Thursday, October 2, 2014

युद्ध की क्रूरता और विरोध का नाटक

(यह टिप्पणी 17मई 2011 को एक अखबार में प्रकाशित हुई थी)

अरविंद गौड़ हिंदी के एक्टिविस्ट रंगकर्मी हैं। इस बार उन्होंने उस घटना
के सिलसिले को नाटक का विषय बनाया है जब इराक में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के
दौरान जॉर्ज डब्ल्यू बुश पर जूता फेंक कर मारा गया था। उनकी ताजा
प्रस्तुति 'द लास्ट सैल्यूट' के नायक जूता फेंक कर मारने वाले पत्रकार
मुंतजर अल जैदी हैं। रविवार को श्रीराम सेंटर में हुई प्रस्तुति के दौरान
मुंतजर अल जैदी भी प्रेक्षागृह में मौजूद थे। नाटक के प्रदर्शन के बाद
मंच से उन्होंने कहा कि दर्शकों की प्रतिक्रिया से उन्हें समझ आया कि
उन्होंने इराक की जनता के दर्द को समझा है। अरविंद गौड़ ने मुंतजिर की
तुलना लाहौर असेंबली में बम धमाका करने वाले भगतसिंह से की। उनके ग्रुप
अस्मिता के लिए यह प्रस्तुति फिल्मकार महेश भट्ट ने प्रोड्यूस की है।
मुंतजर को भारत का वीजा मिलने में भी महेश भट्ट की कोशिशों का बड़ा हाथ
रहा है। उन्होंने कहा कि सिनेमा सपनों की दुनिया है, वहां हम ऐसा काम
नहीं कर पाएंगे जो अरविंद गौड़ ने यहां मंच पर कर दिया है। महेश भट्ट ने
कहा कि हिंदुस्तान वाकई एक कमाल का मुल्क है। मुंतजिर को कई अरब देशों
में भी प्रवेश की इजाजत नहीं दी जा रही। ऐसे में भारत में इस नाटक का
होना यह साबित करता है कि हम वाकई एक फ्री सोसाइटी हैं। उन्होंने कहा कि
इराक में थोपी गई तबाही के बाद मौजूदा हालात को एक हैप्पी एंडिंग
(सुखांत) की तरह पेश किया जा रहा है, ऐसे में एक वैकल्पिक नैरेटिव को
जिंदा रखना बहुत जरूरी है। भट्ट ने कहा कि मुंतजर का आना अपने में एक
बड़ा स्टेटमेंट है। प्रस्तुति का आलेख नाटककार राजेश कुमार ने मुंतजर की
किताब 'द लास्ट सैल्यूट टु प्रेसीडेंट बुश' के आधार पर तैयार किया है।
प्रस्तुति काफी कुछ डॉकु-ड्रामा की तरह है, जिसमें इराक युद्ध से संबंधित
वीडियो काफी मात्रा में इस्तेमाल में लाए गए हैं। प्रस्तुति की शुरुआत
जूता फेंकने वाली खबर से होती है और इस वक्तव्य से कि उस जूते ने बुश के
चेहरे से नकाब हटा दिया। दो स्थितियां मंच पर दिखाई देती हैं। एक में
इराक का कोई नुक्कड़ है, जहां बैठे लोग संभावित युद्ध के हालात से जूझने
के बंदोबस्त की चर्चा कर रहे हैं। रोशनी का फोकस बदलता है और दूसरी
स्थिति में बुश इराक में लोकतंत्र की वकालत करते नजर आते हैं। फिर एक
सूत्रधार आता है और पूछता है कि बुश का चेहरा इतना डरा हुआ क्यों है,
सद्दाम तो डरा हुआ नहीं था। इस वक्तव्य के साथ ही एक दूसरा वक्तव्य समूह
गीत के रूप में पेश होता है- गर हो सके तो अब कोई शम्अ जलाइये/ इस दौरे
सियासत का अंधेरा मिटाइए। फिर युद्ध की गोलाबारी के वीडियो और इनके बीच
मुंतजर की कहानी। उसके अम्मी और अब्बा बचपन में ही गुजर गए थे। वह
पत्रकार हो गया। उसे एक लड़की से मोहब्बत हुई, पर ल़ड़की ने कहा कि वो
उससे शादी नहीं कर सकती, क्योंकि हमारे यहां निकाह रिश्तेदारों में ही
होते हैं। अधूरी मोहब्बत के दर्द को लिए मुंतजर युद्ध की रिपोर्टिंग कर
रहा है। एक मारी गई नन्ही बच्ची जहीरा की दर्दनाक खबर ने उसे मशहूर कर
दिया। युद्ध की क्रूरता को दिखाती सचल तस्वीरें पीछे के पूरे पर्दे पर
फैली हैं। कुछ विवरण बताए भी जा रहे हैं। एक लड़के के माथे में लोहे का
टुकड़ा धंसा था। वह चिल्ला रहा था- अब्बा मुझे बचा लो। अमेरिकी सैनिकों
पर पत्थर फेंकने वाले एक 12 साल के लड़के को गोली से उड़ा दिया गया। एक
लड़का पेट से निकलती आंतों को हाथों में थामे खड़ा था। चैनल कमर्शियल
ब्रेक के साथ युद्ध को बेच रहे हैं। युद्ध खत्म हुआ, पर क्रूरता के अन्य
सिलसिले अभी जारी हैं। अबू गरीब जेल की दहलाने वाली तस्वीरें दिखाई जाती
हैं। खून से लथपथ इराकी सैनिक और इंसानी गरिमा को तार-तार करते टॉर्चर के
विभिन्न प्रकार। इस मंजर में मुंतजर लगातार बेचैन है। उसने तय कर लिया है
कि १४ दिसंबर २००८ को बुश की प्रेस कॉन्फ्रेंस के मौके को वह नहीं
छोड़ेगा। कई बार की गई चेकिंग के बाद वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचता
है। एकबारगी को उसे लगा कि वह यह सब क्यों करने जा रहा है। सब कुछ तो है
उसके पास। लेकिन नहीं अगर उसने यह नहीं किया तो उसका जमीर उसे जीने नहीं
देगा। उसे लीबिया की ओर से इटली के खिलाफ लड़े उमर मुख्तार की याद आती
है। एक गोरा पत्रकार जूते उतारकर बैठे मुंतजर को गौर से देखता है। इसके
कुछ ही देर बाद मुंतजर ने अपने इरादे को अंजाम दे दिया। नाटक में इस पूरे
दृश्य को बहुत अच्छी टाइमिंग के साथ चित्रित किया गया है। कहीं कोई
गड़बड़ नहीं जूता बिल्कुल सही दिशा में पूरी उत्तेजना के साथ फेंका गया।
उसे तीन साल की सजा हुई, लेकिन अच्छे चालचलन के आधार पर नौ महीने बाद
छोड़ दिया गया। पूरी प्रस्तुति मीडिया हाइप में पेश हुई एक उत्तेजक घटना
का बैकग्राउंडर है। दर्शक के आगे मानो एक नया पाठ खुलता है। इस पाठ में
मुंतजर अपनी जिंदगी का दाव खेलने वाला एक वास्तविक नायक है। उसे फांसी भी
हो सकती थी। वह अमेरिका का कुछ बिगाड़ नहीं सकता था, लेकिन उसके विरोध का
एक प्रतीक रच सकता था। प्रस्तुति उसकी व्यथा, विरोध और विद्रोह को
दर्शकों तक ले जाती है।
प्रस्तुति के बाद दर्शकों के बीच से किसी ने कहा कि प्रस्तुति की कुछ और
अच्छी हैंडलिंग की जाती तो यह
अधिक सुघड़ होती। इसका जवाब अरविंद गौड़ ने मंच से यह कहकर दिया कि इस
देश में कोई हम जैसा रंगमंच करके दिखाए फिर यह सुझाव दे। उन्होंने कहा कि
हमारे कलाकार चाय बिस्कुल खाकर घंटों मेहनत करते हैं। हम सरकार से कोई
पैसा नहीं लेते। यह कहते हुए उनके चेहरे पर एक एक्टिविस्ट वाला वाजिब
गुस्सा था। शायद वे कहना चाहते थे कि प्रतिरोध के रंगमंच का चेहरा ऐसा ही
होता है। उससे बहुत चाक चौबंद और बनाव श्रृंगार की उम्मीद मत कीजिए। उसका
असली मूल्य है उसका वक्त- जो काम इस प्रस्तुति ने कर दिखाया है।

प्रस्तुति के बाद मुंजतर अल जैदी ने भारत की तारीफ करते हुए कहा कि
हिंदुस्तान एक बहुत अजीम देश है। इसने दुनिया को एक रास्ता दिखाया है।
महात्मा गांधी से हमने बहुत कुछ सीखा है। हम चाहते हैं कि भारत तरक्की
करे और यहां के लोगों को खुशी मिले।

No comments:

Post a Comment