रतन थियम का मैकबेथ

रतन थियम के थिएटर का मूल तत्त्व मौन है, जिसमें ध्वनि और स्वर खिलकर सामने आते हैं। इसी तरह वे अँधेरे का इस्तेमाल भी करते हैं, जिसमें रोशनियाँ मानो अपने क्लासिक अभिप्रायों में बरती जाती दिखती हैं। बेसिक रंग अक्सर ही उनके यहाँ अपने तीखेपन के साथ दिखाई देते हैं। तीसरी चीज है समय। रंग हो, कोई ध्वनि हो या संवाद ये सब एक निश्चित समय के दौरान अपने आरोह-अवरोह की लय में ही उनके यहाँ मुकाम पाते हैं। इन सारी बातों को आसान भाषा में कहा जाए तो उनका नाटक एक सभ्य दर्शक को छींकने-खाँसने, ताली बजाने की मोहलत और इजाजत नहीं देता। उनका थिएटर अपने व्याकरण, अनुशासन, सौंदर्यबोध और संजीदगी में इब्राहीम अलकाजी की परंपरा को थोड़ा और परिष्कार के साथ लेकिन अपने ही मुहावरे में आगे ले जाता है।
रतन थियम के नाटक को उनके इस एस्थेटिक्स के अलावा जो चीज महत्त्वपूर्ण बनाती है वह है विचार। उनकी प्रस्तुति अपने समय-विशेष की किसी प्रवृत्ति को इंगित करने का एक मकसद लिए होती है। जैसे कि यह 'मैकबेथ' (इस टिप्पणी के आखिर में उनके निर्देशकीय से यह बात ज्यादा स्पष्टता से समझी जा सकती है)। एक दृश्य में अपनी लालसा में पति को नियमित हत्यारा बना चुकी लेडी मैकबेथ अपने अपराधबोध से जूझ रही है और उसके चारों ओर व्हील चेयरों पर नर्सें मृत शरीरों को लिए खड़ी हैं। दृश्य के इस फ्यूजन में हमारा वक्त हमें अनायास दिख जाता है। वैसे प्रस्तुति की सारी संरचना देशज जनजातीय वेशभूषा में है जहाँ डंकन के मुकुट पर कई आदिवासी परंपराओं में दिखने वाले सींग दिखाई देते हैं। प्रस्तुति में चुड़ैलों वाला प्रसिद्ध दृश्य काफी प्रभावशाली था, जिसमें चुड़ैलें बरगद की जटाओं और आक्टोपस के जैसी मोटी रस्सियों सी हैं, और लगातार जोर-जोर से हिल रही हैं। बैंको की हत्या और बाद में उसका भूत दिखने के दृश्य भी इसी क्रम में थे।
रतन थियम भाषा के मामले में सख्तमिजाज और दृढ़ धारणाओं वाले व्यक्ति हैं। पर उनकी धारणाएँ कितनी भी दृढ़ क्यों न हों उनकी प्रस्तुतियाँ ('ऋतुसंहार' को छोड़कर) देखते हुए ये हसरत हमेशा उठी है कि काश यह हिंदी में होती!
प्रस्तुति का निर्देशकीय
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"मैकबेथ नाम है एक बीमारी का, जो अविश्वसनीय गति से आज की दुनिया और तथाकथित सभ्यता में फैल रही है। ये एक खतरनाक महामारी है, जिसके लक्षण हैं-- असीमित इच्छा, लालच, हिंसा आदि। लेकिन इस रोग का आसानी से पता नहीं लग पाता, क्योंकि यह ऊपर से नहीं दिखता और दूषित व भ्रष्ट दिमागों में छिपा रहता है। इसका बढ़ना एक ऐसी प्रक्रिया है जो खतरनाक और जटिल है और कुटिलता तथा षडयंत्र से भरी हुई है। अंततः यह हिंसा के रूप में सामने आकर धरती पर मनुष्यता और शांति को नष्ट करती है। लाखों साहित्यिक पाठों, कलाकृतियों, प्रदर्शनकारी कलाओं, वैज्ञानिक ज्ञान, उन्नत तकनीक और संचार, धार्मिक उद्यमों आदि उपायों द्वारा इस बीमारी को खत्म करने की कोशिशों के बावजूद नतीजा संतोषजनक स्थिति से अभी काफी दूर है।
उपचार की हर कोशिश महज बाहरी अंगों पर की जाने वाली सिंकाई से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पाई, दिमाग के भीतर तक उसकी पहुँच नहीं हो पाई जहाँ से यह बीमारी वास्तव में सक्रिय होना शुरू करती है। मैकबेथ का किरदार मनुष्य प्रजाति का सर्वाधिक घिनौना रूप है जिसकी तादाद दिन-ब-दिन विश्व में हर जगह बढ़ रही है।"

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