Wednesday, August 29, 2012

बैकस्टेज के ढांचे में


बीते सप्ताह हैबिटाट सेंटर के स्टीन ऑडिटोरियम में सहर थिएटर ग्रुप ने
प्रस्तुति 'जी हमें तो नाटक करना है' का मंचन किया। प्रस्तुति
हल्के-फुल्के बतकही के ढंग से थिएटर की व्यावहारिक मुश्किलों का एक कोलाज
बनाती है। एक खाली मंच पर पांच-छह अभिनेता रिहर्सल के लिए जमा हुए हैं।
निर्देशक उन्हें तरह-तरह की एक्सरसाइज करा रहा है, पर उन्हें शिकायत है
कि असली चीज यानी नाटक और किरदार वगैरह की कोई चर्चा ही नहीं हो रही। एक
पात्र उनमें से कुछ ज्यादा ही बेसब्र है। वह दिल्ली देहात के लहजे में
'सरजी, तुम उट्ठक बैठक तो घणी करवाओ हो, पर कुछ सिखा तो रहे ना हो' बोलने
वाला एक ठेठ दुनियादार किस्म का बंदा है। उसकी मंशा शाहरुख खान बनने की
है। एक स्थिति में वह मंच पर अकेला है, और अकेले में ही इस हसरत को अंजाम
देने में जुटा है। शाहरुख की तरह छाती उघाड़े है और उसी की तरह हकला-हकला
कर कोई संवाद बोल रहा है। वह दर्शकों से मुखातिब होते हुए भी उनसे
निस्संग है, क्योंकि हकीकत में वह अपने एकांत में है। उसकी जज्बाती
आत्ममुग्धता का यह 'एकांतिक' दृश्य खासा हास्यप्रद है। युवा निर्देशक
मृत्युंजय प्रभाकर ऐसे ही कई रोचक टुकड़ों को शामिल करते हुए प्रस्तुति
को एक थीम में लामबंद करते हैं।
रिहर्सल के लिए जमा हुए पात्र खुद में भी अलग-अलग किस्म के किरदार हैं।
दो पात्रों को ज्यादा अंतरंग होता देख तीसरी उनपर खींचकर चप्पल मारती है।
एक चौथा पात्र आलसी किस्म का है। उनके चलते रहने वाले झगड़े-टंटों में
कभी कोई रूठ जाता है, कभी कोई नाटक छोड़ने की धमकी देकर चला जाता है। उधर
निर्देशक की समस्या है कि वह एक ऐसा नाटक कैसे तैयार करे जो अपने सामाजिक
दायित्व का निर्वहन करता हो। साधनों से ज्यादा यह विषय की समस्या है।
विषय क्या हो, क्यों न यह दर्शकों से ही पूछ लिया जाए। एक पात्र दर्शकों
से विषय पूछती है। उनके बीच से कई आवाजें आती हैं- स्त्री, पर्यावरण,
युवाशक्ति आदि। लेकिन हीरो बनने की मंशा वाले पात्र का कहना है कि ये
दर्शक किसी काम के ना हैं, और नाटक देख के ये अपने अपने घरों में जाकर सो
जाएंगे, और अगले दिन सब कुछ भूल जाएंगे। एक पात्र उसका प्रतिवाद करती है
और किसी भी कला के प्रभाव को इतना सरलीकृत करने के खिलाफ तर्क देती है।
हीरो बनने की मंशा वाला पात्र कहता है कि क्यों न इस सारे पचड़े में पड़े
बगैर एक लिखा-लिखाया नाटक उठा लिया जाए। और आखिरकार नाटक 'आषाढ़ का एक
दिन' पर सहमति बन जाती है। इस तरह मृत्युंजय बहस की एकरसता को तोड़कर
दृश्य की जगह बनाते हैं। इस दृश्य में स्टेज की संजीदगी के दरम्यान
बैकस्टेज की उठापटक को एक दिलचस्प और कल्पनाशील युक्ति के तौर पर
इस्तेमाल किया गया है। 'दृश्य में' मल्लिका और अंबिका के संवाद चल रहे
हैं और पीछे की ओर बैठे बाकी पात्रों में कोई किसी को घूंसा दिखा रहा है,
तो कभी वे 'चिड़िया उड़ तोता उड़' खेलने में मशगूल हैं। लेकिन आगंतुक के
आने पर हाथों की थपथप से उसकी पदचाप की ध्वनि बनाने में या ऐसी ही अन्य
कार्रवाइयों में वे चूक नहीं रहे हैं। पूरा दृश्य इतने सलीके से मंच पर
मौजूद है कि रह-रह कर छूट रही दर्शकों की हंसी भी उसका हिस्सा बन जाती
है। घड़े की जगह मल्लिका हेलमेट पकड़े हुए है। एक अन्य मौके पर यह हेलमेट
हरिण शावक के रूप में है। रिकॉर्डेड चिड़ियों की चहचहाहट है। लेकिन नाटक
के बाद फिर बहस होती है और यह नतीजा निकलता है कि प्रेम की पराकाष्ठा का
यह नाटक आज के वक्त के लिए अप्रासंगिक है। बहस चल रही है, कई तरह के
प्रयोग हो रहे हैं। नाटक समस्या पर क्यों हो, मनोरंजन के लिए क्यों न हो?
क्योंकि शासकवर्ग मनोरंजन का इस्तेमाल अफीम की तरह करता है, वगैरह-वगैरह।
प्रस्तुति एक ढीलेढाले ढांचे में पर्याप्त चुस्त और स्फूर्त है। शायद यह
निर्देशक द्वारा अच्छी तरह आत्मसात किए आइडिये का परिणाम है। किसी नतीजे
या जवाब की तुलना में उसमें बहुत से सवाल हैं। बहुत सी बिखरी बातों को एक
रोचक सिलसिले में आकार दिया गया है। दर्शकों की शिरकत और अभिनेताओं की
एनर्जी प्रस्तुति को लगातार दिलचस्प बनाए रखती है।


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