Friday, May 3, 2013

मन और मंच के खालीपन में प्रेम


मृत्युंजय प्रभाकर निर्देशित प्रस्तुति ख्वाहिशें’ एक बिल्कुल खाली मंच पर तीन पात्रों के दरमियान घटित होती है। यह बिल्कुल नए फ्लेवर का दो प्रेमी और एक प्रेमिका वाला प्रेम त्रिकोण है। नए जमाने के प्रेमी बगैर भावुकतावादी झामे के बिल्कुल दो टूक हैं। वे आपस में तू-तड़ाक करके बात करते हैं और सुविधा के मुताबिक झूठ भी बोलते हैं। नाटक को लिखा भी मृत्युंजय ने ही हैऔर स्पष्ट ही अपने वक्त की नब्ज को पकड़ने की अच्छी कोशिश की है। इसकी प्रेमिका जींस पहनने वाली वैसी उच्च-अभिलाषीगर्वीलीएकल और स्वतंत्र नौकरीपेशा है जो देवदास नुमा प्रेमियों को लात मारकर भगा देगी। उसका प्रेमी प्रकटतः अपने आत्मविश्वास में जमाने को ठोकर पर रखने वाला लेकिन शराब पीकर अपनी देहाती अंतर्वस्तु की वजह से कुंठित हो जाने वाला बिगड़ैल है। इनके बीच एक लो प्रोफाइल तीसरा किसी सुदूर गांव से आ टपका हैजिसके पास खुद को साबित करने का एक ही अचूक हथियार है- उसकी देहाती विनयशीलता। इस तरह इन तीन पात्रों के बीच करीब डेढ़ घंटे तक कुछ-कुछ चलता रहता है। ऐसा लगता है कि मृत्युंजय डेढ़ घंटे तक एक स्थिति को ही बुनते रहते हैंजिससे प्रकट अर्थों में कुछ भी निकलकर आता दिखाई नहीं देता। न कोई विडंबना, न कोई त्रासदी, न खोखलापन। फिर भी जो निकलकर आता है वह है बात को कहने का एक मुहावरा।
इस मुहावरे में प्रॉपर्टी के जरिए बनाया गया कोई माहौल नहीं हैनाटकीयता की कोई मैथड तरकीब नहीं है। अभिनेतागण अपनी वेशभूषादेहभाषा और बोली जा रही भाषा में इतने सहज-स्वाभाविक हैं कि लगता है मानो वे अपने ही किरदार पेश कर रहे हों। इस मुहावरे में कहीं कोई प्रयास किया जाता नहीं दिख रहा। इसकी स्वाभाविकता काफी मौलिक और नई चीज मालूम देती है, जिसमें एमेच्योर किस्म के झोल नहीं हैं और कथानक की अच्छी-खासी विवरणात्मकता का निबाह है। बिगड़ैल प्रेमी तीसरे कोण यानी लो प्रोफाइल देहाती शायर को थप्पड़ मार देता है। वह अपनी प्रेमिका को समझाने के लिए आधी रात को उसके फ्लैट पर आ धमकता है। प्रेमिका लो प्रोफाइल बंदे से प्रेम नहीं करतीऔर वस्तुतः उसकी चेंपपंती’ से परेशान हैपर अपने वास्तविक’ प्रेमी के निमंत्रण को ठुकराकर उसके साथ शाम बिताने जाती है और आधी रात को उसे घर से निकाल बाहर करती है। मोहब्बत के इस सिलसिले में असली इमोशन शराब पीने के बाद पैदा होता है। पुराने प्रेमियों की तरह यहां कोई घुटता नहीं रहता है। इसका प्रेम त्वचा के भीतर के बजाय उसकी सतह पर रहता है। ऐसे में उसका सारा खटराग अंत की ओर पहुंचते हुए तीन एकालापों के निष्कर्ष तक पहुंचता है। अपने लिए जीने का इकहरा व्यक्तिवादी ढंग अंत में एक अकेलापन बुनता है, जिसे इन एकालापों में दिखाया गया है। लेकिन इस अकेलेपन की खोह में और गहरे तक घुसने की सूझ नाटककार में नहीं रही है, इसलिए वह इसका उत्सव मनाने का संदेश छोड़कर चलता बनता है।    
मंच पर दृश्यात्मकता का प्रतीकात्मक विधान मात्र इतना है कि फ्लैट के दृश्य में एक गद्दा है, रेस्त्रां के दृश्य में दो कुर्सियां और एक अदना सी टेबल, बस। बाकी ज्यादातर दृश्यों में यह भी नहीं है। यहां तक कि प्रकाश योजना की कोई युक्तियां भी नहीं हैं और कुल मिलाकर इतना खालीपन है कि वह अलग से दिखने लगता है। मृत्युंजय इस खालीपन को अभिनय की गतियों से भरने की एक काफी मुश्किल कोशिश करते हैं और ऐसा करते हुए वे इस अभिनय की लय पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देते। अपनी पिछली प्रस्तुति जी हां हमें तो नाटक खेलना है’ में भी उनकी यह पद्धति दिखाई दी थी, जो सामयिक रंगमंच की प्रवृत्तियों में अपने ढंग से काफी मौलिक है। पिछले दिनों दिल्ली के मुक्तधारा प्रेक्षागृह में हुई इस प्रस्तुति के तीनों अभिनेताओं आकांक्षा, प्रियांशु और आशीष को उनकी सहजता के लिए बधाई दी जानी चाहिए।

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