नंदिनी बनर्जी की प्रस्तुति- कहीं अनकही
एलटीजी के ब्लैंक कैनवास में नंदिनी बनर्जी निर्देशित प्रस्तुति ‘कहीं अनकही’ देखते हुए पुराने दिनों के श्रीराम सेंटर बेसमेंट जैसी फील हुई। यहाँ पहले भी प्रस्तुतियाँ देखी हैं, लेकिन इस बार ऐसी फील की मुख्य वजह प्रस्तुति का सेट-डिजाइन था, जिसे शुद्धो बनर्जी ने तैयार किया था। यहाँ के अष्टावक्र स्पेस में स्थान-सीमा से उत्पन्न बेडौलपन की गुंजाइश रहती है, जिसे शुद्धो ने अपने कल्पनाशील सेट-संयोजन से अच्छी धता बताई। एक लिविंग रूम के दृश्य के लिए उन्होंने पूरे मंच को ही उसकी परंपरागत जगह से विस्थापित कर हॉल की चौड़ाई में बनाया। इससे उन्हें दर्शक दीर्घा की कुछ कुर्बानी जरूर देनी पड़ी होगी, पर इससे मंच ज्यादा समावेशी और सुचारू हुआ है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि तीन पात्रीय इस नाटक में मंच का भी अपना एक अहम किरदार है।
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध के ब्रिटिश लेखक चार्ल्स जेम्स ली की एक कहानी पर स्वयं निर्देशिका द्वारा तैयार यह नाट्यालेख दो अविवाहित बहनों की कहानी है, जिसमें उनके किराएदार शर्मा जी एक अयाचित ट्विस्ट की तरह चले आए हैं। सीधी-सादी अपने ढर्रे पर चल रही दोनों बहनों की जिंदगी में उनके आगमन से एक हिलोर पैदा हो गई है। प्रस्तुति इसी हिलोर को दिखाती है। अव्यक्त रहे आए भाव अचानक उभर आए हैं और टकराव पैदा कर रहे हैं। कहीं दबी-छिपी रहीं अनकही इच्छाएँ अचानक एक उद्रेक में तब्दील होकर कटाक्षनुमा बातों में रिफ्लेक्ट हो रही हैं।
50 मिनट की प्रस्तुति में शर्मा जी एक अनुपस्थित पात्र हैं, जिनकी आवाज भर ही सुनाई देती है। लेकिन कमरे में एक खिड़की है जिसका परदा हटाकर छोटी बहन उनका आना और बाहर की हलचल देखती है। छोटे से स्टेज में बड़ी बहन ‘दूसरे कमरे’ में भी जाती है। और इन छोटी-छोटी चीजों से ही स्थितियों में गहनता आती है। कथ्य बहुत छोटा सा है, लेकिन प्रस्तुति के 50 मिनटों में पूरी शिद्दत से फैला हुआ है। छोटी बहन बनीं कृतिका भाटिया की ब़ॉडी लैंग्वेज में कुछ अतिरिक्त नाटकीयता स्वाभाविक रूप से है। इस सहमी और शर्मीली सी बहन के बरक्स बड़ी बहन की भूमिका में नंदिनी बनर्जी स्वयं थीं, जो घर की मुखिया है। उनके किरदारों में अचानक आई तब्दीली ही दरअसल प्रस्तुति का पाठ है, जिसे इस लघु प्रस्तुति में बहुत अच्छे से हैंडल किया गया है। शर्मा जी का मंच पर न आना भी एक अच्छी युक्ति थी। दरवाजे के बाहर से उनसे बातचीत की नाटकीयता ज्यादा कारगर मालूम देती है। उनके निमित्त पात्र का सशरीर मंच पर होना शायद इस पाठ में बेवजह की खलल ही पैदा करता। दीप्तेश दास ने सिर्फ स्वर के जरिए पात्र की कहीं बेहतर छवि उपस्थित की है। हालांकि इस तरह की सीरियस प्रस्तुति के तुरंत बाद दर्शकों के बीच उसकी शल्यक्रिया नुमा मीमांसा एक निहायत बेतुकी बात है।

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