Tuesday, October 2, 2012

थ्री आर्ट्स क्लब के वो दिन


लेखक, निर्देशक और अभिनेता रमेश मेहता 1950 और साठ के दशक में दिल्ली में रंगमंच की दुनिया का एक बड़ा नाम थे। वे 1948 में शिमला से दिल्ली स्थानांतरित हुए थिएटर ग्रुप थ्री आर्ट्स क्लब से जुड़े थे। थ्री आर्ट्स क्लब को तीन लोगों- ओम शर्मा, देवीचंद कायस्थ और आरएम कौल- ने 1943 में बनाया था, लेकिन दिल्ली आने के बाद आरएम कौल, रमेश मेहता और तीन दशक तक बाराखंबा रोड स्थित मॉडर्न स्कूल के प्रिंसिपल रहे एमएन कपूर इसके स्तंभ बने। तब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना नहीं हुई थी और 'थ्री आर्ट्स क्लब' रमेश मेहता के निर्देशन में सप्रू हाउस में निरंतर नए-नए नाटकों का प्रदर्शन करता था। उनके नाटक एक शहरी व्याकरण में सामाजिक प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करने वाले और लोकरुचि के अनुरूप होते थे। इस तरह उन्होंने दिल्ली में थिएटर को एक चेहरा दिया, लेकिन बाद के अरसे में उन्हें भुला दिया गया। सन 2008 में, अपने पिता आरएम कौल की मृत्यु के 25 वर्षों बाद, उनकी पुत्री अनुराधा दर ने थ्री आर्ट्स क्लब को पुनर्जीवित करते हुए दिल्ली में एक समारोह का आयोजन किया, जिसमें रमेश मेहता भी शामिल थे (उसी साल उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार भी दिया गया)। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अनुराधा दर ने इसी सप्ताहांत में श्रीराम सेंटर में रमेश मेहता के लिखे तीन नाटकों की सोहैला कपूर निर्देशित प्रस्तुतियों का एक समारोह एक बार फिर से आयोजित किया। रमेश मेहता इस बार नहीं थे. इसी साल 11 मई को 89 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
शुक्रवार को हुई प्रस्तुति 'पैसा बोलता है' शंभू मित्रा के नाटक 'कंचनरंगा' का रमेश मेहता द्वारा किया रूपांतरण है। नौकर पंचू अपने गांव के रिश्ते के मौसा-मौसी और उनकी संतानों के जुल्मों को कुछ अपने निरीह स्वभाव और कुछ भविष्य सुधर जाने के प्रलोभन में झेल रहा है। सिचुएशनल कॉमेडी की हड़बड़ी और अतिरंजना में स्थितियां आगे बढ़ती हैं। घर का छोटा लड़का जरा सी बात पर पंचू को इस बुरी तरह पीटने पर उतारू है मानो अपनी खलनायकी को जगजाहिर कर देना चाहता है। कई तरह के किरदार प्रस्तुति में हैं- पड़ोसी बल्ली सिंह और उसकी बीवी, नौकरानी तारा, मौसी-मौसा, उनके बेटा और बेटी। इतने सारे किरदार और कई तरह की गफलतें। लड़की का प्रेमपत्र प्रेमी को पहुंचाने के बजाय पंचू उसे कहीं रखकर भूल गया है। इसी बीच लड़की का रिश्ता लेकर एक बुजुर्ग आए हैं। पत्र उनके हाथ में पड़ जाता है। उधर पंचू को बल्ली सिंह ने लाटरी का टिकट खरीदकर दिया हुआ है। पता चलता है कि उसकी एक करोड़ की लाटरी निकल आई है। इस तरह सबसे उपेक्षित प्राणी अचानक सबसे महत्त्वपूर्ण बन जाता है। जिस लड़की को पहले पंचू से घिन आती थी वही अब उसे प्यार से भैया कह रही है। सोहैला कपूर कई एमेच्योर अभिनेताओं के साथ भी कथ्य की स्फूर्तता बनाए रखती हैं। सींकिया बल्ली सिंह की बड़ी-ब़डी मूंछें हैं। भले ही वो कितना दबंग हो, पर गोगल्स लगाए बीवी के सामने उसकी एक नहीं चलती। घाघरा पहने नौकरानी, कर्कशा घर की मालकिन आदि कई तरह के किरदार मंच पर रह-रह कर दिखाई देते हैं। यह सत्तर के दशक का मेलोड्रामा है, जिसमें रुपये को कुछ न समझने वाले गरीब और दूसरों का खयाल रखने वाले पात्र हैं। अपने ईमान को रोजगार से ऊपर रखने वाले पात्र। प्रस्तुति में चुटीलेपन की एक चमक दिखाई देती है। मां को कॉलबेल बजना पसंद नहीं, क्योंकि इसमें बिजली खर्च होती है। इसी तरह लाटरी की रकम से भोजपुरी फिल्म बनाने का ख्वाब देखने वाले बड़े लड़के ने जिस फिल्म डायरेक्टर को बुलाया है, वह हरियाणवी में बात कर रहा है, और एक दिलचस्प किरदार है। अभिनय में कच्चापन तो कई बार तो दिखता है, पर उसमें एक ऐसी स्फूर्तता भी है जो दर्शक को अपने साथ जोड़े रखती है। जीवन के आठ दशक पार कर चुके बुजुर्ग अभिनेता बीएल टंडन की ऊर्जा भी प्रस्तुति में देखने लायक थी। प्रस्तुति से पहले प्रेक्षागृह  में मौजूद फिल्म निर्देशक-अभिनेता शेखर कपूर ने अपने छोटे से वक्तव्य में उन दिनों को याद किया, जब वे थ्री आर्ट्स क्लब की प्रस्तुतियां देखने सप्रू हाउस जाया करते थे। 

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