संदेश

आहिस्ता-आहिस्ता अप्रत्याशित

रतन थियम के नाटकों में थिएटर का एक क्लासिक व्याकरण देखने को मिलता है। इस व्याकरण में कहीं भी कुछ अतिरिक्त नहीं, कोई चूक नहीं। संगीत, ध्वनियां, रोशनियां, अभिनय- सब कुछ सटीक मात्रा में आहिस्ता-आहिस्ता लेकिन पूरी तल्लीनता से पेश होते हैं। रविवार को कमानी प्रेक्षागृह में हुई भारत रंग महोत्सव की उदघाटन प्रस्तुति 'किंग ऑफ द डार्क चेंबर' में भी सब कुछ इसी तरह था। पहले ही दृश्य में नीली स्पॉटलाइट अपना पूरा समय लेते हुए धीरे-धीरे गाढ़ी होती है। गाढ़े होते वृत्त में रानी सुदर्शना एक छितराए से विशाल गोलाकार आसन पर बैठी है। उसके पीछे और दाहिने दो ऊंचे झीनी बुनावट वाले फ्रेम खड़े हैं। एक फ्रेम के पीछे से पीले रंग की पट्टी आगे की ओर गिरती है। फिर एक अन्य पात्र सुरंगमा प्रकट होती है। बांसुरी का स्वर बादलों की गड़गड़ाहट। मणिपुरी नाटक का कोई संवाद दर्शकों के पल्ले नहीं पड़ रहा। लेकिन घटित हो रहा दृश्य उन्हें बांधे हुए है। मंच पर फैले स्याह कपड़े में से अप्रत्याशित एक आकार ऊपर को उठता है। कुम्हार की तरह रानी दोनों हाथों से इसे गढ़ रही है। फिर वह इस स्याह आदमकद को माला और झक्क सफेद पगड़ी पहनाती ह...

बारह बजे सुन सइयां की बोली

दिल्ली के तालकटोरा गार्डन में हिंदी अकादमी की ओर से कानपुर शैली की नौटंकी 'सुल्ताना डाकू' का मंचन किया गया। नौटंकी जुमलेबाजी में रस लेने वाले भारतीय मानस की कला है। पाकिस्तान में 'बकरा किस्तों पर' जैसे रूप भी इसी मानस की चीज हैं। यह मूलतः एक वाचिक नाट्य है जिसमें असली कलाकार माइक है। कानपुर की प्रसिद्ध दि ग्रेट गुलाबबाई थिएट्रिकल कंपनी की इस प्रस्तुति में मंच पर चार-पांच माइक खड़े कर दिए गए हैं, जिन्हें ऐ मालिक तेरे बंदे हम की वंदना के बाद पात्रों ने संभाल लिया है। पहले ही दृश्य में तमाम डाकू शराब पी रहे हैं। वे संवाद बोलने से पहले माइक टेस्टिंग की हलो बोलते हैं। एक मशहूर धार्मिक धुन की तर्ज पर 'फटाफट जाम पिला दे' बज रहा है और ज़ाहिद के बजाय साकी से मस्जिद में बैठकर पीने देने की मिन्नत की जा रही है कि सुल्ताना आकर उनपर कोड़े बरसाना शुरू कर देता है। उसे खुंदक है कि साहब बहादुर उसे लंदन से पकड़ने आ रहे हैं, लखनऊ पार्लियामेंट में हंगामा मचा हुआ है, और 'आप यहां शराब पी रहे हैं'। आगे के दृश्यों में साहब बहादुर मिस्टर यंग पुलिस वाले से बोलता है- तुम बड़ा कुत...

चीन की अभागी खलनायिका

बीते साल भारत रंग महोत्सव में चीन की प्रस्तुति 'अमोरॉस लोटस पैन' का प्रदर्शन किया गया था। यह प्रस्तुति इस बात का अच्छा उदाहरण है कि कैसे शैलीगत प्रयोगों के साथ विषय के तनाव और प्रवाह को बरकरार रखा जा सकता है। प्रस्तुति की केंद्रीय किरदार पैन जिनलियान चीन के एक प्रसिद्ध क्लासिक उपन्यास की पात्र है। सामान्यतः उसकी एक खल-सुंदरी की छवि है, जो अपने पति को धोखा देती है। लेकिन निर्देशक चेन गांग उसकी त्रासदी को उसके व्यक्तित्व और भाग्य के टकराव के अनिवार्य परिणाम के तौर पर देखते हैं। उसकी त्रासदी से जुड़े कई सवाल हैं जिन्हें अंत में यह प्रस्तुति दर्शकों के आगे छोड़ जाती है। मंच पर पीछे की ओर दरवाजे के आकार के फ्रेमों की एक दीवार है। प्रस्तुति के शुरू में एक फ्रेम में से एक पात्र निकलकर आता है और बताता है कि वो एक महान प्रतिभा वाला एक प्रसिद्ध लेखक है। इसी बीच उसके आसपास बहुत से लोग जमा हो जाते हैं और उससे उसके किरदार पैन जिनलियान और उसकी नियति को लेकर सवाल पूछते हैं। इसके कुछ देर बाद पैन जिनलियान खुद मंच पर दिखाई देती है जो छोटी उम्र में अनाथ हो गई थी और उसे झंग दाहू नाम के एक धनी व्यक...

मुस्कुराता हुआ विद्रूप

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'ड्राइव' एक लाइव थिएटर एग्जीबिशन की तरह है। सजीव छवियों की प्रदर्शनी। इसके लिए अभिमंच प्रेक्षागृह के मंच के आयताकार स्पेस में कई केबिन तैयार किए गए हैं। दर्शक इनके सामने से गुजरते हैं। रुककर अभिनीत की जा रही छवि को देखते हैं और फिर अगले केबिन की ओर बढ़ जाते हैं। प्रस्तुति के निर्देशक स्विटजरलैंड के डेनिस मैल्लेफर ने छात्र-छात्राओं के लिए दो विषय चुने-- ऑटो रिक्शा ड्राइवर और वुमेन ट्रैफिक कांस्टेबल। उन्हें वास्तविक जीवन में जाकर इन पात्रों के संपर्क में आना था। उनके निजी और पेशागत पहलुओं को जानना था और इस तरह उनकी शख्सियत की थाह लेनी थी। निर्देशक ने उनसे कहा कि इस प्रक्रिया में अर्जित की गई छवि को वे हूबहू चित्रित न करें, बल्कि जिंदगी के एक रवैये के तौर पर, एक विवरण की तरह उपयोग करें। फिर इस कच्चे माल से वे एक नए लेकिन विशिष्ट चरित्र की सर्जना करें। 'ऐसा चरित्र जिसका कोई लक्ष्य, कोई इच्छा, कोई राज, कोई कमजोरी हो, कुछ ऐसा कि उसे मंच पर साकार किया जा सके'। प्रस्तुति देखते हुए ऐसा लगता है कि अपने मंतव्य को आ...

प्रयोग और प्रगतिशीलता

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों की डिप्लोमा प्रस्तुतियों में प्रयोगशीलता अक्सर सौंदर्य प्रसाधनों की तरह होती है, जिससे प्रस्तुति को सजाया-संवारा जाता है। बीते दिनों विद्यालय परिसर में हुई कर्नाटक की सहाना पी निर्देशित प्रस्तुति 'जन्नत महल' इस लिहाज से दिलचस्प थी। इसका मंचन तीन ओर कॉरिडोर से घिरे एक चौकोर लॉन में किया गया। कॉरिडोर में बैठे दर्शकों और मंच के बीच एक पारदर्शी पन्नी या मोमजामा था, जो आधी प्रस्तुति के बाद हटा दिया गया। मोमजामे के दूसरी ओर नाटक की नायिका जुलेखा की दुनिया का जिक्र कुछ यूं था कि पहले ही दृश्य में वह मंच के एक छोर पर खड़े पेड़ से कूदती है। उसका पति मरा पड़ा है, पर वह प्रफुल्लित स्वर में गमगीन लोगों से जामुन और बादाम खाने के बारे में पूछती है। लोग कहते हैं 'कैसे चहक रही है, क्या इसे जहन्नुम का भी खौफ नहीं' या यह कि 'शायद शौहर की मौत के सदमे में यह ऐसी हो गई है'। मंच के बीचोबीच कफन से ढका मरा पड़ा पति बीच-बीच में उठकर जुलेखा को सिर ढकने वगैरह की हिदायतें देता है, और फिर मंच के एक सिरे पर कतार से खड़े अलग-अलग ऊंचाई के छह-सात रेफ्रिजरेटर...

मौन में व्यंजना

युवा रंगकर्मी लोकेश जैन ने पिछले वर्षों के दौरान एक खास तरह के थिएटर में प्रवीणता हासिल की है। वे मंच पर सीमित संसाधनों से एक ऐसी रंगभाषा रचते हैं जो अपने लालित्य, सादगी और लय में प्रभावित करती है। वे मंच पर एक ऐसा काव्यात्मक मुहावरा रचने की कोशिश करते हैं, जिसमें छंद और अमूर्तन एक साथ शामिल है। खास बात यह है कि यह काम वे स्कूल में पढ़ने वाले किशोर उम्र के कलाकारों के साथ करते हैं। सोमवार को नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी सभागार में उन्होंने प्रस्तुति 'ख्वाबों के बुलबुले' का मंचन किया। प्रस्तुति में कोई संवाद नहीं है पर स्थितियों और घटनाओं की सांकेतिकता में एक कथ्य उसमें दिखाई देता है। लगभग सपाट पीली रोशनी में आकार लेती प्रस्तुति में मंच पर कई पात्र पुतुल शैली में उपस्थित हैं। मंजीरे और बांसुरी के स्वरों पर उनकी देहगतियां एक दृश्य रचती हैं। कभी चिड़ियों की चहचहाहट, कभी घड़े में सिक्कों के उछाले जाने का स्वर, फिर ड्रम के रौद्र स्वर, फिर अचानक शांत आलाप...। स्टेज पर आगे की ओर सफेद रंग में लीपा हुआ एक घड़ा रखा है। एक पात्र वैसे ही रंग के लोटे से सूर्य को अर्घ्य चढ़ाने की मुद्रा में है, ...

उकताहट और तीन औरतें

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सौरभ शुक्ला निर्देशत 'रेड हॉट' प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार नील साइमन का नाटक है। हिंदी में स्वयं सौरभ ने इसका रूपांतरण किया है। इसके केंद्र में एक ऐसा किरदार है जिसकी शादी को 22 साल हो चुके हैं और इस उम्र में उसे लगने लगा है कि जिंदगी बडी बोरियत भरी है, कि कहीं उसकी कोई पूछ नहीं है, कि वह व्यर्थ में ही समय बिताए जा रहा है, वगैरह वगैरह। ऐसे में अपनी जिंदगी में थोड़ी उत्तेजना लाने के लिए उसके दिमाग में विवाहेतर संबंध का आइडिया आता है। यह नाटक इसी सिलसिले में तीन अलग अलग किस्म की स्त्रियों से उसकी मुलाकात याकि मुठभेड़ की कहानी है। अपनी समूची मंचीय संरचना में प्रस्तुति लगातार काफी चुस्त है। उसकी मंच सज्जा में कहीं कोई झोल नहीं, कोई विंग्स नहीं। काफी बारीकी से फ्लैट के अंदर का दृश्य बनाया गया है, जिसमें ड्राइंगरूम से जुड़ा एक टेरेस है, जहां से झांककर नीचे गार्ड को आवाज दी जा सकती है। ड्राइंगरूम में एसी लगा है। कारपेट है। रसोई में सर्विस विंडो है, जहां से भीतर और बाहर खड़े दोनों पात्रों की बातचीत और कार्रवाइयां दर्शकों को दिखाई देती हैं। रसोई के भीतर रखे फ्रिज का थोड़ा सा हिस्सा भी दिखा...