कालांतर में ऐसा तंत्र विकसित कर लिया है कि वास्तविक उत्पादन न करने वाली पूँजी निरंतर बड़ी होती गई है। मसलन आज देश में विज्ञापन उद्योग लगभग 52 हजार करोड़ रुपए का हो गया है। जरा इस उद्योग के फूले पेट की तुलना वास्तविक उत्पादन करने वाले कृषि क्षेत्र से करें—जहाँ हर साल सैकड़ों की तादाद में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 
ऐसा ढाँचा है कि कुछ लोग भयानक रूप से शोषित और कुछ लोग सिर्फ मौज करने के लिए पैदा हुए हैं। याद करें पिछले दो दशकों को, जब एक देश में जहाँ सात सौ ग्राम चावल प्रतिदिन की उपलब्धता पर गरीबी रेखा का निर्धारण था उस देश में बेइंतहा कारें उतार दी गईं, जगह कम पड़ने लगी तो नई-नई सड़कें और फ्लाईओवर बनाए गए;  टेलीविजन, एयरकंडीशनर, फ्रिज वगैरह की खपत बनी रहे इसके लिए बिजली की उपलब्धता बढ़ाई गई। अमीरों को गुणवत्ता मुहैया कराने के लिए अमेरिकी नकल पर हर चीज की पैकेजिंग कर दी गई। और विकास की इस पूरी प्रक्रिया में गाँव और गरीब कहीं नहीं थे। उनके लिए एक ही विकल्प था कि थोड़े-बहुत लाभ रिस-रिस कर उन तक भी पहुँच जाएँ। कुछ मूर्ख लोगों ने इसे कृषि युग के पिछड़ेपन से औद्योगिक युग के अगड़ेपन की ओर का अगला चरण माना।
यहीं सवाल खड़ा होता है कि क्या हम सिविल समाज हैं? एक व्यवस्था है जो अपने अधिसंख्य नागरिकों के जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा किए बगैर अन्य के लिए विलासिता के सामान का बंदोबस्त करने में जुटी है और समाज को इन बेडौल नीतियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर ये कैसा समाज है! ऐसा नहीं है कि इस तरह बनाई गई व्यवस्था के विरोधाभास कोई छुपी हुई चीज हैं। जिस तरह सरकारी राजस्व से उपभोक्तावाद का सूत्रपात किया गया उसी तरह अब मनरेगा जैसी योजना के जरिए कृत्रिम तरह से ग्रामीण रोजगार सृजित किए जा रहे हैं। क्या मनरेगा का पैबंद उदारवादी अर्थव्यवस्था के हमारे मॉडल की नाकामी का ही एक सबूत नहीं है।
वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जो गति दी थी उसे यहाँ की बेढंगी सरकारी नीतियों और भ्रष्टाचार ने बेडौल परिणामों की ओर मोड़ दिया। जो लोग इस बात से खुश नजर आते हैं कि उदार अर्थव्यवस्था के कारण ही गरीब के पैर में चप्पल नजर आने लगी थी वे यह बात भूल जाते हैं कि उदारीकरण ने दुनिया के तमाम देशों में भौतिक विकास के बहुत अच्छे परिणाम दिए हैं, जिनके मुकाबले ये चप्पल-विकास कुछ भी नहीं। और उदारीकरण ने दुनियाभर में जो समस्याएँ दी हैं उन समस्याओं को जटिल से जटिलतम की ओर ले जाने के मामले में हम नंबर एक पर हैं। यह एक निरंकुश उत्पादन के जरिए लागू की गई विकास की नीति थी, जिसका परिणाम था कि आबादी बढ़ रही है, कारें बढ़ रही हैं, कूड़ा बढ़ रहा है, शोर बढ़ रहा है, असमानता बढ़ रही है—जिनको मिलाकर अंततः एक दारुण यथार्थ निरंतर और अराजक होता जा रहा है।
पाँचवें वेतन आयोग ने गैरआनुपातिक ढंग से सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाते हुए यह लक्ष्य भी निर्धारित किया था कि आने वाले दिनों में सरकार का आकार घटाया जाएगा। लेकिन सन 2010 के आँकड़ों के मुताबिक बीस साल के उदारीकरण के बावजूद सरकारी क्षेत्र की नौकरियाँ निजी क्षेत्र से 1 के मुकाबले 1.8 के अनुपात में बहुत ज्यादा थीं। 2010 में ये पौने दो करोड़ कर्मचारी करीब दस करोड़ का उपभोक्ता वर्ग बना रहे थे। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों तक देश की औसत प्रति व्यक्ति आमदनी के मुकाबले सरकारी वेतन 1 के मुकाबले 4.8 था; जो कि विकसित देशों में पाए जाने वाले 1.2 या 1.4 के अनुपात से बहुत ज्यादा था। उसके बाद सातवाँ वेतन आयोग भी लागू कर दिया गया है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि देश का 94 फीसदी श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जिसके आर्थिक या मानवीय अधिकारों की किसी भी स्तर पर कोई फिक्र नहीं की जा रही।   
कैसी अजीब बात है कि एक ओर थॉमस पिकेटी जैसा अर्थशास्त्री वैश्वीकरण के बाद वित्तीय पूँजी के बढ़ते संकेंद्रण को लोकतंत्र के लिए संहारक बताते हुए सत्तर फीसद टैक्स तक के सरकारी दखल की जरूरत बताता है, वहीं भारत जैसे देश में सरकारें इसी पूँजी को संकेंद्रित करने की एजेंसी बनी हुई हैं; जिसे भ्रष्टाचार और नकली करेंसी आदि ने और भी व्यापक बना दिया है। ऐसे में सरकार द्वारा नोटबंदी नीचे के आम लोगों के लिए एक फायदेमंद कदम साबित हो सकता है। हालाँकि ये अकेला कोई पर्याप्त कदम नहीं है। जरूरत सिर्फ काले धन पर ही नकेल लगाने की नहीं है, बल्कि स्वयं सरकार द्वारा प्रश्रित आर्थिक फासले को भी कम करने की है। सरकार को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को असल उत्पादकता और वास्तविक उत्पादन से जोड़े। जैसे कि भारत जैसे देश में टेलीविजन इंडस्ट्री का इतना बड़ा हो जाना अर्थव्यवस्था के बेडौलपन को ही साबित करता है। भारत को इन सब मामलों में अमेरिका की नकल नहीं करनी चाहिए, और सबसे पहले सभी नागरिकों की समावेशिता वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम करना चाहिए। ये नहीं कि कभी एक हिस्से में सूखा पड़ रहा है, कभी दूसरे हिस्से में बाढ़ आ रही है, और देश की डेढ़ फीसद जनता दिल्ली में अरबों रुपए से बनी अत्याधुनिक मेट्रो ट्रेन में सफर कर रही है।
नोटबंदी के साथ-साथ सरकार को कुछ और कदम भी शीघ्र उठाने चाहिए, जो इस प्रकार हैं-
1.      1- सरकार को एक नया वेतन आयोग गठित करना चाहिए, जिसमें एक कर्मचारी का कुल वेतन 15000 से एक लाख की अधिकतम सीमा के दरम्यान हो।
2- कारों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके लिए कई सौ गुना टैक्स लगाकर कारों को महँगा करने के साथ-साथ यह बंदिश भी हो कि कार वही खरीद सकता है जिसके पास पार्किंग स्पेस हो। कार अर्थतंत्र और पर्यावरण के लिए ही नहीं, भारत जैसे ज्यादा आबादी वाले देश में विचरण के सार्वजनिक स्पेस को घेरने के लिहाज से भी नुकसानदेह है।
5       3- न्यूनतम वेतन कानून को कार्यावधि के साथ नत्थी करके सख्ती से लागू किया जाए। इससे अर्थव्यवस्था का लाभ नीचे तक पहुँच पाएगा, और कीमतों का सही निर्धारण हो सकेगा।
4- स्कूलों में बिल्कुल प्रारंभिक स्तर से इस तरह की शिक्षा दी जाए कि लोग खुद की ही तरह दूसरे के अस्तित्व को भी स्वीकार करें। शिशु अवस्था से शामिल करने पर ये चीज एक संस्कार के रूप में सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने वाली होगी। सामाजिकता का अंतर्भूत इलहाम व्यक्ति के स्वार्थ और उसी क्रम में भ्रष्टाचार को कम करेगा। इसे दूसरे शब्दों में इस तरह कहा जा सकता है कि खुद की और दूसरों की वैयक्तिकता का संज्ञान सामाजिकता का मूलाधार है। हिंदुओं के भाववादी समाज में इसकी कमी होने से इस ओर विशेष तवज्जो दी जानी आवश्यक है।
5- लोगों में अपने काम को ठीक से करने की आदत का विकास करने के उपक्रम किए जाएँ। यह आदत कालांतर में अन्वेषी वृत्ति का कारण बनती है, और अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास का आधार बनती है।
6.      6- कृषि को अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक प्राथमिकता वाला क्षेत्र घोषित करके इसे लाभकारी बनाने के उपाय किए जाएँ, जिसके लिए कुछ सुझाव निम्न हो सकते हैं—(क). मदर डेयरी और अमूल डेयरी की तर्ज पर कृषि को समर्पित कुछ ऐसे कोऑपरेटिव बनाए जाएँ जो किसानों से किराए पर जमीन लेकर उनसे ही वहाँ कर्मचारी के रूप में खेती कराएँ। बड़े स्तर पर और आधुनिकतम उपकरणों से खेती का एक मॉडल प्रस्तुत किया जाए। (ख) किसी भी कृषि उत्पाद की अंतिम कीमत में किसान का सर्वाधिक फीसद सुनिश्चित किया जाना चाहिए। (ग) सच्चाई तो यह है कि मध्यवर्ग की गैरआनुपातिक भारीभरकम तन्ख्वाहों को संतुलित किए बगैर किसानों को लाभ देने में हमेशा ही मुश्किल आएगी। इसलिए सबसे पहले उसी दिशा में काम किया जाना चाहिए।