छत्रपति शाहू जी की श्रद्धांजलि का सच
इतिहास लेखन में
फेसवैल्यू पर घटनाओं की मनमुताबिक व्याख्या कर देना एक तरह का अपराध है।
इधर सन 1714 में
छत्रपति शाहूजी के औरंगजेब की कब्र पर श्रद्धांजलि देने की बात कई
अखबारों-पत्रिकाओं ने छापी है।
ज्यादातर ऐसे लेख
फिल्म ‘छावा’ से बनी औरंगजेब की क्रूर छवि को नरम और मानवीय
बनाने की नीयत से छापे गए। लेकिन हकीकत वो नहीं है।
जीनतउन्निसाँ
दयालु थीं, अविवाहित थीं और उनकी उम्र उस वक्त 47 साल थी।
शाहूजी के मन में
जीनतउन्निसाँ के लिए गहरी इज्जत के कई प्रमाण मिलते हैं, लेकिन ऐसी ही इज्जत अपने
पिता के क्रूर हत्यारे औरंगजेब को लेकर भी थी यह कहना सरासर बेतुका है।
कैद में रह रहे ये
दोनों माँ-बेटे राजाराम को प्रत्यक्षतः हमेशा शत्रु के रूप में ही दिखाते रहे। पर
सच्चाई यह थी कि राजाराम के नेतृत्व में मराठों की ताकत ही उनके लिए जिंदगी और सम्मान
का सबसे बड़ा आसरा थी। वरना अपने भाइयों, बेटों और बेटियों तक पर
क्रूरता से न हिचकने वाला बादशाह इन दोनों को क्योंकर बख्शता!
बादशाह के पूछने
पर उनके साथ आए दरबारी ने बताया कि शाहूजी दाल-चावल के बजाय सिर्फ मीठे पर जिंदा
हैं, क्योंकि हिंदुओं में कैद के दौरान आधा खाना खाने की ही
इजाजत है।
आखिर बहुत
कहने-सुनने के बाद औरंगजेब ने यह शर्त रखी कि अगर वे अपने बदले दो मराठों को
मुसलमान बनने के लिए प्रस्तुत करें तो उन्हें मुसलमान नहीं बनाया जाएगा।
शाहू जी के
अनुरोध पर दो लोग तैयार हुए जिनका नाम अब्दुर्रहमान और अब्दुर्रहीम रखा गया (बाद
में मराठा छत्रपति बनने पर शाहू जी ने उन्हें इस एहसान के बदले जागीरें दीं)।
वे अभी मुगलों को
नाराज नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनकी माँ येसुबाई अभी उनकी कैद में थीं (1719 में
उन्हें छोड़ा गया)।
दूसरी वजह
ताराबाई से चल रहा सत्ता-संघर्ष भी रही होगी।
लेकिन औरंगजेब के
प्रति श्रद्धा वजह नहीं हो सकती।
कौन होगा जो अपने
दादा को धोखे से कैद करने वाले,
अपने पिता की
क्रूरतापूर्वक हत्या करने वाले और खुद को जबरन मुसलमान बनाने की कोशिश करने वाले
के प्रति श्रद्धा रखेगा।
इसका प्रमाण है
कि अगले तीन दशकों में शाहूजी ने मुगलों को दक्षिण और मध्य भारत से पूरी तरह
नेस्तनाबूद कर दिया।
और जीनतउन्निसाँ
की मृत्यु के बाद सतारा में उन्होंने उनकी जो कब्र बनवाई वह इंसानी सदगुणों के
प्रति उनकी कृतज्ञता की गवाह है।
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