नालंदा की सच्चाई

नालंदा का ध्वंस बख्तियार खिलजी ने किया, यह 2006 से पहले तक एक स्थापित तथ्य था। लेकिन 2006 में डीएन झा ने इसपर भसड़ खड़ी कर दी। झा ने इस वर्ष भारतीय इतिहास कांग्रेस में अपना एक पर्चा पेश किया, जिसमें 17वीं और 18वीं सदी के दो तिब्बती ग्रंथों के हवाले से नालंदा ध्वंस पर ‘मिथ और परंपराओं के ऐसे अलग तरह के सबूत’ पेश किए जिन्हें पढ़कर हास्य रस का अनुभव होता है। इस सबूत के मुताबिक दो युवा शरारती श्रमणों ने दो ब्राह्मण भिक्षुओं पर गंदा पानी फेंका और कुत्ते छोड़ दिए जिससे कुपित होकर उन ब्राह्मणों ने 12 वर्ष तक सूर्य-साधना करके ऐसी मंत्रसिद्धि हासिल कर ली जिससे उन्होंने सब जगह आग लगा दी। सन 1193 में हुई नालंदा के ध्वंस की घटना का सन 1800 में रचा गया यह ‘सबूत’ झा की फैलाई भसड़ का पहला हिस्सा था (जिसपर किसी ने यकीन नहीं किया)। लेकिन इसका दूसरा हिस्सा था ध्वंस की घटना के स्थापित सबूतों को ‘झूठा’ साबित करना। जो इस प्रकार हैं-- 

 - नालंदा के ध्वंस की घटना का सबसे महत्त्वपूर्ण उल्लेख 13वीं सदी की पुस्तक ‘तबाकत-ए-नासिरी’ में है। इसके लेखक मिन्हाज-उल-सिराज ने बख्तियार खिलजी के साथ इस ध्वंस में हिस्सा लेने वाले एक शख्स के बताए ब्योरों के आधार पर इसके बारे में लिखा था। लेकिन झा की इससे असहमति है। उनके मुताबिक बख्तियार खिलजी ने जहाँ हमला किया वह जगह नालंदा नहीं बल्कि आज के बिहार शरीफ में मौजूद बौद्ध मठ उद्दंत विहार था। 

 मिन्हाज के लिखे में नालंदा या उद्दंत दोनों ही शब्द नहीं हैं, इनकी जगह सिर्फ बिहार लिखा है। उसके वृत्तांत में इस शब्द का जिक्र करीब दर्जन भर जगह आया है-- हमले वाली खास जगह के लिए भी और बिहार अंचल के लिए भी (मसलन ‘लखनौती, बिहार, बंग और कामरूप तक के गैरमुस्लिमों में उसका खौफ भर गया’)।

 ध्वस्त की गई जगह को उसने 'हिसार-ए-बिहार' लिखा है। जिसका अर्थ ‘विहार की चारदीवारी’ भी हो सकता है और ‘विहार का किला’ भी। लेकिन मूल पाठ के अंग्रेजी अनुवादों में ज्यादातर ‘किला’ ही लिखा गया है। जाहिर है कि अगर अतीत के संदर्भों की चेन में न समझा जाए तो अनुवादक को किला शब्द ही अधिक उपयुक्त लगेगा। 

 मिन्हाज के मुताबिक ‘यह पूरा शहर एक मदरसा था’। यही बात नालंदा के बारे में सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी लिखी है जिसने खुद यहां रहकर पढ़ाई की। उसके मुताबिक नालंदा में अनेक राजा अपने-अपने वक्त में संघाराम बनवाते रहे, जिन्हें बाद में एक नरेश ने एक ही चारदीवारी के भीतर ले लिया। यहाँ हजारों शिक्षकों और छात्रों के होने की बात भी ह्वेनसांग ने लिखी है, और यह भी कि ‘शास्त्रार्थ के इच्छुक लोग झुंड के झुंड आकर यहाँ अपनी शंकाओं का निराकरण करते हैं’। 

 - झा का तर्क है कि खिलजी कभी नालंदा गया ही नहीं, क्योंकि यहां के बाद उसका अगला निशाना बंगाल का नादिया राज्य था, और दिल्ली से बंगाल जाते हुए रास्ते में उद्दंत विहार पड़ता है, न कि नालंदा। उनके मुताबिक नालंदा के लिए उसे एक स्वतंत्र अभियान करना पड़ता। 

 - यह ऐसा तर्क है जो मानो अफीम खाकर दिया गया हो। लगता है यह तर्क झा ने मिन्हाज को बगैर पढ़े ही दे दिया है, क्योंकि खिलजी का नालंदा-हमला बंगाल से अलग अभियान ही था। नालंदा को नष्ट करने के बाद इस अभियान में मिले लूट के माल के साथ वह दिल्ली वापस गया था; और वहाँ कुतुबुद्दीन ऐबक से इज्जतआफजाई के बाद पुनः बंगाल के लिए निकला था, जहाँ से फिर कभी वह वापस नहीं लौटा। कामरूप में हुई लड़ाई में उसकी मौत हुई।

 - झा के मुताबिक उक्त हमले के करीब चार दशक बाद (1234 ईस्वी) जब धर्मस्वामिन नाम का बौद्ध नालंदा गया तो वहाँ कुछ इमारतें अभी भी मौजूद थीं, जहाँ कुछ छात्र महापंडित राहुलश्रीभद्र से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, जो साबित करता है कि नालंदा तब तक नष्ट नहीं हुआ था। झा की नीति है कि चित भी मेरी और पट भी मेरी। कुछ अदना जीर्णोद्धारित अवशेषों से वो निष्कर्ष निकाल रहे हैं कि नालंदा का ध्वंस नहीं किया गया। जैसे कोई बहादुरशाह जफर का हवाला देकर कहे कि मुगल साम्राज्य 1857 तक कायम था।

 -अब आते हैं धर्मस्वामिन के वृत्तांत पर। धर्मस्वामिन का ब्योरा दरअसल मिन्हाज के ब्योरे की पुष्टि ही करता है। उससे पता चलता है कि नालंदा का कुछ हिस्सा या तो खिलजी के हमले में बच गया था, या फिर उसके एक हिस्से का जीर्णोद्धार करके उसे फिर से काम लायक बनाया गया था। धर्मस्वामिन के मुताबिक कभी नालंदा परिसर में 7 मंदिर, 14 बड़े मठ और 84 छोटे मठ होते थे, पर वे सभी मुसलमानों द्वारा नष्ट कर दिए गए; और अब (1235 ईस्वी में) सिर्फ दो विहार ही काम लायक हालत में बचे थे। इन दो विहारों में 70 छात्र 90 साल के राहुलश्रीभद्र से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। और ये स्थिति भी इसलिए चल रही थी क्योंकि इन विहारों को बोधगया के राजा बुद्धसेन और उद्दंतपुरी के एक संपन्न ब्राह्मण छात्र जयदेवा की मदद प्राप्त थी। धर्मस्वामिन के मुताबिक नालंदा जिस वजह से पूरी तरह नष्ट होने से बच गया वह मुसलमानों में पनप गया एक दैवीय डर था। जब उन्होंने नालंदा परिसर में ज्ञाननाथ का मंदिर तोड़ा तो वे उसके पत्थरों को (संभवतः) उद्दंतपुरी में मस्जिद बनाने के लिए ले जा रहे थे तभी उन्होंने देवप्रतिमा पर गंदगी डालकर उसे अपमानित भी किया। लेकिन जिन मुस्लिम सैनिकों ने यह काम किया था उनमें से एक उसी शाम उद्दंतपुरी में पेट में दर्द उठने से मर गया। जिससे डर कर मुसलमानों ने फिर नालंदा पर हमला नहीं किया। वैसे तुर्कों के हमले का डर धर्मस्वामिन के समय में भी निरंतर बना हुआ था। जिसके भीषण ब्योरे उसकी जीवनी में भरपूर मात्रा में हैं।

 - झा ने अपनी बात के समर्थन में ‘कम्प्रिहेंसिव हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ (संपादक- आरएस शर्मा) और जदुनाथ सरकार को भी उद्धृत किया है, कि वे भी नालंदा की बजाय उद्दंत विहार पर खिलजी के हमले की पुष्टि करते हैं। 

 - यहाँ जदुनाथ सरकार का हवाला इसलिए बोगस है क्योंकि जदुनाथ सरकार ने नालंदा पर विस्तार से नहीं लिखा, बल्कि बंगाल का इतिहास लिखने के क्रम में एक पंक्ति में यह कहा है कि “ ‘शायद’ 1299 में हुआ वह हमला उद्दंतपुरी पर था।” उनके द्वारा वर्ष का जिक्र तो यहाँ गलत है ही, इसके अलावा उनके ऐसा लिखने का एक कारण शायद यह भी रहा होगा कि 1945 में जब जदुनाथ सरकार ने यह पुस्तक लिखी तब तक धर्मस्वामिन की जीवनी का अनुवाद अंग्रेजी में नहीं हुआ था। जॉर्ज रोरिख द्वारा इस जीवनी का अनुवाद प्रकाशित होने तक वे जीवित नहीं थे। वहीं आरएस शर्मा ने इसके लिए जिन सबूतों का इस्तेमाल किया है वो झा वाले ही हैं, जिन्हें मिन्हाज में तो अंतर्विरोध दिख रहा है, पर 18वीं सदी के तिब्बती ग्रंथ को प्रामाणिक मान रहे हैं। 

 - नेहरूवादी इतिहासकारों का यही तरीका है। जब कोई भी तथ्य आपकी ‘विचारधारा’ के मुताबिक न हो तो व्याख्या की भसड़ खड़ी कर दो। जैसे रोमिला थापर ने महमूद गजनवी को ‘जेहादी नहीं लुटेरा’ बताकर यह काम किया। जबकि गजनवी ने मथुरा का मंदिर लूट के बाद और मंदिर के सौंदर्य से काफी प्रभावित होने के बावजूद तोड़ा था।

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