Monday, March 21, 2011

कस्तूरबा गांधी का जीवन

मुंबई के आविष्कार और कलाश्रय ग्रुप की प्रस्तुति 'जगदंबा' यूं तो कस्तूरबा गांधी के जीवन पर केंद्रित है, लेकिन अंततः उसके केंद्र में महात्मा गांधी ही दिखाई देते हैं। प्रस्तुति में तीन पात्र हैं लेकिन उसकी शक्ल एकालाप की है। मुख्य एकालाप में कस्तूरबा महात्मा गांधी के साथ अपने जीवन को बयान करती हैं और उनके बयान की संवेदना को ज्यादा प्रामाणिक बनाते दो सहयोगी एकालाप उनके पुत्रों- मणि और हरि- के हैं। यह एक पारंपरिक भारतीय स्त्री के संस्कार और उसकी उम्मीदों के बरक्स उसके आत्मोत्सर्ग की कथा है। प्रस्तुति इस उत्सर्ग का महिमामंडन करने के बजाय इसे यथार्थ की जमीन पर देखती है और ऐसे में कस्तूरबा के मन पर लगने वाली चोटें, खुद के साथ उनका समझौता और हालात के आगे झुकना बार-बार दिखाई देता है। प्रस्तुति की कस्तूरबा पति की शुद्धतावादी जिदों के आगे लाचार दिखाई देती हैं। सिद्धांत के धरातल पर सोचते पति के आगे उनकी व्यावहारिक बुद्धि की एक नहीं चलती। वे युवा हो रहे पुत्र और पड़ोस की लड़की में दूरी रखने की हिमायती हैं, लेकिन गांधी दूरी के बजाय संयम के कायल हैं। पुत्र मणि के संयम न रख पाने की सजा वे उपवास रखकर खुद को देते हैं। और पुत्र और पति दोनों को हुए कष्ट को कस्तूरबा झेलती हैं। अछूतों के लिए निषिद्ध जगन्नाथ पुरी के दर्शन पर उन्हें पति से लताड़ मिलती है। गांधी के लिए आश्रम के बच्चे ही अपने बच्चे हैं, लेकिन कस्तूरबा लाख चाहकर भी अपने बेटों के भविष्य की 'अतिरिक्त' चिंता से खुद को रोक नहीं पातीं। पति के कहने पर वे घर आए लोगों का पाखाना साफ करने को तैयार होती हैं लेकिन ईसाई हो चुके दलित की गंदगी साफ करना उनके संस्कार गवारा नहीं करते, पर पति के रौद्र रूप को देखकर उन्हें यह करना पड़ता है। पति के आंदोलन के लिए सारे गहने दे देने वाली बा उपहार में मिले एक महंगे हार को बहुओं के लिए सुरक्षित रखना चाहती हैं, लेकिन गांधी उसे बेचकर रकम को ट्रस्ट के काम में लगाना चाहते हैं। इतना ही नहीं, पति की ब्रह्मचर्य व्रत के दौरान होने वाली 'गलतियों' को सार्वजनिक करने की बात को भी कस्तूरबा समझ नहीं पातीं। किंचित उदासी में वे कहती हैं- 'मैंने न कभी हां कहा न ना। पर इन बातों को सार्वजनिक क्यों कहना!'
प्रस्तुति के दो अन्य बयान इस पहले बयान की तर्कभावना को कुछ और गाढ़ा करते हैं। कस्तूरबा को मलाल है कि हरिलाल अपने शुरुआती दिनों में गांधी के रास्ते पर चलकर कितनी बार जेल गया, पर जेल जाने से हर कोई गांधी नहीं बन जाता। वे कहती हैं- 'इन्हें' विलायत जाकर पढ़ने-लिखने-जानने का मौका मिला, तो ऐसा मौका हरिलाल को क्यों न मिले! प्रस्तुति में शराब की लत के शिकार, पत्नी-बच्चों के प्रति लापरवाह और धर्म परिवर्तन कर मुसलमान और फिर हिंदू बन जाने वाले हरिलाल के मन में मां को दिए दुख को लेकर गहरी कचोट है। लेकिन वहीं पिता के प्रति उनके शिकायती लहजे में एक असमंजस दिखाई देता है। इससे पहले ऐसी कुछ शिकायतें मणि के एकालाप में भी झलकती हैं। प्रस्तुति के अंत में कस्तूरबा उस मोहन को याद करती हैं जो अंधेरे से डरता था, और तब उनके डर को भगाने के लिए वे 'राम राम' का जाप करती थीं। अगले जन्म में वे पति के रूप में विराट छवि और सैद्धांतिक आग्रहों वाले महात्मा गांधी की तुलना में उसी मोहन को चाहती हैं।
मंच के बीचोबीच छोटा सा प्लेटफॉर्म है जिसपर चरखा, दीवार, कुर्सी आदि हैं। एक ही मंच सज्जा में करीब सवा दो घंटे लंबी प्रस्तुति में बगैर किन्हीं नाटकीय भाव भंगिमाओं और युक्तियों के यह कथ्य ही है जो दर्शक को बांधे रखता है। फिर भी पूरे प्रस्तुति डिजाइन में एक ऐसी सादगी है जो कथ्य के अनुरूप है। कस्तूरबा की भूमिका में रोहिणी हट्टंगड़ी मंच पर थीं। उनका अभिनय कस्तूरबा की छवि बनाता है जो प्रत्यक्षतः शांत है, पर जिसके अपने दुख और अनुराग हैं। अन्य दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत किरदारों में असीम हड्डंगड़ी भी गहरा प्रभाव छोड़ते हैं।

Thursday, March 17, 2011

डार से बिछुड़ी

आख्यानमूलक साहित्यिक कृतियों पर नाट्य प्रस्तुति करने का प्रचलित तरीका यही है कि उन्हें संक्षिप्त करके उनके साहित्यिक कलेवर में ही प्रस्तुत किया जाए। लेकिन ऐसी प्रस्तुतियां रंगमंचीय तत्त्वों से रिक्त होने से अक्सर मंच के लिए सपाट भी साबित होती रही हैं। लेकिन उपन्यास 'डार से बिछुड़ी' के मंचन में ऐसा नहीं था। निर्देशकद्वय अंजना राजन और केएस राजेंद्रन ने कृष्णा सोबती के उपन्यास का मंच पर एक सांगीतिक रूपांतरण किया है, जिसमें उपन्यास के पात्र मुकम्मल चरित्रों के तौर पर नहीं बल्कि संकेतों के रूप में दिखते हैं। उन्होंने उपन्यास का संक्षेपण नहीं किया है, लेकिन कथावस्तु के विस्तार के लिहाज से स्थितियों को एक सांकेतिक दृश्य के तौर पर बरतने की विधि अपनाई है। हर स्थिति यहां समूचे विन्यास का एक विवरण मात्र है। उसकी कोई दृश्यात्मक स्वायत्तता नहीं है। वह मंच पर घटित नहीं होती, बल्कि प्रस्तुत की जाती है। इस प्रस्तुतीकरण में जो अभिनेता एक स्थिति में नायिका का हमदर्द शेख बना है, वही बाद में उसका सबकुछ छीन लेने वाला क्रूर बरकत। इस तरह निर्देशकगण एक साहित्यिक पाठ को दर्शक के लिए एक रंगमंचीय अनुभव में तब्दील करते हैं। प्रस्तुति का शैलीगत अभिनय यथार्थ की गहराई को मानो एक काव्यात्मक विस्तार में दिखाने की छूट लेता है। एक पात्र का जीवन यहां एक परिघटना की तरह प्रस्तुत होता है। बहुत सारे सांकेतिक दृश्यों के बीच एक मनुष्य का थोड़ा-बहुत बनता और बहुत कुछ टूटता दिखाई देता है।
उपन्यास 19वीं शताब्दी के स्त्री-जीवन की पुरुष-निर्भरता का एक पाठ है। उपन्यास की केंद्रीय पात्र पाशो के जीवन में निरंतर कुछ न कुछ त्रासद घटता रहता है। अपनी हर खुशी के लिए पाशो किसी पुरुष की मोहताज है। यहां तक कि पति की मौत के बाद उसका देवर उसकी हीं संपत्ति और घर-द्वार पर कब्जा करके उसे अपने किसी उधार को चुकाने के लिए बेच देता है। मुख्य भूमिका में खुद अंजना राजन और दक्षिणा शर्मा मंच पर थीं। वे दोनों स्थितियों को नैरेट भी करती हैं और कभी-कभी किसी अन्य किरदार को भी अंजाम देती हैं। मंच पर जितनी तेजी से स्थितियां बदलती हैं उतनी ही गति से दृश्य आकार ले लेते हैं। दृश्यों में से दृश्य निकलने का यह सिलसिला सतत चलता रहता है। इस क्रम में प्रकाश योजना, वाद्य-संगीत, आलाप, कोरस, शास्त्रीय नृत्य या नृत्य-भंगिमाओं आदि का भरपूर और कल्पनाशील ढंग से इस्तेमाल किया गया है। एक तरह की रंगमंचीय आलंकारिकता में उपन्यास मंच पर आकार पाता है, जिसमें दृश्य अपनी रंग-सज्जा में एक चाक्षुष प्रभाव बनाते हैं। हर दृश्य में बहुत से रंग हैं। लेकिन स्थितियां इसमें बहुत जल्दी से बीत जाती हैं और उनका वातावरण बहुत ठोस ढंग से मौजूद नहीं है। फिर भी वेशभूषा और दृश्य-युक्तियों से कथानक का प्रवाह और स्पष्टता निरंतर बने रहते हैं। पात्रों की वेशभूषा और मेकअप यथार्थवादी प्रस्तुतियों की तरह ही है। लेकिन प्रस्तुति के ढांचे में चरित्रों का स्पेस बहुत ज्यादा नहीं है। उधर मुख्य चरित्र का गठन ऐसा है कि उसे बार-बार नैरेट करने के लिए भूमिका से बाहर आना होता है। इस तरह अभिनय की यह लाक्षणिकता उपन्य़ास की कथात्मकता के समांतर अपनी रंगमंचीय लय से दर्शक को जोड़ती है। उसमें कई दृश्य नृत्य नाटिका की तरह के हैं। परदे की दीवार अचानक दरवाजे की शक्ल ले लेती है जिसमें से भौंचक्की नायिका एक नई स्थिति को सामने देखती है। घुड़सवार के आने का दृश्य, डोली में बैठने का दृश्य आदि भी इसी तरह के हैं। तबले के स्वर और युक्तिपूर्ण देहभाषा के जरिए ये दृश्य मंच पर आकार लेते हैं। प्रस्तुति की निर्देशिका और अभिनेत्री अंजना राजन भरतनाट्यम की दक्ष हैं। उनकी इस दक्षता का सहयोग भी प्रस्तुति को रहा है। वहीं सुधा रघुरामन के स्वर भी उसकी सांगीतिकता को ज्यादा प्रखर बनाते हैं। हालांकि दूसरी पाशो और मुख्य नैरेटर दक्षिणा शर्मा का किरदार के जीवन के अनुरूप मंच पर कुछ ज्यादा संजीदा दिखना बेहतर होता।
निर्देशकीय के मुताबिक निर्देशिका अंजना राजन को लगता है कि उनकी प्रस्तुति उपन्यास की कलात्मकता के साथ न्याय नहीं कर सकती। क्या इसलिए कि उनकी कलात्मकता उपन्यास से जुदा है? प्रस्तुति की मंचीय परिकल्पना में सह निर्देशक केएस राजेंद्रन की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है। उनके दृश्य-विन्यास में वह बारीक संतुलन और प्रवाह दिखता है जिसके लिए उन्हें जाना जाता है।

Wednesday, March 16, 2011

ममताजभाई पतंगवाले

पिछले कुछ वर्षों के दौरान युवा आलेखकार और निर्देशक मानव कौल ने हिंदी रंगमंच में एक महत्त्वपूर्ण जगह बनाई है। हर साल दिए जाने वाले महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड (मेटा) के लिए इस साल उनके दो नाटक नामित किए गए। इनमें से एक 'ममताज भाई पतंगवाले' दो अलग-अलग वक्तों की कहानी है। करीब बीस-पच्चीस साल पहले गुजर चुके और हमारे आज के वक्त की। इस बीच समय की गति में कोई ऐसा पेंच रहा है कि व्यक्ति वो नहीं रहा जो वह था। यह बदला हुआ व्यक्ति पूरी तरह अन्यमनस्क है। वह चीजों में रस लेता हुआ दिखता है, लेकिन तत्क्षण ही हर रसास्वाद को भूल जाता है। वह फुर्तीला और स्मार्ट हो गया है, लेकिन उसमें अपने वक्त की कोई तल्लीनता नहीं है। वह फोन पर नया जोक सुनकर ठहाका लगाता है और लगभग भूल चुका है कि उसके बचपन में घर के पड़ोस में एक सच्चे पतंगबाज ममताज भाई थे। नाटक फ्लैशबैक में जाकर उस पूरे जीवन को याद करता है जिसमें ममताजभाई के अलावा अवस्थी मास्टर साहब, मां, बहन, दोस्त आनंद और इनके केंद्र में पतंगबाजी का दीवाना विकी हुआ करता था, जो मानता है कि ममताजभाई के बीवी-बच्चे नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो पतंगबाज हैं न! उधर परीक्षा की वजह से जब उसके बाहर निकलने पर रोक लगा दी जाती है तो ममताजभाई को भी पता है कि 'विकी पतंगबाज है, जरूर वापस आएगा'। यहां तक कि वो उसे ढूंढ़ते हुए उसके घर पहुंच जाते हैं। उस पुराने वक्त में गली में पतंग लूटने की होड़ लगी है। कंधे पर अपनी बहनों को बिठाए लड़के ऊंचे से ऊंचे जाकर पतंग लूट लेना चाहते हैं। विकी को मालूम है कि पतंग को काटने के लिए ममजातभाई ने जरूर कत्थई वाला मांजा लगाया होगा, जबकि उसके दोस्त आनंद को सद्दी और मांजे का फर्क भी ठीक से नहीं पता।
अब वर्षों के अंतराल के बाद विकी के पास उसी दोस्त आनंद का फोन आया है कि ममताजभाई बीमार हैं और उससे मिलना चाहते हैं। एक लंबी भूमिका के बाद दो वक्तों के मिलन का यह एक संवेदनशील दृश्य है। स्टेशन पर लेने आए दोस्त की साइकिल के कैरियर पर बैठा विकी देख रहा है कि बचपन की जगह में सब कुछ बदल चुका है। दृश्य में साइकिल अपने स्टैंड पर स्थिर है लेकिन पीछे परदे पर बहुत सी आकृतियां उभरती हुई दिखती हैं। एक बैल, एक पेड़, एक बटोही, एक साइकिल। अपने घर पर इस बीच बूढ़े और जर्जर हो चुके ममताजभाई में अब भी अपनी जल चुकी दुकान को फिर से खोलने की हसरत है। विकी उनसे मिलकर काफी बेचैन हो गया है। उसे कहीं कोई बदबू महसूस होती है, कहीं कुछ जलता हुआ। वह यहां नहीं रुक सकता। उसे खुद को रिलैक्स करने के लिए एक अदद लतीफे की दरकार है। स्टेशन पहुंचते ही वह अपने मुंबई के दोस्त को इसके लिए फोन करता है।
प्रस्तुति पूर्वार्ध में काफी बिखरी हुई है। इसकी वजह है कि मानव कौल स्थितियों को किसी यथार्थपरक तरतीब में बरतने के बजाय अतिनाटकीय मुहावरे की तरकीब में बरतते हैं। उसमें 'काइट इज फ्लाइंग' जैसे वाक्यों में अपना अंग्रेजी ज्ञान बघारते जोकर नुमा अवस्थी मास्टर साहब हैं, 'कैन आई गो फॉर सूसू' की इजाजत मांगते छात्र हैं और अपने किरदार के आपे से बाहर नजर आती मां है। इस दौरान मंच पर काफी अस्तव्यस्तता है, और इससे विषय की संवेदना पर एक निश्चित प्रभाव पड़ता है। इन दिनों इस तरह की किंचित एब्सर्ड दृश्य प्रणाली का ठीक से अनुशीलन न कर पाने के बावजूद उसे शैली की तरह इस्तेमाल करने का चलन काफी बढ़ गया है। हालांकि दृश्यों की अस्तव्यस्तता में एक ही किरदार में दो पात्रों के इस्तेमाल की एक अच्छी युक्ति ठीक से उभर नहीं पाई है। इस युक्ति में छोटे विकी के साथ एक बड़ा विकी भी दिखाई देता है। बड़ा विकी इसमें वो संवाद बोलता है जो छोटा विकी बोलना चाहता है। जैसे कि मां जब ममताजभाई को घर से चले जाने को कहती है तो बड़ा विकी कहता है- 'आपको बोलने की क्या जरूरत है, ये मेरे और ममताजभाई के बीच की बात है'। लेकिन पूर्वार्ध के बिखरेपन में आलेख की ये बारीकियां निष्प्रभावी ढंग से घटित होकर रह जाती हैं। प्रस्तुति को इस साल मेटा की नौ श्रेणियों में नामित किया गया, लेकिन उसे सिर्फ एक श्रेणी (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री) में ही पुरस्कार हासिल हो सका। जिन श्रेणियों में उसे नामित किया गया उनमें से एक कोरियोग्राफी की भी थी। मानव कौल पदचापों की धमक से एक दृश्य बनाते हैं। इस तरह वे अपनी शैली को कुछ चमकदार बनाने की कोशिश करते हैं। अभिनय की दृष्टि से आसिफ बसरा प्रस्तुति में काफी बेहतर थे।

Monday, March 7, 2011

नौटंकी शैली में ओथेलो


बीते दिनों अभिमंच प्रेक्षागृह में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'मौन एक मासूम सा' का मंचन किया गया। त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन में शेक्सपीयर के ओथेलो पर आधारित यह कथित रूप से नौटंकी शैली की प्रस्तुति थी। शैलीकरण के लिए त्रिपुरारी शर्मा ने अपने रूपांतरण में- वालिदा, खाबिंद, अब्बा हुजूर, शमशीर आदि- काफी उर्दू शब्दों का इस्तेमाल किया है। प्रस्तुति में बहरे तबील की लय को पकड़ने की कोशिश जरूर है लेकिन अक्सर उसमें तल्लीनता और मीटर की कमी दिखती है, और आधी अधूरी गलेबाजी रस-निर्माण के बजाय रसभंग ज्यादा करती है। पूरी प्रस्तुति में गढ़न बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। डेस्डिमोना का नाम यहां दिव्या है, रोडरिगो का रुद्रो, इयागो का योग्या और कैसियो का मधुकर कश्यप। लेकिन नाम में कुछ नहीं रखा, शायद इसीलिए ओथेलो का नाम ओथेलो ही रहने दिया गया है। छंद की गढ़न के लिए उसे बार-बार जंगी कहा जाता है- 'नजर रखना जंगी अगर तेरी आंख देख सकती, धोखा दिया वालिद को तुझे भी दे सकती' या 'इधर आ जंगी मेरे, मौका है ये खास/ तहेदिल से देता तुझे, जो है पहले से तेरे पास'। इस तरह त्रिपुरारी शर्मा अपने आलेख में नौटंकी शैली के भदेस और लयकारी तक पहुंचने की चेष्टा करती हैं। लेकिन गढ़न की वजह से प्रस्तुति आखिरकार एक 'कंस्ट्रक्ट' होकर रह जाती है। आधुनिक थिएटर की सुविधाओं में भी वे शैली का कोई परिष्कार नहीं कर पातीं और अंततः दर्शकों के हाथ एक अधकचरा सा ढांचा ही लगता है। यहां तक कि कुछ दृश्यों में निर्देशिका अपने आधुनिकतावादी व्यामोह को भी नहीं छोड़ पाई हैं। एक दृश्य में ओथेलो और इयागो आपस में गुत्थमगुत्था हैं। इयागो ओथेलो के ऊपर लदा उसकी बांह मरोड़ता दिखता है। आधुनिक नाटक के हिसाब से वे प्रत्यक्षतः गुत्थमगुत्था नहीं हैं बल्कि ये उनके भीतरी चरित्र हैं। लेकिन नौटंकी के भदेस में आधुनिकता का यह फ्यूजन एक अटपटा प्रयोग ही कहा जाएगा।

पूरी प्रस्तुति मानो शैली का एक ढांचा बनाने की कोशिश में ही व्यतीत होती है। अगर शैली की कसरत को हटा दें तो अभिनय का स्तर प्रस्तुति में ठीकठाक है। खासकर दोनों मुख्य भूमिकाओं में प्रतीक श्रीवास्तव और कल्याणी मुले काफी बेहतर थे। लेकिन दिक्कत तब आती है जब वे बेतरतीब तुकबंदी वाले संवादों में देर तक उलझे पाए जाते हैं। संवाद का निबटना ही अपने में एक मसला बन जाता है और इस कवायद में शब्द और आशय भी धूमिल हो जाते हैं। नौटंकी की पारंपरिक प्रस्तुतियों में संगीत संवादों की क्षतिपूर्ति करता है। यहां ऐसा नहीं था। यह संगीत और आलेख का मिला-जुला व्यतिक्रम था। हालांकि शैली के मुहावरे पर आलेख में निश्चित ही काफी मेहनत की गई है, पर फिर भी उसका रस छूट गया है। कुछ बेहतर उदाहरण देखे जा सकते हैं- 'मुकद्दस सितारे तुम्हीं से, मैं क्या कहूं/ फिर भी बहाऊंगा नहीं मैं उसका लहू' या 'हर जुबान पर रहता मेरी नेकी का नाम/ वही छिन गया मुझसे आई कैसे ये शाम'। हालांकि पारंपरिक लय के इस एक पुराने उदाहरण से यह काफी भिन्न है- 'मांग ले इस घड़ी बीच दरबार में, मुझसे जिस चीज की तुमको दरकार हो/ सदके दिल से तुझे कौल हूं दे रहा, उसके देने में न मुझको इनकार हो'। प्रस्तुति में आंतरिक लय के बजाय शैलीकरण की कोशिश अलग से दिखाई देती है। उसमें थोड़ा ओथेलो है, थोड़ी बहुत नौटंकी शैली- लेकिन दोनों ही अधूरे-अधूरे हैं। यह दरअसल मिजाज का अधूरापन है, या शायद यही प्रस्तुति का मुहावरा है। मंच पर झरोखे, छज्जे और मुख्य द्वार वाला सेट काफी अच्छा था, जिसमें दाईं ओर से नीचे उतरती सीढ़ियां दिखती हैं। पेड़ों की बड़ी-बड़ी जटाएं भी अच्छा प्रभाव बनाती हैं। अंतिम दृश्य में डेस्डिमोना के कत्ल की दृश्य संरचना काफी प्रभावशाली थी। प्रस्तुति में संगीत नौटंकी शैली से जुड़ी रहीं कृष्णा कुमारी माथुर का है।

Saturday, March 5, 2011

शरीर में अभिनय की पहचान

रंग-अभिनय के क्षेत्र में शरीर का कई तरह से संधान किया गया है। भारंगम में प्रदर्शित अर्जेंटीना की दो युवा अभिनेत्रियों- मरीना क्वेसादा और नतालिया लोपेज- की 'मुआरे' नामक प्रस्तुति इसका एक उदाहरण है। यह प्रस्तुति एक उपन्यास से प्रेरित है जिसमें लेखिका ने गहरे मृत्युबोध में हर स्मृति और वस्तु को मानो बड़े आकार में और बहुत पास जाकर देखा है। यथार्थ को देखने के इस ढंग ने इन अभिनेत्रियों को मंच पर एक 'गति आधारित भाषा' रचने का विचार दिया। दरार पड़े शरीर और उसमें स्वायत्त हो चुके अंगों की भाषा। अपने एकांगीपन में हर अंग क्या कर सकता है- इसकी देहाभिव्यक्ति। मंच में बने एक दरवाजे में शीशा लगा है, जिसमें सबसे पहले उंगलियां, फिर हथेली, पूरा हाथ और फिर एक लहराती हुई काया दिखती है। थोड़े से खुले दरवाजे से एक-एक अंग करके बहुत कोशिशों के साथ यह दुबली-पतली काया भीतर आती है। एक जर्जर, कांपती हुई-सी स्त्री-देह। बहुत कोशिश करके खड़ी होती और चलती, गिरती-पड़ती, वहीं पड़ी मेज पर खुद को मरोड़ती-तोड़ती और फर्श पर आड़े-तिरछे, किसी निर्जीव की तरह ऊटपटांग ढंग से फैल जाती। थोड़ी देर में वैसी ही एक दूसरी देह वहीं पड़े सोफे पर फैले बहुत से कपड़ों में से प्रकट होती है। मेज के पास कांपती हुई मुंह में पानी भरकर इस देह पर उगल देती है और फिर उसे अपने कंधे पर लाद लेती है। फिर दोनों एक प्लास्टिक की पन्नी में उलझ जाती हैं। तेज संगीत पर गिरती-पड़ती नाचती हैं। अर्थहीन ढंग के कुछ संवाद बुदबुदाती हैं।

'मुआरे' से अलग लेकिन अपनी प्रकृति में वैसी ही प्रभाववादी निर्देशक मडोका ओकाडा की जापानी प्रस्तुति 'उगेत्सु मोनोगतारी' भी थी। फर्क यह है कि इसमें एक कहानी और उसके निहितार्थों को प्रभावात्मक तरह से पेश किया गया है। एक आदमी के मादा सांप के प्रति आकर्षण की इस कहानी में प्रत्यक्षतः मंच पर एक शैली ही ज्यादा नजर आती है। इस शैली में 'जापानी प्रदर्शन कला के परंपरागत शारीरिक अभिनय के आयामों को जोड़ा गया है'। कमानी प्रेक्षागृह के मंच की पूरी गहराई और चौड़ाई में लगातार कई रंगों की प्रकाश योजना है। शुरू के दृश्यों में पात्र इसमें लगभग सुनिश्चित ग्राफिकल ढंग से खड़े हैं। स्वरों और मुखौटों का प्रयोग भी किया गया है।

इन विदेशी प्रस्तुतियों के बीच तमिल प्रस्तुति 'अट्टरामाई' अपनी सादगी में बिल्कुल अलग आस्वाद देती है। अट्टरामाई का अर्थ है ईर्ष्या। वरिष्ठ रंग निर्देशक एन. मुत्थुस्वामी निर्देशित इस प्रस्तुति में बारी-बारी से चार कहानियां बिल्कुल सीधे-सादे ढंग से पेश की गई हैं। शीर्षक कहानी में एक स्त्री का सैनिक पति नौकरी की वजह से दो साल से उससे दूर है। अपनी हमउम्र पड़ोसन को पति के साथ खुश देखकर उसमें तरह-तरह की भावनाएं उमड़ती रहती हैं। प्रस्तुति में मंचीय तामझाम नगण्य है। कहानी के विवरण ही उसका मंचीय यथार्थ है। फूलवाला आता है, झाड़ूवाला आता है लेकिन उदास सावित्री के लिए ये सब बेमतलब है। वह दरवाजे से देखती है पड़ोसन के घर में कोई आया और पति के दरवाजा खोलने पर वो अस्तव्यस्त लेटी थी। पति की लापरवाही से पड़ोसन खुद शर्मिंदा है पर सावित्री इसे उसकी बेशर्मी समझती है। एक कहानी कथासरित्सागर से ली गई है। एक गरीब आदमी अपनी बेबसी से थका हुआ गेरुआवस्त्रधारी चमत्कारी बन जाता है और राजा तक को उसका कायल होना पड़ता है। यथार्थपूर्ण चरित्रांकन और नैरेटिव की सादगी ही प्रस्तुति की विशेषता है। इसके निर्देशक एन. मुथुस्वामी तमिल में आधुनिक रंगमंच की नींव डालने वालों में शुमार किए जाते हैं।