Saturday, June 11, 2011

मृत्यु के रूमान का नाटक

चेतन दातार हिंदी और मराठी के प्रखर रंगकर्मी थे। सन 2008 में मात्र 44 साल की उम्र में उनका आकस्मिक निधन हो गया। निधन से पूर्व 'राम नाम सत्य है' शीर्षक यह प्रस्तुति उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के लिए निर्देशित की थी। प्रस्तुति के सभी प्रमुख पात्र किसी अस्पताल या आश्रमनुमा जगह में रह रहे एचआईवी एड्स से ग्रसित मरीज हैं। आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा में वे बचे-खुचे जीवन के लिए खुशियों के जुगाड़ ढूंढ़ रहे हैं। दो पात्र दिल को बहलाने वाली नितांत हवाई किस्म की बातें किया करते हैं। मैंने वह फार्म हाउस खरीद लिया, सीधी फ्लाइट से उतरते हैं, वगैरह। आश्रम का सबसे 'जीवंत' पात्र गोपीनाथ अपनी जीवनगाथा सुनाता रहता है, जिसमें वो बहुत ऊंचे इरादे रखने वाला अतिआत्मविश्वास से परिपूर्ण एक नौजवान हुआ करता था। अपने आत्मविश्वास में उसने एक उद्योगपति की बेटी से प्रणय निवेदन किया, घर-बार छोड़कर सड़कछाप मवाली की सी जिंदगी चुनी, और आखिरकार एक हसीना के धोखे में एड्स का तोहफा मिला। मरीजों की जिंदगी का यथार्थ और गोपीनाथ की बीती जिंदगी की हास्यपूर्ण स्थितियां प्रस्तुति को ब्लैक कॉमेडी का दर्जा देती हैं। उसमें कुछ-कुछ अंतराल के बाद कोई-कोई मरीज गिरकर मौत का शिकार होता है। उनके चेहरे शरीर में पसरती मौत की वजह से काले हो गए हैं। शरीर में यहां-वहां घुसी टेप से चिपकी नलियों हैं। मंच सज्जा की कोई कवायद नहीं है, पर एक स्ट्रेचर है जिसपर बैठकर गोपीनाथ अपनी कहानी सुनाता है। इसके अलावा पीछे लगी स्क्रीन पर अस्पताल, ऑपरेशन वगैरह के दृश्य लगातार दिखाई देते रहते हैं। जब गोपीनाथ कहानी सुनाता है तो रोशनी का फोकस बदल जाता है दर्शकों को एक ज्यादा चुस्त-स्मार्ट युवा गोपीनाथ दिखाई देता है।
निर्देशक चेतन दातार ने इसे मौत नहीं जीवन का नाटक बताया है। पर ऐसा कहने की कोई स्पष्ट वजह नजर नहीं आती। हो सकता है उनके पात्र अपनी मौत को भुलाए रख पाने की वजह से जीवंत हों, पर दर्शक के लिए ऐसा नहीं है। प्रस्तुति इतने कोण से मौत को दिखाती है कि ऊब होने लगती है। यहां तक कि मर-मर कर गिरते पात्रों के अलावा ऑपरेशन थिएटर के भीतर की चीरफाड़ के क्लोज वीडियो दिखाए जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये सब दृश्य पात्र के प्रति करुणा पैदा करते हों। इसके लिए पात्र और दर्शक का जरूरी हार्दिक तदात्म प्रस्तुति कभी भी नहीं बना पाती। गोपीनाथ के बीते जीवन के दृश्य दर्शक से उसका जुड़ाव बना पाने के बजाय कॉमिक रिलीफ ज्यादा लगते हैं। प्रस्तुति देखते हुए लगता है जैसे उसका पूरा विधान इस अवधारणा के तहत हो कि मृत्यु अपने में ही करुणा का विषय है और उसे भुलाए रखना जीवंतता की सबसे बड़ी वजह। वैसे भी भारतीय परंपरा में गंगा स्नान के बाद मृत्यु ही ऐसी चीज है जो मनुष्य को पवित्र बना देती है। इस अर्थ में हृषिकेश मुखर्जी की आनंद के स्यापे की रूमानियत को यह प्रस्तुति एक दारुण दृश्यात्मक फैलाव तक ले जाती है। बाकी मृत्यु के विषाद का वितंडा वैसा ही है। प्रस्तुति की एक अन्य सीमा यह है कि वह नाटकीय दृश्य बनाने के बजाय साहित्यिक किस्म की लच्छेदारी में ज्यादा उलझी हुई है। दरअसल यह प्रस्तुति से ज्यादा आलेख की समस्या है। गोपीनाथ बताता है- 'धूम्रपान हमारे यहां खानदानी जुनून रहा है' या घर छोड़ते वक्त उसका बयान 'आपकी जेब से 250 रुपए और जयललिता की फोटो ले जा रहा हूं', 'आपका पथभ्रष्ट पुत्र' आदि। यानी ऐसी भाषा जिसमें जुमले की चमक तो है, पर दृश्य के लिहाज से कोई पेंच नहीं है। वैसे इनके अलावा प्रस्तुति के मिजाज का थोड़ा अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि उसमें कजरारे कजरारे, ईचक दाना बीचक दाना से लेकर बीड़ी जलइले आदि स्वर भी बीच-बीच में सुनाई देते हैं। कुछ लोकधुनें और उसी माहौल के दृश्य भी हैं। और आखिर में -'इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें, शिवजी का नाम ले लूं'। यानी रंगमंचीयता के नाम पर कई तरह की चीजें प्रस्तुति में शामिल है। गोपीनाथ एक मौके पर एक सैद्धांतिक पंक्ति भी बोलता है कि हमारे जीवन में 99 प्रतिशत के जिम्मेदार हम खुद होते हैं। काश यह प्रस्तुति इसी वाक्य पर तैयार किसी कथानक पर आधारित होती!

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