संदेश

भीष्म साहनी के नाटक

हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैं, वहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान ‘कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आजादी का एजेंडा हासिल हो जाने से आधुनिकता की नई प्रवृत्तियाँ सामने आईं। एकाएक व्यक्ति यहाँ प्रमुख हो गया था। वह व्यक्ति जो खुद को दूसरों से खास समझता था पर था उनके जैसा ही। फिर यह आधुनिकता कई तरह के प्रयोग करना चाहती थी। मंच को दर्शक दीर्घा तक ले जाया गया, या दर्शकों को मंच पर उतार दिया गया।....वगैरह। इस सारे कोलाहल के बीच भीष्म साहनी को हम एक ऐसे रचनाकार के रूप में पाते हैं जिनकी आधुनिकता ठेठ भारतीय परंपरा से उपजी है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि पश्चिम में दो-दो महायुद्धों ने व्यक्ति और उसके अस्तित्व के सवाल को जिस तरह केंद्र में ला दिया था वह उस तरह हमारी समस्या नहीं थी। (बावजूद इसके कि इन पश्चिमी प्रवृत्तियों का प्रभाव हिंदी में कई रचनाकारों पर काफी गहरा था; और कुछ ने इसे फैशनेबल ढंग से भी पकड़ा हुआ थ...

झाँसी की रानी से एक मुलाकात

झाँसी की रानी से एक मुलाकात जॉन लैंग जॉन लैंग   (1816 - 1864) का जन्म सिडनी में हुआ था। उसने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की, और 1842 में भारत आकर वकालत करने लगा। सन 1851 में आगरा कोर्ट में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ एक मुकदमे में उसे बड़ी जीत हासिल हुई। यह मुकदमा कंपनी के ही एक कॉन्ट्रैक्टर रहे लाला जोती प्रसाद की ओर से था। मुकदमे में जीत ने उसे हिंदुस्तानियों के बीच प्रसिद्ध कर दिया। रानी झाँसी द्वारा अपने राज्य के अधिकार पुनः हासिल करने की कोशिशों के सिलसिले में उसकी राय जानने के लिए उसे बुलाया जाना उसी प्रसिद्धि का नतीजा था। रानी से उसकी मुलाकात का यह वाकया 1854 का है, जिसपर लिखे संस्मरण को उसने 1859 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ वांडरिंग्स इन इंडिया ’ में शामिल किया।            छोटे से राज्य झाँसी को कब्जे में लेने का आदेश दिए जाने के करीब महीने भर बाद, और कब्जे के लिए 13वीं नेटिव इन्फेन्ट्री की एक टुकड़ी के रवाना होने के पहले मुझे रानी झाँसी का एक पत्र मिला। सुनहरे पृष्ठ पर फारसी भाषा में लिखे इस पत्र में निवेदन ...

न्यायप्रियता जहाँ ले जाती है

अल्बेयर कामू के नाटक  ‘ जस्ट एसेसिन ’  उर्फ  ‘ जायज़ हत्यारे ’  को परवेज़ अख्तर ने  ‘ न्यायप्रिय ’  शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय  ‘ एब्सर्ड ’  की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से जुड़ी एक वास्तविक घटना पर आधारित है, पर प्रस्तुति में इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा गया है। एक अंग्रेज अफसर की हत्या की जानी है। लेकिन ऐन बम फेंके जाने के वक्त दो बच्चे वहाँ मौजूद होने से क्रांतिकारी मस्ताना बम नहीं फेंक सका। ग्रुप के एक क्रांतिकारी तेजप्रताप को ऐतराज है कि उद्देश्य की राह में भावुकता को आड़े क्यों आने दिया गया। लेकिन मस्ताना के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह बच्चों के ऊपर बम फेंक पाए। बहरहाल दूसरी कोशिश में अफसर मार दिया जाता है, और मस्ताना जेल में है। यहाँ एक दूसरा एब्सर्ड अफसर की बीवी के आगमन के रूप में पेश आता है। वह अपने मार दिए गए अफसर पति के कई मानवीय पक्षों के बारे में बताती है, और उसका यह बताना एक नया विरोधाभास पैदा करता है। उसके जाने के बाद एक सरकार...

तोलस्तोय, भारत और गांधी

तोलस्तोय को हमारे देश में अक्सर गांधी के प्रसंग से याद किया जाता है। गांधी अपने आरंभिक दौर में उनसे गहरे प्रभावित रहे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक तोलस्तोय आश्रम भी बनाया। ईश्वर, अहिंसा, निजी संपत्ति और शाकाहार पर गांधी के विचार लगभग वही थे जो तोलस्तोय के थे। इस अर्थ में गांधीवाद काफी हद तक तोलस्तोय के विचारों का ही राजनीतिक सूत्रीकरण मालूम देता है। तोलस्तोय हिंसा को सबसे बड़ी बुराई और ईश्वर को मनुष्य का ध्येय मानते थे। इस क्रम में जिस तरह वे राज्यसत्ता की हिंसा और अंततः राज्य के ही मुखर विरोधी थे, उसके कारण उनके विचारों को अराजकतावादी भी माना गया। तोलस्तोय का मानना था कि राज्य को बुरे लोग क्रूर ताकतों के समर्थन से चलाते हैं, और एक सुसंगठित राज्य लुटेरों से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है। अपने परवर्ती जीवन में वे विज्ञान और राज्य के पश्चिमी मॉडल के इस कदर खिलाफ थे कि भारत जैसे देश की ओर उम्मीद से देखते थे। हालांकि उनकी यह उम्मीद भारत की परिस्थितियों के बारे में उनकी कम जानकारी और संभवतः बुद्ध की जन्मभूमि के रूप में कुछ ज्यादा ही ऊंची धारणा पर आधारित थी। उन्होंने बुद्ध के विचारों क...

देश में बदलाव के लिए छह सुझाव

1991 के बाद बनी अर्थव्यवस्था बड़ी पूँजी की फूँक से फुलाई हुई अर्थव्यवस्था है। किसी भी अर्थव्यवस्था की जाँच का वास्तविक तरीका उसके सबसे गरीब लोग होते हैं। लेकिन इस फुलाई हुई अर्थव्यवस्था ने सिद्धांततः गरीबी को अप्रासंगिक और व्यवहारतः उसे ज्यादा दयनीय बनाया है। सबसे गरीब आदमी फटीचर यूनीफॉर्म पहने दफ्तरों और सोसाइटियों के बाहर गार्डगीरी करता दिखता है और दिन के बारह घंटे नौकरी में गिरवी रखने के बाद उतना गरीब मालूम नहीं देता ; जबकि उसकी जिंदगी पहले की तुलना में बहुत कम उसकी अपनी है। भौतिक रूप से पुराने फुटपाथ के दिनों से उसकी हालत जितनी बेहतर हुई है उसकी तुलना में ऊपर वाले लोगों की हालत उनकी वर्गीय हस्तियों के हिसाब से कई-कई गुना ज्यादा बेहतर होती गई है—इसलिए अंततः उसकी स्थिति ज्यादा हीन ही हुई है। इसे संक्षेप में कहें तो वैश्वीकरण का फायदा उठाकर भारतीय राज्य-व्यवस्था ने यहाँ की प्रिय सामाजिक प्रवृत्ति ‘ हाइरारकी ’ (ऊँच-नीच) को एक आर्थिक दिशा देकर उच्चतम अवस्था में पहुँचा दिया है। ऐसा विश्वपूँजी को छुट्टा छोड़ने और अपने तईं मुद्रास्फीति को बढ़ावा देने से हुआ है। विश्व पूँजी ‘ गैरजरूरी ’ ...