छत्रपति शाहू जी की श्रद्धांजलि का सच

 

इतिहास लेखन में फेसवैल्यू पर घटनाओं की मनमुताबिक व्याख्या कर देना एक तरह का अपराध है।

इधर सन 1714 में छत्रपति शाहूजी के औरंगजेब की कब्र पर श्रद्धांजलि देने की बात कई अखबारों-पत्रिकाओं ने छापी है।

ज्यादातर ऐसे लेख फिल्म छावासे बनी औरंगजेब की क्रूर छवि को नरम और मानवीय बनाने की नीयत से छापे गए। लेकिन हकीकत वो नहीं है।

 1689 में संभा जी अपने पुत्र और पत्नी सहित मुगलों के कब्जे में आ गए। संभा जी की क्रूरतापूर्वक हत्या कर दी गई, और उनकी पत्नी येसुबाई और पुत्र शाहूजी को औरंगजेब ने अपनी बेटी जीनतउन्निसाँ  की देखरेख में कैद कर लिया।

जीनतउन्निसाँ दयालु थीं, अविवाहित थीं और उनकी उम्र उस वक्त 47 साल थी।

शाहूजी के मन में जीनतउन्निसाँ के लिए गहरी इज्जत के कई प्रमाण मिलते हैं, लेकिन ऐसी ही इज्जत अपने पिता के क्रूर हत्यारे औरंगजेब को लेकर भी थी यह कहना सरासर बेतुका है।

 संभाजी की हत्या के बाद मराठा छत्रपति उनके सौतेले भाई राजाराम को बनाया गया।

कैद में रह रहे ये दोनों माँ-बेटे राजाराम को प्रत्यक्षतः हमेशा शत्रु के रूप में ही दिखाते रहे। पर सच्चाई यह थी कि राजाराम के नेतृत्व में मराठों की ताकत ही उनके लिए जिंदगी और सम्मान का सबसे बड़ा आसरा थी। वरना अपने भाइयों, बेटों और बेटियों तक पर क्रूरता से न हिचकने वाला बादशाह इन दोनों को क्योंकर बख्शता!

 इसके प्रमाण भी हैं। अगस्त 1700 में जब राजाराम की असमय मृत्यु हुई तो शाहूजी इतनी हताशा में आ गए कि बीमार पड़ गए, जबकि पूरा मुगल खेमा वक्त इस खबर से उल्लास में था।

बादशाह के पूछने पर उनके साथ आए दरबारी ने बताया कि शाहूजी दाल-चावल के बजाय सिर्फ मीठे पर जिंदा हैं, क्योंकि हिंदुओं में कैद के दौरान आधा खाना खाने की ही इजाजत है।

 अप्रैल 1703 में औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया कि एक तय दिन शाहू जी को मुसलमान बनाया जाएगा। खबर से बौखलाए माँ-बेटे ने विरोध में खाना-पीना छोड़ दिया और बेगम साहब जीनतउन्निसाँ से गुजारिश की कि वे इस बारे में कुछ करें।

आखिर बहुत कहने-सुनने के बाद औरंगजेब ने यह शर्त रखी कि अगर वे अपने बदले दो मराठों को मुसलमान बनने के लिए प्रस्तुत करें तो उन्हें मुसलमान नहीं बनाया जाएगा।

शाहू जी के अनुरोध पर दो लोग तैयार हुए जिनका नाम अब्दुर्रहमान और अब्दुर्रहीम रखा गया (बाद में मराठा छत्रपति बनने पर शाहू जी ने उन्हें इस एहसान के बदले जागीरें दीं)।

 राजाराम के बाद मराठों की कमान उनकी पत्नी ताराबाई के हाथ में आई। उनके नेतृत्व में मराठे और भी ताकतवर होते गए और मुगल कमजोर। औरंगजेब की सुलह की कई कोशिशें भी उन्होंने ठुकरा दीं। ऐसे में औरंगजेब की मौत होते ही नए मुगल उत्तराधिकारियों ने शाहूजी को इस इरादे से छोड़ा कि मराठा नेतृत्व में दरार पड़ सके। हालाँकि उनकी माँ येसुबाई इसके बाद भी अगले 12 साल मुगलों की कैद में रहीं।

 ऐसे में 1714 में शाहू जी अगर औरंगजेब की कब्र पर गए तो इसे एक कूटनीति ही मानना चाहिए।

वे अभी मुगलों को नाराज नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनकी माँ येसुबाई अभी उनकी कैद में थीं (1719 में उन्हें छोड़ा गया)।

दूसरी वजह ताराबाई से चल रहा सत्ता-संघर्ष भी रही होगी।

लेकिन औरंगजेब के प्रति श्रद्धा वजह नहीं हो सकती।

कौन होगा जो अपने दादा को धोखे से कैद करने वाले, अपने पिता की क्रूरतापूर्वक हत्या करने वाले और खुद को जबरन मुसलमान बनाने की कोशिश करने वाले के प्रति श्रद्धा रखेगा।

इसका प्रमाण है कि अगले तीन दशकों में शाहूजी ने मुगलों को दक्षिण और मध्य भारत से पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया।

और जीनतउन्निसाँ की मृत्यु के बाद सतारा में उन्होंने उनकी जो कब्र बनवाई वह इंसानी सदगुणों के प्रति उनकी कृतज्ञता की गवाह है।

 

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