भारतीय पंचांग की कहानी

भारत में कैलेंडर की शुरुआत ऋग्वेद-काल में यज्ञों का समय निर्धारण करने के लिए हुई थी।

शुरुआती कैलेंडर 1200 ईस्वी पूर्व में वेदांग ज्योतिष के नाम से ऋग्वेद का एक हिस्सा था। इस कैलेंडर में एक साल 360 दिनों का था। विद्वानों का मानना है कि वेदांग ज्योतिष समय की गणना के बहुतेरे अनुसंधानों का परिणाम था, न कि बिल्कुल शुरुआती।
वेदांग ज्योतिष में समय की गणना की अशुद्धियों को क्रमशः दूर किया जाता रहा। अंततः आज से 1500 साल पहले आर्यभट्ट ने वह भारतीय पंचांग कैलेंडर तैयार किया जो आज तक प्रयोग में है और जिसे आज हिंदू पंचांग कहा जाता है।
दुनिया भर में कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा की परिक्रमाओं के आधार पर तैयार किए जाते हैं। सूर्य की परिक्रमा मोटे तौर पर 365 दिन और 6 घंटे में पूरी होती है जबकि चंद्रमा की 12 परिक्रमाएँ 354 दिन में। इस लिहाज से अंग्रेजी कैलेंडर सूर्य कैलेंडर है और इस्लामी कैलेंडर चंद्र कैलेंडर।
आर्यभट्ट ने सूर्य और चंद्र दोनों कैलेंडरों को अपने पंचांग में समाहित किया, इसलिए अंग्रेजी में इसे लूनी-सोलर कैलेंडर कहते हैं। इसके लिए सूर्य और चंद्रमा की परिक्रमाओं में मौजूद करीब 11 दिन के अंतराल को भरने के लिए हर तीन साल में एक अधिमास का प्रावधान किया गया।
यहाँ यह जानना आवश्यक है कि जहाँ चंद्रमा की परिक्रमा समय की सूक्ष्म गणना के लिए महत्त्वपूर्ण है, वहीं सूर्य-वर्ष की आवश्यकता बदलते मौसमों के समय को जानने के लिए होती है, क्योंकि आकाश में सूर्य की गति और दिशा ही पृथ्वी पर मौसमों को निर्धारित करती है।
पंचांग में एक दिन के पाँच अंग होते हैं। तिथि, वार, नक्षत्र, करण, योग। इनमें चंद्रमा की गति, सूर्य से उसकी दूरी, दिवस का करणों में विभाजन आदि पहलुओं की सूक्ष्म गणना ने त्रुटियों की गुंजाइश को खत्म कर दिया।
दुनिया भर में कैलेंडरों के फर्क सिर्फ सूर्य और चंद्रमा के आधार पर ही नहीं हैं, बल्कि सूर्य की परिक्रमा को लेकर भी दो अलग-अलग सिद्धांत हैं, जिन्हें सायण (ट्रॉपिकल) और निरयण (साइडरियल) कहा जाता है।
सायण पद्धति में ग्रहों की परिक्रमा को सिर्फ सूर्य के सापेक्ष देखा जाता है, जबकि निरयण पद्धति में उसे नक्षत्रों के कोण से भी देखा जाता है। नक्षत्रों के बारे में परंपरागत मान्यता रही है कि वे ग्रहों की तरह चलायमान न होकर स्थिर हैं, पर निरयण पद्धति के अनुसार उनमें भी एक सूक्ष्म गति होती है। उस हिसाब से हर 72 वर्ष में समय की गणना में एक दिन का फर्क आ जाता है। आर्यभट्ट ने अपना पंचांग इसी निरयण पद्धति के आधार पर तैयार किया था।
निरयण पद्धति के मुताबिक एक वर्ष 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट और 36.56 सेकेंड का होता है, जबकि सायण पद्धति से बने अंग्रेजी ग्रेगरियन कैलेंडर में यह 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट और 45.25 सेकेंड का होता है। इस फर्क के कारण अंग्रेजी सूर्य वर्ष और भारतीय सूर्य वर्ष में आज 23 दिनों का फर्क आ चुका है।
इसका पता सूर्य कैलेंडर आधारित एकमात्र हिंदू त्योहार मकर संक्रांति से चलता है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह 22 दिसंबर को मनाया जाना चाहिए, जबकि हिंदू पंचांग के मुताबिक यह 14 जनवरी को मनाया जाता है।
हिंदू कैलेंडर के विक्रम संवत की शुरुआत हालाँकि 57 ईस्वी पूर्व यानी 2081 वर्ष पूर्व हुई, लेकिन करीब 1500 वर्ष पूर्व यानी पाँचवीं सदी में आर्यभट्ट द्वारा इसमें काफी सुधार किए गए। जानकारों ने इस्लामी, हिब्रू, चीनी, और दक्षिण पूर्व एशिया के बौद्ध कैलेंडरों पर भी हिंदू पंचांग के प्रभाव की बात कही है।
भारत में समय की सूक्ष्म गणना की आवश्यकता की एक वजह यहाँ ज्योतिष का व्यापक प्रभाव भी रहा है। ईसा पूर्व के समय में यहाँ नक्षत्र ज्योतिष का ही चलन था, जिससे मोटे तौर पर शुभ और अशुभ समय का पता लगाया जाता था। लेकिन ईसा-पश्चात के समय में जन्मपत्री-ज्योतिष व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ, जो समय की सटीक जानकारी के बगैर संभव नहीं था।

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