Friday, November 25, 2011

बारह बजे सुन सइयां की बोली

दिल्ली के तालकटोरा गार्डन में हिंदी अकादमी की ओर से कानपुर शैली की नौटंकी 'सुल्ताना डाकू' का मंचन किया गया। नौटंकी जुमलेबाजी में रस लेने वाले भारतीय मानस की कला है। पाकिस्तान में 'बकरा किस्तों पर' जैसे रूप भी इसी मानस की चीज हैं। यह मूलतः एक वाचिक नाट्य है जिसमें असली कलाकार माइक है। कानपुर की प्रसिद्ध दि ग्रेट गुलाबबाई थिएट्रिकल कंपनी की इस प्रस्तुति में मंच पर चार-पांच माइक खड़े कर दिए गए हैं, जिन्हें ऐ मालिक तेरे बंदे हम की वंदना के बाद पात्रों ने संभाल लिया है। पहले ही दृश्य में तमाम डाकू शराब पी रहे हैं। वे संवाद बोलने से पहले माइक टेस्टिंग की हलो बोलते हैं। एक मशहूर धार्मिक धुन की तर्ज पर 'फटाफट जाम पिला दे' बज रहा है और वाइज के बजाय साकी से मस्जिद में बैठकर पीने देने की मिन्नत की जा रही है कि सुल्ताना आकर उनपर कोड़े बरसाना शुरू कर देता है। उसे खुंदक है कि साहब बहादुर उसे लंदन से पकड़ने आ रहे हैं, लखनऊ पार्लियामेंट में हंगामा मचा हुआ है, और 'आप यहां शराब पी रहे हैं'। आगे के दृश्यों में साहब बहादुर मिस्टर यंग पुलिस वाले से बोलता है- तुम बड़ा कुत्ती चीज है। यह पुलिस वाला प्रस्तुति का कॉमेडियन है और 'जो मिनट मिनट पर गौर करे वो गौरमिंट' जैसी लतीफेबाज लफ्फाजी से दर्शकों का मनोरंजन किया करता है। उसका नाम गुलाम हैदर है, और मुसीबत के समय जय हनुमान ज्ञान गुन सागर का जाप करता है। पकड़े जाने पर अपना नाम अब्दुल हनुमान और बाप का नाम राम मोहम्मद डिसूजा बताता है। उसे कलाकारों के साथ सुल्ताना के भेद लेने भेजा गया है, क्योंकि सुल्ताना की कमजोरी है कि वह आर्टिस्टों की सुनता है। उसके साथ गई आर्टिस्ट गाना गाती हैं- बारह बजे सुन सइयां की बोली।...
शेरे बिजनौर सुल्ताना को बचपन में उसकी मां ने मुर्गी चोरी करने पर शाबाशी न दी होती तो वह कभी डाकू न बनता। लेकिन जब बन ही गया तो अब वह अमीरों को लूटता है और अपने हिस्से की दौलत गरीबों में बांट देता है। उसने जिंदगी में सिर्फ एक बार खड़कसिंह जमींदार के घर की लड़की पर गलत निगाह डाली, पर लड़की जब अपनी आबरू की खातिर कुएं में जा कूदी तो उसने उसके सच्ची भारतीय नारी होने पर 'वाह' भी कहा। 'सुल्तानी' का 'इतना डेंजरस होने पर भी लव बनाने का कोशिश' मिस्टर यंग को भी हैरानी में डाल देता है।
प्रस्तुति में कहीं की ईंट, कहीं के रोड़े भी कम नहीं हैं। सुल्ताना से कोई औरत मिलने आई है। कॉमेडियन को यह नहीं पता कि इज्जत के साथ लाना किसे कहते हैं। वह चादर फैलाकर औरत से पहले उसकी इज्जत मांगता है। जनता ऐसे मौकों पर ताली पीटती है। ये तालियां तब भी पीटी जाती हैं जब सुल्ताना 'भारतीय नारी' की तारीफ करता है। दुनिया चाहे बहुत बदल गई हो, पर हिंदुस्तानी जनता की तबीयत इन सब मामलों में वैसी की वैसी ही है। वैसे वीर रस का संचार कर पाने में सुल्ताना बने मोहम्मद शाहिद की तुलना में पुलिस वाले नागेंद्र द्विवेदी की लफ्फाजी का हास्य रस प्रस्तुति में ज्यादा जगह घेरता है।
पारंपरिक शैलियों में भदेस का आकर्षण तो होता है, पर यह भदेस अपनी असली शक्ल में अब कम ही दिखाई देता है। वह एक 'गिमिक' की तरह हो गया है या वैसा मालूम देने लगा है। यह प्रस्तुति इस अर्थ में ठेठ पारंपरिक है। उसका मंच गांव देहात के मंच की तरह अस्तव्यस्त और बिखरा हुआ है। बहरे तबील, नक्कारे और हारमोनियम नौटंकी की एक मूल लय जरूर बनाते हैं। लेकिन लोकरुचि यहां असली प्रोत्साहक तत्व है। प्रस्तुति का पूरा ढांचा अपने बेडौलपने में मुख्यतः तालियों के हिसाब से तैयार किया गया है। डाकू इसमें हमेशा के साफा धारी काले कुर्ते वाले हैं। फिर भी मिस्टर यंग की भूमिका में मोहम्मद सत्तार प्रस्तुति में एक संजीदा अभिनेता के तौर पर दिखाई देते हैं। यह ऐसा किरदार है जो थोड़ी सी ढील देते ही कार्टून जैसा हो सकता था। संगीत में हारमोनियम पर सूरज कुमार, नक्कारे पर प्रभुदयाल, ढोलक पर हातिम और कांगो पर दीप थे। प्रस्तुति का निर्देशन नौटंकी विधा से अरसे से जुड़ीं मधु अग्रवाल का है।


चीन की अभागी खलनायिका

बीते साल भारत रंग महोत्सव में चीन की प्रस्तुति 'अमोरॉस लोटस पैन' का प्रदर्शन किया गया था। यह प्रस्तुति इस बात का अच्छा उदाहरण है कि कैसे शैलीगत प्रयोगों के साथ विषय के तनाव और प्रवाह को बरकरार रखा जा सकता है। प्रस्तुति की केंद्रीय किरदार पैन जिनलियान चीन के एक प्रसिद्ध क्लासिक उपन्यास की पात्र है। सामान्यतः उसकी एक खल-सुंदरी की छवि है, जो अपने पति को धोखा देती है। लेकिन निर्देशक चेन गांग उसकी त्रासदी को उसके व्यक्तित्व और भाग्य के टकराव के अनिवार्य परिणाम के तौर पर देखते हैं। उसकी त्रासदी से जुड़े कई सवाल हैं जिन्हें अंत में यह प्रस्तुति दर्शकों के आगे छोड़ जाती है।
मंच पर पीछे की ओर दरवाजे के आकार के फ्रेमों की एक दीवार है। प्रस्तुति के शुरू में एक फ्रेम में से एक पात्र निकलकर आता है और बताता है कि वो एक महान प्रतिभा वाला एक प्रसिद्ध लेखक है। इसी बीच उसके आसपास बहुत से लोग जमा हो जाते हैं और उससे उसके किरदार पैन जिनलियान और उसकी नियति को लेकर सवाल पूछते हैं। इसके कुछ देर बाद पैन जिनलियान खुद मंच पर दिखाई देती है जो छोटी उम्र में अनाथ हो गई थी और उसे झंग दाहू नाम के एक धनी व्यक्ति को बेच दिया गया था। लंबी दाढ़ी वाला कुटिल झंग दाहू उसे अपनी रखैल बनाने पर उतारू है, लेकिन उसके लगातार इनकार करने पर सजा के तौर पर वो उसकी शादी तीन इंच के वू दा से करा देता है। मंच पर झुककर चलने वाला वू दा तीन इंच का तो है साथ ही परले दरजे का कायर भी। तीन बदमाशों की एक टोली आकर दोनों पति-पत्नी को धमकाती और तोड़फोड़ करती है तो वो कुछ करने के बजाय उल्टे जिनलियान को भी उनका मुकाबला करने से रोकता है। इसी बीच शहर मे शेर को मार गिराने वाले जवान और खूबसूरत वू सांग की डुगडुगी पिट रही है। पता चलता है कि वू सांग तीन इंच के वू दा का भाई है। जिनलियान उसपर आसक्त है लेकिन वो उसके प्रणय निवेदन को ठुकरा कर अपनी नौकरी पर कहीं दूर निकल जाता है। इस बीच आशिकमिजाज जियान क्विंग जिनलियान पर डोरे डालता है और देखते देखते दोनों का मेलजोल शहर भर में चर्चा का विषय बन जाता है। लेकिन दोनों की शादी के दो ही रास्ते हैं। या तो वू दा जिनलियान को तलाक दे दे या जिनलियान उसे जहर दे दे। वू दा तलाक देने से इनकार कर देता है। उसके मुताबिक जो भी हो धागे को सुई के साथ-साथ ही रहना होता है। ऐसे में एक साजिश के तहत जिनलियान उसे जहर दे देती है। लेकिन उसके भाई वू सांग के लौटने पर वो अपना कृत्य कबूल करके उसके हाथों अपनी मौत भी कबूल कर लेती है। नाटक के अंत में कई पात्र आकर जिनलियान की नियति से संबंधित कई सवाल उठाते हैं कि उसे अपने पति को अपनी नियति समझते हुए उसी के साथ ही रहना चाहिए था, कि उसे आशिकमिजाज जियान क्विंग से प्रेम की पींगे नहीं बढ़ानी चाहिए थीं, कि उसे शुरू में ही पत्थरदिल झंग दाहू से ही शादी कर लेनी चाहिए थी, आदि-आदि। ये सवाल जिंदगी के बारे में सोचने के लिए निर्देशक की ओर से दर्शकों के लिए भी हैं।
प्रस्तुति अपनी सादगी, रोचकता और शिल्पगत विशिष्टता में खास है। यह चीन के पारंपरिक नाट्य की छवियों से युक्त शिल्प था। मंच पर पीछे की दीवार के अलावा सिर्फ एक ड्रम है। बीच-बीच में घर को दर्शाने के लिए एक मेज और कुर्सियां लाकर रख दी जाती हैं। पात्रों की वेशभूषा से लेकर प्रकाश योजना तक हल्के लाल और सफेद रंग का कंट्रास्ट एक स्निग्ध प्रभाव बनाता है। पात्रों की वेशभूषा और देहभाषा अपने में ही रोचकता का एक विषय है। तीन इंच का वू दा जब झंग दाहू के यहां पहुंचता है तो दाहू अपने नौकर को छोटा स्टूल लाने का निर्देश देता है, लेकिन वू दा बताता है कि स्टूल वो अपने साथ लेकर आया है। वू दा झुककर चलता है, झंग दाहू की कुटिलता उसकी दाढ़ी में से झांकती है। आशिकमिजाज क्विंग बगुले जैसी सफेद पोशाक में है। तीनों बदमाश भी अपनी मूंछ-दाढ़ी और अटपटी हरकतों में निश्चित छवियां बनाते हैं। प्रस्तुति का संगीत पक्ष और कोरियोग्राफी उसे म्यूजिकल ऑपेरा की सी रंगत देते हैं। जिनलियान के दुर्भाग्य और बाद में उसके प्रेम की स्थितियां गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से एक भावनात्मक विस्तार लेती हैं।

Sunday, November 6, 2011

मुस्कुराता हुआ विद्रूप

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्रों की प्रस्तुति 'ड्राइव' एक लाइव थिएटर एग्जीबिशन की तरह है। सजीव छवियों की प्रदर्शनी। इसके लिए अभिमंच प्रेक्षागृह के मंच के आयताकार स्पेस में कई केबिन तैयार किए गए हैं। दर्शक इनके सामने से गुजरते हैं। रुककर अभिनीत की जा रही छवि को देखते हैं और फिर अगले केबिन की ओर बढ़ जाते हैं।
प्रस्तुति के निर्देशक स्विटजरलैंड के डेनिस मैल्लेफर ने छात्र और छात्राओं के लिए दो विषय चुने-- ऑटो रिक्शा ड्राइवर और वुमेन ट्रैफिक कांस्टेबल। उन्हें वास्तविक जीवन में जाकर इन पात्रों के संपर्क में आना था। उनके निजी और पेशागत पहलुओं को जानना था और इस तरह उनकी शख्सियत की थाह लेनी थी। निर्देशक ने उनसे कहा कि इस प्रक्रिया में अर्जित की गई छवि को वे हूबहू चित्रित न करें, बल्कि जिंदगी के एक रवैये के तौर पर, एक विवरण की तरह उपयोग करें। फिर इस कच्चे माल से वे एक नए लेकिन विशिष्ट चरित्र की सर्जना करें। 'ऐसा चरित्र जिसका कोई लक्ष्य, कोई इच्छा, कोई राज, कोई कमजोरी हो, कुछ ऐसा कि उसे मंच पर साकार किया जा सके'। प्रस्तुति देखते हुए ऐसा लगता है कि अपने मंतव्य को आत्मसात करवाने में निर्देशक काफी सफल रहे हैं। छात्रों की रचनात्मकता के कई रंग और अभिनय की अंतरदृष्टियां उसमें नजर आती हैं।
एक केबिन में ट्रैफिक पुलिस की वर्दी में खड़ी लड़की के चेहरे की तुर्शी देखते ही बनती है। 'डुट्टी कर री हू...आंख्खे फाड़ के के देख्खे है, पढ़ी-लिखी हूं' दिल्ली देहात के लहजे में वो बोलती है। वर्दी का आत्मविश्वास उसके चेहरे पर हल्की स्मिति के रूप में मौजूद है। केबिन के छोटे से स्पेस में वो मूव करती है। सहारे से थो़ड़ा टेढ़ा खड़ी होती और रिवॉल्वर उठाकर निशाना साधने की मुद्रा बनाती है। एक दूसरे केबिन में एक लड़की साड़ी पहन रही है। उसकी वर्दी दीवार पर खूंटी पर टंगी है। शायद वह धाविका भी है। चार सौ मीटर में दूसरे नंबर पर रही है। कंधे पर साड़ी के पल्लू में वो देर तक पिन लगा रही है। बताती है कि 'मैडम जी ने कहा था, ब्होत आगे जाएगी छोरी'। वहीं एक अन्य केबिन में खड़ा एक पात्र दर्शकों से मुखातिब है। उसके चेहरे पर हर ओर सौजन्यता पसरी हुई है, जो शायद एक हीनतर जीवन के अकाट्य आशावाद का परिणाम है। वो एक सेल्समैन के अंदाज में लगातार बोले जा रहा है- 'मैं गलत नहीं कह रहा हूं.. आप भी अंबानी बन सकते हो। भाई साहब, इच्छाएं हर आदमी में होती हैं, आप में भी हैं, मुझमें भी हैं, आप बताइये!' उसके अलावा एक अन्य केबिन में एक ऑटो वाला काले रंग के कोट-पैंट और लाल रंग की टाई में खड़ा है। यह पोशाक उसने अपनी बेटी-दामाद के इसरार पर किसी शादी के लिए बनवाई थी। वो दर्शकों से आंखें मिलाए बगैर इसी के बारे में बात कर रहा है। 'दामाद की बात नहीं टाल सकते थे, इसलिए बनवा लिए। शादी में हमसे कोई कुछ पूछने को आया तो हमें कुछ समझ में नहीं आया। फिर मालूम हुआ वो खाने के बारे में पूछ रहा था। हम देखे वहां कोका कोला लेकर घूम रहा सब वेटर हमरे जैसा ही कोट-पैंट पहने था। लेकिन टाई अलग था।' वो टाई के रंग को नीचे बिछी दरी के रंग से मिलाने के लिए झुक जाता है। बताता है कि उसका ड्राइवर होना किसी को नहीं बोला जा सकता था। इससे दामाद जी की बेइज्जती होती। और यह कि पहले दिल्ली में ज्यादा पंजाबी लोग टैक्सी चलाते थे। अब तो यूपी-बिहार वाले ज्यादा हैं। एक अन्य केबिन में वर्दी पहने ऑटो वाले की नींद को दिखाया गया है। चारपाई पर लेटा वो नींद में तरह-तरह से कसमसा रहा है। दरअसल वो लेटा नहीं है, बल्कि एक खड़ी चारपाई के समांतर चिपका हुआ खड़ा है। उसकी चप्पलें भी दीवार पर इस तरह चिपकाकर टांगी गई हैं, मानो फर्श पर रखी हों। एक दूसरा ऑटो वाला कल-पुर्जों को साफ करते हुए दुनियादारी की एक अपनी कहानी बांच रहा है। लेकिन एक कहीं ज्यादा दिलचस्प किरदार स्ट्रीट लाइट के नीचे हवाई चप्पल और उसी अनुरूप स्वेटर और पैंट में हाथ की टेक लगाकर पसरा हुआ सा बैठा है। बीड़ी पीते हुए उसकी बेपरवाह दुनियादारी का व्याख्यान सुनने लायक है। अपनी बेमुरव्वती के किस्से भी मजे लेकर सुनाता है और अपने पर आई मुसीबतों के भी।
ऐसा नहीं है कि सभी छवियां यथार्थवादी हों। कुछ सर्रियल ढंग के बिंब भी हैं। एक लड़की मेकअप करते हुए देर तक अपने सिर पर तेल गिराए जा रही है। उसका चेहरा और कपड़े तेल और पाउडर और क्रीम में सने हुए हैं। फिर भी उसके चेहरे पर एक मुस्कान है। वह एक मुस्कुराता हुआ विद्रूप है। एक अन्य पात्र पोर्न पत्रिका खोले बिल्कुल स्थिर ढंग से उसमें ताक रहा है। उसकी नाक बहकर लटकी हुई है और घिन पैदा करती है। एक अन्य पात्र लगातार टब में नहा रहा है। कपड़े उतारता है और फिर पहन लेता है। यह दोहराव अन्य छवियों में भी इसी तरह चल रहा है।
पूरी प्रस्तुति अपनी छवियों में जैसे गोर्की के 'लोअर डेप्थ' का आधुनिक संसार है। बगैर किसी कहानी के उसमें सूक्ष्म ढंग से एक दुनिया आबाद होती है। इंसानी हसरतों, उसके तलछट, उसके इरादों और उसकी जैविकता की दुनिया। सबसे खुशी की बात है कि यह दुनिया थिएटर की बुनियादी चीज अभिनय- मात्र अभिनय- से बनती है। उसपर यह भी कि यह काफी कुछ युवा अभिनेताओं की अपनी ईजाद है।