Thursday, January 26, 2017

झाँसी की रानी से एक मुलाकात

इस संस्मरण के लेखक जॉन लैंग  (1816-1864) का जन्म सिडनी में हुआ था। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने के कुछ साल बाद सन 1842 में वह भारत आ गया। यहाँ आगरा कोर्ट में सन 1851 में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ कंपनी के ही एक कॉन्ट्रैक्टर रहे लाला जोती प्रसाद के मुकदमे में बतौर वकील उसे बड़ी सफलता मिली। मुकदमे में जीत ने उसे हिंदुस्तानियों के बीच प्रसिद्ध कर दिया। रानी झाँसी द्वारा अपने राज्य के अधिकार पुनः हासिल करने की कोशिशों के सिलसिले में उसकी राय जानने के लिए उसे बुलाया जाना उसी प्रसिद्धि का नतीजा था। रानी से उसकी मुलाकात का यह वाकया 1854 का है, जिसपर लिखे संस्मरण को उसने 1859 में प्रकाशित अपनी पुस्तक वांडरिंग्स इन इंडिया में शामिल किया।  

छोटे से राज्य झाँसी को कब्जे में लेने का आदेश दिए जाने के करीब महीने भर बाद, और कब्जे के लिए 13वीं नेटिव इन्फेन्ट्री की एक टुकड़ी के रवाना होने के थोड़ा पहले मुझे रानी झाँसी का एक पत्र मिला। स्वर्ण-पृष्ठ पर फारसी भाषा में लिखे इस पत्र में निवेदन किया गया था कि मैं झाँसी में एक बार उनसे मिल लूँ। पत्र लाने वाले दोनों लोग हैसियतदार हिंदुस्तानी थे। एक दिवंगत राजा का वित्त मंत्री रहा था, दूसरा रानी का मुख्य वकील था।
झाँसी का राजस्व करीब छह लाख सालाना था। सरकार के खर्चे और दिवंगत राजा की सेवा में रहे सैन्य दल का वेतन देने के बाद करीब ढाई लाख बच जाते थे। सैन्य दल ज्यादा बड़ा नहीं, एक हजार के भीतर ही था, और ये मुख्यतः घुड़सवार ही थे। राज्य को कब्जे में लेने के बाद रानी को 60 हजार सालाना की पेंशन मासिक तौर पर दी जानी थी। 
रानी का मुझे मिलने के लिए बुलाने का उद्देश्य मुझसे यह सलाह करना था कि क्या कब्जे के आदेश को रद्द या वापस करवाया जा सकता है। मैं यहाँ जिक्र कर दूँ कि रानी ने मुझसे यह संपर्क राजकीय सेवा में रहे एक सज्जन के कहने पर किया था। ये सज्जन एक समय में ऊपरी प्रांत की एक स्थानीय अदालत में रेजीडेंट अथवा गवर्नर जनरल के एजेंट रहे थे, और भारत में ऊँची हैसियत के अन्य बहुतेरे अफसरों की तरह झाँसी पर कब्जे को अंततः एक बकवास कदम मानते थे —जो न सिर्फ अविवेकपूर्ण बल्कि अन्यायपूर्ण भी था और जिसका कोई तर्क नहीं दिया जा सकता था। कुल तथ्य संक्षेप में ये थे : दिवंगत राजा के अपनी एकमात्र पत्नी (वह महिला जो हमारे देश की औरतों, आदमियों और बच्चों की किले में मौत का कारण थी, और जिसे बाद में दी सलाहों के मुताबिक मार दिया गया*) से कोई संतान नहीं थी, और अपनी मौत से कुछ सप्ताह पहले अशक्त शरीर के बावजूद दृढ़ मस्तिष्क से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर एक उत्तराधिकारी गोद लिया, और झाँसी में गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि के उपयुक्त माध्यम को संबोधित करते हुए सरकार को ऐसा करने की सूचना दी। संक्षेप में, ऐसे मामलों में धोखेबाजी से बचने के लिए सरकार की ओर से निर्धारित सभी नियमों का अनुपालन किया गया था। राजा के जमा किए हुए लोगों और गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि की उपस्थिति में बच्चा राजा द्वारा गोद में लिया गया, और फिर इस सारी कार्रवाई का जिक्र करते हुए एक हस्ताक्षरित और सत्यापित दस्तावेज भी तैयार किया गया। राजा एक ब्राह्मण था, और गोद लिया लड़का उसके नजदीकी रिश्ते में था।
झाँसी का राजा ब्रिटिश सरकार का खास विश्वासपात्र रहा था। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने दिवंगत राजा के भाई** को एक ब्रिटिश चिह्न और राजा की पदवी देने वाले पत्र दिये थे। इस पत्र में सुनिश्चित किया गया था कि ब्रिटिश सरकार इस पदवी और इसमें निहित आजादी की उसे, यानी राजा को, और उसके वंशजों और (गोद लिए) उत्तराधिकारियों को गारंटी करती है। कोई शक नहीं किया जा सकता कि लॉर्ड विलियम बैंटिक के उस अनुबंध (जिस उद्देश्य के लिए यह कथित रूप से था) का बगैर किसी रत्ती भर दिखावे के उल्लंघन किया गया। पेशवा के वक्त में झाँसी का मरहूम राजा महज एक बड़ा जमींदार हुआ करता था, और अगर वह पदवी-हीन ही बना रहता तो उसकी अंतिम ख्वाहिशों में कम से कम उसकी संपत्ति के मामले को लेकर किसी सवाल से जूझना न पड़ता। यह तो राजा की पदवी को स्वीकारने के कारण ही था कि मामला उसकी संपत्तियों की ज़ब्ती, और ढाई लाख सालाना के बदले 60 हजार सालाना दिए जाने तक पहुँचा। हो सकता है यह पूरा बयान पाठकों को थोड़ा अविश्वसनीय मालूम दे, पर यह पूरी तरह सच है। 
मुझे जब रानी का पत्र मिला तब मैं आगरा में था, और आगरा वहाँ से दो दिन का रास्ता है। बावजूद इसके कि मैं झाँसी से ही आया था मेरी इस महिला से सहानुभूति थी। जिस लड़के को राजा ने गोद लिया था वह सिर्फ छह साल का था, और राजा की ख्वाहिश के मुताबिक उसके बालिग यानी 18 साल का होने तक रानी को ही शासक और लड़के के अभिभावक के तौर पर रहना था। और यह किसी महिला- वो भी हिंदुस्तानी कुलीन महिला- के लिए कोई छोटा मामला नहीं था कि वो ऐसी हैसियत को ठुकराकर एक पेंशनभोगी बन जाए—भले ही वो पेंशन 60 हजार सालाना की क्यों न हो। अब मैं झाँसी में रानी के निवास तक की अपनी यात्रा के विवरणों का वर्णन करता हूँ। मैं गोधूलि के वक्त पालकी में बैठा, और अगली सुबह उजाला होने के वक्त ग्वालियर पहुँच गया। झाँसी के राजा के पास यहाँ छावनी से करीब डेढ़ मील के फासले पर एक छोटा मकान पड़ाव के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। मेरे साथ चल रहे मंत्री और वकील मुझे वहीं ले गए। दस बजे, जब मैं नाश्ता करके अपना हुक्का गुड़गुड़ा चुका तो यह प्रस्ताव आया कि एक ही ठाँव में निकल लिया जाए। दिन बहुत गरम था, लेकिन रानी ने बड़ी ही सुविधाजनक पालकी-गाड़ी भेजी थी। थोड़े में कहें तो यह किसी सवारी से कहीं बड़ी और हर सुविधा से युक्त एक छोटे-से कमरे जैसी थी। यहाँ तक कि इसमें पंखे का इंतजाम भी था, जिसे बाहर फुट-बोर्ड पर बैठा एक नौकर झलता था। वाहन में मेरे, मंत्री और वकील के अलावा एक खानसामा या बावर्ची था, जो अपने घुटनों के बीच पात्रों में ठंडा पानी, और वाइन, और बीयर इस क्रम में रखे बैठा था कि जब भी मैं प्यास महसूस करूँ तो मुझे क्षण भर में ये चीजें मुहैया करा सके। इस विशाल वाहन को घोड़ों की एक जोड़ी पूरी ताकत और वेग से खींच रही थी। दोनों ही खूब ऊँचे घोड़े थे। स्वर्गीय राजा ने इन्हें फ्रांस से 15000 की कीमत पर आयात करवाया था। रास्ता कई जगह काफी ऊबड़खाबड़ था, लेकिन इन सबसे गुजरते हुए हम करीब नौ मील प्रति घंटा की रफ्तार पर थे। दो बार घोड़े बदलने के बाद दिन के करीब दो बजे हमने झाँसी राज्य के क्षेत्र में प्रवेश किया। हमें अभी करीब नौ मील और जाना था। अब तक हमारे साथ महज चार घुड़सवार रक्षाकर्मी थे, पर अब उनकी तादाद बढ़कर करीब पचास हो गई। हर घुड़सवार एक बड़ी सी बर्छी लिए था, और ईस्ट इंडिया कंपनी के अनियमित अश्वारोही दल से काफी कुछ मिलती-जुलती वेशभूषा में था। सड़क के किनारे कुछ-कुछ सौ गज के अंतराल पर घुड़सवार मौजूद थे, और जैसे ही हम गुजरते वो भी इस दल में शामिल हो जाते। इस तरह जब हम किले- यदि निम्न कोटि की नौ तोपों के उस पार की उन कमजोर दीवारों को किला कहा जा सके- के करीब पहुँचे तो झाँसी की कुल अश्वारोही सेना वहाँ उपस्थित थी। सवारी को राजा का बगीचा कही जाने वाली एक जगह की ओर ले जाया गया, जहाँ मैं उतरा, और वित्त मंत्री, वकील और अन्य राज्य कर्मचारियों द्वारा आम के विशाल पेड़ों के झुरमुट के नीचे लगे एक बड़े से तंबू की ओर ले आया गया। यह वही तंबू था जिसमें कि मरहूम राजा ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक और सैन्य अफसरों से मिला करता था। तंबू सलीके से लगाया गया था और उसमें कालीन बिछा था, और कम से कम दर्जन भर घरेलू नौकर मेरे आदेशों को पूरा करने के लिए वहाँ तत्पर थे। मुझे यहाँ यह जिक्र नहीं भूलना चाहिए कि मेरी यात्रा के साथी- मंत्री और वकील- दोनों ही योग्य और खुशनुमा सलीके वाले लोग थे। इसके अलावा वे पढ़े-लिखे जानकार लोग थे, लिहाजा सफर में मेरा समय बहुत ही सुखद ढंग से गुजरा।
रानी ने उनके द्वारा प्रश्रय पाने वाले बहुतेरे ब्राह्मणों में से एक से सलाह की थी कि उस परदे, जिसके दूसरी ओर वे बैठती हैं, पर मेरे आने का सबसे अनुकूल समय क्या होगा;  और ब्राह्मण ने उन्हें बताया था कि यह अवश्य ही सूर्य के अस्त होने और चाँद, जो कि अपनी पूर्ण अवस्था में हो, के उदित होने का समय होना चाहिए। दूसरे शब्दों में साढ़े पाँच और साढ़े छह के बीच का समय।
यह महत्त्वपूर्ण मामला मुझे बता दिया गया था, मैंने मिलने के समय को लेकर अपना पूर्ण संतोष जताया, और उसी अनुरूप रात के खाने का आदेश दे दिया। यह होने के बाद वित्त मंत्री ने थोड़ा झेंपते हुए कहा कि वे मुझसे एक नाजुक विषय पर कुछ बात करना चाहते हैं। और कि, अगर मेरी इजाजत हो तो वे मेरे निजी सेवक सहित मेरी आवभगत में लगे नौकरों को तंबू से थोड़ा दूर होकर खड़े होने के लिए आदेश दें। जाहिर ही मैंने हाँ कहा और पाया कि कि मैं छोटे से झाँसी राज्य के केवल आधिकारिक लोगों (आठ या नौ की संख्या में) के साथ वहाँ अकेला रह गया हूँ। वित्त मंत्री मुझसे जो पूछना चाहते थे वह यह था कि क्या मैं इस बात पर सहमत हूँ कि रानी के कक्ष में प्रवेश से पहले मुझे जूते बाहर ही उतार देने होंगे! मैंने पूछा कि क्या गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि ने ऐसा किया था? उन्होंने जवाब दिया कि गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि की रानी से कभी कोई मुलाकात नहीं हुई; और दिवंगत राजा ने कभी किसी यूरोपीय जेंटलमैन की अपने महल के निजी कक्ष में अगवानी नहीं की, बल्कि इसके लिए अलग से एक कक्ष तय था, या इस तंबू में जहाँ इस वक्त हम बात कर रहे थे। मैं थोड़ी मुश्किल में था और नहीं जानता था कि क्या कहूँ, जैसा कि कुछ साल पहले मैंने दिल्ली के बादशाह के यहाँ उपस्थित होने से इनकार कर दिया था, जिसका आग्रह था कि यूरोपियन उसके यहाँ जूते उतारकर आएँ। जूते उतारने का विचार मुझे बहुत गैरवाजिब लग रहा था और मैंने यह बात दिवंगत राजा के मंत्री से स्पष्ट रूप से कही भी। मैंने उससे पूछा कि क्या वह इंग्लैंड की रानी के महल की राजसभा में शामिल होगा, अगर उसे पता हो कि वहाँ उसे अपना सिर (बिना पगड़ी के) खुला रखना होगा, क्योंकि ऐसा ही नियम छोटे से बड़े तक सबके लिए है? इस सवाल का उसने मुझे सीधा जवाब नहीं दिया, बल्कि कहा- आप अपना हैट पहन सकते हैं साहब। रानी उसका बुरा नहीं मानेंगी। बल्कि उल्टे वे तो इसे उनके प्रति सम्मान जताने का एक अतिरिक्त चिह्न मानेंगी। अब यही वो बात थी जो मैं नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि मान लो मैं अपने जूते उतारने पर सहमत हो जाता हूँ तो वो मेरे हैट पहनने को अपनी ओर से, और मेरी ओर से भी, एक किस्म का समझौता मानें। खैर, यह मोलभाव जैसा भी था, मुझे इससे खुशी हुई और उसपर मैंने स्पष्ट रूप से उन्हें यह समझाते हुए सहमति जता दी कि इस सहमति को उनके पद और महिमा के प्रति नहीं बल्कि उनके महिला और सिर्फ महिला होने के प्रति शुभकामना के रूप में माना जाए। इस तरह यह महती मुद्दा तय हुआ। मैंने मेरे लिए तैयार किया गया आलीशान भोजन ग्रहण किया, और सूर्य के अस्त या चाँद के उदय होने की धैर्यपूर्वक लेकिन इस दृढ़ता के साथ प्रतीक्षा करने लगा कि मैं काले रंग के निचले हिस्से और सफेद रंग के ऊपरी हिस्से वाली अपनी हैट निश्चय ही पहनूँगा।
आखिर वो वक्त आया, और अपनी विशाल पीठ पर लाल रंग के मखमल से सजा हुआ चाँदी का हौदा लिए एक सफेद हाथी (एक अलबीनो, जो कि पूरे भारत में कुछ ही हैं) तंबू की ओर लाया गया। मैं लाल मखमल से ही सजाए स्टेप्स से ऊपर चढ़ा और अपनी जगह बैठ गया। महावत बहुत ही अच्छी वेशभूषा में था। हाथी के दोनों ओर राज्य के मंत्री सफेद अरबी घोड़ों पर सवार खड़े थे। झाँसी का घुड़सवार दल महल की ओर जाने वाली सड़क पर पंक्तिबद्ध खडा होकर एक वीथिका बनाए हुए था। महल मेरे शिविर की जगह से करीब आधे मील की दूरी पर था।
शीघ्र ही हम मुख्य द्वार पर आ गए, जिसे पैदल अर्दलियों ने जोरदार तरह से खटखटाना शुरू किया। एक छोटा दरवाजा खुला, और फौरन ही बंद हो गया। रानी को सूचना भिजवाई गई, और करीब दस मिनट के विलंब के बाद द्वार को खोलने का हुकुम आया। मैंने हाथी पर बैठे-बैठे भीतर प्रवेश किया, और एक प्रांगण में जाकर उतरा। शाम बहुत ही गर्म थी, और मुझे लगा कि मैं मेरे आसपास जमा हो गए देसी लोगों (आश्रितों) में घुट जाऊँगा। मेरी बेचैनी को देख मंत्री ने उन्हें जोरदार तरह से पीछे ही रहने का आदेश दिया। फिर एक और अदना-सी देरी के बाद मुझसे एक बहुत ही सँकरे पत्थर के जीने पर चढ़ने के लिए कहा गया, और वहाँ ऊपर पहुँचने पर मुझे एक देसी सज्जन मिले, जो कि रानी के कोई रिश्तेदार थे। वे मुझे पहले एक कक्ष में फिर दूसरे में ले गए। ये सभी (छह या सात) एक जैसे कक्ष फर्श पर पड़े कालीन को छोड़कर बिना किसी साज-सज्जा के थे। लेकिन छत पर पंखा और झूमर लटके हुए थे, और दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें और यहाँ-वहाँ विशाल दर्पण थे। थोड़ी देर में मैं एक कमरे के दरवाजे पर ले जाया गया, जिसपर देसी सज्जन ने दस्तक दी। एक स्त्री-स्वर ने भीतर से पूछा- कौन है वहाँ?’
साहब हैं जवाब दिया गया। फिर एक और मुख्तसर देरी के बाद दरवाजा किन्हीं अदृश्य हाथों से खोला गया, और देसी सज्जन ने मुझसे भीतर प्रवेश करने के लिए कहा, और साथ ही बताया कि वह अब वहाँ से जा रहे हैं। इस बार एक तनिक विलंब मेरी ओर से हुआ। मैं बहुत मुश्किल से खुद को जूते उतारने की स्थिति तक लाया; तथापि कुछ देर में यह कार्य संपादित कर मोज़े पहने पैरों के साथ मैं कक्ष में दाखिल हुआ। कक्ष, जिसमें बहुत सुंदर कालीन बिछा हुआ था, के बीचोबीच यूरोप में बनी एक आरामकुर्सी (आर्म चेयर) रखी थी और इसके चारों ओर फूलों की मालाएँ बिखरी हुई थीं (झाँसी अपने सुंदर और सुगंधित फूलों के लिए मशहूर है)। कक्ष के दूसरे सिरे पर एक परदा था, और इसके पीछे कुछ लोग बात कर रहे थे। मैं आर्म चेयर पर बैठ गया, और आदतन अपनी हैट उतार ली; पर अपने निश्चय का खयाल आते ही उसे पुनः पहन लिया—बल्कि इस बार इसे इतनी अच्छी तरह खींचकर पहना कि मेरा माथा ही पूरी तरह इसमें छुप गया। यह शायद मेरी ओर से एक मूर्खतापूर्ण निश्चय था, क्योंकि हैट ने पंखे की हवा को मेरी कनपटियों तक ठंडक पहुँचाने से रोक लिया था।
मैं एक बच्चे से कहे जा रहे स्त्री-स्वरों जाओ साहब के पास को सुन सकता था, और सुन सकता था कि बच्चा ऐसा करने से इनकार कर रहा है। आखिरकार उसे कक्ष में भेज ही दिया गया। मेरे द्वारा बच्चे से सहृदयतापूर्वक बात करने पर उसने मेरी ओर रुख किया, पर बहुत ही संकोच के साथ। उसकी वेशभूषा और पहने हुए जवाहरात से मैं आश्वस्त हुआ कि यह बच्चा दिवंगत राजा का गोद लिया बेटा और झाँसी के छोटे से राजमुकुट का ठुकराया हुआ उत्तराधिकारी ही है। वह एक सुंदर, लेकिन अपनी उम्र के लिहाज से काफी ठिगना और जैसा कि मैंने ज्यादातर मराठा बच्चों में देखा है चौड़े कंधों वाला बच्चा था।
जब मैं बच्चे से बात कर रहा था, एक महीन और बेमेल आवाज पर्दे के पीछे से सुनाई दी, और मुझे बताया गया कि लड़का महाराजा है और हाल ही में भारत के गवर्नर जनरल द्वारा उसके अधिकारों को हथिया लिया गया है। मुझे लगा कि आवाज किसी बहुत वृद्ध महिला की है—शायद किसी सेविका या उत्साही आश्रिता की; लेकिन बच्चे ने अनुमान लगाकर कि उससे ही बोला जा रहा है, जवाब दिया- महारानी!’ और इस तरह मुझे मेरे निष्कर्ष की गलती बताई गई।
और अब रानी ने मुझे परदे के करीब आने के लिए आमंत्रित कर अपनी शिकायतें बताना शुरू किया। जब वह रुकतीं, तो उन्हें घेरकर बैठी औरतों का एक तरह का का कोरस शुरू हो जाता-- उदास उद्गारों, मसलन मैं कितनी दुखी हूँ, कैसा अत्याचार है की एक श्रृंखला। इससे मुझे किसी तईं एक ग्रीक ट्रैजेडी का एक दृश्य याद हो आया—ऐसी हास्यप्रद स्थिति थी।
मैंने वकील से सुना था कि रानी करीब छह या सात और बीस साल*** की उम्र की एक बहुत खूबसूरत महिला हैं और मैं उनकी एक झलक पाने के लिए निस्संदेह बहुत उत्सुक था। मुझे नहीं पता कि यह दुर्घटनावश हुआ याकि यह रानी की ओर से योजनाबद्ध था कि मेरी उत्सुकता शांत हो पाई। छोटे लड़के द्वारा परदा एक ओर को हटाया गया और मैंने उन्हें ठीक से देखा। यह सही है कि यह सिर्फ क्षण भर के लिए था, पर फिर भी मैंने उन्हें इतना पर्याप्त देखा था उनके व्यक्तित्व का निरूपण कर पाऊँ। वो मँझोले कद की महिला थीं—थोड़ी बलिष्ठ, पर बहुत बलिष्ठ नहीं। उनका चेहरा अपनी कम उम्र में काफी सुंदर रहा होगा, और बल्कि अभी भी उसमें काफी आकर्षण था—फिर भी, सौंदर्य के मेरे नजरिये से, यह काफी गोल था। मुखमुद्रा भी बहुत अच्छी, और बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण थी। आँखें विशेष रूप से सुंदर थीं और नाक भी बहुत सुघड़ सुकुमार थी। उनका रंग बहुत गोरा नहीं था, लेकिन काले से भी बहुत दूर था। अजीब था कि उन्होंने सिवाय कानों में सोने की बालियों के कोई आभूषण नहीं पहना हुआ था। उनके वस्त्र अच्छी बुनावट वाले साधारण सफेद मलमल के और इस तरह के टाइट सिले हुए थे कि उनकी देहयष्टि का पता चलता था, और वे यकीनन एक सुंदर देहयष्टि वाली महिला थीं। जो चीज बिगाड़ करती थी वो थी उनकी आवाज, जो थोड़ी फटी हुई थी और उसमें कराहट थी। जब परदा एक ओर को हुआ तो वो बहुत गुस्से में थीं, या ऐसा उन्होंने दिखावा किया। लेकिन अपने प्रस्तुत व्यवहार में वो हँसीं, और खुशमिजाजी के साथ यह आशा व्यक्त की कि उनका दिखना उनकी व्यथाओं के प्रति मेरी सहानुभूति को कम नहीं करेगा, ना ही उनके कारण के प्रति किसी पूर्वाग्रह को जन्म देगा।
मैंने जवाब दिया, उल्टे, यदि गवर्नर जनरल महज उतने भी भाग्यशाली हो सकें जितना कि मैं रहा हूँ, और वो भी सिर्फ पल भर के लिए, तो मैं यह पक्का महसूस करता हूँ कि वो तुरंत झाँसी को इसकी खूबसूरत रानी को शासन के लिए लौटा देंगे।   
उन्होंने भी मेरी प्रशंसा पर कुछ कहा, और अगले दस मिनट इसी किस्म के वार्तालाप में व्यतीत हुए। मैंने उनसे कहा कि पूरी दुनिया में उनकी सुंदरता और महान बुद्धिमत्ता की गूँज है। और उन्होंने मुझे कहा कि इस धरती पर कोई कोना नहीं है जहाँ मेरे अच्छे के लिए प्रार्थना न की गई हों।
फिर हम मुद्दे पर वापस आए—उनका मामला। मैंने उन्हें बताया कि गवर्नर जनरल के पास बगैर इंग्लैंड को बताए कोई अधिकार नहीं है कि वे राज्य को पुनः बहाल कर सकें, और गोद लिए बेटे के दावे को मान्यता दे सकें; और कि उनके लिए सबसे उपयुक्त तरीका यही होगा कि गोद लिया बेटा राजगद्दी के लिए दरखास्त लगा दे और इस बीच वो 60 हजार सालाना की पेंशन इस विरोध के साथ लेती रहें कि यह गोद लिए बेटे के अधिकार को कोई हानि नहीं पहुँचाएगी। पहले तो उन्होंने इससे इनकार कर दिया, और बल्कि जोर से चिल्लाईं—‘मेरा झाँसी नहीं दूँगी। तब मैंने जितना संभव था उतनी सलाहियत से उन्हें यह बताने की कोशिश की कि किसी भी तरह का विरोध कितना व्यर्थ होगा, और उन्हें वो बताया जो कि सच था कि एक देसी रेजीमेंट की टुकड़ी और कुछ तोपखाने महल से तीन कदम की दूरी पर थे। और मैंने पुनः यह प्रभाव बनाने की कोशिश की कि उनकी बढ़ती का हल्का-सा भी विरोध रानी की हर आशा को मिट्टी में मिला देगा-- और थोड़े शब्दों में उनकी आजादी को जोखिम में डाल देगा। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि उनसे, और उनके वकील से भी, बात करके मुझे यह समझ आया (और मुझे लगा कि वे सच बोल रहे थे) कि झाँसी की जनता ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अधीन नहीं होना चाहती थी।
यह रात के दो बजे का वक्त था जब उस रात मैं महल से निकला। निकलने से पहले मैंने अपनी समझ के मुताबिक रानी को सलाहें दीं। 
अगले रोज मैं आगरा के रास्ते पर ग्वालियर लौट गया। रानी ने मुझे एक हाथी, एक ऊँट, एक अरबी घोड़ा, एक फुर्तीला शिकारी कुत्ता, (झाँसी में बने) रेशम के कुछ कपड़े और भारतीय दुशाले का एक एक जोड़ा भेंट किया। मैंने काफी ना-नुकुर के बाद इन्हें स्वीकार किया। वित्त मंत्री ने काफी अनुनय की कि अगर मैंने इन्हें न लिया तो इससे रानी के मन को चोट पहुँचेगी। रानी ने एक हिंदू देसी व्यक्ति द्वारा बनाया अपना एक चित्र भी मुझे भेंट किया।
झाँसी राज्य में रानी को शासन का पुनराधिकार नहीं दिया गया, और हम जानते हैं कि बाद में उन्होंने परम क्रूर व्यक्ति नाना साहब, जिनके कष्ट उनसे मिलते-जुलते थे, के साथ विद्रोह कर दिया था। सरकार ने नाना साहब को पेशवा के गोद लिए बेटे और उत्तराधिकारी के तौर पर मान्यता नहीं दी थी, जबकि झाँसी की रानी दिवंगत राजा के गोद लिए बेटे की अवयस्कता के दौरान उसकी संरक्षक-शासक के तौर पर मान्यता चाहती थीं।
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*झाँसी के जोखनबाग में 7 जून 1857 को हुई इस घटना में 60 अंग्रेज स्त्री-पुरुष मारे गए थे। यह कृत्य बंगाल इन्फेन्ट्री की विद्रोही टुकड़ी ने उसके एक कमांडर काला खान के कहने पर किया था। अंग्रेजों के आधिपत्य वाले किले में फँसे गोरे लोगों को रानी लक्ष्मीबाई से मदद की उम्मीद थी, जो वे उन्हें मुहैया नहीं करा पाईं। इसका कारण यह था कि वे खुद असहाय स्थिति में थीं।  
** रानी के पति गंगाधर राव के भाई और उनके ठीक पहले राजा रहे रघुनाथ राव तृतीय
*** प्रायः रानी का जन्म 1835 और उस लिहाज से उनकी मृत्यु 23 साल की उम्र में मानी जाती है। पर कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक उनका जन्म 1828 का होना चाहिए। इसका एक प्रमाण ब्रिटिश लाइब्रेरी में सुरक्षित झाँसी के खजाने से गंगाधर राव की शादी के लिए किए गए 40 हजार रुपए के भुगतान की एक प्रविष्टि का दस्तावेज है। वैसे में क्या लक्ष्मीबाई की गंगाधर राव से सिर्फ सात साल की उम्र में शादी हो जाना व्यवहार्य माना जा सकता है? अगर वैसा था भी, तो वे अपने से उम्र में 15 साल ज्यादा ठहरने वाले नाना साहब के साथ बिठूर मेंबरछी, ढाल, कृपाण, कटारी से कब खेलीं? स्वयं लैंग इस संस्मरण में उनके कम उम्र में ज्यादा सुंदर रहे होने का अनुमान करता है। अगर 1854 में रानी के वकील के मुताबिक वे 20 साल की थीं, तो सवाल है कि कम उम्र से लैंग का आशय क्या था?

(अनुवाद एवं प्रस्तुति- संगम पांडेय)

1 comment:

  1. It's a captivating piece presenting the original alongwith the presenter's view and comment. The presenter Mr. Sangam Pandey as he appeared to me in a journey account of Bithur has the requisite bearing, approach and insight of a historian. The piece at hand is no history writing; it can be labelled as sth. by a historian.It entertained as also enlightened me to such great degrees.

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