शाहिद अनवर

शाहिद अपने स्वभाव और अपनी रौ में जीने वाले इंसान थे। विदेश यात्रा
या कमेटियों का सदस्य होने जैसे प्रलोभनों का उन्हें कोई आकर्षण नहीं था; मेरी जानकारी में
कुछ मौकों पर उन्होंने इन्हें ठुकराया भी। उन्हें बस उतना ही चाहिए था कि उनकी
दुनिया चलती रहे। न उन्हें कंजूसी का अभ्यास था न जुगाड़बाजी चाहिए थी। दूसरे
शब्दों में कहा जाए तो शाहिद बिल्कुल भी जटिल व्यक्ति नहीं थे। वे थोड़ा-सा जटिल
हो गए होते तो शायद उनकी जिंदगी कुछ आसान होती। प्रत्यक्षतः उनकी मृत्यु उनकी
लापरवाही का ही नतीजा थी— लीवर और हृदय तक रक्त का संचार करने वाली तीन धमनियाँ
अवरुद्ध हो चुकने तक उन्होंने अस्पताल जाने की सुध नहीं ली।
मैं जानता था कि शाहिद यथार्थ के नहीं यूटोपिया के व्यक्ति हैं। वे
अन्यमनस्क हो सकते थे, पर किसी यथार्थवादी की तरह भीतर से निराश नहीं। ‘बहुरूप’ प्रायः जेएनयू के
छात्रों का थिएटर ग्रुप रहा है। साल दर साल वे छात्रों की परीक्षा, छुट्टियों,
क्लासेस का हिसाब रखते हुए प्रस्तुति की रूपरेखा बनाने का रंग-प्रबंधन करते रहे।
मैंने कई बार उनसे शिकायत की कि उनका ग्रुप इतनी मेहनत करके प्रस्तुति तैयार करता
है और उसके एक-दो शो ही हो पाते हैं, क्यों नहीं वे जेएनयू से बाहर निकलते! शाहिद के पास इसका
कोई जवाब नहीं होता, पर एक बार उन्होंने यह कहा था कि उनके काम की कोई और सार्थकता
हो या नहीं, पर कम से कम उनके साथ काम कर चुके लड़के भविष्य में ड्रग एडिक्ट और
सांप्रदायिक तो नहीं बनेंगे। यही वो संकल्पना थी जो उन्हें निरंतर सक्रिय रखती थी।
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