Friday, February 15, 2013

तीन प्रस्तुतियां, तीन शैलियां


अंग्रेजी और हिंदी थिएटर में समान रूप से सक्रिय सोहैला कपूर के रंगकर्म में हमेशा एक पेशेवर साफ-सुथरापन होता है। यह चीज भारत रंग महोत्सव में उनकी अंग्रेजी प्रस्तुति मिस जूली में भी थी। कुल तीन पात्रीय इस नाटक में असली कथानक मुख्य दो ही पात्रों के बीच घटित होता है। यह सवा सौ साल पहले के यूरोप का परिवेश हैजहां रईस काउंट की बेटी जूली और उसके यहां काम करने वाले ज्यां अपने बंधे यथार्थ से बाहर निकलने की कुछ योजनाएं बनाए हुए हैं। पूरा नाटक रसोई की सेटिंग में एक रात के दौरान घटित होता है। दोनों पात्र अपने-अपने यथार्थ से उबरना चाहते हैंपर उन दोनों का संबंध भी इतना सीधा नहीं है। उनके वर्गीय या लैंगिक अहं लगातार एक किस्म के नाटकीय उतार-चढ़ाव की वजह बनते हैं। यह पूरी तरह पीरियड-प्रस्तुति नहीं हैउसमें हल्का-सा समकालीनता का पुट भी है। निर्देशिका मानती हैं कि आजादी की कामना और सामाजिक निषेधों का यह पाठ आज की भारतीय स्त्री के नजरिए से काफी समसामयिक है। लेकिन उनकी इस राय के बावजूद भाषा के तौर पर अंग्रेजी भारतीय यथार्थवाद की चीज नहीं हैऔर मंचित होते हुए एक अंतराल हमेशा बना ही रहता है। इसके बावजूद मंच पर दोनों पात्र इस लिहाज से ठीकठाक सहज हैं कि अंग्रेजी की अभिव्यक्ति का परायापन उनके किरदार पर हावी नही दिखता। हालांकि ज्यां की भूमिका में दमनदीप सिद्धू शायद किरदार की हैसियत से थोड़े ज्यादा दबंग याकि आश्वस्त नजर आते हैं।
महोत्सव में समय और अवधि के टकराव याकि दबाव के कारण कुछ नाटक आधेअधूरे ही देखना संभव हो पाया। इनमें माया कृष्ण राव की एकल प्रस्तुति द नान स्टॉप फील गुड शो भी एक थी। माया की देहभाषा में एक बेलौस खुलापन है। किसी भी तरह के दिखावे से ऊपर और आकर्षक दिखने की अभिलाषा से परे एक स्फूर्त सहजता। शुरू के दृश्य में वे एक सामान्य प्रवेश द्वार से प्रेक्षागृह में एंट्री लेती हैं और एक खूसट बुढ़िया के वेश में प्रकाश-वृत्त के साथ-साथ मंच पर पहुंचती हैं। अगले दृश्य में वे एक ऊंची स्कर्ट में खुद को संभालती हुई स्टेज पर रखी एक कुर्सी पर बैठती हैंऔर स्कर्ट को दुरुस्त करती हुई आगे बैठे दर्शकों से पूछती हैं कि कहीं कुछ दिख तो नहीं रहा। मंच पर लगी एक स्क्रीन पर नायिका की जीवन लीला के हास्यजनक चित्र उभर रहे हैं। इस दौरान माया बैकस्टेज (जो कि मंच पर ही मौजूद था) के दो संचालकों से भी लगातार डांटशिकायत या निर्देश का अनौपचारिक संबंध बनाए हुए हैं। सब कुछ इतना स्फूर्त है कि उसकेस्क्रिप्टेड होने पर संदेह होने लगता है। माया अपनी हर प्रस्तुति में पिछली से आगे का कुछ करती हैं। पिछले एक दशक के दौरान उनके यहां अमूर्तता क्रमशः कम हुई है। इस प्रस्तुति को एक भरपूर फनी शो बताया गया है,  जिसमें एक बेधड़क औरत अपनी जिंदगी को ज्यादा मानी देने के लिए शानदार कपड़ोंशानदार खाने और सुपर कारोंसुपर राजनीति की दुनिया से खुद को बचाती है और वह नवरस से लेकर नैनो तक हर चीज की जानकार है।   
एक अन्य प्रस्तुति इंडियन टैंपेस्ट को कास्ट्यूम ड्रामा कहा जा सकता है। यह फुट्सबार्न इंटरनेशनल थिएटर की प्रस्तुति है। फुट्सबार्न एक टूरिंग थिएटर कंपनी है जिसने 60 से ज्यादा क्लासिक नाटकों की दुनिया भर में प्रस्तुतियां की हैं। इसके सदस्य चार दशक पहले शुरू के दिनों में इंग्लैड में एक खलिहान में रिहर्सल किया करते थे, बाद में उन्होंने फ्रांस में जमीन खरीदकर अपना स्थायी ठिकाना बना लिया। उनका थिएटर तरह-तरह की तरकीबों से युक्त चाक्षुष और सांगीतिक होता है। इस प्रस्तुति में भी पात्र अजीबोगरीब वेशभूषाओं में दिखाई देते हैं। उनमें विचित्रता का एक आकर्षण है। वेशभूषा कैसे एक पात्र के व्यक्तित्व को बदल देती है, इसे देखना काफी दिलचस्प है। बड़े-बड़े नकली स्तनों वाले कास्ट्यूम में एक पात्र काफी देर तक नृत्यरत है। स्तनों के हिलने में एक सघन ऐंद्रियता है। उसके चेहरे पर एक मुखौटा है। मुखौटा हटाने पर पीछे से एक पुरुष चेहरा निकलता है। पेड्डी हायटर निर्देशित इस प्रस्तुति में शेक्सपीयर के इस अंतिम हास्य नाटक का पुनर्परिप्रेक्ष्यीकरण किया गया है। एक काल्पनिक समयहीन टापू पर यह नाटक सत्ता के उत्कर्ष और पतन, क्षमा और खेद, नादानी और विवेक, सपनों और लक्ष्यों, दमन और विद्रोह को एक साथ लाता है।

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