बेगूसराय में रंग-ए-माहौल


युवा रंग-निर्देशक प्रवीण गुंजन ने अभिनेता की एनर्जी को एक मुहावरे की तरह बरतने की एक दिलचस्प शैली विकसित की है। उनका अभिनेता मंच पर इस कदर सक्रिय होता है कि देखने वाले में गर्मजोशी आ जाए। मुझे उनकी ‘गबरघिचोर’ और ‘मैकबेथ’ जैसी प्रस्तुतियाँ याद हैं जिनमें देहगतियों की तीव्रता एक आकर्षक तरकीब बन जाती है, और अंततः शैली का रूप ले लेती है। यह भी याद है कि अपनी ‘समझौता’ शीर्षक एकल प्रस्तुति में उन्होंने अभिनेता की शारीरिक ऊर्जा का इतना दोहन किया है कि उससे सहानुभूति होने लगती है।
यह तीव्रता और एनर्जी खुद गुंजन के किरदार में भी है, जिसे कुछ लोग जुनून कहते हैं और जिसकी गूँज रह-रहकर उनके गृह-जनपद बेगूसराय से दिल्ली तक भी पहुँचती रही है। रानावि पास करने के बाद गुंजन ने अपने गृह जनपद को ही अपना ठिकाना बनाया, जहाँ वे ‘रंग-ए-माहौल’ नाम से नाटकों का सालाना जलसा करते हैं, जिसमें नाटक होते हैं, पुरस्कार दिए जाते हैं और रंगमंच की जानी-मानी हस्तियाँ शिरकत करती हैं। इस बार प्रवीण गुंजन के निमंत्रण पर मैं भी वहाँ था, और पुरस्कार समारोह सहित दो नाटक देखने को मिले।
नाटक ‘बंद अकेली औरत’ उन्हीं की निर्देशित एकल प्रस्तुति है जो यूँ तो फ्रांका रेमे और दारियो फो का नाटक है, पर मालूम ऐसा देता है मानो एब्सर्ड शैली की प्रस्तुति हो। एक भरेपुरे मंच पर दर्शक युवा अभिनेत्री खुशबू को तेजी से बदलती भाव-भंगिमाओं में देखते हैं, जो दो हजार साल के अन्याय से बाहर आने की उत्तेजना का परिणाम है। यह नाटक स्त्रीवाद का एक बयान है। मंच पर कई जगह ‘आप कैमरे की निगाह में हैं’ का सतर्कता-संदेश चिपकाया हुआ है। रिश्ते का झाँसा और उत्पीड़न और गुस्सा-- इन सबकी अभिव्यक्तियाँ खुशबू ने काफी शिद्दत से की हैं।
दूसरे दिन की प्रस्तुति दिलीप गुप्ता की नेटुआ थी। लौंडा-नाच के एक कलाकार के जीवन पर आधारित रतन वर्मा का यह नाटक बिहार के रंगकर्मियों के बीच खासा प्रसिद्ध रहा है। दिलीप के अभिनय और निर्देशन दोनों ही लिहाज से प्रस्तुति देखने लायक थी।
निजी साधनों से किए जाने वाले नाट्य समारोहों में बेगूसराय का ‘रंग-ए-माहौल’ अपने जज्बाती तेवर में कुछ खास है; प्रवीण गुंजन कई तरह के ‘राष्ट्रीय’ को अपनी स्थानीयता का नियमित हिस्सा बनाया हुआ है। इस बार उन्होंने देवेन्द्र राज अंकुर, सुरेश शर्मा और अभिलाष पिल्लई को तीन अलग-अलग पुरस्कारों से विभूषित किया। अतिथियों की आवभगत से लेकर समारोह स्थल की भव्यता तक में एक बड़े कलेवर का पुट स्पष्ट देखा जा सकता है। इन सारी चीजों ने बेगूसराय के युवाओं के बीच थिएटर का एक अच्छा माहौल बनाया है, और इसीसे बेगूसराय आज हिंदी पट्टी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण केंद्रों में एक बन गया है।

टिप्पणियाँ

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 18/02/2019 की बुलेटिन, " एयरमेल हुआ १०८ साल का - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

भीष्म साहनी के नाटक

न्यायप्रियता जहाँ ले जाती है

कौन थी अनारकली?