Wednesday, October 31, 2012

दूर से तुगलक पास से तुगलक

फिरोजशाह कोटला में नाटक के मंच के कई खंड हैं। बाएं छोर पर आम जनता से जुड़ी स्थितियों के लिए छोटे-छोटे जीनों में बना प्लेटफॉर्म, फिर बादशाह का दरबार और कक्ष, फिर एक बस्ती, एक किला और उसकी बुर्जी; उसी से सटी एक ऊबड़खाबड़ जगह। यह इतना विस्तृत मंजर है कि किसी एक दृश्य के लिए दर्शक को बहुत ज्यादा गर्दन घुमानी पड़ती है, या बुर्जी पर एक वास्तविक पेड़ के करीब अपने सिपहसालार से बात कर रहा बादशाह किसी सुदूर छवि की तरह दिखाई देता है। यह प्रोसीनियम से एक अलग तरह का अनुभव है। यहां कोई छत नहीं है जहां से पात्र को फोकस में लेने वाला रोशनी का कोई स्पष्ट वृत्त बन सके। यहां रोशनियां थोड़ी दूर से आती हैं। दृश्य दर दृश्य किसी एक मंच को उजागर करतीं। आरके धींगरा ने कई मौकों पर अपनी प्रकाश योजना से अच्छे चाक्षुष असर पैदा किए हैं।  इब्राहीम अलकाजी के शब्दों में तुगलक एक ऐसा नाटक है जो 'विशद निरूपण' की मांग करता है, जिसमें उदाहरण के लिए उन्होंने बादशाह के अध्ययन कक्ष की किताबों से ठसाठस भरी ताख का भी जिक्र किया है। पर निर्देशक भानु भारती की प्रस्तुति के इस विस्तृत मंच पर विशद निरूपण का अर्थ बदल गया है। राजधानी के दिल्ली से दौलताबाद जाने के दृश्य के लिए सामने के पूरे विस्तार में पीछे की ओर बांसों के बने रास्ते पर देर तक सुनाई देते वाद्यस्वरों के बीच लोग जाते दिखते हैं। भानु भारती इस दूरस्थ मंच पर प्रवेश-प्रस्थान, अभिनेयता और वेशभूषा की गुणवत्ता से एक प्रभाव पैदा करते हैं। प्रस्तुति में माइक्रोफोन एक महत्त्वपूर्ण औजार है। लिहाजा दृश्य भले थोड़ा दूर हो पर वाचिक के न्यूनतम झोल नाटक के उस मूल तर्क को अक्षुण्ण रखते हैं जहां से नाटक तुगलक का तनाव बनता और एक ट्रैजेडी की ओर जाता दिखता है।
नाटक तुगलक अपने प्रोटागोनिस्ट के माध्यम से एक समाज का भी विहंगम दृश्य उपस्थित करता है। उसके छल-कपट, उसकी आत्मदीनता और मक्कारियों का। जहां लाशों का भी कारोबार कर लिया जाता है और जहां मौत के खेल हमेशा चला ही करते हैं। एक मुल्क जहां कुछ भी सही नहीं है, उसे एक बादशाह अपने स्वयंभू फैसलों से दुरुस्त करने में लगा है। वो अपने आसपास की साजिशों से बाखबर है, अपने फैसलों के तमाम पक्षों और नतीजों के बारे में जानता है, उसके पास मुल्क को लेकर एक नजरिया है- पर फिर भी कोई चीज है जो उसे नाकामी की तरफ धकेलती है। वह क्या है? गिरीश कर्नाड इसका भी हल्का सा पता देते हैं। नाटक में दुनियादारी छोड़कर मोक्ष की फिक्र करने वाली हिंदू दार्शनिकता के कारण हकीकी तरक्की के इल्म इस्लाम को कबूल करने वाला वजीरे आजम नजीब अंततः इस नतीजे पर पहुंचता है कि 'सुनहरा दौर इस दुनिया में कभी कायम नहीं हो सकता। यहां है सिर्फ चंद लम्हे जो हम जी रहे हैं। बस, इन पर से हमारी गिरफ्त ढीली न पड़े।' कर्नाड शायद इसी बौद्धिक निष्कर्ष को उसमें निहित विरोधाभास और विडंबना के साथ कई तरह के पात्रों के माध्यम से एक तनावपूर्ण नाटकीयता में बांधते हैं। इस नाटकीयता में लगातार घटनाएं और साजिशें होती रहती हैं। अविश्वास का वैसा ही माहौल है जैसा समकालीन हिंदुस्तान में देखा जा सकता है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने आत्मविश्वास से लबरेज एक बादशाह के निराशा के गर्त तक पहुंचने की तमाम रंगतों का मंच पर अच्छा चित्रण किया है। एक दूसरा पात्र जो मंच पर अलग से नजर आता है, वह है धूर्त अजीज का। हत्या, चोरी, लूटमारी जैसे काम करने वाले इस पात्र को टीकम जोशी ने अपनी नियमित ऊर्जा से मंच पर पेश किया है। इसके अलावा सौतेली मां की भूमिका में हिमानी शिवपुरी, नजीब की भूमिका में रवि खानविल्कर एवं अन्य अभिनेताओं का अभिनय भी काफी अच्छा है। प्रस्तुति में आलेख के माहौल को बनाने में अम्बा सान्याल की वेशभूषा की भी खास भूमिका दिखाई देती है।
प्रस्तुति में दृश्य संरचना का भारीभरकम तामझाम होने के बावजूद निर्देशक भानु भारती ने चीजों को बिखरने नहीं दिया है। वे मंच के यथार्थवाद को उसके पूरे अनुशासन के साथ व्यवहार में लाए हैं। ज्यादा बारीकियों में उलझने के बजाय ऐसी ग्रैंड प्रस्तुति के लिए विशद निरूपण की यही नीति शायद उचित भी थी। उसके कई दृश्य अपने संयोजन में काफी भव्यता लिए हैं।

Saturday, October 27, 2012

इतिहास के खंडहर में तुगलक


फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में पिछले साल किए 'अंधा युग' के मंचन के बाद निर्देशक भानु भारती एक बार फिर वहीं एक बड़ी प्रस्तुति 'तुगलक' लेकर आ रहे हैं। गिरीश कारनाड का यह नाटक सत्तर के दशक में इब्राहीम अलकाजी ने पुराना किला में खेला था। लेकिन फिरोजशाह कोटला का इतिहास तो खुद तुगलक वंश से जुड़ा है। इसे नाटक के नायक मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई और उत्तराधिकारी बने फिरोजशाह तुगलक ने चौदहवीं शताब्दी के मध्य में बनवाया था। लेकिन इस ऐतिहासिक संयोग याकि संगति के अलावा निर्देशक भानु भारती के मुताबिक 'यह नाटक आधुनिक युग के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। सत्तासीन लोगों के इर्द-गिर्द रहने वाले विवेकशून्य लोग शासकों को भी आम जनता के कल्याणकारी काम करने से रोकते हैं। वे दूरदृष्टि वाले शासक के नेक विचारों को भी अपने स्वार्थ के लिए तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं।' 
गिरीश कारनाड ने अपने नाटक में भारतीय इतिहास के सबसे विवादास्पद चरित्रों में से एक रहे तुगलक को एक नए तरह से देखा था। एक स्वप्नदर्शी शासक, जिसमें बड़े फैसले लेने का साहस था। लेकिन जो अपनी सुगठित राज्य की आकांक्षाओं का वस्तुस्थिति से तालमेल नहीं बैठा पाया। पुराना किला वाली प्रस्तुति के वक्त अपने निर्देशकीय में इब्राहीम अलकाजी ने मुहम्मद बिन तुगलक को एक ऐसे 'प्रतिभाशाली चरित्र' के तौर पर चित्रित करना चाहा था, 'जिसका आधुनिक मन इस विशाल देश को एक राष्ट्र का रूप देने में लगा था'. उस निर्देशकीय में उन्होंने लिखा था- 'तुगलक की सारी विडंबना यही है कि वह एक ऐसा द्रष्टा था जिसके दृष्टिकोण की व्यापकता उसके समकालीनों के लिए अबूझ पहेली थी।' बव कारंत द्वारा किए नाटक के हिंदी अनुवाद की भूमिका में अलकाजी में लिखा- 'कुछ ही वर्षों में तुगलक की गगनचुंबी योजनाएं और स्वप्न धूल में मिल गए। अपनी इच्छाओं की पूर्ति में बाधा बनने वाले सभी व्यक्तियों को उसने मौत के घाट उतार दिया, और अंत में उसने यही पाया कि अपने ही उलझन-भरे अस्तित्व की छायाओं में वह जिंदगी-भर लड़ता रहा। निपट अकेला, शवों के झुंडों से और अपने ही हाथों किए सर्वनाश से घिरा हुआ वह उन्माद के छोर तक पहुंच गया।' 
अलकाजी की प्रस्तुति में तुगलक की भूमिका मनोहर सिंह ने की थी, भानु भारती की प्रस्तुति में यह भूमिका राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक और हिंदी सिनेमा में पहचान बना चुके यशपाल शर्मा के सुपुर्द है, जिन्हें लगता है कि ऐसी बड़ी प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को रंगमंच की ओर आकर्षित किया जा सकता है। भानु भारती याद करते हैं कि सत्तर के शुरुआती दौर में हर युवा अभिनेता तुगलक का किरदार करने का इच्छुक हुआ करता था। उसे लगता था कि 'तुगलक की प्रामाणिकता एक अभिनेता के रूप में साबित करने के लिए यह भूमिका निभानी चाहिए.' उनके मुताबिक इस प्रस्तुति में उन्होंने तुगलक के जीवन के समांतर उसके जीवन दर्शन पर केंद्रित रहने का प्रयास किया है। एक ऐसा शासक और स्वप्नद्रष्टा जो किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना चाहता था।
तुगलक की छवि इतिहास में एक सनकी शासक की भी रही है, जो अपने फैसले लेने में वस्तुस्थिति की बहुत परवाह नहीं करता था, जिसने हिंदुओं पर से जजिया हटाने का फैसला लिया और अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद ले गया।  
यशपाल शर्मा के अलावा अन्य मुख्य भूमिकाओं में हिमानी शिवपुरी, सीताराम पांचाल, रवि खानविल्कर, रवि झंकाल भी प्रस्तुति में हैं। दिल्ली की साहित्य कला परिषद द्वारा आयोजित इस नाट्य प्रस्तुति के प्रदर्शन 28 अक्तूबर से 4 नवंबर तक किए जाएंगे।

Friday, October 19, 2012

फिर फिर मंटो


दिल्ली की उर्दू अकादमी ने सआदत हसन मंटो की जन्म शताब्दी के मौके पर अपना इस साल का नाट्य समारोह उन्हीं को समर्पित किया। पिछले साल अकादमी ने यह फेस्टिवल  फैज अहमद फैज की जन्म शताब्दी के मौके पर इसी तरह फैज को समर्पित किया था। नाटककार न फैज थे, न मंटो। हिंदी-उर्दू के रंगकर्मी ऐसी सूरत में कोलाजनुमा एक फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। थोड़ी-बहुत लेखक की जिंदगी और थोड़ा-बहुत उसका साहित्य लेकर प्रस्तुति तैयार की जाती हैं। हिंदी-उर्दू की बौद्धिकता की इस इतिवृत्तात्मकता से आगे कोई गति नहीं है। उसपर उर्दू वालों की विशेषता यह है कि वे अपने लेखकों पर जरूरत से कुछ ज्यादा ही मुग्ध रहते हैं। पिछले एक-डेढ़ दशक में मंटो को लेकर बनी इस तरह की 
इतनी प्रस्तुतियां देख ली हैं कि सारे दोहराव की तस्वीर पहले से ही आंखों के आगे खिंची रहती है। संयोग ऐसा रहा कि इस फेस्टिवल में देखी दो प्रस्तुतियों में यह दोहराव डबल होकर सामने आया। सलीमा रजा निर्देशित 'एक कुत्ते की कहानी' और रामजी बाली निर्देशित 'मंटो की कलम से' की मार्फत मंटो की कहानियां 'टिटवाल का कुत्ता' और 'काली सलवार' दो-दो बार देखने को मिलीं। 
'एक कुत्ते की कहानी' का आलेख नाटककार दानिश इकबाल ने तैयार किया था। दानिश की पिछले साल फैज वाली प्रस्तुति भी देखी थी। वे इस तरह के आलेख के लिए एक अच्छे संपादक हैं। उन्होंने दोनों कहानियों के उतने ही हिस्से को लिया है जहां उनकी विडंबना ज्यादा चुस्त होकर दिखती है। कहानी 'टिटवाल का कुत्ता' सरहद पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान के मोर्चों के दरम्यान कहीं से चले आए एक कुत्ते के जरिए एक खांचाबद्ध मानसिकता की विडंबना को दिखाती है. निरीह कुत्ते को दोनों तरफ के देशभक्त सैनिक अपने-अपने संदेहों में आखिर मार डालते हैं। सलीमा रजा के यहां मंच पर एक बंदा नकली कुत्ते को पकड़े है और उसकी आवाज निकाल रहा है। जबकि रामजी बाली ने एक कलाकार से कुत्ते की एक्टिंग कराई है। ऐसी बजाहिर तरकीब से अलग कोई अन्य कल्पनाशीलता ऐसे मामले में शायद संभव नहीं थी। उसपर रामजी बाली इस तरकीब में थोड़ा और 'खुला खेल' करते हैं। उनका 'कुत्ता' बीच-बीच में डायलाग भी बोलता है। बहरहाल पहले बात सलीमा रजा और दानिश इकबाल वाली प्रस्तुति की। दानिश कहानियों की फोकस की गई विडंबना को मंटो की अपनी एक व्याख्या के साथ पेश करते हैं। इसके लिए वे साहित्यिक किस्म की नाटकीयता का एक ढांचा बनाते हैं। इसमें मंटो एक मनोचिकित्सक के पास पहुंचे हुए हैं, क्योंकि उनपर चले मुकदमे के फैसले में उनसे पागलपन का इलाज कराने के लिए कहा गया है। मनोचिकित्सक के आगे वे अपने और समाज के पागलपन का विश्लेषण करते नजर आते हैं। वे कहते हैं- 'मैं राइटर हूं। मुझे जिंदगी को उसी शक्ल में पेश करना चाहिए जैसी कि वह है, न कि जैसी वह थी या जैसा उसे होना चाहिए।' लेकिन उनका यह यथार्थवाद ऐसा है कि 'कहानियां खुद बखुद लिखवा लेती हैं अपने आपको।'
लगभग खाली स्टेज के दाएं छोर पर मनोचिकित्सक के साथ बैठे मंटो बीच-बीच में 'मदर टिंचर' का सेवन करते कुर्ता-पाजामा पहने बैठे हैं। बाकी स्टेज पर कुछ-कुछ अंतराल पर कहानियां दिखाई देती हैं। लेकिन दृश्यात्मकता के लिहाज से 'टिटवाल का कुत्ता' को छोड़कर बाकी कहानियां पैबंदनुमा हैं, जिनका कोई भी असर उनके खत्म होते ही खत्म हो जाता है। दरअसल प्रस्तुति दृश्य से ज्यादा व्याख्याओं में उलझी है। इसी क्रम में तीसरी कहानी 'ठंडा गोश्त' के नायक ईशर सिंह को ऐसा किरदार बताया गया है 'जो हैवान होकर भी इंसानियत न खो सका.' ऐसी ही एक व्याख्या में मंटो कहते हैं- 'साहित्य और कल्चर में पोर्नोग्राफी तलाश करना है तो पहले उसकी मंशा तलाश करिए।'
लेकिन इस सारे कुछ के बावजूद प्रस्तुति कुछ ऐसी है कि उसमें एक गढ़ाव जैसा दिखाई देता है। मंटो के मुरीदों ने उनके किरदार की सुसंगतियां ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उनका एक नपा-तुला व्यक्तित्व निर्मित कर लिया है। यह मंटो अपने बारे में हर कुछ जानता है, वह बेलौस है, बुद्धिजीवी है, फक्कड़ है और जैसा कि इस प्रस्तुति का एक संवाद बताता है परेशान नहीं, उदास नहीं, बेजार है। मंटो हर नाट्य प्रस्तुति में अपने साहित्य की पूरी सैद्धांतिकी को निरूपित किया करते हैं। नाटक जो जाना-बूझा है उसी को दोहराता है। मंटो की भूमिका में तारिक हमीद कुछ स्मार्ट ड़ायलाग जरूर बोलते हैं, पर इसके अलावा किरदार में कोई रोचकता नहीं है। 
प्रस्तुति 'मंटो की कलम से' में हाल कुछ दूसरे ही हैं। यहां सीधे 'कहानी का रंगमंच' ही मंच पर मौजूद है। यह बोगस पद्धति कभी देवेंद्र राज अंकुर ने ईजाद की थी, जहां वाचिक देखते देखते एक बकबक में तब्दील हो जाता है। रामजी बाली न कहानी को संशोधित करते हैं न संपादित। न कोई दृश्य संरचना, न अभिनय जैसा अभिनय। न यथार्थ न माहौल। 'काली सलवार' का एक-एक विवरण बताया जा रहा है। चुनांचे सुल्ताना की आखिरी कंगनी भी घर से चली गई। चुनांचे खुदाबख्श के साथ उसे अंबाला से दिल्ली आना पड़ा। चुनांचे उसने बालकनी में जाना भी छोड़ दिया। हर दूसरे वाक्य में एक चुनांचे है, और कहानी बगैर कोई भावबोध बनाए इन्हीं वाक्यों में धीरे-धीरे और जल्दी-जल्दी निबट रही है। निबटते समय में एक्टिंग के नाम पर कुछ निबट रहा है। अब शंकर बालियां ले जाएगा, फिर सलवार लाएगा। दर्शक उड़ते चमगादड़ों के बीच ये कार्रवाइयां देख रहे हैं। चमगादड़ों का छोटा परिवार जो कभी श्रीराम सेंटर में रहता था, अब काफी बड़ा हो गया है। निर्द्वंद्व उड़ते चमगादड़ों की फड़फड़ाहटें दर्शक के लिए विघ्नकारी हो सकती थीं, पर इस विघ्न के लायक कुछ हो भी तो।  

Monday, October 15, 2012

असली लड़ाई अतर्कवाद से है


किसी भी विषय को लेकर सही तरह से सोच पाना हिंदुस्तानियों को कभी नहीं आया. विचार के किसी एक सिरे को पकड़ कर खींचते चले जाना हमने खूब सीखा. इस तरह हमारी सभ्यता में तरह-तरह के शास्त्र तैयार हुए- तर्कशास्त्र, वैशेषिक, सांख्य, न्यायसूत्र...और जाने क्या-क्या. लेकिन इन शास्त्रों से समाज सुखी क्यों नहीं हो रहा, इसके समेकित नतीजे तक पहुंचने की चेष्टा कभी नहीं की गई. इसकी वजह है कि समाज कभी फिक्र में रहा ही नहीं. यह हमारी  व्यक्तिकेंद्रित सभ्यता में ही संभव था कि कई करोड़ व्यक्तियों की एक जैसी समस्याओं को वह व्यक्ति दर व्यक्ति के शुद्धतावादी अनुरोध में उलझा देती. गांधी ने यह काम सबसे बड़े पैमाने पर किया. उन्होंने एक व्यापक जनांदोलन में निहित सामाजिक आकांक्षाओं को आत्मशुद्धि के अहिंसावाद में नष्ट कर दिया. करोड़ों लोगों की ख्वाहिशों से जुड़े ऐसे सवाल जिनके जवाब हमेशा कठिन और अक्सर कटु होते हैं, का उन्होंने एक कृत्रिम समाधान पेश किया- भावुक आत्मोत्सर्ग का. ठोस ढंग के स्वार्थों पर टिकी व्यवस्था को उन्होंने अनशन कर-कर के पिघलाने की बचकानी चेष्टा की. हकीकत में उनकी यह चेष्टा सैकड़ों साल की व्यक्तिनिष्ठ जीवन परंपरा को बदलने की कोशिशों के मूल तर्क पर एक प्रहार थी.
वर्णव्यवस्था को भारतीय समाज की दुर्गति का मूलभूत कारण मानने वालों को एक सुविधा है कि इस तरह उन्हें कोसने के लिए ब्राह्मण नाम का एक बना-बनाया विलेन मिल जाता है. पर सच्चाई यह है कि वर्णव्यवस्था को बनाया भले ही ब्राह्मणों ने हो, पर उसके टिके रहने की अकेली वजह वे नहीं हो सकते थे। किसी भी गतिशील समाज में सामाजिक टकरावों के साथ ऐसी व्यवस्था वक्त के साथ समाप्त हो जानी चाहिए थी. ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि दक्षिण एशिया की प्रवृत्ति हमेशा ही अतर्कवाद के साथ जीने की रही. अनादि और अनंत के दरम्यान किसी शून्य समय में जीते इस समाज को किसी गति की आवश्यकता नहीं थी. उसकी गति दाएं से बाएं और बाएं से दाएं घूमते रहने में थी, न कि आगे बढ़ने में. इस गतिहीनता में ज्ञान ज्ञान के लिए था और कला कला के लिए. कालांतर में व्यक्ति और समाज के द्वंद्व को न सुलझाने वाला यह अतर्कवाद संस्कृत साहित्य के श्रृंगारवाद या मध्यकालीन भक्ति साहित्य के परिणाम देता रहा. एक विभाजित और पराजित सभ्यता अपनी कुंठाओं को निजी श्रेष्ठताओं और कान पर जनेऊ चढ़ाने की पवित्रताओं में तुष्ट करती रही. उसका यह तुष्टीकरण उसे एक इकहरी जीवनदृष्टि और खामखयालियों में खुश रहने की मूर्खता की ओर धकेलता रहा. 
निश्चित ही इस अतर्कवाद का सूत्रपात कभी साधनों की प्रचुरता के वक्त में भारतीय धरती पर हुआ था, पर बढ़ती आबादी, साधनों की कमी और सही तरह से न सोच पाने ने उसे अब एक सार्वजनिक विवशता के मुकाम पर ला ख़ड़ा किया है. अन्याय को कहीं भी हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है, पर इसका निराकरण कैसे हो, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. मौजूदा विश्व में शायद सबसे निर्लज्ज स्वार्थ समूहों द्वारा हांकी जा रही हमारी व्यवस्था में चींटी और हाथी के जैसे विस्फोटक हो चुके पूंजीवादी वर्ग विभाजन को यह अतर्कवाद देखने नहीं दे रहा. लेकिन इस सभ्यता के बाशिंदे भले ही इसे न देख पा रहे हों, कई विदेशी विद्वानों का ध्यान इस ओर गया है. सन 1973 में जापानी विद्वान दाइसाकु इकेदा ने ब्रिटिश चिंतक आर्नल्ड टायनबी से इस बारे में एक सवाल किया था. उनका सवाल था कि ''क्या अतर्कवादी हिंदू परंपरा वाले भारतीय समाज में साम्यवाद अपने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से क्रांति ला पाएगा?" 
टायनबी का जवाब भी इसपर उतना ही पते का था. उनका कहना था कि "हिंदू समाज जैसे किसी पूर्णतः अतर्कवादी समाज में, अथवा ऐसे किसी समाज में, जो पश्चिम की बराबरी की स्पर्धा में नहीं पड़ना चाहता, साम्यवाद की दाल गलने की संभावना अत्यंत क्षीण है." 
समझा जा सकता है कि क्यों इन दिनों सिर से पैर तक भूमंडलीकृत हो चुके लोग 'पश्चिमी वैचारिक हमले' के खिलाफ भारतीयता का नारा बुलंद करने में लगे हैं, और क्यों रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार पिछले साठ सालों के हिंदुस्तानी इतिहास पर लिखे अपने दो मोटे पोथों के निष्कर्ष में 'हिंदुस्तान की हस्ती' पर गदगद हैं..... बहरहाल, अतर्कवाद के लिए एक दूसरा शब्द भाववाद भी है. भारतीय दार्शनिक परंपरा की इस प्रवृत्ति के बारे में और ज्यादा सोचे जाने की जरूरत है।

Tuesday, October 9, 2012

गफलत के माहौल में


सोहैला कपूर हाल तक अंग्रेजी थिएटर करती रही हैं। इधर कुछ अरसे से वे हिंदी में दाखिल हुई हैं। कॉमेडी उनका प्रिय क्षेत्र है। बीते सप्ताहांत रमेश मेहता की स्मृति में श्रीराम सेंटर में हुए समारोह में उन्होंने उनका नाटक 'उलझन' पेश किया। ड्राइंगरूम की सेंटिंग में एक युवा नायक और उसका दोस्तनुमा नौकर। कई तरह की उधारियों के जरिए सुख से जीने वाले नायक से उगाही के लिए दर्जी और दुकानदार आते हैं। दक्षिण भारतीय मकान मालकिन, जिसका किराया कई महीने से नहीं चुकाया गया है, भी रह-रह कर कुछ खरीखोटी सुनाकर जाती है। यानी कई तरह के किरदार रह-रह कर दृश्य में दिखाई देते रहते हैं। नायक को शाम तक घर खाली न करने पर सामान फेंक देने की धमकी मिल चुकी है। लेकिन इन तमाम परेशानियों से जूझ रहा वह सहसा गदगद हो उठता है जब एक खूबसूरत लड़की दृश्य में नमूदार होती है। प्रस्तुति  सार्वकालिक सिटकॉम का एक अच्छा उदाहरण है। ऐसी प्रस्तुतियों में टाइमिंग की चुस्ती काफी महत्त्वपूर्ण होती है, जो कि इस प्रस्तुति में ठीक से है। सोहैला कपूर अपने पात्रों को एक अच्छी कॉमिक रंगत देती हैं। कभी यह चीज किरदार की बदहवासी से बनती है, कभी मेकअप से, कभी अभिनय याकि खास भंगिमा या अदा से। उगाही करने आए पात्रों में एक ऊंचे डीलडौल वाला पठान है। वह हिंदी के पॉपुलर कल्चर के पठान की छवि की एक दिलचस्प पैरोडी मालूम देता है। लेकिन प्रस्तुति का सबसे नायाब किरदार दक्षिण भारतीय मकान मालकिन का है। इस भूमिका में वाणी व्यास बोलने के लहजे से लेकर स्थिति की कुछ बारीक रंगतों को भी बखूबी संभाले रहती हैं। ऐसा ही एक दूसरा दिलचस्प किरदार बाप का है। वह हरियाणवी है और बेटे की शादी पक्की करने आया है। उसके हाथ में बुजुर्गों वाली लाठी है, जिसे वह रह-रह कर हास्यजनक ढंग से बेटे और उसके दोस्तनुमा नौकर पर आजमाता रहता है। हिंदी थिएटर में ऐसे कॉमिक किरदार अक्सर बहुत जल्द आपे से बाहर लाउड नजर आने लगते हैं। लेकिन सोहैला कपूर के यहां ऐसा नहीं है। वे प्रचलित छवियों में से नई छवियां निकालती हैं। हरियाणवी बाप की बोली, लहजा और वेशभूषा बिल्कुल दुरुस्त है, पर उसकी देहभाषा उतनी खांटी नहीं है। वह काफी शराफत से अपनी बात रख रहा है। इस तरह सोहैला हरियाणवी किरदार के स्टीरियोटाइप को तोड़कर उसकी एक ज्यादा रंजक छवि पेश करती हैं। खास बात यह है कि चरित्रांकन में कहीं कोई झोल नहीं हैं। ऐसे में शर्म से निहाल हो रही दक्षिण भारतीय मकान मालकिन पर हरियाणवी बाप का लट्टू हो जाना अपने में ही एक दिलचस्प दृश्य बन जाता है। 
सोहैला कपूर के यहां हड़बड़ी की भी एक निश्चित व्यवस्था है। मंच पर गफलतों के माहौल में हास्य के असल ठिकानों को वे जानती हैं। जैसे कि दोस्तनुमा नौकर यूं तो मंच पर अपने काम पूरी संजीदगी से निबटाया करता है, पर अपनी हैसियत को लेकर उसे हमेशा शंका बनी रहती है। वह हर आगंतुक को बताना नहीं भूलता कि 'इस घर में नौकर कोई नहीं है शाब जी'। किराएदार नायक से अपनी बेटी को ब्याहने की फिराक में रहने वाली मकान मालकिन को घर में एक स्त्री के होने के सुराग मिलना एक कोहराम बरपा कर देता है। उसका किरदार दक्षिण भारतीय लहजे की प्रचलित पैरोडी न होकर काफी नई रंगतें लिए है। वह एक चुस्त-चौकन्नी औरत है। स्टेज पर उसकी हर एंट्री अपने साथ एक रोचकता लिए आती है।
कथ्य में कोई विशेष नवीनता न होने के बावजूद कई तरह के किरदार और कथानक की गति निर्देशक को पूरा मौका देते हैं। अभिनय के लिहाज से निधिकांत और अरुण प्रकाश भी प्रस्तुति में प्रभावित करते हैं।  

Tuesday, October 2, 2012

थ्री आर्ट्स क्लब के वो दिन


लेखक, निर्देशक और अभिनेता रमेश मेहता 1950 और साठ के दशक में दिल्ली में रंगमंच की दुनिया का एक बड़ा नाम थे। वे 1948 में शिमला से दिल्ली स्थानांतरित हुए थिएटर ग्रुप थ्री आर्ट्स क्लब से जुड़े थे। थ्री आर्ट्स क्लब को तीन लोगों- ओम शर्मा, देवीचंद कायस्थ और आरएम कौल- ने 1943 में बनाया था, लेकिन दिल्ली आने के बाद आरएम कौल, रमेश मेहता और तीन दशक तक बाराखंबा रोड स्थित मॉडर्न स्कूल के प्रिंसिपल रहे एमएन कपूर इसके स्तंभ बने। तब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना नहीं हुई थी और 'थ्री आर्ट्स क्लब' रमेश मेहता के निर्देशन में सप्रू हाउस में निरंतर नए-नए नाटकों का प्रदर्शन करता था। उनके नाटक एक शहरी व्याकरण में सामाजिक प्रवृत्तियों पर व्यंग्य करने वाले और लोकरुचि के अनुरूप होते थे। इस तरह उन्होंने दिल्ली में थिएटर को एक चेहरा दिया, लेकिन बाद के अरसे में उन्हें भुला दिया गया। सन 2008 में, अपने पिता आरएम कौल की मृत्यु के 25 वर्षों बाद, उनकी पुत्री अनुराधा दर ने थ्री आर्ट्स क्लब को पुनर्जीवित करते हुए दिल्ली में एक समारोह का आयोजन किया, जिसमें रमेश मेहता भी शामिल थे (उसी साल उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार भी दिया गया)। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अनुराधा दर ने इसी सप्ताहांत में श्रीराम सेंटर में रमेश मेहता के लिखे तीन नाटकों की सोहैला कपूर निर्देशित प्रस्तुतियों का एक समारोह एक बार फिर से आयोजित किया। रमेश मेहता इस बार नहीं थे. इसी साल 11 मई को 89 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
शुक्रवार को हुई प्रस्तुति 'पैसा बोलता है' शंभू मित्रा के नाटक 'कंचनरंगा' का रमेश मेहता द्वारा किया रूपांतरण है। नौकर पंचू अपने गांव के रिश्ते के मौसा-मौसी और उनकी संतानों के जुल्मों को कुछ अपने निरीह स्वभाव और कुछ भविष्य सुधर जाने के प्रलोभन में झेल रहा है। सिचुएशनल कॉमेडी की हड़बड़ी और अतिरंजना में स्थितियां आगे बढ़ती हैं। घर का छोटा लड़का जरा सी बात पर पंचू को इस बुरी तरह पीटने पर उतारू है मानो अपनी खलनायकी को जगजाहिर कर देना चाहता है। कई तरह के किरदार प्रस्तुति में हैं- पड़ोसी बल्ली सिंह और उसकी बीवी, नौकरानी तारा, मौसी-मौसा, उनके बेटा और बेटी। इतने सारे किरदार और कई तरह की गफलतें। लड़की का प्रेमपत्र प्रेमी को पहुंचाने के बजाय पंचू उसे कहीं रखकर भूल गया है। इसी बीच लड़की का रिश्ता लेकर एक बुजुर्ग आए हैं। पत्र उनके हाथ में पड़ जाता है। उधर पंचू को बल्ली सिंह ने लाटरी का टिकट खरीदकर दिया हुआ है। पता चलता है कि उसकी एक करोड़ की लाटरी निकल आई है। इस तरह सबसे उपेक्षित प्राणी अचानक सबसे महत्त्वपूर्ण बन जाता है। जिस लड़की को पहले पंचू से घिन आती थी वही अब उसे प्यार से भैया कह रही है। सोहैला कपूर कई एमेच्योर अभिनेताओं के साथ भी कथ्य की स्फूर्तता बनाए रखती हैं। सींकिया बल्ली सिंह की बड़ी-ब़डी मूंछें हैं। भले ही वो कितना दबंग हो, पर गोगल्स लगाए बीवी के सामने उसकी एक नहीं चलती। घाघरा पहने नौकरानी, कर्कशा घर की मालकिन आदि कई तरह के किरदार मंच पर रह-रह कर दिखाई देते हैं। यह सत्तर के दशक का मेलोड्रामा है, जिसमें रुपये को कुछ न समझने वाले गरीब और दूसरों का खयाल रखने वाले पात्र हैं। अपने ईमान को रोजगार से ऊपर रखने वाले पात्र। प्रस्तुति में चुटीलेपन की एक चमक दिखाई देती है। मां को कॉलबेल बजना पसंद नहीं, क्योंकि इसमें बिजली खर्च होती है। इसी तरह लाटरी की रकम से भोजपुरी फिल्म बनाने का ख्वाब देखने वाले बड़े लड़के ने जिस फिल्म डायरेक्टर को बुलाया है, वह हरियाणवी में बात कर रहा है, और एक दिलचस्प किरदार है। अभिनय में कच्चापन तो कई बार तो दिखता है, पर उसमें एक ऐसी स्फूर्तता भी है जो दर्शक को अपने साथ जोड़े रखती है। जीवन के आठ दशक पार कर चुके बुजुर्ग अभिनेता बीएल टंडन की ऊर्जा भी प्रस्तुति में देखने लायक थी। प्रस्तुति से पहले प्रेक्षागृह  में मौजूद फिल्म निर्देशक-अभिनेता शेखर कपूर ने अपने छोटे से वक्तव्य में उन दिनों को याद किया, जब वे थ्री आर्ट्स क्लब की प्रस्तुतियां देखने सप्रू हाउस जाया करते थे।