Wednesday, February 27, 2013

जफर पनाही और हम


इन दिनों ईरान में सरकारी कैद भुगत रहे फिल्मकार जफर पनाही ने अपनी फिल्म ऑफसाइड सन 2006 में बनाई थी. उसी दौरान ईरान और बहरीन के बीच हुए विश्वकप फुटबाल के एक क्वालीफाइंग मैच की पृष्ठभूमि में इसमें कुछ लड़कियों की कहानी कही गई है। ये लड़कियां भी फुटबाल मैच देखना चाहती हैं, पर ईरान का कानून इसकी इजाजत नहीं देता। वे छुप-छुपाकर और छद्मवेश में स्टेडियम में घुसने की कोशिश करती हैं, पर पकड़ी जाती हैं। भीतर मैच चल रहा है, और इधर स्टेडियम के बाहर के गलियारे में मैच की उत्तेजना है और पुलिसवालों के पहरे में लड़कियां हैं। सिर्फ ढाई हजार डॉलर की लागत से बनी इस फिल्म के बहुत से हिस्से को वास्तविक लोकेशन पर सचमुच के समय में जाकर फिल्माया गया। अपने शुरुआती दिनों में वितोरियो डी सिका की फिल्म बाइसिकिल थीफ से बेहद प्रभावित रहे जफर पनाही द्वारा सिर्फ 39 दिनों में बनाई गई इस फिल्म के बनने की कहानी काफी दिलचस्प है। पनाही को फिल्म के विषय को लेकर विवाद की आशंका पहले से ही थी, लिहाजा उन्होंने इसकी इजाजत देने वाले मंत्रालय में एक झूठी स्क्रिप्ट भेजी, जिसमें लड़कियों की जगह पर लड़के दिखाए गए थे। लेकिन चूंकि अपनी पिछली दो फिल्मों – क्रिमसन गोल्ड और द सर्किल- पर पहले से लगी पाबंदियों के कारण पनाही सरकार की नजर में थे, इसलिए मंत्रालय ने उनके सामने शर्त रखी कि उनको इजाजत तब दी जाएगी जब वे अपनी पिछली फिल्मों के आपत्तिजनक हिस्सों को संपादित करेंगे। पनाही ने ऐसा करने के बजाय एक दूसरा रास्ता निकाला  और अपने सहायक को फिल्म का आधिकारिक निर्देशक घोषित कर तमाम मुश्किल हालात में फिल्म को शूट करना शुरू कर दिया। इतालवी नवयथार्थवाद की तरह तरह उनकी इस फिल्म के प्रायः अभिनेता भी गैरपेशेवर लोग और कॉलेज छात्राएं हैं। भीड़भाड़ के दृश्यों को वास्तविक रूप में फिल्माने के लिए उन्होंने आसानी से छुपाए जा सकने वाले छोटे कैमरे का इस्तेमाल किया। फिल्म में मैच के दृश्यों को नहीं दिखाया गया है, पर स्टेडियम के अंदर की आवाजों को उसी मौके पर रिकॉर्ड किया गया, जो बाद में शूट किए गए हिस्सों के साथ जुड़कर वास्तविकता का प्रभाव पैदा करते हैं। फिल्म की नब्बे फीसदी शूटिंग जब हो चुकी थी, तभी ऐन मौके पर एक अखबार में इसके बारे में एक रिपोर्ट छप गई। तब उसका अंतिम दृश्य ही शूट होना बाकी था, जिसमें मैच में जीत के बाद जश्न में डूबी सड़कों और बाजारों से गुजरती वैन में लड़कियों को ले जाना दिखाया जाना था। इसमें कोई आधिकारिक बाधा नहीं थी, इसलिए अंततः फिल्म पूरी हुई। जफर पनाही को उम्मीद रही होगी कि फिल्म पर शायद सरकारी पाबंदी न लगाई जाए, क्योंकि उसमें स्त्रियों के लिए बराबर की आजादी के सवाल को फुटबॉल की मार्फत देशप्रेम के एक युक्तिपूर्ण परिप्रेक्ष्य में उठाया गया है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और फिल्म ईरान में बैन कर दी गई। लेकिन विश्वकप से बीस रोज पहले लगाए गए इस बैन से पनाही को आर्थिक नुकसान जो भी हुआ हो, पर पायरेटेड डीवीडी वगैरह के जरिए यह फिल्म पूरे ईरान में व्यापक पैमाने पर देखी गई। उसी साल बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में इसका प्रीमियर हुआ, जहां इसे सिल्वर जूरी अवार्ड भी दिया गया। यह पनाही की अब तक की आखिरी फीचर फिल्म है।
जफर पनाही अपने सिनेमा की वजह से बार-बार सरकारी पूछताछ, नजरबंदी और कैद के शिकार हुए हैं. सन 2010 में उन्हें देश और सरकार के खिलाफ काम करने के लिए छह साल कैद और फिल्म बनाने पर बीस साल की पाबंदी की सजा सुनाई गई। तब से वे जेल में हैं। अंतरराष्ट्रीय फिल्म समुदाय के व्यापक समर्थन के बावजूद ईरानी सरकार उन्हें लेकर अब कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं है।
ईरान में सत्ता का रुख जैसा भी हो, वहां के समकालीन फिल्मकार अपने देश और समाज और जीवन को एक कलात्मक सादगी के साथ दिखाने के अपने-अपने तरीके निकालते रहे हैं। लेकिन इसीके बरक्स हम अपने समाज को देखते हैं तो नजारा कुछ अलग ही है।
साहित्यिक पत्रिका हंस के इधर आए सिनेमा विशेषांक में पोलैंड की शोधकर्ता तत्तयाना षुर्लेई ने हिंदी में दलितों के विषय पर बनी फिल्मों पर एक लेख लिखा है।। इसमें प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण की भी चर्चा है, जो इस देश में जाति के ज्वलंत मसले पर बनाई गई है।  तत्याना के मुताबिक फिल्म अपने विषय को लेकर इतनी रक्षात्मक है कि अंततः आडंबरपूर्ण और हास्यास्पद हो जाने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है। यह हाल हमारे उदार लोकतंत्र में कभी नई धारा के रहे एक फिल्मकार का है। जाहिर है कि आडंबर हमारे यहां सर्वव्यापी और सर्वस्वीकृत पैमाने पर चल रहा है। सिनेमा में ही हर साल ढेर सारा कूड़ा करकट बनता है जिसे देखकर लोग अपना समय बरबाद करते हैं, और इस समय बरबाद करने से फिल्म उद्योग की अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है। यह ईरान में सत्ता की कट्टरता से भी ज्यादा बुरी स्थिति है। कट्टरता का अपना एक मनमाना सच होता है, पर अपने यहां के उदारवाद में तो हर कोई मनमाने झूठ बोल रहा है और झूठ में जी रहा है। वह इतना स्वार्थी है कि झूठ बोल रहा है, वह इतना रक्षात्मक है कि झूठ बोल रहा है, वह इतना अभ्यासी है कि अभ्यास में ही झूठ बोल रहा है। सिनेमा के इतने बड़े कारोबार में भी हमारे यहां ढंग की आधा दर्जन फिल्में भी हर साल क्यों नहीं बनती, यह सवाल हमारे फिल्मकारों को बेचैन क्यों नहीं करता, और क्यों वे अपने झूठ में बगैर किसी ठोस आधार के भी आशावादी बने रहते हैं, इसपर सोचना चाहिए।  इसी के वश अनुराग कश्यप गैंग ऑफ वासेपुर के रक्तपात में कोई सार्थकता घोषित कर रहे हैं, और राजकुमार हीरानी मुन्नाभाई नुमा किसी बेहूदा आइडिये में। सत्ताओं की निरंकुशता के खिलाफ कलाएं नागरिक समाजों में विरोध का एक हथियार होती रही आई हैं, पर इस भ्रामक स्थिति में कोई क्या करे।  

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