इब्सन का नाटक ‘प्रेत’
एमके रैना निर्देशित हेनरिक इब्सन का नाटक ‘प्रेत’(अनुवाद- नेमिचंद्र जैन) शुक्रवार को त्रिवेणी सभागार में देखा। इब्सन के कई अन्य नाटकों की तरह यह भी उस तरह का नाटक है जिसका देसीकरण नहीं किया जा सकता। न परिस्थितियाँ न पात्र-- कुछ भी अपने यहाँ से मिलता-जुलता नहीं है। लेकिन फिर भी रानी साहिबा, विक्रम, शास्त्री जी आदि नामों के जरिए यह कोशिश की गई है। इसे बहुत देसी न बनाए जा सकने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह एक औपन्यासिक किस्म का नाटक है, जिसमें स्थितियाँ नाटकीय प्रकृति में कम वृत्तांत की शक्ल में ज्यादा पेश आती हैं।
बाद के वक्त में सार्त्र ने जिसे ‘बैड फेथ’ कहा वही इस नाटक की थीम है। यानी वो रूढ़िग्रस्त नैतिकता जो असलियत को ढँक लेती है। रानी साहिबा अपने पति की दुश्चरित्रता को जानते हुए भी परिवार के मिथ्या सम्मान की खातिर उसे छुपाए रखती हैं। यद्यपि अपने बेटे को पति की दुश्चरित्रता की छाया से बचाए रखने के लिए वो उसे पढ़ने के लिए दूर पेरिस भेज देती है, लेकिन पिता नाम का ‘एक वाहियात अंधविश्वास’ उसके बेटे में एक लाइलाज आनुवांशिक बीमारी की वजह बन चुका है। नाटक का कथानक बहुत अच्छी तरह बुना गया है। अपनी सारी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरी दुनियावी मर्यादा से निभाने वाली रानी साहिबा को अब अपने ही बेटे को उसके कष्ट से निजात दिलाने के लिए ड्रग का इंजेक्शन देना है। इस हालत में यह पता चलना कि बेटे का घर में काम करने वाली मेड से प्रेम है, माँ के लिए एक नई परेशानी है। तब उसे यह राज बताना पड़ता है कि मेड खुद भी उसके पिता के एक नाजायज संबंध से पैदा हुई उसकी सौतेली बहन है।
रानी साहिबा जिस सोशल कंडीशनिंग की शिकार हैं शास्त्री जी उसके संचालक हैं। वो रानी साहिबा के यहाँ (बकौल एमके रैना) रखी डार्विन और मार्क्स की किताबों को देखकर खिन्न होते हैं। हालाँकि उन्होंने ये किताबें नहीं पढ़ी हैं, पर उनका मशविरा है कि नए विचारों को जान लेना तो ठीक है, पर उनपर ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए। क्योंकि इनसे दुनियावी व्यवस्था में खलल पैदा होती है। दुनियावी व्यवस्था में खलल की बात से रानी साहिबा भी सहमत हैं। इस तरह नाटक सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं के नाम पर प्रचलित झूठ के अलग-अलग स्तर दिखाता है। कथानक इतना सघन है कि सभी पात्रों में यह झूठ किसी न किसी रूप में पैबस्त है।
लेकिन यह भी सच्चाई है कि नाटक मंच पर उतना सघन नहीं है। प्रस्तुति अपने देशकाल को लेकर फँसी हुई है। उसका लोकेल स्पष्ट नहीं है। पात्रों की ऐसी बातचीत रानी साहिबा और शास्त्री जी नुमा पात्रों में संभव नहीं है। उसपर तुर्रा यह कि बाकी पात्रों के नाम मूल नाटक वाले रेगीना और जैकब आदि ही हैं। ऐसे में मंच पर उन्नीसवीं सदी के एलीट यूरोपीय परिवेश की तस्दीक करती कुर्सियाँ आदि भी आधा तीतर आधा बटेर वाले ढंग से मौजूद हैं, और इन हालात में अभिनेता कितनी भी जान लगा लें बात बन नहीं पाती। प्रस्तुति एक समुच्चय के रूप में दर्शक से वाजिब कनेक्शन नहीं बना पाती।
वैसे भी इब्सन के नाटकों में वातावरण का महत्त्व बहुत ज्यादा है, जिसके लिए उनका मूड पकड़ में आना बहुत जरूरी है, वरना लाख मेहनत भी किसी काम की नहीं। सामान्यतः प्रस्तुति में सभी अभिनेताओं- राकेश कुमार सिंह, कविता सेठ, विपिन कुमार, नम्रता सिन्हा, अर्पित आनंद- का काम ठीक था, लेकिन जाहिर है उसका प्रभाव ठीक से न बन पाने की वजह कहीं और थी। प्रस्तुति की प्रोड्यूसर अनुराधा दर अपनी निरंतर सक्रियता से थ्री आर्ट्स क्लब को जीवंत बनाए हुए हैं इसके लिए उन्हें बधाई!
नोट- इब्सन के नाटक में जिस लाइलाज बीमारी का जिक्र है वह सिफलिस है। वैज्ञानिक दृष्टि से सिफलिस आनुवांशिक रोग नहीं है। लेकिन यह हो सकता है कि यौन-संपर्क के दौरान यह पिता से संक्रमित होकर मां द्वारा बच्चे में आ जाए। प्रसिद्ध निर्देशक रिचर्ड चार्ल्स के मुताबिक इब्सन इस वैज्ञानिक तथ्य से अनिभिज्ञ रहे होंगे यह संभव नहीं है। शायद वे बताना चाहते हैं कि रानी साहिबा यह जानती हैं कि वो ही इस संक्रमण की वाहक हैं।

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