Thursday, November 5, 2015

एक पुरानी रिपोर्ट

यह रिपोर्ट कुछ वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी--

लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादेमी सालभर के दौरान तैयार हुई अपनी पाठ्यक्रम प्रस्तुतियों का एक समारोह पिछले साल से दिल्ली में करने लगी है। इस साल यह समारोह 15 से 17 मई तक श्रीराम सेंटर में होना प्रस्तावित है। समारोह में रवि केमू, अरुण त्रिवेदी और सत्यव्रत राउत निर्देशित तीन प्रस्तुतियां दिखाई जाएंगी, पर खुद भारतेंदु के जीवन पर आधारित देवेंद्र राज अंकुर निर्देशित चौथी पाठ्यक्रम प्रस्तुति 'गुलाम राधारानी' इसमें शामिल नहीं है। वजह है कि पिछले साल सितंबर में जब इस प्रस्तुति का मंचन लखनऊ में किया गया तो वहां के कुछ प्रगतिशील लेखकों-रंगकर्मियों का इसलिए इसके विरोध में होना बताया गया था कि यह भारतेंदु का चरित्र-हनन करती है। चरित्र-हनन के मुख्यतः चार कारण बताए गए-- 1) नाटक में बनारस के विश्वनाथ मंदिर के पीछे दिखने वाली मस्जिद को भारतेंदु आंख का कांटा बताते हैं; 2) वे विक्टोरिया के युवराज में राम की छवि को देखते हुए उनसे इस कांटे को दूर करने की उम्मीद करते हैं, यानी अंग्रेजों के प्रशंसक हैं। 3) नाटक में भारतेंदु 'प्राचीन काल से चली आ रही' बहुविवाह प्रथा का समर्थन करते हैं, और इसके लिए कृष्ण की 1008 पटरानियां होने का हवाला देते हैं। 4) वे अपनी एक तवायफ प्रेमिका को हिंदू धर्म में लौट आने की सलाह देते हैं, यानी धर्मांतरण के समर्थक हैं।
अकादमी के निदेशक अरुण त्रिवेदी से पूछे जाने पर उनका यह कहना है कि यह प्रस्तुति पिछले साल काफी विवादित हो गई थी, इसलिए वे इसे दिल्ली के समारोह में शामिल नहीं कर रहे हैं। उनके मुताबिक भारतेंदु साहित्यकार थे, रसिया नहीं थे, जबकि यह प्रस्तुति उनके जीवन के निजी पक्षों को ज्यादा दिखाती है। त्रिवेदी के मुताबिक यह प्रस्तुति दिल्ली वालों के नजरिए से ठीक होगी, पर उत्तर प्रदेश वाले, जहां के भारतेंदु स्वयं थे, भारतेंदु को इस तरह नहीं देखते। वैसे उनके मुताबिक प्रस्तुति 'गुलाम राधारानी' को न चुने जाने का एक अन्य कारण यह भी है कि भारतेंदु पर पिछले सालों में भी बहुत काम हुआ है और उन्होंने दिल्ली के समारोह के लिए नए आलेखों वाली प्रस्तुतियों के चुनाव को बेहतर समझा।
उल्लेखनीय यह भी है कि प्रस्तुति को चरित्र-हनन मानने का मसला एक स्थानीय अखबार में उठाया गया था। खबर लिखने वाले कौशल किशोर स्वयं जन संस्कृति मंच की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष हैं। उन्होंने इस नाटक को 'अपसंस्कृति और प्रतिक्रियावाद का केंद्र' बन गई अकादमी की 'प्रेमचंद के चरित्र हनन के ऐसे ही प्रयास' के बाद एक अन्य 'सुनियोजित' कार्रवाई बताया था। कौशल किशोर के मुताबिक अकादमी द्वारा मंचित नाटक 'परदे में रहने दो' में प्रेमचंद को भ्रष्टाचारियों के दोस्त और अंग्रेजी सत्ता के समर्थक के रूप में पेश किया गया था।
प्रस्तुति 'गुलाम राधारानी' के निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर हैं, पर इसका नाट्यालेख युवा रंगकर्मी रामजी बाली का है। रामजी बाली ने इसकी स्रोत सामग्री मुख्यतः कोलकाता की उन वरिष्ठ रंगकर्मी प्रतिभा अग्रवाल के जीवनीपरक उपन्यास 'प्यारे हरिश्चंद्र जू' से ली है, जिनका ताल्लुक स्वयं भारतेंदु की वंश परंपरा में तीसरी पीढ़ी से है। रामजी बाली नाटक को लेकर हुए इस पूरे विवाद से काफी आहत हैं। उनके मुताबिक नाटक में भारतेंदु विश्वनाथ मंदिर से सटी मस्जिद को कांटे की तरह खटकने वाला बताते जरूर हैं। पर आगे के संवाद में वे अपनी दुविधा भी बताते हैं कि आखिर मुझे ऐसा क्यों लगता है। क्या ये बचपन के संस्कार हैं या कुछ और। वहीं यह भी सही है कि उन्होंने अंग्रेजों के भारत में आने की तुलना राम के अवध में आने से करते हुए एक प्रशंसात्मक कविता भी लिखी थी। वजह थी कि वे अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा और उनके शासन में हुए समाज सुधार के प्रशंसक थे। हालांकि बाद में जब उन्हें अंग्रेजों की शासन नीति का असल उद्देश्य समझ में आया तो वे उनके विरोधी भी हुए, और उनकी शख्सियत के इन सभी पहलुओं को नाटक में शामिल किया गया है। बाली के अनुसार भारतेंदु रसिक तबियत के इंसान थे, और उनके कई प्रेम प्रसंग रहे। उनके कई संवाद किरदार की उसी सहजता में हैं। वहीं देवेंद्र राज अंकुर का कहना है कि जो लोग नाटक पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें भारतेंदु समग्र पढ़ना चाहिए, और नाटक से पहले प्रतिभा अग्रवाल के उपन्यास पर आपत्ति उठानी चाहिए। भारतेंदु जैसे हकीकत में थे वैसे ही इस नाटक में भी हैं। नाटक का किरदार एक रचनाकार में निहित विरोधाभास और उसके संघर्ष को दिखाता है। अंकुर के अनुसार 35 साल की उम्र तक जिया एक व्यक्ति अपने आसपास को कई तरह से देखता है। यह सही है कि भारतेंदु ने एक ओर 'भारत दुर्दशा' जैसी रचना लिखी पर वहीं उनपर अंग्रेज-शासन के प्रति सहानुभूतिपूर्ण होने के आरोप पहले भी लगे हैं।
दिलचस्प यह भी है कि जिन लोगों का नाम प्रस्तुति का विरोध करने वालों में लिया गया वे भी अपनी राय को अधिक से अधिक असहमति ही बता रहे हैं। वरिष्ठ अभिनेता अनिल रस्तोगी के मुताबिक भारतेंदु के बारे में उन्होंने अधिक नहीं पढ़ा है, इसलिए वे नाटक में दर्शाई गई स्थितियों के सही-गलत होने को लेकर कुछ नहीं कह सकते। वहीं सुपरिचित नाट्य निर्देशक उर्मिल थपलियाल की असहमति इस बात से है कि नाटक अपनी संप्रेषण-विधि में दुरुस्त नहीं है। वह भारतेंदु हरिश्चंद्र की अब तक चली आई छवि को सही रीजनिंग के बगैर खंडित करता है, यानी वह किरदार की उपयुक्त व्याख्या नहीं करता। उर्मिल थपलियाल खुद भी 'प्यारे हरिश्चंद्र की कहानी रह जाएगी' शीर्षक से इसी विषय पर पहले नाटक कर चुके हैं। उनके मुताबिक आज शुद्धता मात्र कहीं संभव है तो विचारों के कम्युनिकेशन में। वे कहते हैं देवेंद्र राज अंकुर इसे अभियोग की तरह न लें, पर भारतेंदु की छवि को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुति ऐसी होनी चाहिए कि उनके अंकुरत्व का क्षय न हो। लेकिन उर्मिल इस सारी असहमति के बावजूद प्रस्तुति के मंचन को रोक दिए जाने से इत्तेफाक नहीं रखते। उनकी राय में अगर अंकुर जी ने अपनी दृष्टि से प्रस्तुति की है तो भारतेंदु नाट्य अकादेमी को उसे रोकना नहीं चाहिए।
जन संस्कृति मंच को अपनी आपत्ति में मुख्य घपला रामजी बाली द्वारा अपने लेखकीय में इस्तेमाल किए गए शब्द 'काल्पनिक खुराफात' में नजर आ रहा है। जबकि रामजी बाली का कहना है कि उन्होंने ये शब्द भारतेंदु के प्रेम प्रसंग में अपनी कल्पना के इस्तेमाल के संदर्भ में लिखे थे, और नाटक में वर्णित स्थितियां पूरी तरह तथ्यसम्मत हैं। दिलचस्प यह भी है कि जन संस्कृति मंच ने इस पूरे प्रकरण में अपनी आपत्तियों के पक्ष में कोई तथ्यात्मक हवाला नहीं दिया है।
रामजी बाली प्रस्तुति को दिल्ली में मंचित न किए जाने को लेकर खासे क्षोभ में हैं। उनका इरादा समारोह के उदघाटन के रोज इस मामले को लेकर एक नुक्कड़ नाटक करने का भी है। नाटक में भारतेंदु खुद अकादमी से अपनी जिंदगी पर तैयार नाटक को न रोके जाने की गुहार लगाते दिखाए जाएंगे।




Thursday, July 30, 2015

हिमाचल की वादियों में करियाला

यह हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले का कुठाड़ इलाका है। यहाँ के दाड़वा नाम के गाँव में लोक नाट्य करियाला के कलाकार जुटे हुए हैं। जून के महीने में भी रात को इतनी ठंड है कि दो तरफ के घेरे में बैठे दर्शकों ने ऊनी दुशाले लपेटे हुए हैं। करियाला सोलन, शिमला और सिरमौर जिलों का लोक नाट्य है। इसकी प्रस्तुति रात-रात भर चलने का दस्तूर रहा है, जो कुठाड़ रियासत के ईष्टदेव ब्रजेश्वर महादेव को समर्पित होती हैं। एक वक्त था जब रियासत में श्राद्धों के अवसर पर राजा के दरबार हाल में करियाला की प्रस्तुतियों के लगातार 16 दिनों तक प्रदर्शन होते थे, और यह आयोजन दशहरा उत्सव को संपन्न होता था। अब न राजा रहा, न राजा का दरबार, पर करियाला की परंपरा आज भी बची हुई है। राजा का महल भी बचा हुआ है, पर उसे अब कुठाड़ पैलेस रिजॉर्ट के तौर पर जाना जाता है। काफी ऊँचाई पर स्थित इस पैलेस से दिन में दूर तक वादियों की हरियाली दिखाई देती है, और रात को शिमला और कसौली की रोशनियाँ।
माइक लगाया जा चुका है। अभिनेतागण मंच पर आ चुके हैं। हारमोनियम, ढोलक, नक्कारे और थोड़े छोटे आकार की शहनाई, जिसे नपीरी कहा जाता है, के साथ साजिंदे भी तैयार हैं। दर्शकों में औरतें, बच्चे, पुरुष सभी हैं। अलबत्ता कि महिलाओं का कलाकार होना करियाला में निषिद्ध है, लिहाजा स्त्री पात्र भी पुरुष कलाकारों के ही जिम्मे है। जय-जय-जय जगदंबे माता का गायन शुरू हो चुका है। माँ जगदंबे के नारी वेश में खूब सजा-धजा पुरुष कलाकार एवमस्तु की मुद्रा में हाथ उठाए हुए गोल-गोल घूम रहा है। बाकी कलाकार सामान्य वेशभूषा में माँ जगदंबे की आरती उतार रहे हैं। साथ-साथ गणपति, भवानी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश का स्तुति-गायन भी चल रहा है। सब कुछ पूरी तरह अनगढ़ है। दृश्य का उपसंहार होते ही साधु वेश में एक पात्र का मंच पर प्रवेश होता है। पीला कुर्ता, सिर पर जटाजूट, विचित्र ढंग से नाक के नीचे दाढ़ी बाँधे। फिर तरह-तरह के भयानक मुखौटों वाले पात्रों का प्रवेश होता है। उनमें से एक राक्षस दर्शकों को डराता है। सारे पात्र भयानक स्वर निकालते हैं। यह करियाला की प्रस्तुति का दूसरा चरण है, यानी साधु का स्वांग। गुरुजी और पूरबनाथ में संवाद हो रहा है। गुरुजी के हालचाल लेने गया पूरबनाथ उनका अपमान कर देता है। उनके भस्म कर देंगे को पूरबनाथ खसम कर देंगे समझ रहा है। गुरुजी को पूजन सामग्री चाहिए- करवा, कमंडल, जौ, कपड़ा और जल। पूरबनाथ को इनका इंतजाम करना है। प्रलाप की हद तक पहुँची यहाँ-वहाँ की बतकही में प्रस्तुति आगे बढ़ती है। एक पात्र छड़ी के साथ आया है। छड़ी फटकारते हुए वह गुरुजी के ज्ञान को परखता है। एक क्या है? --ओंकार, गुरुजी बताते हैं। तीन...त्रिलोक, चार... दिशाएँ, नौ...ग्रह। फिर सब मिलकर गाते हैं—भजो रे मन राम गोविंद हरे...मोहमाया के सारे बंधन झूठे, सच्चा नाम हरि। माइक में सारे स्वर दूर तक पहाड़ों में गूँज रहे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी लोकेंद्र त्रिवेदी कान के पास आकर बताते हैं—पहले यह स्वांग पूरी तरह धार्मिक था, अब कॉमेडी हो गया है।
इस दरम्यान मिस अंजलि मंच पर नमूदार हुई हैं। उनका लटके-झटके वाला डांस देखने लायक है— कोई ले गया रे बईमान, मेरा दिल कोई ले गया। इकहरी काठी वाली मिस अंजलि एक मुकम्मल स्त्री-छवि के साथ हैं। उन्होंने एक पुराना गाना कंकड़िया मार के जगाया भी सुनाया, और जाने से पहले कहा- मैं ब्रजेश्वर महादेव से कामना करती हूँ कि यहाँ पधारे अतिथि और मेरे भाई-बहन सदैव खुश और परिपूर्ण रहें। 
करियाला पहले शादी, मुंडन या अन्य धार्मिक-सामाजिक उत्सवों के मौकों पर आयोजित किया जाता था। शाम होते-होते करियालची गाँव पहुँच जाते। उनकी शहनाई और नगाड़े के स्वर दूर-दूर तक उनके आने और रात के स्वांग का ऐलान कर देते और लोगबाग तैयार होकर प्रस्तुति स्थल पर पहुँच जाते। आयोजन स्थल तीन तरफ से दरियों, कुर्सियों और गद्दों वगैरह के जरिए दर्शकों के लिए मुकर्रर होता है और चौथी तरफ मंच और उसके पीछे वो कमरा, जहाँ अभिनेतागण मेकअप वगैरह करते हैं। पूरा लोक नाट्य दो-तीन चरणों में संपन्न होता है। पहला, चंद्रावल स्वांग (जिसमें शिव और शक्ति को मंचस्थ किया जाता है), फिर साधु का स्वांग, अंग्रेज का स्वांग, नंबरदार का स्वांग। अंग्रेज का स्वांग अंग्रेजी राज के दौरान और बाद में लोकप्रिय रहा। नंबरदार के स्वांग में एक नटी को लेकर दो नटों में विवाद हो रहा है। फैसले के लिए दोनों में लड़ाई होने लगती है। यह काफी दिलचस्प लड़ाई है। दोनों एक दूसरे पर गिर रहे हैं। आखिर में फैसला नंबरदार को करना है। नंबरदार को आवाज लगाई जाती है। लेकिन नंबरदार के बजाय एक गोरखन आई है। वह बताती है कि नंबरदार कहीं गया हुआ है। पूरी प्रस्तुति का कोई आलेख नहीं है। कथानक के नाम पर महज एक स्थूल सूत्र है, जिसपर देर तक इधर-उधर का गपशप नुमा नाटकीय वार्तालाप चला करता है। इस वार्तालाप का सारा रस गोरखा बने जियालाल ठाकुर और गोरखन बने भुवनेश आनंद की अभिनय प्रतिभा से सृजित होता है। दोनों ही ऊँचे दर्जे के कलाकार हैं। न सिर्फ अभिनय में बल्कि गायकी में भी। उनकी गायकी में शास्त्रीयता का पुट है—वे बाकायदा बाखबर हैं कि कौन सा राग कहाँ पर इस्तेमाल किया जाना है।
संक्षेप में कहें तो करियाला परंपरा से जुड़े रहने की चाहत, सामुदायिकता के भदेस और शास्त्रीयता की आकांक्षा की कला है। उसका शास्त्र महज एक मोटी रूपरेखा के तौर पर है। उसके कलाकार आशु-कलाकार हैं, और उसका शिल्प सतत चलने वाले इंप्रोवाइजेशन से आकार लेता है। सीधे-सादे ग्रामीणों के बीच खेले जाने वाले इस नाट्य का तात्विक गुण उसकी सरलता और अनगढ़पन है। प्रस्तुति चल रही है कि करियाला की परंपरा के वरिष्ठ जानकार पारसराम तोमर अभिनेताओं को रोककर अचानक किसी संदर्भ के बारे में बताने लगते हैं। उनके बता चुकने के बाद अभिनय उसी रुके हुए बिंदु से फिर शुरू हो जाता है। दर्शकों में बच्चे हैं, माताएँ और बहुएँ हैं, अलग-अलग उम्रों के पुरुष हैं। करियाला महानगरों के जटिल तंत्र से दूर इस सीधी-सादी दुनिया का ही नाट्य है।
संगीत नाटक अकादेमी के सहयोग से दिल्ली की संस्था अभिज्ञान नाट्य एसोसिएशन ने स्थानीय संस्था हिमानी कला मंच के साथ इसी जून के शुरुआती हफ्ते में इस कार्यक्रम का आयोजन किया। हिमालयी कला मंच (सोलन), ब्रजेश्वर नाट्य मंडल (शिमला) आदि मंडलियों ने इसमें भाग लिया।    

Tuesday, July 28, 2015

नीलकंठ निराला

हिंदी थिएटर में देशज होने का मतलब है एक तरह की अस्तव्यस्तता। धोती-मुरैठा बाँधे पात्र मंच पर किसी भी छोर से चले आ रहे हैं, जुमलों की तरह के संवाद बोले जाते हैं और वैसी ही स्थितियों की घिचपिच वाला कथानक अंत में किसी लोकगीत के कोरस में निष्पत्ति पाता है। सभ्य भाषा में देशज के इस व्याकरण को अनगढ़पन कहा जाता है। मध्यप्रदेश ड्रामा स्कूल के निदेशक संजय उपाध्याय का यह योगदान माना जा सकता है कि उन्होंने हिंदी रंगमंच में अनगढ़पन के अनपढ़पन के बरक्स देशज संवेदना का प्रभावी परिष्कार किया है। कितनी भी बड़ी टीम हो, कितनी भी जटिल कथावस्तु हो, संजय का मिडास टच मंच पर उसका कुछ-न-कुछ परिपाक कर ही देता है। पिछले सालों में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के छात्रों के साथ किये हृषिकेश सुलभ के नाटक माटी गाड़ी को उन्होंने एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया था, और पीयूष मिश्रा के अपेक्षाकृत बिखरे आलेख गगन दमामा बाज्यो को सामूहिकता की युक्तियों से एक दिलचस्प रंगत दी थी। नाट्य विद्यालय के इस साल जबलपुर में हुए सत्र समापन समारोह में  हुई नीलकंठ निराला भी इसी क्रम में एक संवेदनशील प्रस्तुति थी। नीलकंठ निराला बिहार में लोहासिंह के नाम से मशहूर रहे रामेश्वर सिंह काश्यप का नाटक है। नाटक में निराला की कविताओं और उनके जीवन को कुछ इस ढंग से पिरोया गया है कि यहाँ घटनाओं का कोई निश्चित क्रम नहीं है। नाटक न सिर्फ संवादों में बल्कि अपने मुहावरे में भी एक छंद में आबद्ध मालूम देता है। इस लिहाज से यह निश्चित ही एक मुश्किल नाट्यालेख रहा होगा। लेकिन संजय इसका ऐसा निरूपण करते हैं कि एक घंटा चालीस मिनट दर्शक को हिलने की मोहलत नहीं होती।
प्रस्तुति में संजय एक गुजरे वक्त को, निराला की दग्धता और मुग्धता से युक्त खाँटी छवियों को, कई शहरी और गँवई पात्रों को कुछ यों संयोजित करते हैं कि उनके तमाम छात्र भी उसमें समायोजित हो सकें। निराला हिंदी के आत्महंता, महाप्राण और नीलकंठ हैं। उन्होंने निजी जीवन में जो दुख झेला वह उनकी साहित्यिक छवि में शामिल हुआ। यह नाटक एक दौर की साहित्यिक भावदशाओं का भी पता देता है। नाटक में निराला के घर में चारों ओर अभाव ही अभाव हैं, लेकिन इससे उनका आत्मसम्मान झुकनेवाला नहीं। अपने एक शुभचिंतक की मदद को वे निराला कभी दान नहीं लेता कहकर ठुकरा देते हैं और कहीं से मिले पैसे और घर का एकमात्र कंबल भिखारिन बुढ़िया को दे देते हैं। वे कृतघ्नों की भाषा हिंदी से दग्ध हैं और अंग्रेजी में ही लिखने की बात कहते हैं, और कहते हैं मेरे हस्ताक्षरों का मोल लोग ढाई सौ साल बाद जानेंगे। निराला की विक्षिप्तावस्था के दिनों के इन ब्योरों में निराला के मित्र हजारी पहलवान, मनोहरा, एक अफसर, उसकी साहित्यप्रेमी पत्नी, चायवाला, डाकिया आदि पात्र दिखाई देते हैं। चाय वाला लड़का लेटे हुए निराला के पैर पर सिर रखकर पाँय लागी दादा कहता है। ये छवियाँ निश्चित ही काफी अचूक हैं। खुद आंशिक विक्षिप्त निराला भी, जो अपने वक्त के एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। लोग उनको आयोजनों में निमंत्रित करते हैं, लेकिन निराला की उनमें कोई रुचि नहीं।
संजय उपाध्याय के यहाँ स्टेज पूरी तरह उनके नियंत्रण में दिखता है। वे प्रस्तुति के सुर को जानते हैं। रंगमंच में ये सुर बहुत से अंगों-उपांगों की समांतरता में सधता है। मंच पर छह निराला हैं पर कहीं कोई लड़खड़ाहट नहीं। उनकी खड़ाऊँ है, एक मौके पर वे हजारी से हाथापाई पर उतर आते हैं। प्रवेश-प्रस्थान में कहीं कोई व्यवधान नहीं, न टाइमिंग का कोई अन्य व्यतिक्रम, एक-एक भंगिमा अपनी जगह पूरी तरह दुरुस्त। सरोज स्मृति के प्रसंग में एक जगह मेरे पड़ोस में बैठे हृषिकेश सुलभ चश्मा उतारकर आँसू पोंछते दिखे।   

हिंदी एक भाषा नहीं, भावदशाओं की एक दुनिया है और निराला उसकी तदनुरूप व्याखायाओं के नायक। इस दुनिया में जीने का सुख अनिर्वचनीय है। संभवतः उसके दुख में भी करुणा या वैसा ही कोई रस मौजूद होता है। संजय इस दुनिया को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। उनकी यह संवेदना ही उनकी देशज निपुणता को इतना ठोस बनाती है।  

Tuesday, June 2, 2015

परिंदे और गदल

निर्मल वर्मा की कहानी 'परिंदे' का मंचन सतीश (आनंद) जी ने करीब महीना भर पहले किया तो मुझसे पूछा कि कैसा लगा। मैंने उनसे प्रस्तुति की कुछ त्रुटियों का जिक्र किया, और पाया कि उनका सोचने का तरीका बिल्कुल अलग था। 'परिंदे' कई लोगों की बहुत प्रिय कहानी है। वर्षों पहले पढ़़ी थी तो मुझे भी ठीकठाक लगी थी। लेकिन उम्र के साथ जब जिंदगी की हकीकत उसके संभ्रमों को लात मारकर दूर फेंकती जाती है, तब उसके रूमान की शक्ल पहले जैसी नहीं रह जाती। यही वजह है कि अब उसे दोबारा पढ़ने पर उसकी स्थितियाँ बनावटी न सही पर बेवजह फैलाई हुई जरूर लगती हैं। फिर भी कहानी का अपना एक मिजाज तो है। मैंने सोचा कि दिनेश खन्ना की प्रस्तुति 'प्रेम की भूतकथा' का मंच (जिसमें बड़ी मेहनत से मसूरी का पहाड़ी दृश्य बनाया गया था) अगर हूबहू इस प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल किया जाता तो यह काफी कारगर होता। लेकिन सतीश जी ने प्रॉपर्टी का निहायत सांकेतिक इस्तेमाल किया है, जिसमें पेड़ के नाम पर एक खंबा खड़ा था। मैंने उनसे जब इस बात का जिक्र किया तो उन्होंने बताया कि उनसे हिंदी अकादमी ने वादा किया था कि वह उन्हें इस प्रस्तुति के लिए पैसा देगी और इसी वादे के भरोसे उन्होंने अपनी मानसिक तैयारी कर ली थी थी। लिहाजा जब किसी गफलत की वजह से पैसा नहीं मिला, तो उनके लिए यह मुश्किल था कि वे यह प्रस्तुति न करते। प्रेक्षागृह के किराए और दूसरे अपरिहार्य खर्चों का बंदोबस्त तो किसी तरह उन्होंने कर लिया, पर कटौती की गाज मंच पर सीधे आ गिरी। मैंने उनसे कहा कि अपने रूमान में यह एक माहौल की कहानी है, जिसके अवयवों को किसी भी तरह सांकेतिकता में टाला नहीं जा सकता था। कहानी में ऐसा महसूस होता है कि पात्रों के भीतर कुछ आंतरिक घटित हो रहा है और इसे ही मंच पर दिखाया जाना है। लगा कि सतीश जी मेरी बात पर कुछ विचलित थे-- दरअसल उन्होंने मंचीय कटौतियों के चक्कर में प्रत्यक्ष किस्म की हैपनिंग को कुछ ज्यादा तवज्जो दे दी थी। मैंने उनसे कहा कि अच्छा होता अगर इस प्रस्तुति का नाट्यालेख खुद आपने तैयार किया होता। नाट्यालेख तैयार करना आखिर विषय को आत्मसात करने की एक प्रक्रिया भी तो होती है।
थोड़ा ही अरसा पहले सतीश जी ने रांगेय राघव की कहानी गदल का मंचन भी किया था, जो बहुत ही अच्छा था। वजह साफ है, वह घटनाओं की कहानी थी, जिसका सुमन कुमार द्वारा तैयार आलेख भी काफी सुलझा हुआ था। कहानी में कई तरह के किरदार, उनकी टकराहटें और एक देसी परिवेश है। इस रॉ मैटेरियल के जरिए सतीश जी ने जो प्रस्तुति तैयार की थी, याद नहीं पड़ता कि किसी कहानी पर आधारित उतनी सुघड़ प्रस्तुति इससे पहले कब देखी थी। खास बात यह कि पूरी प्रस्तुति में राजस्थानी के लहजे का काफी संयत इस्तेमाल था—जो इस लिहाज से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि उनकी टीम के कलाकार ज्यादातर महानगरीय युवा हैं। मुझे याद है कि गदल जब बहुत पहले पढ़ी थी, तो एक मशहूर कहानी होने के कारण पढ़ जरूर ली थी, लेकिन उस उम्र के लिए उसका अपरिचित अनुभव-जगत मन में कहानी की कोई निश्चित छवि नहीं बना पाया था। लेकिन सतीश जी की प्रस्तुति इस बात का एक श्रेष्ठ उदाहरण है कि मंच पर प्रस्तुत होते हुए कहानी महज उतनी ही नहीं होती जितनी कि पाठ के तौर पर। एक अनकहा संलाप होता है...कुछ ऐसी अभिव्यक्तियाँ, जिनके बारे में शायद खुद अभिनेताओं ने भी सोचा नहीं होगा।


Wednesday, May 6, 2015

पति, पत्नी और साजिश

मंच पर जवानी पार चुका एक बंदा अपनी जवान बीवी के साथ मौजूद है। दोनों सोफे पर बैठे ड्रिंक ले रहे हैं और पास में ही बार सजी है। दोनों रह-रह कर एक-दूसरे की बाबत अपनी मोहब्बत की ताईद कर रहे हैं। मतलब साफ है कि रिश्ते के भीतर कहीं कोई लोचा है। पति को चौथा पेग गले से नीचे उतारने में दिक्कत आ रही है, यानी सेहत ठीक नहीं रहती। इसी दरम्यान बीवी का मोबाइल बजता है जिसपर उसका होनहार प्रेमी संवाद बोलता है- चिड़िया घर से निकल चुकी है, जल्द ही पहुँचने वाली है। इस तरह एक सस्पेंस नाटक में शुरू होता है।
बंगाल के राजनेता-रंगकर्मी बृत्य बसु के नाटक चतुष्कोण का यह सस्पेंस मुकाम तक पहुँचने से पहले कई उतार-चढावों से होकर गुजरता है। नाटक में कुल तीन पात्र हैं और कुछ गफलतें। इनमें सबसे दिलचस्प गफलत तीसरे पात्र की है, जो खुद को इंटेलिजेंट और कलाकार समझता है; लिहाजा उसे हमेशा धंधे और पैसे की बात करने वाले नायिका के पति से नफरत हो गई है। वह उन इकहरी शख्सियत वाले लोगों का नुमाइंदा है जो किसी जुमले के स्टीरियोटाइप में अपने लिए विचार खोज लेते हैं। अपनी खोखली नफरत के बूते वह हत्या करने जा रहा है। निर्देशक सुरेश भारद्वाज की प्रस्तुति में यह दृश्य काफी चुस्ती के साथ मौजूद है। मरने वाला और मारने वाला दोनों बुरी तरह डरे हुए हैं। रमेश मनचंदा ने तो यह किरदार वाकई काफी मन से किया है। यह रूटीन से जुदा किरदार है। वह बिजनेसमैन जरूर है पर उसके अलावा एक सरल व्यक्ति है। फिल्म बनाने के मसले में अवैध संबंध की थीम में उसे मुनाफा दिखता है, पर अपनी बीवी के अवैध संबंध की थीम पर आशंका के बावजूद वह ज्यादा तवज्जो नहीं दे सकता। जाहिर है उसकी उम्र की अपनी मजबूरियाँ हैं। सुगर बढ़े हुए मरीज के तौर पर मौत को सामने खड़ा देख उसका चेहरा बुरी तरह थरथरा रहा है। इस पूरे घटनाचक्र की सूत्रधार यानी उम्रदराज बिजनेसमैन की बीवी के पात्र में निधि मिश्रा रंगमंडल के अपने दिनों से अब काफी बदल चुकी हैं। अब वे काफी स्वाभाविक, परिपक्व और आत्मविश्वास से परिपूर्ण मालूम देती हैं। एक क्षण को उन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। पात्र के दोहरे चरित्र से उत्पन्न नाटकीय स्थितियों को उन्होंने मंच पर काफी अच्छे से निभाया है, जो मोबाइल पर अपने प्रेमी से बात करते हुए उसे ढाबे वाले के रूप में संबोधित कर रही है।
सुरेश भारद्वाज की प्रस्तुतियों में मंच हमेशा ही काफी सुकूनदेह होता है। वे प्रायः शहरी ढाँचे की प्रस्तुतियाँ ही करते हैं, जहाँ आवश्यक चीजें बड़ी ही दुरुस्तगी के साथ मंच सज्जा में पैबस्त होती हैं। यहाँ भी ड्राइंगरूप के दृश्य में न कुछ अतिरिक्त है, न कुछ कम। दूसरी चीज, जिसके वे विशेषज्ञ ही माने जाते हैं, यानी लाइट्स का शांत इस्तेमाल भी यहाँ आहिस्ता से नत्थी है।
लेकिन इन सारी बातों के बावजूद इस नाटक के कथ्य को पूरी तरह फ्लॉलेस नहीं कहा जा सकता। यह बात गले नहीं उतरती कि एक धनी और आशंकित पति अपनी जवान बीवी को एक जवान आदमी के साथ छोड़कर ढाबे से खाना लेने जैसे मामूली काम के लिए निकल जाएगा।

Monday, May 4, 2015

कोई बात चले उर्फ मोहब्बत की वर्तनी


रामजी बाली लिखित, निर्देशित, अभिनीत प्रस्तुति कोई बात चले को देखते हुए विजय तेंदुलकर के नाटक पंछी ऐसे आते हैं की याद आती है। पर यह एक लाइट कॉमेडी है। इसका नायक कन्हाईलाल बंसीप्रसाद 35 साल की उम्र में एक बीवी की तलाश में है। उसकी शर्तें बहुत मामूली हैं, जो जल्दी-जल्दी बदलती रहती हैं। कभी उसे गाल पर तिल वाली लड़की चाहिए, फिर वह इसमें आँखों में चमक की शर्त जोड़ देता है। मैरिज ब्यूरो का पंजाबी लहजे वाला प्यारेलाल शर्मा शरीफ आदमी है जो उसकी हर डिमांड के मुताबिक लड़कियाँ ढूँढ़ निकालता है। इनसे मिलने की जगह कभी तीस हजारी मेट्रो स्टेशन के नीचे फिक्स होती है कभी किसी रेस्त्राँ में। रेस्त्राँ में ड्रिंक ले रही लड़की अपना नाम प्रियांका बताती है और नायक को भूल में बार-बार बंसीप्रसाद के बजाय मुरलीप्रसाद बुलाती है; और उनकी विवाह संबंधी चर्चा नामों की वर्तनी और व्याकरण में ही उलझकर दम तोड़ देती है।
नायक की दिक्कत है कि वो काफी देसी इंसान है। पसंद की लड़की से मोहब्बत के इजहार में उसके तोते उड़े रहते हैं। अपने देसीपन में जब वह खालिस हिंदीनिष्ठ संवाद बोलता है तो एक अच्छी नाटकीयता बनती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह कोई वैसा गँवारू देसी नहीं है जैसे सायास किरदार आजकल कॉमेडी के मकसद से काफी रचे जाते हैं। इस किरदार की अपनी पसंद-नापसंद काफी स्पष्ट है। प्रस्तुति देखते हुए मालूम देता है कि अभिनेता यशपाल शर्मा से ज्यादा फिट इस रोल के लिए कोई नहीं हो सकता। मात्र चेहरे-मोहरे में ही नहीं, अपने कुल व्यक्तित्व में भी। मैं उनसे एक-दो मौकों पर मिला हूँ। हर बार वे इतने ओरिजिनल व्यक्ति मालूम दिए कि लगा किसी भी तरह की ढोंगपूर्ण स्थिति उनके लिए मुसीबत खड़ी कर देती होगी। बहरहाल इन्हीं सब हालात के बीच नाटक में सिचुएशन के मुताबिक ओ मेरी हंसिनी, भीगी-भीगी रातों में और किसी शायर की गजल...ड्रीम गर्ल वगैरह गाने भी सुनाई देते हैं और एक प्रवाह बना रहता है।
लेखक के तौर पर रामजी बाली ने भाषा की लच्छेदारी में अच्छी महारत हासिल कर ली है; और खास बात यह कि ऐसा करते हुए वे जुमलेबाजी में प्रायः नहीं फँसे हैं। पिछले सालों के दौरान उन्होंने कुछ साहित्यिक शख्सियतों पर भी नाटक तैयार किए हैं, जिनमें वे कई बार पाठ की भाषा के चंगुल में फँसे दिखाई दिए थे। साहित्यिकता की वैसी त्रुटि से यह प्रस्तुति प्रायः बरी है। अलबत्ता मंच पर खुद प्यारेलाल शर्मा की भूमिका में वे पूरा खुल नहीं पाए हैं। वे थोड़ा मुखर होते तो यह किरदार कुछ ज्यादा दिलचस्प हो सकता था। वरना वेशभूषा और पंजाबी लहजे में यह एक ठीकठाक रोचक किरदार है। इनके अलावा एक-दूसरे से पूरी तरह जुदा स्त्री भूमिकाओं में ऋतु शर्मा भी प्रस्तुति में अच्छी एनर्जी के साथ थीं।  

यह प्रस्तुति करीब साल भर पहले भी एक बार देखी थी। लेकिन इस बार यह ज्यादा बाँधने वाली लगी।    

Tuesday, April 21, 2015

अदम गोंडवी की याद

पिछले से पिछले हफ्ते की बात है, गोविंद यादव ने जब बताया कि वह अदम गोंडवी की कविता चमारों की गली का मंचन करने जा रहे हैं तो मैंने इसकी इत्तेला अदम गोंडवी के भतीजे दिलीप सिंह को भी दे दी। चमारों की गलीसन 1965 में गाँव के एक ठाकुर द्वारा एक दलित लड़की से बलात्कार और उससे जुड़े अन्याय की सच्ची घटना पर लिखी गई लंबी कविता है। इसे लिखने के बाद अदम गोंडवी, जिनका असल नाम रामनाथ सिंह था, को बिरादरी और टोले में अलग-थलग कर दिया गया था, और यह स्थिति आजीवन बनी रही। प्रस्तुति के बाद प्रेक्षागृह से बाहर आते हुए मैंने दिलीप से पूछा कि कविता के पात्रों के अब क्या हाल हैं। उन्होंने बताया- कृष्णा अभी हैं, लेकिन मंगल की मौत हो चुकी है;  और सुखराज सिंह का डंका आज भी गाँव में बोलता है। दिलीप ने अपनी जेब से सौ का नोट निकालते हुए मुझसे पूछा कि हमारे पास ज्यादा तो नहीं है पर क्या हम ये सौ रुपए आभारस्वरूप या पुरस्कारस्वरूप उस लड़की को दे दें जो मंच पर एकल अभिनय कर रही थी। मैंने उन्हें मना किया कि इसका कोई तुक नहीं है।
अदम जी का निधन 18 दिसंबर 2011 को लखनऊ के पीजीआई अस्पताल में हुआ था। अस्पताल वालों ने उन्हें भर्ती करने से इनकार कर दिया था। लेकिन मीडिया में खबर बनने और कई लोगों द्वारा आर्थिक मदद देने के बाद उन्हें भर्ती कर लिया गया। तब तक अन्ना आंदोलन शुरू हो चुका था। अस्पताल के बिस्तर से ही अदम जी ने लिखा- ये महाभारत है, जिसके पात्र सारे आ गए/ योगगुरु भागे तो फिर अन्ना हजारे आ गए।
दिलीप ने बताया कि उनके जीवन के अंतिम वर्षों में घर के हालात बहुत कष्टपूर्ण थे। ऐसे अभाव थे कि कई बार फाकाकशी तक की नौबत आ जाती थी। गाँव के दबंगों के अन्याय अदम जी की कविता के रमसुधी को ही नहीं खुद उन्हें भी झेलने पड़े थे। जमीन या तो बिकती रही या सीलिंग का बंजर उनके हिस्से में आता रहा। जमीन को बेचा जा सकता था पर जमीर का क्या करते! अदम जी हिंदी की मुख्यधारा के साहित्यकार नहीं थे। मुख्यधारा का साहित्यकार पुरस्कारों और सच्ची-झूठी प्रशंसाओं वगैरह से बहला रहता है, पर अदम जी के लिए वह मुमकिन नहीं था। उनके जैसे व्यक्ति के भीतर जीवन का यथार्थ इतने ठोस तरह से व्याप्त होता है कि उसके विद्रूप से मुँह फेरकर निजी हसरतों में लीन रहना उनके लिए संभव नहीं होता। यशःप्रार्थिता उनकी चीज नहीं थी और न ही कविता के क्षेत्र में उन्हें कभी किसी अनुमोदक या समीक्षक की जरूरत हुई। उनकी कविता इतनी आवेगशील और इतनी दो टूक थी कि पाठक/श्रोता को सीधे अपने असर में लेती थी। लेकिन इस वजह से मिली लोकप्रियता भी उन्हें कोई भुलावा नहीं दे पाई, क्योंकि कहीं कुछ बदल नहीं रहा था बल्कि राष्ट्रीय और सामाजिक हालात और बदतर होते जा रहे थे। ऐसे में एक ही चीज उनके लिए बचती थी, वह थी—शराब। उन्होंने खुद को उसी के सिपुर्द कर दिया।
दिलीप को लगता है कि वो अपने चाचा की लीगेसी को कैसे बनाए रखें। लीगेसी यानी अदम जी की पक्षधरता को। बावजूद इसके कि प्रशासन आदि की मदद से घर के हालात आज बहुत सुधर गए हैं, यह द्वंद्व आज भी उनके लिए जस का तस है।    



Monday, April 6, 2015

सही और गलत

खबर केरल के कोच्चि जनपद की है। अमेरिका के एक कलाकार यहाँ के एक कला-उत्सव में भाग लेने आए थे। आयोजन की समाप्ति के बाद जब वे अपना सामान समेटकर ट्रक में लदवाने लगे तो सिर्फ दस फुट की दूरी तक छह बक्से पहुँचाने के उनसे दस हजार रुपए माँगे गए। खीझकर उन्होंने कहा कि मैं अपनी कृतियाँ नष्ट कर दूँगा, पर इतना पैसा नहीं दूँगा। उन्होंने केरल की लेबर यूनियनों को माफिया की संज्ञा दी और अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए खुद द्वारा अपनी कृतियों को नष्ट किए जाने का एक वीडियो यूट्यूब पर डाल दिया।वासवो नाम के इन अमेरिकी कलाकार के साथ हुए इस बर्ताव जैसा ही बर्ताव उत्सव में भाग लेने गए भारतीय कलाकार सुबोध केरकर के साथ भी हुआ। उन्हें दो ट्रकों पर अपना सामान लोड कराने के साठ हजार रुपए देने पड़े।
आए दिन ताकतवर लोगों के अतिचारों की खबरों के बीच यह बहुत दिनों बाद 'सर्वहारा' के 'अधिनयाकवाद' की कोई खबर सुनाई दी है। 1990 के बाद के भूमंडलीकरण ने मजदूर की हस्ती को इतना निरीह बना दिया है कि उसके हित की कोई भी बात विकास के रास्ते का रोड़ा समझी जाती है। ऐसे में केरल की यह घटना निश्चित ही काफी अलग किस्म की है। खासकर इसलिए कि जनसंख्या नियंत्रण, स्त्री-पुरुष अनुपात, साक्षरता दर आदि सभी सूचकांकों में केरल देश का अव्वल राज्य है। वहाँ के गाँव आज भी ऐसे हैं कि दिल्ली में सरकारी नौकरियों से रिटायर होने वाले मल्लू अक्सर वहाँ वापस लौट जाते हैं। किसी भी समाज को अगर सुचारू रखना है तो सबसे पहले आमदनियों के अनुपात को सुचारू बनाना होता है, और इसका सबसे बड़ा संकेतक है-- वहाँ के मजदूर की हैसियत।
इस घटना से हम भाँप सकते हैं कि केरल तुलनात्मक रूप से अगर एक सुचारू राज्य है तो इसमें वहाँ की ट्रेड यूनियन संस्कृति की एक बड़ी भूमिका है। लेकिन फिर भी केरल इस देश की अर्थव्यवस्था का ही एक हिस्सा है। इस अर्थव्यवस्था में फासले इतने ज्यादा हैं कि एक मजदूर के श्रम का जो मूल्य उसके लिए 'सही' है वह चुकाने वाले को 'बहुत ज्यादा' लगता है। कहना सिर्फ यही है कि अमेरिकी कलाकार के साथ हुई 'ज्यादती' को मात्र व्यक्तिगत संदर्भ में न देखकर एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें।

Saturday, April 4, 2015

एक तू और एक मैं

इस मूलतः दो पात्रीय नाटक का मंचन 30 मार्च को मुक्तधारा प्रेक्षागृह में किया गया। पहला पात्र अपनी बीवी की हत्या का मुल्ज़िम है और दूसरा उसका वकील। वकील साहब की जिंदगी का यह पहला मुकदमा है, जो उन्हें अदालत के क्लर्क की एक तकनीकी गलती की वजह से मिल गया है। क्लर्क ने पी के बजाय बी टाइप न कर दिया होता तो अभियुक्त के हिस्से की कानूनी सहायता इन वकील बेनी प्रसाद के जिम्मे न आई होती। बेनीप्रसाद एक असफल लेकिन कल्पनाशील इंसान हैं। वे अपने मुवक्किल की बेगुनाही के कई कोण प्रस्तावित करते हैं। उन्हें पूरा यकीन है कि उसकी बीवी बदचलन रही होगी। वे जज के सामने पुरजोर तरीके से साबित करने की रिहर्सल करते हैं कि मुवक्किल की बीवी ने सटकर या लदकर किराएदार चौधरी के मोबाइल पर वाट्सएप का मैसेज देखा था। दिलचस्प यह है कि इस रिहर्सल में खुद मुवक्किल ही वकील की मदद कर रहा है। कभी वह गवाह बना हुआ है, कभी जज, और कभी वास्तविक अपराधी। यह मुवक्किल थोड़ा सुस्त, निरीह और थका-ऊबा प्राणी है। उसकी नीरस जिंदगी में वकील की रिहर्सलों ने रस पैदा कर दिया है। वह बराबर नए-नए पार्ट की अदायगी के लिए तत्पर है। स्क्रिप्ट काफी ढंग से लिखी गई है। नरेंद्र गुप्ता और सुनील सिन्हा ने इसे जितने अच्छे तरह से लिखा है उतने ही अच्छे तरह से मंच पर राजेश बब्बर और आशीष शर्मा ने पेश किया है। जैसा कि हिंदी में अक्सर होता है, कॉमेडी किरदारों की हाइप में फँसी नजर जाती है-- वैसा इस प्रस्तुति में नहीं था। दोनों ही किरदार अपने आपे में हैं और कुछ न कुछ किया करते हैं।  

नाटक में लगातार नए-नए प्रकरण निकलकर आते रहते हैं। अपराधी को खूँखार सजाएँ देने वाले जज माँगीलाल का वर्णन। उस वकील का किस्सा जो उम्रदराज जजों की मानसिकता के मुतल्लिक मेडिकल एविडेंस पर खेल जाता था, आदि-आदि। नाटक में सिर्फ दो दृश्य हैं और हवलदार के आनुषंगिक पात्र को मिलाकर कुल तीन पात्र; लेकिन उसमें एक रवानी है जो देखने वाले को पूरे समय बाँधे रखती है। प्रतिबिंब कला दर्पण की राजेश बब्बर निर्देशित इस प्रस्तुति का नाम था- एक तू और एक मैं।