Sunday, December 25, 2016

न्यायप्रियता जहाँ ले जाती है

अल्बेयर कामू के नाटक जस्ट एसेसिन उर्फ जायज़ हत्यारे को परवेज़ अख्तर ने न्यायप्रिय’ शीर्षक से मंचित किया है। नाटक कामू के प्रिय विषय एब्सर्ड’ की ही एक स्थिति पेश करता है, और शायद समाधान भी। इसकी थीम 1905 के दौरान सोवियत क्रांतिकारियों के एक ग्रुप से जुड़ी एक वास्तविक घटना पर आधारित है, पर प्रस्तुति में इसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा गया है। एक अंग्रेज अफसर की हत्या की जानी है। लेकिन ऐन बम फेंके जाने के वक्त दो बच्चे वहाँ मौजूद होने से क्रांतिकारी मस्ताना बम नहीं फेंक सका। ग्रुप के एक क्रांतिकारी तेजप्रताप को ऐतराज है कि उद्देश्य की राह में भावुकता को आड़े क्यों आने दिया गया। लेकिन मस्ताना के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह बच्चों के ऊपर बम फेंक पाए। बहरहाल दूसरी कोशिश में अफसर मार दिया जाता है, और मस्ताना जेल में है। यहाँ एक दूसरा एब्सर्ड अफसर की बीवी के आगमन के रूप में पेश आता है। वह अपने मार दिए गए अफसर पति के कई मानवीय पक्षों के बारे में बताती है, और उसका यह बताना एक नया विरोधाभास पैदा करता है। उसके जाने के बाद एक सरकारी एजेंट का प्रवेश होता है जो एक कबूलनामे के एवज में उसे और उसके साथियों के फायदे का एक प्रस्ताव, और न मानने पर उसे एक विश्वासघाती के तौर पर प्रचारित करने की धमकी, देता है। लेकिन मस्ताना के लिए इन सब प्रलोभनों का कोई अर्थ नहीं। उसने अगर अपने किए की सजा को नहीं भुगता तो खुद को हत्यारे के रूप में देखने के अलावा कोई रास्ता उसके लिए नहीं होगा।
कामू ने यह नाटक 1949 में लिखा था। यह वही वक्त था जब मार्क्सवाद के मुद्दे पर सार्त्र से उनके स्थायी मतभेद सामने आए थे। वही सार्त्र जिनके नाटक मेन विदाउट शेडो में भी कुछ क्रांतिकारी कैद में एक ऐसी ही दुविधापूर्ण स्थिति का सामना कर रहे हैं-- उनके साथ का एक कमउम्र लड़का उनके सीक्रेट्स को उजागर करके संभावित सजा से बच निकलने की धमकी देता है। लेकिन उस नाटक का एक विद्रोही अपने कॉज के लिए लड़के की हत्या कर देता है। जबकि इसीसे मिलते-जुलते कारण से मस्ताना पहली बार में बम नहीं फेंक पाया था।
कामू ने अपने पहले नाटक कालिगुला में इसी नाम के रोमन बादशाह का चरित दिखाया था, जिसका जीवन सबसे बड़ी समस्या एब्सर्ड को जीवनशैली के रूप में चुनने का उदाहरण था, जिस वजह से उसकी हत्या कर दी गई थी। क्या वह एक तरह की आत्महत्या ही नहीं थीबाद में अपनी किताब मिथ ऑफ सिसिफस में जीवन के व्यर्थताबोध की मीमांसा करते हुए कामू आत्महत्या को एक नतीजे के रूप में चुनने के विचार को खुद ही एब्सर्ड मानते हुए ठुकरा चुके थे। वे इस नतीजे पर पहुँचे कि जीवन की असंगति का समाधान है उसे कबूल कर लेना। इससे जीवन जीने के लिए एक उद्देश्य का चुनाव किया जा सकता है। नाटक जस्ट एसेसिन का नायक इसी विचार का प्रतिनिधि है। उसने जीवन को मृत्यु के आमंत्रण के तौर पर आत्मसात कर एक उद्देश्य का चुनाव किया है, और इसी क्रम में उद्देश्य से जुड़ी गतिविधि और नतीजे का भी। लेकिन मुश्किल यही है कि जो तार्किक समाधान है वह मानवीय समाधान साबित नहीं हो पा रहा।
प्रस्तुति न्यायप्रिय में स्थितियों का एक साफ-सुथरा किंतु भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया है। कामू के नाटक में उद्देश्य एक पात्र की समस्या के तौर पर है, पर हिंदुस्तानी परिवेश में उच्चतर भावना की चीज समझा जाता है। यह फाँक प्रस्तुति में निरंतर दिखाई देती है। पात्रों की भावनाएँ कई बार इतनी प्रत्यक्ष हैं कि इससे बात का तनाव डाइल्यूट होता है। मस्ताना की प्रेमिका रही दमयंती का दर्द में डूबा चेहरा इतनी देर तक दृश्य में दिखाई देता है कि एक आनुषंगिक संदर्भ प्रमुख प्रसंग की तरह उभरा दिखाई देने लगता है। बम फेंकने जैसी कार्रवाई में असमर्थ यूसुफ का भी यही हाल है। इतने भावुक लोगों में तेजप्रताप का किरदार कुछ विलेन जैसा होकर रह जाता है। ऐसा होने की एक वजह शायद यह है कि अपने आइडिये में आश्वस्त पात्र हमारे परिवेश की चीज ही नहीं हैं। बहरहाल प्रस्तुति की अच्छी बात ये ही किभावना के अतिरिक्त और कुछ भी उसमें बाहरी नहीं है—न रंगमंचीय युक्तियाँ, न संगीत का शोर। उस अर्थ में यह एक ठोस यथार्थवादी नाट्य प्रस्तुति है। यानी मंच पर दृश्य का कोई अतिरिक्त तामझाम नहीं है। बस उतनी ही चीजें हैं कि लोकेशन का संकेत हो जाए, और पूरा नाटक पात्रों के परस्पर व्यवहार से ही निकलता है। यह यथार्थ हिंदी नाटक में अब दुर्लभ हो चला है। हर फाँसी के बदले में सजा में एक साल की छूट पाने वाले जल्लाद कैदी का किरदार अच्छा बन पाया है। वैसे नाटक की एक अन्य समस्या शायद उसके अनुवाद में भी है, कई बार कुछ शब्द बनावटी मालूम देती है। 

Saturday, December 24, 2016

तोलस्तोय, भारत और गांधी

तोलस्तोय को हमारे देश में अक्सर गांधी के प्रसंग से याद किया जाता है। गांधी अपने आरंभिक दौर में उनसे गहरे प्रभावित रहे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक तोलस्तोय आश्रम भी बनाया। ईश्वर, अहिंसा, निजी संपत्ति और शाकाहार पर गांधी के विचार लगभग वही थे जो तोलस्तोय के थे। इस अर्थ में गांधीवाद काफी हद तक तोलस्तोय के विचारों का ही राजनीतिक सूत्रीकरण मालूम देता है। तोलस्तोय हिंसा को सबसे बड़ी बुराई और ईश्वर को मनुष्य का ध्येय मानते थे।
इस क्रम में जिस तरह वे राज्यसत्ता की हिंसा और अंततः राज्य के ही मुखर विरोधी थे, उसके कारण उनके विचारों को अराजकतावादी भी माना गया। तोलस्तोय का मानना था कि राज्य को बुरे लोग क्रूर ताकतों के समर्थन से चलाते हैं, और एक सुसंगठित राज्य लुटेरों से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है। अपने परवर्ती जीवन में वे विज्ञान और राज्य के पश्चिमी मॉडल के इस कदर खिलाफ थे कि भारत जैसे देश की ओर उम्मीद से देखते थे। हालांकि उनकी यह उम्मीद भारत की परिस्थितियों के बारे में उनकी कम जानकारी और संभवतः बुद्ध की जन्मभूमि के रूप में कुछ ज्यादा ही ऊंची धारणा पर आधारित थी। उन्होंने बुद्ध के विचारों का बहुत गहराई से अध्ययन किया था और भारत को वे एक परंपरानिष्ठ और ऐसे देश के रूप में देखते थे, जहां से उन्हें मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का कोई सूत्र मिल सकता था।
भारत के बारे में तोलस्तोय की सारी समझ या तो किताबों से बनी थी या भारत में रह चुके कुछ लोगों से सुनी बातों के आधार पर। जाहिर है कि भारतीय जीवन के असंख्य विरोधाभास उनकी निगाह में नहीं आ पाए थे। लेकिन भारतीय दर्शन और विचार पद्धति के विरोधाभास उनकी पैनी निगाह- गोर्की के मुताबिक जिससे कुछ भी छिपा नहीं रह सकता था- ने जरूर देखे थे। उन्हें शंकराचार्य की जीवन के बारे में मूलभूत आध्यात्मिक कल्पना ठीक लगती थी, पर कुल मिलाकर उन्हें उनमें बहुत सारे अंतर्विरोध दिखाई देते थे। तोलस्तोय को वेदों के ज्ञान की जानकारी थी और रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का लेखन भी उन्होंने पढ़ा था। वे ज्ञान की इस परंपरा के प्रशंसक थे, और उन्हें इसमें बहुत कुछ अपने काम की बातें दिखाई देती थीं। लेकिन ऐसा लगता है कि तोलस्तोय के आत्मिक ज्ञान और भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के बीच कोई ऐसा बहुत बड़ा फर्क था, जो उन्हें असंतुष्ट करता था। उनका यह असंतोष शायद भारतीय ज्ञान परंपरा की अति व्यक्तिनिष्ठता से था। उन्हें परमात्मा में लीन हो जाने वाले एकांतिक अध्यात्म की नहीं, बल्कि समाज में सहज रूप से सम्मिलित और क्रियाशील व्यक्ति के आत्मबोध से उपजे अध्यात्म की तलाश थी। उन्हें लगता था कि भारतीयों ने सदियों में विज्ञान से दूर प्राकृतिक जीवन जीते हुए इसे हासिल कर लिया है। उन्हें भारत एक ऐसी जगह लगती थी जहां भले ही गरीबी थी, लेकिन जहां के लोगों में कृत्रिमता और बनावट नहीं थी, और विज्ञान से दूर वे उन्हें प्रकृति और ईश्वर के ज्यादा निकट लगते थे। तोलस्तोय को यह भी लगता था कि अंग्रेज अपने लालच के लिए भारतीय जीवन प्रणाली को चौपट कर रहे हैं, और गुलाम होने के बावजूद भारतीय इस मायने में अंग्रेजों से श्रेष्ठ हैं कि 'वे अंग्रेजों के बिना जी सकते हैं, लेकिन अंग्रेज उनके बिना नहीं।' ऐसे में तोलस्तोय को भारतीय विद्वानों के बताए अध्यात्म के फार्मूले विचित्र लगते थे। उन्हें उच्च समाधि अवस्था तक पहुंचने के लिए बताई गई भारतीय पद्धति में- पीठ सीधी रखते हुए बैठना, दोनों आंखें नासिकाग्र पर एकाग्र करना और ओम् शब्द जपना मूर्खतापूर्ण लगता था।  अपने एक परिचित के साथ भारत संबंधी चर्चा में उन्होंने कहा था- 'भगवान करे वहां विज्ञान का विकास न हो।'
तोलस्तोय का अहिंसा का विचार सर्वसमन्यवयवादी भारतीय मानस से मेल खाता था। यही वजह रही कि गांधी उसे एक राजनीतिक थ्योरी में बदलने में कामयाब रहे। अहिंसा को एक पूर्ण राजनीतिक विचार के रूप में लागू करने पर गांधी को अपने देशवासियों के बीच ही भारी आलोचनाएं भी सहनी पड़ीं। गांधी और तोलस्तोय में यह मूल अंतर है कि गांधी जहां अपने विचारों को लेकर आश्वस्त नजर आते हैं, वहीं तोलस्तोय में खुद अपनी ही धारणाओं को लेकर सर्वत्र एक बेचैनी दिखाई देती है। वे अपने हर विचार को कई कोणों से परखते हैं, और एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद भी मानो संदेह से भरे रहते हैं। जीवन के प्रश्नों पर आत्मा, बुद्धि, हृदय के इतने बहुविध तर्कों से इतना स्पष्ट ढंग से संसार में शायद ही किसी और  ने सोचा हो। एक स्थान पर वे विचार को ही बुराई बताने वाली सूक्ति का इस वजह से समर्थन करते दिखाई देते हैं, कि विचार आस्था को नष्ट करता है। माना जाता है कि तोलस्तोय जीवन भर चीजों के औचित्य की खोज में जीवन के अपने ही अंतर्भूत अतर्कवाद से जूझते रहे।
तोलस्तोय के विचारों का सिद्धांतीकरण गांधीवाद में देखने पर सवाल खड़ा होता है कि ऐसा कैसे संभव हुआ? तोलस्तोय अपने जिन विचारों के लिए अराजकतावादी करार दिए गए, वही विचार गांधीवाद में आखिर कैसे स्वीकार्य हुए? इसकी दो वजहें हैं। पहली, गांधी अहिंसा पर आधारित अपनी थ्योरी का एक कहीं व्यावहारिक संस्करण तैयार करते हैं, जिसमें वे अराजकतावाद की एक मूलभूत स्थापना- राज्य के निषेध- पर एक ढीलाढाला परहेज बरतते हुए राज्य से न्याय और सत्य के पक्ष में खड़े होने की उम्मीद करते हैं।  इसके अलावा दूसरी वजह को समझने के लिए यहां जापानी विद्वान दाइसाकु इकेदा के उस विचार को उद्धृत करना उपयोगी होगा जिसमें वे भारत को एक अतर्कवादी समाज बताते हैं। अतर्कवाद की यह विशेषता होती है कि वहां प्रक्रिया और परिणाम में किसी समुचित सामंजस्य की जरूरत नहीं समझी जाती। गांधीवाद इस विशेषता को शुरू से अपने में समाहित किए रहा और सफल माना गया। भारत जैसी मुफीद जगह में गांधीवाद की सफलता दरअसल एक अतर्कवादी सफलता ही है, जहां प्रक्रिया और परिणाम में कोई भेद नहीं माना जाता, और हर अच्छा-बुरा एक निरंतरता में जीवन का हिस्सा भर होता है। नतीजा यह है कि दुनिया जितने ताज्जुब से गांधीवाद के प्रयोगों को देखती थी, उतने ही ताज्जुब से आज गरीबी रेखा कही जाने वाली मृत्यु रेखा के नीचे रह रहे देश की 37 फीसदी आबादी को देखती है। गोरों के रंगभेद के अलावा तमाम तरह के रंगभेद तरह तरह की नई नई शक्लों में भेस बदलते हुए यहां कायम ही हैं और हिंसा के तो कहने ही क्या!
दिलचस्प यह है कि तोलस्तोय की निगाह इस अतर्कवाद पर भी गई है। 'आन्ना कारेनिना' के एक पात्र स्वियाज्स्की के बारे में ये पंक्तियां पढ़ने लायक हैं- 'उसके लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं था कि उसका तर्क-वितर्क उसे किस नतीजे पर पहुंचाता है। उसे तो केवल तर्क-वितर्क की प्रक्रिया से ही मतलब था। उसका तर्क-वितर्क जब उसे अंध गली में ले जाता था, तो उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे यह पसंद नहीं था और वह इससे बचता था तथा बातचीत को किसी सुखद और मधुर दिशा में मोड़ ले जाता था।'
तोलस्तोय कम्युनिस्टों के खिलाफ उनके हिंसात्मक दर्शन की वजह से थे। उन्हें साम्यवाद का सदियों से चली आई व्यवस्था को आमूलचूल उलट देने का विचार भी अटपटा लगता था। लेकिन निजी संपत्ति के उन्मूलन के साम्यवादी विचार से वे खुद जीवन भर जूझते रहे। इस सवाल तक वे अपने मौलिक रास्ते से पहुंचे थे, न कि साम्यवाद के रास्ते। परवर्ती जीवन में अपनी निजी जायदाद को किसानों के नाम कर देने का उनका विचार उनके घर में निरंतर कलह का कारण बना रहा। उनके उपन्यासों 'आन्ना कारेनिना' का लेविन और 'पुनरुत्थान' का नेख्लूदोव भी निरंतर इस प्रश्न से जूझते दिखाई देते हैं। वे स्पेंसर और अमेरिकी विचारक हैनरी जॉर्ज के सिद्धांतों से प्रभावित हैं, जो कहता है- भूमि पर किसी का स्वामित्व नहीं हो सकता। जिस भांति जल, वायु तथा धूप का क्रय-विक्रय नहीं किया जा सकता, उसी भांति जमीन को भी खरीदा और बेचा नहीं जा सकता।'
तोलस्तोय का मानना था कि राज्य समाज के संपन्न वर्ग के फायदे के लिए काम करता है, और सरकार का तो मतलब ही है सुसंगठित हिंसा। विडंबना यह है कि तोलस्तोय की मृत्यु के सौ साल बाद भी राज्य का कोई ऐसा मॉडल संसार में दिखाई नहीं दे रहा है, जिसपर आम लोगों की आजादी और व्यापक हितों के लिए यकीन किया जा सके। भारत जैसे देश में संसदीय लोकतंत्र से फायदा उठाने वाले लोग इसकी लोकप्रियता का तूमार खड़ा किया करते हैं, जबकि देश की तीन चौथाई आबादी को जीवन का न्यूनतम मुहैया कराने में भी यह तोलस्तोयकालीन रूसी राज्य से कहीं ज्यादा विफल है। यह अलग बात है कि तोलस्तोय जिसकी वकालत किया करते थे उस सरकार विहीन राज्य के अराजकतावाद के मॉडल की भी कोई स्पष्टता नहीं है, लेकिन ज्यादा बड़ी दिक्कत यह है कि आज हमारी दुनिया में कोई तोलस्तोय भी नहीं है जो राज्य की ज्यादतियों और विकास की विसंगतियों पर उसी शिद्दत से उंगली उठाए। जो कहे कि हमारे देश को राष्ट्रमंडल खेलों के दिखावे और मेट्रो ट्रेन जैसे महंगे और एकांगी विकास की नहीं, बल्कि एक समेकित और विकेंद्रीकृत विकास की जरूरत है, जिसका फायदा देश की बहुसंख्य आबादी को मिल सके। तोलस्तोय ने ऐसा ही विरोध जताया था, जब रूस के तूला प्रदेश में ट्रेन लाइन बिछाई जा रही थी। उनका मानना था कि रूस में रेल लाइन अर्थव्यवस्था के यूरोपीय पैटर्न को लागू करने के लिए बिछाई जा रही है। उन्होंने लिखा- 'रेलें प्रलोभन बढ़ाती हैं, जंगलों को नष्ट करती हैं, कामगार छीन लेती हैं, अनाज के भाव बढ़ा देती हैं और घोड़े पालने के धंधे को तबाह कर देती हैं।'
वर्जीनिया वुल्फ ने तोलस्तोय को दुनिया का महानतम लेखक माना, तो इसकी वजह फ्लाबेयर की उस राय में ढूंढ़ी जा सकती है, जिसमें वे उन्हें एक अद्भुत कलाकार और मनोविश्लेषक बताते हैं। तोलस्तोय के नैरेटिव और सच को देखने की उनकी निगाह का कोई सानी नहीं है। वे साहित्य में रूमानवाद को 'सच्चाई से आंखें न मिला पाने का साहस' मानते थे और अपने जीवन को भी उन्होंने उसी बेबाकी से परखा और कबूल किया था। 34 साल की उम्र में अपने विवाह से पहले उन्होंने अपनी होने वाली पत्नी को वह डायरी दी थी जिसमें उनके 20 सालों तक बिताए 'पापपूर्ण जीवन' के ब्योरे दर्ज थे। यह पाप था उनकी जमींदारी में काम करने वाली किसान और मजदूर स्त्रियों से रहे उनके दैहिक संबंध। ऐसे एक संबंध से हुई एक संतान का भी इस डायरी में उल्लेख था। उनकी पत्नी इन ब्योरों को पढ़कर गहरे तक विचलित हुई थीं, पर फिर भी वे विवाह के लिए राजी हुईं। उस दौर के रूस के द्विवर्गीय जीवन में इस तरह के संबंध बहुत आम बात थे। यहां तक कि तोलस्तोय ने अपने पिता के इसी तरह के एक संबंध के नतीजे में हुए अपने एक 'भाई' का भी जिक्र किया है, जो दीन-हीन अवस्था में उनके पास कभी-कभार चंद रुपए मांगने आता था, और जिसे देखकर वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाया करते थे।
तोलस्तोय के पापबोध और पुनरुत्थान में ईसाइयत की गहरी झलक है। क्या गांधी का 'वैष्णव जन' भी उसीसे मिलती जुलती आस्था का ही एक भारतीय परावर्तन नहीं है?