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नंदिनी बनर्जी की प्रस्तुति- कहीं अनकही

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एलटीजी के ब्लैंक कैनवास में नंदिनी बनर्जी निर्देशित प्रस्तुति ‘कहीं अनकही’ देखते हुए पुराने दिनों के श्रीराम सेंटर बेसमेंट जैसी फील हुई। यहाँ पहले भी प्रस्तुतियाँ देखी हैं, लेकिन इस बार ऐसी फील की मुख्य वजह प्रस्तुति का सेट-डिजाइन था, जिसे शुद्धो बनर्जी ने तैयार किया था। यहाँ के अष्टावक्र स्पेस में स्थान-सीमा से उत्पन्न बेडौलपन की गुंजाइश रहती है, जिसे शुद्धो ने अपने कल्पनाशील सेट-संयोजन से अच्छी धता बताई। एक लिविंग रूम के दृश्य के लिए उन्होंने पूरे मंच को ही उसकी परंपरागत जगह से विस्थापित कर हॉल की चौड़ाई में बनाया। इससे उन्हें दर्शक दीर्घा की कुछ कुर्बानी जरूर देनी पड़ी होगी, पर इससे मंच ज्यादा समावेशी और सुचारू हुआ है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि तीन पात्रीय इस नाटक में मंच का भी अपना एक अहम किरदार है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के ब्रिटिश लेखक चार्ल्स जेम्स ली की एक कहानी पर स्वयं निर्देशिका द्वारा तैयार यह नाट्यालेख दो अविवाहित बहनों की कहानी है, जिसमें उनके किराएदार शर्मा जी एक अयाचित ट्विस्ट की तरह चले आए हैं। सीधी-सादी अपने ढर्रे पर चल रही दोनों बहनों की जिंदगी में उनके आगमन से...

इब्सन का नाटक ‘प्रेत’

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एमके रैना निर्देशित हेनरिक इब्सन का नाटक ‘प्रेत’(अनुवाद- नेमिचंद्र जैन) शुक्रवार को त्रिवेणी सभागार में देखा। इब्सन के कई अन्य नाटकों की तरह यह भी उस तरह का नाटक है जिसका देसीकरण नहीं किया जा सकता। न परिस्थितियाँ न पात्र-- कुछ भी अपने यहाँ से मिलता-जुलता नहीं है। लेकिन फिर भी रानी साहिबा, विक्रम, शास्त्री जी आदि नामों के जरिए यह कोशिश की गई है। इसे बहुत देसी न बनाए जा सकने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह एक औपन्यासिक किस्म का नाटक है, जिसमें स्थितियाँ नाटकीय प्रकृति में कम वृत्तांत की शक्ल में ज्यादा पेश आती हैं। बाद के वक्त में सार्त्र ने जिसे ‘बैड फेथ’ कहा वही इस नाटक की थीम है। यानी वो रूढ़िग्रस्त नैतिकता जो असलियत को ढँक लेती है। रानी साहिबा अपने पति की दुश्चरित्रता को जानते हुए भी परिवार के मिथ्या सम्मान की खातिर उसे छुपाए रखती हैं। यद्यपि अपने बेटे को पति की दुश्चरित्रता की छाया से बचाए रखने के लिए वो उसे पढ़ने के लिए दूर पेरिस भेज देती है, लेकिन पिता नाम का ‘एक वाहियात अंधविश्वास’ उसके बेटे में एक लाइलाज आनुवांशिक बीमारी की वजह बन चुका है। नाटक का कथानक बहुत अच्छी तरह बुना गया ह...

नालंदा की सच्चाई

नालंदा का ध्वंस बख्तियार खिलजी ने किया, यह 2006 से पहले तक एक स्थापित तथ्य था। लेकिन 2006 में डीएन झा ने इसपर भसड़ खड़ी कर दी। झा ने इस वर्ष भारतीय इतिहास कांग्रेस में अपना एक पर्चा पेश किया, जिसमें 17वीं और 18वीं सदी के दो तिब्बती ग्रंथों के हवाले से नालंदा ध्वंस पर ‘मिथ और परंपराओं के ऐसे अलग तरह के सबूत’ पेश किए जिन्हें पढ़कर हास्य रस का अनुभव होता है। इस सबूत के मुताबिक दो युवा शरारती श्रमणों ने दो ब्राह्मण भिक्षुओं पर गंदा पानी फेंका और कुत्ते छोड़ दिए जिससे कुपित होकर उन ब्राह्मणों ने 12 वर्ष तक सूर्य-साधना करके ऐसी मंत्रसिद्धि हासिल कर ली जिससे उन्होंने सब जगह आग लगा दी। सन 1193 में हुई नालंदा के ध्वंस की घटना का सन 1800 में रचा गया यह ‘सबूत’ झा की फैलाई भसड़ का पहला हिस्सा था (जिसपर किसी ने यकीन नहीं किया)। लेकिन इसका दूसरा हिस्सा था ध्वंस की घटना के स्थापित सबूतों को ‘झूठा’ साबित करना। जो इस प्रकार हैं--   - नालंदा के ध्वंस की घटना का सबसे महत्त्वपूर्ण उल्लेख 13वीं सदी की पुस्तक ‘तबाकत-ए-नासिरी’ में है। इसके लेखक मिन्हाज-उल-सिराज ने बख्तियार खिलजी के साथ इस ध्वंस म...