Wednesday, June 29, 2011

प्रेम की एक आधुनिक दंतकथा

एमएस सथ्यू अपनी नई नाट्य प्रस्तुति 'अमृता' के साथ एक बार फिर हाजिर हैं। अमृता की कहानी आधुनिक समय के एक प्रसिद्ध प्रेम त्रिकोण की कथा है। इस त्रिकोण की विशेषता यह है कि उसमें कोई बाहरी द्वंद्व नहीं है। उसके तीनों पात्रों- अमृता प्रीतम, इमरोज और साहिर लुधियानवी- में अपने वजूद की पहचान का एक आंतरिक द्वंद्व है, और यही द्वंद्व प्रस्तुति की थीम है। प्रस्तुति की नायिका अमृता हैं, पर उसके नायक उम्र में उनसे 10-12 साल छोटे इमरोज हैं, न कि साहिर। यह दरअसल अमृता और इमरोज की प्रेमकथा है जिसमें साहिर एक अहम संदर्भ की तरह मौजूद हैं। नाटक की एक अन्य विशेषता है कि उसके आलेखकार दानिश इकबाल खुद को उसका लेखक मानने को तैयार नहीं हैं। उनके मुताबिक मंच पर बोला जा रहा एक-एक शब्द अमृता प्रीतम का लिखा है, और उनकी भूमिका सिर्फ विषय के तरतीबकार या संयोजक की है।
एमएस सथ्यू की मशहूर फिल्म गरम हवा 1973 में रिलीज हुई थी। उसके मुख्य किरदार सलीम मिर्जा का असमंजस है कि वो पाकिस्तान जाए या नहीं। नया मुल्क बनने के बाद उसकी आर्थिक परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। सथ्यू का कहना था कि इस फिल्म के पीछे उनका मकसद उस खेल को सामने लाने का था जो राजनीतिज्ञों ने बंटवारे के नाम पर खेला। गरम हवा की पटकथा कैफी आजमी और शमा जैदी ने लिखी थी और उसकी मूल कहानी इस्मत चुगताई की थी। लेकिन अमृता कोई कहानी नहीं है, वो एक वास्तविक जीवन का ब्योरा है। उसकी नायिका प्रेम और संबंध तो चाहती है पर बंधन नहीं। उसे लगता है कि विवाह का बंधाव उसके प्रेम के गाढ़ेपन को कम करता है। वैयक्तिकता के बहुतेरे संदर्भ हैं जो इस संबंध-कथा में सामने आते हैं। अमृता कहती हैं- 'इमरोज, अगर मुझे साहिर मिल जाता तो तू न मिलता।' जवाब में इमरोज कहते हैं- 'मैं जानता हूं साहिर को तुम कितना चाहती थीं, पर उससे ज्यादा मैं यह जानता हूं कि मैं तुम्हें कितना चाहता हूं।'
आलेखकार दानिश इकबाल के मुताबिक- 'ड्रामा एक ऐसा कलात्मक वसीला है, जिसमें विषयवस्तु को परत-दर-परत इजहार के सांचे में लाना जरूरी होता है, जिस से संबंधित मूल्यों की समझ-बूझ की गुंजाइश बढ़ जाती है। इस नाटक का ताना-बाना अमृता की मूल रचनाओं से बुना गया है और सिर्फ डिजाइन के स्तर पर नाटकीय तत्वों का थोड़ा-बहुत इस्तेमाल किया गया है। अमृता की नज्मों, कहानियों, नाविलों, निबंधों और इंटरव्यूज में जा-बजा हमें ऐसे सुराग मिलते हैं जिनसे उनके जेह्नो-दिल का कोई गुमनाम दरीचा अचानक खुल जाता है।' दानिश के अनुसार यह नाटक पात्रों के अंतरजगत की कथा है, समाज इसमें नहीं है। वे बताते हैं- 'अमृता प्रीतम की तहरीरें हमें मुसलसल जेहनी सफर की एक ऐसी कायनात में ले जाती हैं, जहां खयाल और जज्बे की सच्चाई, मोहब्बत की भीनी खुशबू और पंजाब के सदियों पुराने सूफियाना विरसे की बाजगश्त हमारी रहनुमा होती है, जहां हम और आप, राह से भटके मुसाफिरों की तरह गुमशुदा मंजिल के आसार देखते बेताब आगे बढ़ते जाते हैं। अमृता ने अपनी जिंदगी की हर कसक, हर तड़प, हर खुशी को नज्मों के फूल बना कर जुदाइयों, मोहब्बतों, उदासियों और मसर्रतों की लाफानी कहानियां रकम की हैं, जिनमें अहदे-माजी का पंजाब अपनी तमामतर रानाइयों के साथ रहता-बसता है।'
दक्षिण दिल्ली के एक बडे बेसमेंट में नाटक की रिहर्सल चल रही है। एक छोर पर सथ्यू चुपचाप देख रहे हैं। कई बार उन्हें लगता है कि कुछ है जो लय को तोड़ रहा है तो वे टोकते हैं। नाटक में एक चरित्र समय का भी है। आलेखकार दानिश इकबाल के मुताबिक यह भी उनका अपना डाला हुआ चरित्र नहीं है, बल्कि अमृता ने एक बार एक सपना देखा था, जिसमें एक बू़ढ़े आदमी ने उनसे आत्मकथा लिखने के लिए कहा। सथ्यू कहते हैं- 'मुझे बूढ़ा, लाठी लेकर चलता हिलता-डुलता ऐसा वक्त नहीं चाहिए...। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद सब कुछ खत्म हो गया था, तब द्वापर आकर कलयुग को आगे का सिलसिला सौंपता है। ..यह अगला युग...टाइमलेसनेस...समयहीनता का अहसास...ऐसा कुछ चाहिए।'
देश का बंटवारा गरम हवा में भी था, अमृता प्रीतम के जीवन में भी था, और उन साहिर को भी उसे भोगना पड़ा, जिन्होंने बाद में कभी लिखा था- 'वो वक्त गया वो दौर गया जब दो कौमों का नारा था/ वो लोग गए इस धरती से जिनका मकसद बंटवारा था।' लाहौर से दिल्ली के बीच इसी बंटवारे को भोगते कभी अमृता प्रीतम ने अपनी प्रसिद्ध रचना 'आक्खां वारिस शाह नू' में हीर रांझा के लेखक वारिस शाह को याद किया था- 'उट्ठ दर्दमंदां दिया दर्दिया, उट्ठ तक अपना पंजाब, अज बेले लाशां बिछियां ते लहू दी भरी चिनाब'। 16 साल की उम्र में व्यवसायी प्रीतम सिंह से उनकी शादी हुई जो 41 साल की उम्र तक चली, फिर साहिर से घनिष्ठता हुई, जिसका जिक्र उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में किया है। लेकिन उनका सबसे लंबा साथ चित्रकार इमरोज के साथ रहा। अमृता अपने जज्बे में आजादी की तलाश करती एक बेचैन रूह थीं। अपनी बेबाकी में कभी उन्होंने मदर टेरेसा जैसी शख्सियत की आलोचना की थी, कि दीन-दुखियों की सेवा के लिए उनके यहां ईसाइयत अपनाना क्यों जरूरी है। दानिश कहते हैं- 'नए दौर की ये हीर हिजरत के बे-आब रेगिस्तान में तमाम उम्र रूहानियत के नखलिस्तान ढूंढ़ती रही, जो अक्सरो-बेशतर सराब साबित हुए। लेकिन राहे-हक की तलाश ने उनकी जात को एक कायनात की वुसअत अता की जिसने इंसान की तामीर-कर्दा हदों-सरहदों को हमेशा फरामोश रखा।' अपने बाद के दिनों में रूहानियत का नखलिस्तान उन्हें ओशो के दर्शन में मिला। ओशो की कई किताबों के आमुख उन्होंने लिखे।
प्रस्तुति के निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू इसे नाटक न कहकर श्रद्धांजलि कहते हैं। एक बेचैन रूह 81 साल के होने जा रहे सथ्यू में भी रही है। 1952 में विज्ञान विषय की अपनी नियमित पढ़ाई छोड़कर वे खुद को आजमाने सिनेमा की दुनिया में चले आए, जहां उन्हें पहला बड़ा काम सन 1964 में फिल्म 'हकीकत' में मिला। चेतन आनंद निर्देशित इस फिल्म में वे सहायक निर्देशक थे। फिर उसके करीब एक दशक बाद आई फिल्म 'गरम हवा' ने उन्हें देश के शीर्ष फिल्म निर्देशकों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया। यथार्थवादी अभिनय सथ्यू की पसंद है। उनका मानना है कि किसी फिल्म या नाटक में चरित्र महत्त्वपूर्ण होते हैं और टेक्नालॉजी को फिल्म पर हावी नहीं होने देना चाहिए। एक इंटरव्यू में उनका कहना था- 'मैं असल चरित्र चाहता हूं, जो सहज दिखते हों। यही वो बारीक रेखा है जहां से वास्तविक और अवास्तविक का फर्क दिखने लगता है।' कुछ साल पहले उनकी नाट्य प्रस्तुति 'दाराशिकोह' काफी चर्चित रही थी।....
लेकिन इस पूरी प्रस्तुति को आकार देने वाले सबसे अहम शख्स हैं इसके प्रोड्यूसर के के कोहली। के के कोहली न सिर्फ 'अमृता' के प्रोड्यूसर हैं, बल्कि यह मूलतः उन्हीं का आइडिया भी है। उन्हीं के आग्रह पर दानिश इकबाल ने आलेख तैयार किया। उन्होंने ही निर्देशक सथ्यू से संपर्क किया, और इस तरह प्रस्तुति शक्ल लेने लगी। कोहली दाराशिकोह के प्रोड्यूसर भी थे। उनकी संस्था इंप्रेसेरियो एशिया पिछले बीस साल से थिएटर की दुनिया में सक्रिय है। लेकिन उनके इस मामले में कुछ सिद्धांत हैं। उनका मानना है कि मोलियर, इब्सन करना बहुत आसान होता, पर ज्यादा अच्छा तब लगता है जब अपने मन का कुछ सार्थक हो। कोहली के मुताबिक उन्होंने दाराशिकोह के किरदार पर नाटक करना इसलिए चुना कि वह कंपोजिट कल्चर का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। उनके मुताबिक- अमृता-इमरोज की प्रेमकथा में एक सूफियाना रंगत है। उन दोनों ने मानो स्वयं को एक-दूसरे में समाहित कर लिया था। जिसे आध्यात्मक तौर पर आत्मा में परमात्मा का मिलन कहा जाता है वैसा कुछ था। कोहली बताते हैं- अमृता के न रहने पर भी इमरोज कभी उनके प्रेम से बरी नहीं हुए। वे एक बार कहा इमरोज का यह कथन याद करते हैं- तुमने औरत के साथ सो कर तो देख लिया, कभी उसे जाग कर भी देखो।
कोहली कहते हैं, साहिर कवि चाहे कितने बड़े थे, पर इंसान के तौर पर बहुत कमजोर थे। वे अमृता की प्यार की ऊंचाई के सही पार्टनर नहीं थे। वे अमृता के प्यार को न समझ पाए न कबूल कर पाए।
प्रस्तुति में अमृता बनीं लवलीन थंडानी अमृता प्रीतम से उनके जीवन में असंख्य बार मिली हैं। बहुत कम उम्र से वे उन्हें देखती रही हैं। उनके व्यक्तित्व की छवियां, उसकी गरिमा वे आज भी महसूस कर सकती हैं। जैसा कि नाटक का एक संवाद कहता है, अमृता पांच दरियाओं की बेटी थीं। मंच पर ऐसा शख्सियत को पेश करना वाकई एक बड़ी चुनौती है।

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