Monday, August 12, 2013

दोहराव और रूपांतरण

शायद सरकारी धन पर निर्भरता के कारण या जिस भी वजह से हिंदी रंगमंच का परिदृश्य कई बार एक रस्मी कवायद जैसा लगता है। वही पुराने नाटक बार-बार खेले जाते हैं, जिनके निर्देशकीय में निर्देशकगण बताते हैं कि कैसे यह फलां नाटक आज के यथार्थ के लिए भी उतना ही समीचीन है। इस दोहराव के अलावा हिंदी रंगमंच का दूसरा प्रतिनिधि तत्त्व रूपांतरण है। कोई किसी कहानी का रूपांतरण कर रहा है, कोई उपन्यास का, कोई किसी पुराने नाटक का ही। पिछले दिनों देखी कुछ प्रस्तुतियां भी इसी सिलसिले में थीं। 
खूबसूरत बला :  राधेश्याम कथावाचक लिखित इस पारसी नाटक का यह ताजा संस्करण मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के सौजन्य से था। भोपाल के रवींद्र भवन में हेमा सिंह के निर्देशन में यह वहाँ के छात्रों की प्रस्तुति थी। संयोग से इसी नाटक की अतीत में देखी दो अन्य प्रस्तुतियाँ भी हेमा सिंह के निर्देशन में अलग-अलग छात्र समूहों की ही थीं। इस नाटक के कुल गठन में संप्रेषण की कोई बुनियादी खामी है। नाटक में कथानक का कोई ठोस याकि समेकित प्रभाव नहीं बन पाता; और अंत में सिवाय शम्सा के चरित्र के कुछ भी याद नहीं रह जाता। शम्सा एक नायाब किरदार है जिसे अपनी बुराइयों से पृथक अपना कोई वजूद कबूल नहीं, इसकी तुलना में वह मौत को गले लगाना पसंद करती है। ऐसा लगता है कि नाटक अपने ही रेटॉरिक में उलझ गया है; यानी कथानक के स्पष्ट विन्यास पर शैलीगत जुमलेबाजी कुछ ज्यादा हावी हो गई है। जो भी हो यह प्रस्तुति अभिनेताओं की ऊर्जा से कई अच्छे दृश्य बनाती है। कास्ट्यूम पर भी अच्छी मेहनत की गई है, जिसका रंग-बिरंगापन एक चाक्षुष असर पैदा करता है। हालांकि पारसी शैली में विशेष रूप से आवश्यक वाचिक की अपेक्षित विविधता यहां नहीं थी। सभी पात्र एक ही तरह से बोलते दिखाई देते हैं।
ए मिडसमर नाइट ड्रीम : मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के दीक्षांत समारोह की इस अंतिम प्रस्तुति के निर्देशक आलोक चटर्जी थे। यह एक सवा घंटे की साफ-सुथरी सारगर्भित प्रस्तुति थी। निर्देशक ने परिवेश का हिंदुस्तानीकरण करने के बजाय एक प्रायः खाली मंच पर कास्ट्यूम के जरिए अपनी कल्पना की ग्रीक शैली का एक परिवेश रचा है. पात्रों की शरारत, गफलत और फितरत से बनने वाली शेक्सपीयर की इस कॉमेडी का सबसे बेहतर हिस्सा वह है जिसमें कुछ कारीगर और मजदूर ड्यूक के सम्मान में नाटक खेलने जा रहे हैं। नाटक की प्रेमियों की गलतफहमी से पैदा हुई उलटबांसी आज कई शताब्दियों बाद पुरानी पड़ चुकी है, पर मजदूरों के भोलेपन का यह हिस्सा आज भी उतना ही ताजा है। दिक्कत यह है कि आलोक चटर्जी के मजदूर भी मजदूर कम कास्ट्यूम ड्रामा के यूनानी पात्र ज्यादा लगते हैं. ऐसे में उनकी छवि का खांटीपन और लिहाजा उसका हास्य मुकम्मल ढंग से स्थापित नहीं हो पाता. इसे एक नपी-तुली मैथड प्रस्तुति कह सकते हैं.
इस नाउम्मीदी की कायनात में : युवा निर्देशक दिलीप गुप्ता ने प्रेम भारद्वाज की कहानी पर एक प्रस्तुति पिछले दिनों श्रीराम सेंटर में पेश की। इसका नायक हिंदी साहित्य की छोटी-सी दुनिया का एक आत्मपीड़ित प्रतिनिधि है। वह एक चेंप किस्म का प्रेमी है जो खुद को थप्पड़ मारने वाली प्रेमिका के यहां14 साल बाद कूरियरवाला बनकर जाता है और कहता है कि आपको मुझे नकारने का पूरा अधिकार है। फिर वह एक बलत्कृता से ब्याह करता है लेकिन उससे कभी कोई संबंध नहीं बनाता। इस नायक की हसरत रही है कि वह अपनी कविताओं से अपनी पहचान बनाएन कि पुरस्कारों से। लेकिन प्रकाशकों और आलोचकों सबने उसे छला है। लगातार अभावों में जीते इस नायक के अपने ही जैसे एक सीनियर और एक जूनियर दोस्त भी हैं। दिलीप गुप्ता ने हिंदी साहित्य की दो परिचित शख्सियतों की छवियों का एक गिमिक भी मंच पर रचा है। इनमें से एक की आवाज की स्वाभाविक नाटकीयता को उन्होंने एक अच्छी तरकीब की तरह इस्तेमाल किया है। स्पष्ट ही उनमें रंगमंचीय दृश्यात्मकता की अच्छी समझ है। हिंदी कहानियां आजकल जानबूझकर टेढ़ी होने की कोशिश करती हैं। दिलीप इसी टेढ़ेपन से मंच पर एक प्रयोग बनाते हैं। उनका निरीह नायक ऐ मेरे खुदा इस कायनात में एक कतरा जीवन मुझे भी नवाज देजैसा मुगलिया डायलाग बोलता है। नाटक के शुरू में छह पात्र खड़े हुए नायक की मौत पर शोकसभा कर रहे हैं। दृश्य में पीछे की ओर महानगरी ऊंची इमारतों के कटआउट्स लगे हैं और रोशनियां थोड़े उदास तरह से मंच पर अपने सायों के साथ गिर रही हैं। इसी तरह विवाह के दृश्य में कुछ लोग लालटेन लिए और मुंह को काले कपड़े से ढंके खड़े हैं। नायक के प्रेम के ऐलान के वक्त अमीर खुसरो की पंक्ति पर सूफियाना धुन बज उठती है। दिलीप गुप्ता में प्रतिभा की एक चमक दिखती है और साथ ही कई छोटे-मोटे व्यामोह भी। हिंदी थिएटर में इन्हीं व्यामोहों की वजह से स्थितियों को इंप्रेशनिज्म के टुकड़ों की तरह बरते जाने का चलन काफी बढ़ गया है।     

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