Wednesday, February 27, 2013

जफर पनाही और हम


इन दिनों ईरान में सरकारी कैद भुगत रहे फिल्मकार जफर पनाही ने अपनी फिल्म ऑफसाइड सन 2006 में बनाई थी. उसी दौरान ईरान और बहरीन के बीच हुए विश्वकप फुटबाल के एक क्वालीफाइंग मैच की पृष्ठभूमि में इसमें कुछ लड़कियों की कहानी कही गई है। ये लड़कियां भी फुटबाल मैच देखना चाहती हैं, पर ईरान का कानून इसकी इजाजत नहीं देता। वे छुप-छुपाकर और छद्मवेश में स्टेडियम में घुसने की कोशिश करती हैं, पर पकड़ी जाती हैं। भीतर मैच चल रहा है, और इधर स्टेडियम के बाहर के गलियारे में मैच की उत्तेजना है और पुलिसवालों के पहरे में लड़कियां हैं। सिर्फ ढाई हजार डॉलर की लागत से बनी इस फिल्म के बहुत से हिस्से को वास्तविक लोकेशन पर सचमुच के समय में जाकर फिल्माया गया। अपने शुरुआती दिनों में वितोरियो डी सिका की फिल्म बाइसिकिल थीफ से बेहद प्रभावित रहे जफर पनाही द्वारा सिर्फ 39 दिनों में बनाई गई इस फिल्म के बनने की कहानी काफी दिलचस्प है। पनाही को फिल्म के विषय को लेकर विवाद की आशंका पहले से ही थी, लिहाजा उन्होंने इसकी इजाजत देने वाले मंत्रालय में एक झूठी स्क्रिप्ट भेजी, जिसमें लड़कियों की जगह पर लड़के दिखाए गए थे। लेकिन चूंकि अपनी पिछली दो फिल्मों – क्रिमसन गोल्ड और द सर्किल- पर पहले से लगी पाबंदियों के कारण पनाही सरकार की नजर में थे, इसलिए मंत्रालय ने उनके सामने शर्त रखी कि उनको इजाजत तब दी जाएगी जब वे अपनी पिछली फिल्मों के आपत्तिजनक हिस्सों को संपादित करेंगे। पनाही ने ऐसा करने के बजाय एक दूसरा रास्ता निकाला  और अपने सहायक को फिल्म का आधिकारिक निर्देशक घोषित कर तमाम मुश्किल हालात में फिल्म को शूट करना शुरू कर दिया। इतालवी नवयथार्थवाद की तरह तरह उनकी इस फिल्म के प्रायः अभिनेता भी गैरपेशेवर लोग और कॉलेज छात्राएं हैं। भीड़भाड़ के दृश्यों को वास्तविक रूप में फिल्माने के लिए उन्होंने आसानी से छुपाए जा सकने वाले छोटे कैमरे का इस्तेमाल किया। फिल्म में मैच के दृश्यों को नहीं दिखाया गया है, पर स्टेडियम के अंदर की आवाजों को उसी मौके पर रिकॉर्ड किया गया, जो बाद में शूट किए गए हिस्सों के साथ जुड़कर वास्तविकता का प्रभाव पैदा करते हैं। फिल्म की नब्बे फीसदी शूटिंग जब हो चुकी थी, तभी ऐन मौके पर एक अखबार में इसके बारे में एक रिपोर्ट छप गई। तब उसका अंतिम दृश्य ही शूट होना बाकी था, जिसमें मैच में जीत के बाद जश्न में डूबी सड़कों और बाजारों से गुजरती वैन में लड़कियों को ले जाना दिखाया जाना था। इसमें कोई आधिकारिक बाधा नहीं थी, इसलिए अंततः फिल्म पूरी हुई। जफर पनाही को उम्मीद रही होगी कि फिल्म पर शायद सरकारी पाबंदी न लगाई जाए, क्योंकि उसमें स्त्रियों के लिए बराबर की आजादी के सवाल को फुटबॉल की मार्फत देशप्रेम के एक युक्तिपूर्ण परिप्रेक्ष्य में उठाया गया है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और फिल्म ईरान में बैन कर दी गई। लेकिन विश्वकप से बीस रोज पहले लगाए गए इस बैन से पनाही को आर्थिक नुकसान जो भी हुआ हो, पर पायरेटेड डीवीडी वगैरह के जरिए यह फिल्म पूरे ईरान में व्यापक पैमाने पर देखी गई। उसी साल बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में इसका प्रीमियर हुआ, जहां इसे सिल्वर जूरी अवार्ड भी दिया गया। यह पनाही की अब तक की आखिरी फीचर फिल्म है।
जफर पनाही अपने सिनेमा की वजह से बार-बार सरकारी पूछताछ, नजरबंदी और कैद के शिकार हुए हैं. सन 2010 में उन्हें देश और सरकार के खिलाफ काम करने के लिए छह साल कैद और फिल्म बनाने पर बीस साल की पाबंदी की सजा सुनाई गई। तब से वे जेल में हैं। अंतरराष्ट्रीय फिल्म समुदाय के व्यापक समर्थन के बावजूद ईरानी सरकार उन्हें लेकर अब कोई नरमी दिखाने के मूड में नहीं है।
ईरान में सत्ता का रुख जैसा भी हो, वहां के समकालीन फिल्मकार अपने देश और समाज और जीवन को एक कलात्मक सादगी के साथ दिखाने के अपने-अपने तरीके निकालते रहे हैं। लेकिन इसीके बरक्स हम अपने समाज को देखते हैं तो नजारा कुछ अलग ही है।
साहित्यिक पत्रिका हंस के इधर आए सिनेमा विशेषांक में पोलैंड की शोधकर्ता तत्तयाना षुर्लेई ने हिंदी में दलितों के विषय पर बनी फिल्मों पर एक लेख लिखा है।। इसमें प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण की भी चर्चा है, जो इस देश में जाति के ज्वलंत मसले पर बनाई गई है।  तत्याना के मुताबिक फिल्म अपने विषय को लेकर इतनी रक्षात्मक है कि अंततः आडंबरपूर्ण और हास्यास्पद हो जाने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है। यह हाल हमारे उदार लोकतंत्र में कभी नई धारा के रहे एक फिल्मकार का है। जाहिर है कि आडंबर हमारे यहां सर्वव्यापी और सर्वस्वीकृत पैमाने पर चल रहा है। सिनेमा में ही हर साल ढेर सारा कूड़ा करकट बनता है जिसे देखकर लोग अपना समय बरबाद करते हैं, और इस समय बरबाद करने से फिल्म उद्योग की अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है। यह ईरान में सत्ता की कट्टरता से भी ज्यादा बुरी स्थिति है। कट्टरता का अपना एक मनमाना सच होता है, पर अपने यहां के उदारवाद में तो हर कोई मनमाने झूठ बोल रहा है और झूठ में जी रहा है। वह इतना स्वार्थी है कि झूठ बोल रहा है, वह इतना रक्षात्मक है कि झूठ बोल रहा है, वह इतना अभ्यासी है कि अभ्यास में ही झूठ बोल रहा है। सिनेमा के इतने बड़े कारोबार में भी हमारे यहां ढंग की आधा दर्जन फिल्में भी हर साल क्यों नहीं बनती, यह सवाल हमारे फिल्मकारों को बेचैन क्यों नहीं करता, और क्यों वे अपने झूठ में बगैर किसी ठोस आधार के भी आशावादी बने रहते हैं, इसपर सोचना चाहिए।  इसी के वश अनुराग कश्यप गैंग ऑफ वासेपुर के रक्तपात में कोई सार्थकता घोषित कर रहे हैं, और राजकुमार हीरानी मुन्नाभाई नुमा किसी बेहूदा आइडिये में। सत्ताओं की निरंकुशता के खिलाफ कलाएं नागरिक समाजों में विरोध का एक हथियार होती रही आई हैं, पर इस भ्रामक स्थिति में कोई क्या करे।  

Monday, February 25, 2013

बरेली में मोहनदास


उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में डॉ. ब्रजेश्वर एक जाने-माने ऑर्थोपीडिक सर्जन हैं। करीब एक-डेढ़ दशक पहले जब वे दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे उसी दौरान पड़ोस के मंडी हाउस में नाटक देखने के शौक ने कालांतर में उन्हें एक रंग-आयोजक बना दिया। वे पिछले कई साल से हर बरस जनवरी के महीने में शहर में एक नाट्य उत्सव का आयोजन करते हैं, उनकी अपनी रंग विनायक नाम की एक रेपर्टरी है, और अब उन्होंने दो सौ सीट की क्षमता वाला एक प्रेक्षागृह भी बना लिया है। यह सारा कुछ उन्होंने अपने निजी साधनों से किया है। वे एक सरल, खुशमिजाज और खासे ऊर्जावान इंसान हैं। दिन में ओपीडी, शाम को नाटक, और फिर वहां से वे देर रात ऑपरेशन थिएटर में पहुंचते हैं। उन्हें हर रोज चार-पांच ऑपरेशन करने होते हैं। इस तरह वे सुबह करीब पांच बजे सोने जा पाते हैं। रंगमंच से संबंधित उनके पूरे उपक्रम की एक आलोचना यह है कि इसे सिर्फ शहर के अभिजात तबके को ध्यान में रखकर बनाया गया है। वहां आम लोगों के प्रवेश की कोई गुंजाइश नहीं है। प्रकटतः और प्रथमदृष्टया यह आरोप सही भी मालूम देता है। प्रेक्षागृह के परिसर में एक नए जमाने की महंगी कॉफी शॉप है, और प्रेक्षागृह में प्रवेश भी प्रायः कुछ नियमित सदस्य दर्शकों को ही दिया जाता है।
डॉ ब्रजेश्वर अभी युवा हैं और अपनी व्यस्तता और संपन्नता की वजह से थोड़े मासूम भी मालूम पड़ते हैं। थिएटर की दुनिया के दांवपेचों को ज्यादा जानने की शायद उनके पास मोहलत भी नहीं है। किसी नाटक की चर्चा सुनने पर वे टैक्सी से सीधे दिल्ली चले आते हैं और इसी तरह कुछ सुनकर कुछ देखकर वे अपने फेस्टिवल के लिए नाटकों का चयन करते हैं। इस बार फेस्टिवल की दस नाट्य प्रस्तुतियों की लिस्ट में एक उदयप्रकाश की कहानी मोहनदास’   पर आधारित राजेंद्रनाथ निर्देशित श्रीराम सेंटर रंगमंडल की इसी शीर्षक प्रस्तुति भी थी। अपनी कहानी में उदयप्रकाश ने आखिरी बूंद तक भ्रष्ट हो चुकी एक दुर्दांत व्यवस्था की विडंबना को एक चिट्ठे की तरह पेश किया है। इस व्यवस्था में व्यक्ति की नियति को भूमंडलीकरण के पहलुओं से जोड़ने के लिए वे कई बार किसी लेख की तरह के ब्योरे भी कहानी में ले आते हैं। मंचन के लिहाज से प्रस्तुति में कुछ भी अतिरिक्त रूप से उल्लेखनीय नहीं है। थोड़ा-बहुत पात्रों का यथार्थवाद और बाकी दर्शकों को संबोधित इकहरा नैरेशन। लेकिन इसके बावजूद प्रस्तुति का साफ-सुथरापन और उसमें व्यक्त तीखा और सामयिक सच दर्शकों को बांधे रखता है। एक शख्स को मिली नौकरी पर मिलीभगत के जरिए एक दूसरा शख्स कब्जा कर लेता है। इसके लिए उसने अपना नाम भी बदल लिया है। सालों बाद मामला कोर्ट में पहुंचने पर वहां भी ऐसा ही कुछ हाल है। अपनी नौकरी और नाम को हासिल करने की कोशिश में लुटा-पिटा मोहनदास आखिर में यह दारुण बिनती करता है कि उसे इस नाम से न जाना जाए। प्रस्तुति एक पिटे हुए ढंग से बार-बार दर्शकों को कुछ ज्यादा ही संबोधित है। खुद निर्देशक द्वारा तैयार किया गया आलेख इतना सरलीकृत है कि शुरू के दृश्य में चरित्रों का दर्शकों से परिचय कराया जाता है। स्थितियां प्रस्तुति में सिर्फ सहयोगी ढंग से घटित होती हैं। फिर भी एक नाटकीय युक्ति प्रस्तुति में ठीक से थी, जिसमें एक पात्र की पीठ पर कालबेल की तरह अंगूठा दबाया जाता है, और जवाब में बजने वाली घंटी लिए वह खुद ही खड़ा है।
प्रस्तुति के बाद किसी दर्शक को उसमें दर्शाई गई स्थितियां अतिरंजित लगीं और उसने सवाल उठाया कि क्या आज के इतने आधुनिक वक्त में ऐसा संभव है। दिलचस्प ढंग से निर्देशक को इसका जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ी, और दर्शकों के बीच से ही इसके प्रतिवाद में कई स्वर उठ खड़े हुए। पता नहीं ये दर्शक कितने उच्चवर्गीय थे, पर उनका प्रतिवाद देशकाल की उनकी जानकारी को तो जता ही रहा था। उनमें से कई आवाजों ने यह माना कि प्रस्तुति में दिखाई गई घटना जैसी घटनाएं देश में कई गुना स्तर पर हो रही हैं।

Friday, February 15, 2013

तीन प्रस्तुतियां, तीन शैलियां


अंग्रेजी और हिंदी थिएटर में समान रूप से सक्रिय सोहैला कपूर के रंगकर्म में हमेशा एक पेशेवर साफ-सुथरापन होता है। यह चीज भारत रंग महोत्सव में उनकी अंग्रेजी प्रस्तुति मिस जूली में भी थी। कुल तीन पात्रीय इस नाटक में असली कथानक मुख्य दो ही पात्रों के बीच घटित होता है। यह सवा सौ साल पहले के यूरोप का परिवेश हैजहां रईस काउंट की बेटी जूली और उसके यहां काम करने वाले ज्यां अपने बंधे यथार्थ से बाहर निकलने की कुछ योजनाएं बनाए हुए हैं। पूरा नाटक रसोई की सेटिंग में एक रात के दौरान घटित होता है। दोनों पात्र अपने-अपने यथार्थ से उबरना चाहते हैंपर उन दोनों का संबंध भी इतना सीधा नहीं है। उनके वर्गीय या लैंगिक अहं लगातार एक किस्म के नाटकीय उतार-चढ़ाव की वजह बनते हैं। यह पूरी तरह पीरियड-प्रस्तुति नहीं हैउसमें हल्का-सा समकालीनता का पुट भी है। निर्देशिका मानती हैं कि आजादी की कामना और सामाजिक निषेधों का यह पाठ आज की भारतीय स्त्री के नजरिए से काफी समसामयिक है। लेकिन उनकी इस राय के बावजूद भाषा के तौर पर अंग्रेजी भारतीय यथार्थवाद की चीज नहीं हैऔर मंचित होते हुए एक अंतराल हमेशा बना ही रहता है। इसके बावजूद मंच पर दोनों पात्र इस लिहाज से ठीकठाक सहज हैं कि अंग्रेजी की अभिव्यक्ति का परायापन उनके किरदार पर हावी नही दिखता। हालांकि ज्यां की भूमिका में दमनदीप सिद्धू शायद किरदार की हैसियत से थोड़े ज्यादा दबंग याकि आश्वस्त नजर आते हैं।
महोत्सव में समय और अवधि के टकराव याकि दबाव के कारण कुछ नाटक आधेअधूरे ही देखना संभव हो पाया। इनमें माया कृष्ण राव की एकल प्रस्तुति द नान स्टॉप फील गुड शो भी एक थी। माया की देहभाषा में एक बेलौस खुलापन है। किसी भी तरह के दिखावे से ऊपर और आकर्षक दिखने की अभिलाषा से परे एक स्फूर्त सहजता। शुरू के दृश्य में वे एक सामान्य प्रवेश द्वार से प्रेक्षागृह में एंट्री लेती हैं और एक खूसट बुढ़िया के वेश में प्रकाश-वृत्त के साथ-साथ मंच पर पहुंचती हैं। अगले दृश्य में वे एक ऊंची स्कर्ट में खुद को संभालती हुई स्टेज पर रखी एक कुर्सी पर बैठती हैंऔर स्कर्ट को दुरुस्त करती हुई आगे बैठे दर्शकों से पूछती हैं कि कहीं कुछ दिख तो नहीं रहा। मंच पर लगी एक स्क्रीन पर नायिका की जीवन लीला के हास्यजनक चित्र उभर रहे हैं। इस दौरान माया बैकस्टेज (जो कि मंच पर ही मौजूद था) के दो संचालकों से भी लगातार डांटशिकायत या निर्देश का अनौपचारिक संबंध बनाए हुए हैं। सब कुछ इतना स्फूर्त है कि उसकेस्क्रिप्टेड होने पर संदेह होने लगता है। माया अपनी हर प्रस्तुति में पिछली से आगे का कुछ करती हैं। पिछले एक दशक के दौरान उनके यहां अमूर्तता क्रमशः कम हुई है। इस प्रस्तुति को एक भरपूर फनी शो बताया गया है,  जिसमें एक बेधड़क औरत अपनी जिंदगी को ज्यादा मानी देने के लिए शानदार कपड़ोंशानदार खाने और सुपर कारोंसुपर राजनीति की दुनिया से खुद को बचाती है और वह नवरस से लेकर नैनो तक हर चीज की जानकार है।   
एक अन्य प्रस्तुति इंडियन टैंपेस्ट को कास्ट्यूम ड्रामा कहा जा सकता है। यह फुट्सबार्न इंटरनेशनल थिएटर की प्रस्तुति है। फुट्सबार्न एक टूरिंग थिएटर कंपनी है जिसने 60 से ज्यादा क्लासिक नाटकों की दुनिया भर में प्रस्तुतियां की हैं। इसके सदस्य चार दशक पहले शुरू के दिनों में इंग्लैड में एक खलिहान में रिहर्सल किया करते थे, बाद में उन्होंने फ्रांस में जमीन खरीदकर अपना स्थायी ठिकाना बना लिया। उनका थिएटर तरह-तरह की तरकीबों से युक्त चाक्षुष और सांगीतिक होता है। इस प्रस्तुति में भी पात्र अजीबोगरीब वेशभूषाओं में दिखाई देते हैं। उनमें विचित्रता का एक आकर्षण है। वेशभूषा कैसे एक पात्र के व्यक्तित्व को बदल देती है, इसे देखना काफी दिलचस्प है। बड़े-बड़े नकली स्तनों वाले कास्ट्यूम में एक पात्र काफी देर तक नृत्यरत है। स्तनों के हिलने में एक सघन ऐंद्रियता है। उसके चेहरे पर एक मुखौटा है। मुखौटा हटाने पर पीछे से एक पुरुष चेहरा निकलता है। पेड्डी हायटर निर्देशित इस प्रस्तुति में शेक्सपीयर के इस अंतिम हास्य नाटक का पुनर्परिप्रेक्ष्यीकरण किया गया है। एक काल्पनिक समयहीन टापू पर यह नाटक सत्ता के उत्कर्ष और पतन, क्षमा और खेद, नादानी और विवेक, सपनों और लक्ष्यों, दमन और विद्रोह को एक साथ लाता है।

Sunday, February 10, 2013

सारा : एक आत्महंता विद्रोह


मेरे जज्बे अपाहिज कर दिए गए हैं
मैं मुकम्मल गुफ्तगू नहीं कर सकती
मैं मुकम्मल उधार हूं
मेरी कब्र के चिरागों से हाथ तापने वालो
ठिठुरे वक्त पर एक दिन मैं भी कांपी थी 
 अपनी नज्म आंखें सांस ले रही हैं में एक मुकम्मल बेचैनी का बयान करने वाली ये सतरें हैं पाकिस्तानी शायरा सारा शगुफ्ता की। सारा ने 4 जून 1984 को साढ़े 29 साल की उम्र में खुदकुशी कर ली थी। इससे पहले वह ऐसी चार कोशिशें और कर चुकी थी। आखिर वो कैसी जिंदगी थी जिसकी शिद्दत को बार-बार इस नतीजे तक पहुंचने के लिए मजबूर होना पड़ा। नाटककार शाहिद अनवर ने इसी के ब्योरे अपने एकल नाट्य सारा में समेटे हैं, जिसकी प्रस्तुति पिछले दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कन्वेंशन सेंटर में की गई। लगभग खाली मंच पर अभिनेत्री सीमा आजमी इस पाठ को बताती और चित्रित करती हैं। उनके बयान में नाटकीयता खास नहीं है, पर इतना साफ-सुथरा वह जरूर है कि देखने वाले को पूरा सिलसिला समझ आ जाए। अव्वल तो सारा शगुफ्ता की छोटी-सी जिंदगी खुद में ही खासी नाटकीयता से भरी रही है, फिर शाहिद अनवर ने भी अपनी तरतीब में अपनी प्रोटागोनिस्ट की बेबाकी को एक रोमांटिक मुहावरे में एक नज्म की मानिंद पिरोया है। यह उर्दू का खालिस अपना रोमांटिसिज्म है, जहां किरदार अपनी बेबसी को सामने खड़ा करके उसी से गुफ्तगू करता दिखाई देता है। आप बेमुरव्वत जिंदगी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते, पर उसकी हर इंतेहा के मुकाबले अपने जज्बे को थोड़ा-सा और इकट्ठा करते हैं। कोई कहता सारा शायरी तो अच्छी करती है पर उसे दुपट्टे की सूझ नहीं है; कोई कहता सारा मुझसे इश्क करती है, वह तो एक आसान शिकार है, मेरे साथ सो चुकी है। पर सारा ऐसे छिछोरे मर्दों की औकात जानती है। वह कहती है- इन आला नस्ली कुत्तों को कोई तो समझाता कि अरे भई, अगर सारा के साथ सोए भी हो तो तुमने कौन-सा तीर मार लिया... मैदान मेरा हौसला है/अंगारा मेरी ख्वाहिश/ हम सर पे कफन बांध कर पैदा हुए हैं/ कोई अंगूठी पहनकर नहींजिसे तुम चोरी कर लोगे
वह अपनी ग्यारह बच्चे पैदा करने वाली मां के बारे में सोचती है कि क्या मेरी मां की कोख महज एक आदत थी, क्या तिनके भर भी मोहब्बत उसमें शामिल न थी। अपने बारे में वो बताती है- चार बार मेरी शादी हुई। चार बार मैं पागल बनी। चार बार खुदकुशी की कोशिश की, और चार किताबें इस लफ्जमारी के हाथ लगीं। पहले शौहर ने उसे बदचलन करार देकर तलाक दे दिया। लेकिन सारा को बदचलन ठहराए जाने का नहीं, गम था तो बच्चों से दूर होने का। तीन इंसान जनने के बाद भी अकेली सारा ने तब अदालत में गुहार लगाई और कहा, जज साहब, मेरा शौहर रहा यह आदमी सही कह रहा है कि मैं बदचलन, बदकिरदार, आवारा हूं. इसलिए मैं इकबाल करती हूं कि ये बच्चे इसके नहीं हैं. अदालत मुझे इजाजत दे कि मैं इन बच्चों को उनके बाप तक पहुंचा सकूं।  
सीमा आजमी की इस एकल प्रस्तुति का निर्देशन महेश दात्तानी ने किया है। उसकी एक जाहिर खामी यह है कि एक मिजाज की कमी उसमें बिल्कुल साफ दिखती है। सारा के तंज और उसकी जज्बाती शख्सियत को जज्ब करने के बजाय सीमा मानो खुद को एक नैरेटर की सरहद में रखकर ही मुतमइन हैं। कुछ मौकों पर तीखी लाल रोशनी या बुरका या गोगल्स आदि छिटपुट थिएट्रिकल औजार उन्होंने जरूर इस्तेमाल किए हैं, पर असली चीज किरदार की शिद्दत उनके अभिनय में थोड़ी छिटकी हुई है। प्रस्तुति इस अर्थ में निहायत सादा है। आलेख के स्तर पर भी शुरू के हिस्सों में मैं और मेरा की शैली को कुछ कम किया जाना चाहिए। चीजें इससे एक सायास शक्ल लेती हैं।
यहां इस तथ्य का जिक्र भी शायद जरूरी है कि दो-ढाई साल पहले इस प्रस्तुति का मंचन जब मुंबई में किया गया था तो इसपर शिवसेना वालों ने बखेड़ा कर दिया था। जाहिर है कि उन्हें नाटक की विषयवस्तु वगैरह का कुछ ठोस शायद पता नहीं था, और सारी बौखलाहट कहीं से सिर्फ पाकिस्तानी शायरा सुन लेने की ही होगी।

Wednesday, February 6, 2013

पेंटिंग के जैसा दृश्य


विभूतिनारायण राय के उपन्यास प्रेम की भूतकथा का कथानक एक पहाड़ी परिवेश के अतीत और वर्तमान में मिले-जुले तौर पर आकार लेता है। उपन्यास पर दिनेश खन्ना निर्देशित इसी शीर्षक प्रस्तुति में मंच सज्जा पर काफी काम किया गया है। यह एक पहाड़ी शहर का नजदीकी लैंडस्केप हैजिसमें ऊंचाई-नीचाई पर बने ढलवां छतों वाले घरउनके रोशनदानों और खिड़कियों से छनकर आती रोशनीकतार में खड़े पेड़कभी-कभी हल्की धुंध वगैरह का मंजर काफी ठीक से बनाया गया है। मंच पर प्रायः हल्की नीली रोशनी हैजिसमें पुराने ढंग की पोशाकों में पात्र अपने नॉस्टैल्जिया में एक रूमान बनाते हैं। कथानक का सूत्रधार सन 1909 में मसूरी में हुई एक हत्या के रहस्य को सुलझाने की कोशिश में उसके मृत पात्रों से बात करता है। इस तरह एक प्रेमउसकी वर्जना और इस वजह से जन्म लेने वाली हिंसा और सस्पेंस को दिखाने की कोशिश की गई है। ऊपन्यास कुछ इस मुहावरे का मालूम देता है जिसमें यथार्थ पर आभासीपन का वर्क चढ़ा हुआ है। धीरे-धीरे इस वर्क को हटाने में कहानी और उसका माहौल निकलकर आते हैं।
लेकिन जैसा कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़े लोगों के बीच एक दस्तूर है कि वे थिएटर का सारा काम डिजाइन से ही निकालना चाहते हैंवैसा ही यहां पर भी है। अपनी प्रस्तुति में दिनेश खन्ना दृश्य को पेंटिंग में बदलते नजर आते हैं। यहां तक कि एक स्थिति में नायिका अपने पामेरियन के साथ काफी देर तक मंच पर टहलती नजर आती है। ऐसा लगता है कि इस पेंटिंग की नोक-पलक सुधारने में दिनेश इस कदर व्यस्त रहे हैं कि चरित्रांकन का काम उन्होंने खुद अभिनेताओं पर छोड़ दिया है। लिहाजा उनके सारे अभिनेता चीख-चीख कर इस रटे हुए ढंग से अपने संवाद बोलते हैं कि इतनी मेहनत से बनाए गए माहौल की कोई लय बनने ही नहीं बनने पाती। सूत्रधार की भूमिका में टीकम जोशी हिंदी थिएटर के सबसे व्यस्त अभिनेताओं में हैं। उनकी अभिव्यक्ति में सबसे अहम चीज उनकी ऊर्जा होती है। ज्यादा बारीकी की शायद उनके पास मोहलत ही नहीं होती। यहां भी ऐसा ही है। टीकम जोशी के अलावा फादर कैमिलस बने जीतू शास्त्री भी इसी राह पर चलते दिखते हैं। दिनेश खन्ना ने अपनी ओर से स्थितियों को पूरा गहन बनाने की चेष्टा की है। एलन और रिप्ली के प्रेम प्रसंगों में या कैप्टेन यंग द्वारा एलन पर आजमाई जाने वाली थर्ड डिग्री में। लेकिन यह गहनता वास्तव में नहीं बन पाती, क्योंकि दिनेश उसके असल तंतु के बजाय बाहरी साधनों या अकादमिक किस्म की युक्तियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। पाठ यहां आत्मसात नहीं किया गया है। वह एक ऊपरी संरचना है, एक निर्मिति। अभिनय, चरित्रांकन और वह दृष्टि जो विषयवस्तु और भाववस्तु को ठोस ढंग से एकीकृत करती है, यहां उतनी सुदृढ़ नहीं दिखती। पाठ की योजना में न वह स्पष्टता है न वह तल्लीनता। इसके बजाय हर पात्र कुछ अतिरिक्त ढंग से नाटकीय होने या सायास ढंग से दर्शकों से मुखातिब होने की कोशिश में दिखाई देता है। हालांकि नाटकीयता के कई बेहतर अंश भी प्रस्तुति में हैं। कैप्टेन यंग की भूमिका में शाहिद उर रहमान इस लिहाज से कहीं बेहतर है। एक दृश्य में एलन पर उसका अत्याचार एक बेहतर युक्ति में सामने आता है, जब दोनों सिर्फ अत्याचार करने और अत्याचारित होने का एक्शन करते हैं। प्रस्तुति की प्रकाश योजना भी ठीकठाक सुरुचिपूर्ण है। निश्चित ही आलेख और चरित्रांकन पर थोड़ा और काम किए जाने से यह एक ज्यादा बड़ी और भव्य प्रस्तुति बन सकती है।

Sunday, February 3, 2013

एक जैसा एशिया


अजरबैजान की प्रस्तुति मस्यर जोर डान एंड दरवेश मस्ताली शेख उन्नीसवीं सदी के ईरानी नाटककार एम. एफ अखुनद्जादेह का नाटक हैजिन्हें ईरान में आधुनिक साहित्यिक आलोचना का शुरुआतकर्ता माना जाता है। वे साहित्य में यथार्थवाद के हिमायती थेऔर उन्होंने तत्कालीन पर्शियन साहित्य को अपने वक्त की जरूरतों को संबोधित करने में नाकाम रहने के लिए जमकर कोसा था। फिरुद्दीन महारोव निर्देशित यह प्रस्तुति देखते हुए किसी को यह गलतफहमी हो सकती है कि यह कहीं कोई भारतीय प्रस्तुति तो नहीं। पूरा एशिया एक जैसी फितरतों में बंधा हुआ है। नाटक में एक फ्रेंच वैज्ञानिक महाशय डोन जान अजरबैजान के काराबाख में एक जड़ी के अनुसंधान के लिए आया हुआ है। यहां उसकी दोस्ती गाटमखान आगा के भतीजे शाहबाज बेक से हो जाती है। वह उसे उच्च शिक्षा के लिए फ्रांस ले जाना चाहता है। पर गाटमखान की बीवी को इसपर सख्त ऐतराज है क्योंकि उसकी बेटी की शादी शाहबाज बेक से होने वाली है। उसने पेरिस की ऐसी तस्वीरें देखी हैं जिनमें बेशर्म फ्रेंकिशऔरतें सिर और चेहरा उघाड़े मर्दों के साथ बैठी हैं। अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख वह दरवेश मस्ताली शेख को बुलाती है जिसका दावा है कि वह अपने जादू-टोने से पूरे पेरिस को ही नष्ट कर देगा। प्रस्तुति एक प्रहसन की तरह कुछ अतिचरित्रों के जरिए एक माहौल बनाती है। मंच पर कई दरवाजों की शक्ल में कई परदे लटके हैं। इसके अलावा कास्ट्यूम आदि के जरिए भी मंच पर एक रंग-बिरंगापन दिखाई देता है। दृश्य की रोचकता यहां किरदारों के वैविध्य से बनती है। दकियानूस अड़ियल बीवी, लाजवंती दुल्हन, विचित्र वेशभूषा वाले ओझा की कारगुजारियां आदि हिंदुस्तानी समाज के भी काफी जाने पहचाने किरदार हैं। इन पात्रों के अलावा चेहरे पर रंग पोते, बाल फैलाए तीन किरदार और भी दिखते हैं। उनके हिस्से में कोई संवाद नहीं हैं, लेकिन वे स्थिति में किसी उत्प्रेरक या समीक्षक की तरह हाथों और शरीर को मटकाते हुए मौजूद हैं। हालांकि उनकी उजबक उपस्थिति ज्यादा रोचकता नहीं बना पाती।
इधर बेगूसराय के युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन कछेक सालों से काफी प्रयोगपूर्ण किस्म की प्रस्तुतियां करते आ रहे हैं। भारत रंग महोत्सव में ही एक-दो साल पहले उनकी प्रस्तुति हेमलेट देखी थी, जिसमें एक प्रखरता स्पष्ट थी।  इस बार एलटीजी प्रेक्षागृह में उनकी प्रस्तुति जर्नी टु फ्रीडम देखने को मिली। प्रस्तुति साहित्य के अकविता नुमा किसी मुहावरे की तरह बहुत कुछ को किसी निश्चित सिलसिले के बगैर कहने की कोशिश करती है। प्रवीण में मंच पर स्थितियों को एक अपने ही ढंग से आकार देने की समझ तो है, पर इस बार वे खिलवाड़ करते ज्यादा दिखाई देते हैं। थिएटर में इन दिनों एक चलन ऐसा बढ़ा है जहां किसी भी ऊटपटांग चीज को थिएटर की संज्ञा दी जा सकती है। तमाम पात्र और संवाद प्रायः इतने असंबद्ध हैं कि वे किसी शैली से ज्यादा एक बेढब संरचना हो जाते हैं। प्रवीण एक किस्म की अराजकता को मुहावरे की शक्ल देने की कोशिश करते नजर आते हैं। प्रस्तुति में किसी अभिव्यक्ति की तुलना में निर्देशक का आत्मविश्वास निश्चित ही ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है।