Tuesday, December 11, 2012

पाकिस्तान की प्रस्तुति गुड़िया घर


दिल्ली इब्सन फेस्टिवल में पिछले सप्ताह पाकिस्तान के थिएटर ग्रुप तहरीक-ए-निसवां ने नाटक गुड़िया घर का मंचन किया। हेनरिक इब्सन के 1979 में लिखे प्रसिद्ध नाटक ए डॉल्स हाउस का यह एक रूपांतरित संस्करण थी। रूपांतरण में नाटक के सात पात्रों के बजाय कुल चार ही मंच पर दिखाई देते हैं। पत्नी का नाम यहां तहमीना है और पति का मुराद। मूल नाटक की कथावस्तु पूरे फैलाव में न दिखकर सरसरी तौर पर ही दिखाई देती है : पति की खुशी के लिए जी-जान से जुटी तहमीना, घर में किसी नारी निकेतन जैसी जगह से कुछ दिनों के लिए आई सकीना से उसकी बातचीत, इस बातचीत के जरिए स्पष्ट होता यथार्थ, जिसमें तहमीना की हर गतिविधि पति द्वारा नियंत्रित है, मानो वह एक गुड़िया हो जिससे वह जब चाहे जैसे चाहे, खेलता है। और अंत में तहमीना का घर छोड़कर जाने का निर्णय। नाटक के निर्देशक अनवर जाफरी के अनुसार पाकिस्तान के परिवेश में, जहां शादी को एक पवित्र और अटूट किस्म का संबंध माना जाता हो, नोरा या तहमीना के निर्णय की संगति ठहराना थोड़ा मुश्किल काम था, फिर भी उन्होंने इसे खेलने का निर्णय लिया। प्रस्तुति में एक प्रयोग यह किया गया है कि पूरा नाटक यहां एक रिहर्सल के तौर पर खेला जा रहा है। नाटक शुरू होने के पहले मंच पर एक-दो लोग लापरवाही से इधर-उधर आ-जा रहे या खड़े हैं। फिर वे जल्दी-जल्दी सोफा-कुर्सियां वगैरह लाकर रख देते हैं। कोने पर एक बोर्ड लगा है, जिसपर रिहर्सल का शेड्यूल लिखा हुआ है। दृश्यों के दौरान भी कुछ ऐसा मंजर है कि तहमीना को आईना देखना है तो एक कार्यकर्ता शीशे जैसा एक फ्रेम लेकर खड़ा हो जाता है। मुराद को अखबार चाहिए तो एक अन्य कार्यकर्ता अखबार लेकर दृश्य के बीच चला आता है, आदि। हालांकि यह तरकीब प्रस्तुति में कुछ जोड़ने के बजाय बाहरी और निष्प्रभावी तरह से दिखती है। रिहर्सल की यह तरकीब न होती तब भी प्रस्तुति का यथार्थवाद उतना ही औसत होता जितना कि वह था। एक मध्यवर्गीय गृहिणी की भूमिका में महवाश फारुकी और निचले तबके की कड़क औरत की भूमिका में सलीमा कैरमानी एक साफ-सुथरा दृश्य बनाती हैं। पोंछा लगाते हुए सकीना पति-पत्नी की बात सुनती रहती है। उसकी तुर्श भंगिमाएं प्रस्तुति को एक अतिरिक्त नाटकीयता देती हैं। धीरे-धीरे तहमीना को पता चलता है कि जिस शौहर की खुशी के लिए वह एक छोटे झूठ में शरीक हुई, वह तो उस झूठ से पैदा हुई मुश्किल को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहता है।
प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि वह नाटक की मंशा को बहस से ज्यादा स्थितियों में पेश करती है। हर समय पति और परिवार की चिंता करने वाली तहमीना से सकीना कहती है- क्या हमारा अपने को लेकर कोई फर्ज नहीं है, क्या हमारा अपने पर कोई इख्तियार नहीं है? इन स्थितियों में भी दृश्य का ज्यादा तामझाम नहीं है। निश्चित ही यह प्रस्तुति एक क्लासिक नाटक का एक संक्षिप्त और आसान विधान करती है, भले ही इस क्रम में विषयवस्तु का तनाव उस स्तर पर बना नहीं रह पाता।। नार्वे एंबेसी के सहयोग से आयोजित किए जाने वाले ड्रामेटिक आर्ट एंड डिजाइन एकेडमी के दिल्ली इब्सन फेस्टिवल के तहत एलटीजी प्रेक्षागृह में इसका मंचन किया गया।

No comments:

Post a Comment