Monday, June 12, 2017

सोवियत संघ क्यों ढहा

1990 के आसपास सोवियत संघ और उससे जुड़े देशों में कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं के एकाएक ढह जाने का सबसे प्रकट कारण वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं का जड़ हो जाना था। इस स्थिति को मार्क्सवादी सिद्धांत, जो निजी लाभ की प्रेरणा को सामूहिक हित के लक्ष्य में रूपांतरित करता है, की विफलता के तौर पर भी देखा गया। कम्युनिज्म को एक कृत्रिम व्यवस्था और निजी लाभ को एक नैसर्गिक प्रवृत्ति मानने वालों के लिए यह समूचा विघटन एक स्वाभाविक चीज था, जिसे देर-सबेर घटित होना ही था।
लेकिन इस निष्कर्ष की कुछ खामियाँ हैं। पहली मुश्किल ये खड़ी होती है कि फिर हम रूस में करीब 73 साल तक चले समाजवादी प्रयोग और उसकी उपलब्धियों को कैसे देखें! बहुत से कम्युनिज्म विरोधी इन्हें तानाशाह व्यवस्था की डंडे के जोर पर अर्जित उपलब्धियाँ मानते रहे हैं, पर सच्चाई की कसौटी पर यह एक खामखाँह किस्म की बात ही है। पहले विश्वयुद्ध के बाद खस्ताहाल एक देश पहले तो एक नई व्यवस्था में खुद को खड़ा करे, फिर खुद पर थोपे गए दूसरे विश्वयुद्ध का विजेता बन जाए, और तत्पश्चात शुरू हुए शीत युद्ध में अन्वेषण के कई मोर्चों पर अमेरिका को मात दे सके, आदि उपलब्धियों को डंडे के जोर पर अर्जित मानना बुद्धिहीनता अथवा दुराग्रह की ही निशानी कही जाएगी। ऐसी उपलब्धियों के लिए बाकी चीजों के अलावा एक बड़ा राष्ट्रीय जज्बा भी चाहिए होता है, जो किन्हीं भी कारणों से उस वक्त के रूस में मौजूद था। इसका एक संकेत हमें अपने दौर के प्रसिद्ध ब्रिटिश बुद्धिजीवी बरट्रेंड रसेल की उन पंक्तियों में मिल सकता है जो उन्होंने 1920 में रूस गए एक ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में वहाँ के हालात देखने के बाद लिखी थीं। उन्होंने लिखा कि रूस के कामरेड सब कुछ भूलभालकर 16-16 घंटे काम कर रहे हैं, उनके कोई निजी उद्देश्य नहीं हैं, और वे बगैर कोई ढील दिए नए समाज के निर्माण में जुटे हुए हैं। हालाँकि यह सब लिखने के बाद रसेल ने यह राय भी रखी कि रूस में इन दिनों जीवन वैसा ही है जैसा शुद्धतावादी-इंग्लैंड के दिनों में होता था—इंसानी फितरत के खिलाफ जाता हुआ। अगर बोल्शेविक परास्त होते हैं तो यह ठीक-ठीक उसी कारण होगा जिस कारण अंग्रेजों के शुद्धतावाद का पतन हुआ। वक्त आएगा जब लोग इस बात को कबूल करेंगे कि जीवन का आनंद किसी भी शुद्धतावादी मूल्य से ज्यादा मूल्यवान होता है।
मुद्दा ये है कि रसेल जिन समाजवादी उसूलों को शुद्धतावाद कह रहे थे उनमें वो कौन सा लोचा आ गया था कि स्तालिनोत्तर शीत युद्ध की अपेक्षाकृत आसान परिस्थितियों में वे कारगर साबित नहीं हो पाए, और चार दशक से भी कम समय में पूरा समाजवादी तंत्र यूँ चरमरा गया?
लेकिन इस बारे में कोई भी विचार करने से पहले हमें विश्व राजनीति के प्रचार तंत्रों द्वारा बनाई गई उन छवियों से बाहर आना होगा, जहाँ जापान पर दो-दो बम गिराने की औचित्यहीन संहारक कार्रवाई के लिए तो एक तार्किक निरूपण मौजूद होता है, पर बेहद विषम परिस्थितियों से निबटने में हुई अतिरिक्त सतर्कता या ज्यादतियों को क्रूरता और तानाशाही घोषित कर दिया जाता है। बेहतर है कि ऐसे जटिल मसलों में हम चीजों को कार्य-कारण आधार पर ही जाँचें। 
यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि स्टालिन की मृत्यु सोवियत नीति में टर्निंग प्वाइंट का सबब बनी, जिसके प्रणेता निकिता ख्रुश्चेव थे। कभी स्टालिन के खास सहयोगी रहे ख्रुश्चेव का रवैया पूरी तरह अप्रत्याशित था। उन्होंने सत्ता में आते ही स्तालिनवाद की इस कदर धज्जियाँ उड़ानी शुरू कीं कि कम्युनिस्ट पार्टी ही नहीं, पूरा देश ही कुछ वक्त के लिए सकते में आ गया। ऐसा उन्होंने जिस भी वजह से किया पर इतना अचानक और बगैर तैयारी के किया कि रूस के लिए यह एक बड़े झटके की तरह था। इसके बाकी परिणाम तो इतिहास में तथ्यों के रूप में स्पष्ट हैं, पर जो परिणाम महसूस करने की चीज था वह था एक जज्बे को गफलत की स्थिति में डाल देना। और ऐसा करते हुए उनके पास कोई स्पष्ट दिशा ही रही हो यह भी नहीं था। वे खुलापन लाए, पर इस खुलेपन के झोल बहुत स्पष्ट थे। पास्तरनाक प्रकरण के जरिए रूस को बंद समाज की ज्यादा कुख्याति उन्होंने ही दिलाई। सवाल है कि अगर वे खुद स्टालिन की आलोचना कर सकते थे तो उनके समय की ज्यादतियों को कहने वाले साहित्य से उन्हें क्या परहेज था? उन्होंने खुलापन लाने की जो कवायद की वह खुद उन्हीं से बर्दाश्त नहीं हुई। मालूम पड़ता है कि वे एक आत्मविश्वास से भरे कन्फ्यूज्ड व्यक्ति थे, जिन्होंने बगैर तैयारी के बहुत सी ऐसी नीतियाँ लागू कीं जिन्हें या उन्हें खुद ही वापस लेना पड़ा या वे असफल साबित हुईं। उनकी खुलेपन की नीति के तहत लगी एक अवाँ गार्द कलाकारों की चित्र प्रदर्शनी को देखकर पहले तो उन्होंने उसे कुत्ते का गू कहा, फिर कलाकारों से सीमा में रहने की राजकीय चेतावनी निकाली। इसी तरह अनाज के अतिशय उत्पादन की उनकी सनकपूर्ण नीति भी सफल नहीं हो पाई। ऐसा मालूम देता है कि स्टालिन के बारे में अपने निजी आग्रहों को बगैर वृहत्तर संदर्भों में आकलित किए ख्रुश्चेव ने एक प्रतिक्रियामूलक राष्ट्रीय नीति में तब्दील कर दिया। इससे कई तरह के अंतर्विरोध पैदा हुए। 
समाजवादी व्यवस्था कृत्रिम है या नहीं पर वह इंसानी आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने वाली एक सप्रयास बनाई गई व्यवस्था जरूर है। यह उसी तरह की बात है कि जो हाथ प्रकृति ने मनुष्य को भोजन करने के लिए दिए उनसे वह सितार बजाने लगा। भोजन हासिल करना वह नहीं भूल सकता पर अगर छोड़ दे तो सितार बजाना अवश्य भूल सकता है। लिहाजा ऐसी व्यवस्था के साथ एक एहतियात आवश्यक है। उसे गतिशील बनाए रखने की चुनौती है। स्तालिन कालीन सोवियत रूस अपने वक्त की भीषण उठापटक में समाजवादी जज्बे से जिस गतिशीलता को बनाए रहा, वह उसके परवर्ती शासक बनाए नहीं रख पाए। ऐसा शायद इसलिए ही था कि उन्होंने जो भी आधे-अधूरे सुधार किए वे राजनीति या समाज के सुपरस्ट्रक्चर तक ही थे—समाजवादी अर्थशास्त्र को कैसे पश्चिमी अर्थतंत्र के समांतर ज्यादा गतिशील बनाया जाए इस असल चुनौती पर ध्यान नहीं दिया गया।
बहुत से लोगों का मानना है कि लोकतंत्र की कमी के कारण सोवियत तंत्र की जकड़न अभिव्यक्त नहीं हो पाई और यह उन व्यवस्थाओं के टूटने का कारण बनी। लेकिन ऐसा तर्क देने वाले क्या इस बात का जवाब देंगे कि भारत जैसे देश में लोकतंत्रीय प्रणाली की प्रचुरता भी कोई परिवर्तन क्यों नहीं कर पा रही? कारण यही है कि अर्थतंत्र पर नए बने बूर्ज्वा वर्ग की पकड़ी इतनी मजबूत है कि उसका ये लोकतंत्र कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। 
सोवियत रूस ने अर्थशास्त्र के समाजवादी मॉडल को एक स्वयंभू मॉडल की तरह लिया। समाजवादी अर्थव्यवस्था कई तरह के लीकेज को खत्म करके उत्पादन को बढ़ा देती है। इस किस्म की प्रचुरता समाजवादी देशों में विघटन के ठीक पहले तक भी मौजूद थी। मैंने उन्हीं दिनों बुल्गारिया में विजिटिंग प्रोफेसर रहे कर्णसिंह चौहान के संस्मरणों में सोफिया के जनरल स्टोरों से तुर्की लोगों द्वारा बेहद सस्ता राशन और सब्जी खरीद ले जाने की बात पढ़ी है। लेकिन बाद के दिनों में पनपे भ्रष्टाचार ने वितरण के तंत्र में भी बाधाएँ खड़ी कीं और सरकारी दुकानों पर लोगों की कतारें लगने की बात सामने आईं। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीयतावाद के समर्थन में क्यूबा और भारत सहित अस्सी देशों को जाने वाली विकराल संपदा भी मार्क्सवाद की रटंतू और किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का सत्यानाश करने वाली कार्रवाई थी। भारत में ब्रिटिश दौर में देश से बाहर संपदा का ऐसा ही प्रवाह कई अकालों की वजह बना, जबकि ब्रिटिश दौर के टैक्स मुगलों के वक्त के जैसे ही और कई बार उनसे कम भी थे।
स्टालिन के बाद की सोवियत सत्ता ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों और युद्ध उद्योग को तो अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता के जज्बे में आगे बढ़ाया, पर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पश्चिम की चुनौती पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। इसके बजाय प्रचुरता को गुणवत्ता का समानार्थी मानने की रटी हुई नीति पर कायम रहे। इस तरह ये एक ऐसा समाज बन गया जहाँ किसी तरह की कोई चुनौती नहीं बची थी। तलाकों की तादाद इसलिए ज्यादा थी क्योंकि वे विवाह और सरकारी सुविधाओं के कारण सुरक्षित जीवन में थोड़ी हलचल पैदा करते थे। इसे लोगों ने व्यक्तिगत प्रेरणाओं के अभाव की व्यवस्था समझा, जबकि ये आगे बढ़ने की हसरतों से विपन्न एक व्यवस्था थी। इसका कोई उद्देश्य नहीं था और इसका वास्तविक पतन उसी दिन शुरू हो गया था जब इसने स्टालिन मॉडल की प्रतिक्रिया को ही अपना जमीर बना लिया था।
सोवियत समाजवाद की विडंबना शायद यह थी कि उसे हर समय बेहद गतिमान पश्चिम के मुकाबले में रहना था। उन यूरोपीय समाजों के मुकाबले जिन्होंने वैयक्तिकता और सामूहिकता को एक-दूसरे के बरक्स खड़ा करना छोड़कर उनमें सामंजस्य के संतुलन बिंदु तलाशने शुरू कर दिए थे। विज्ञान की तरक्की आम लोगों को ज्यादा निजी समय दे पाए इसके रास्ते तलाश करने शुरू कर दिए थे। जिसका नतीजा है कि नीदरलैंड्स जैसे देश में साप्ताहिक कार्य अवधि आज सिर्फ 21 घंटे की है, और अमेरिका जैसे देश की कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को अपने काम के निर्धारित घंटे खुद चुनने की आजादी दे रही हैं। कल्पना करें कि सोवियत संघ का यह मुकाबला अगर किसी एशियाई देश से होता तो यह संकट नहीं होता। एशियाई सभ्यताएँ अपने में मशगूल होने से उन्हें गति की वैसी आवश्यकता नहीं होती। वहाँ के लिए प्रचुरता निस्संदेह एक बड़ा मूल्य है। भारत तो कुछ सदी पहले तक प्रचुरता की ही सभ्यता थी, जिसने उसे सर्वसमावेशी हिंदू जीवन का अनोखा उपहार दिया। खुद सोवियत संघ भी ज्यादातर एशियाई ही है, जिसने वहाँ के समाजवाद को जहाँ का तहाँ पड़े रहने की अजगरी वृत्ति दी। हम यह भी कह सकते हैं कि यूरोपीय सिर ने रूस को क्रांति दी और एशियाई धड़ ने उसे निष्क्रिय बना डाला। 
1990 के आसपास भूमंडलीकरण के रूप में अभिव्यक्त हुआ पश्चिमी पूँजीवाद दुर्दमनीय शै थी, जिससे बचना नामुमकिन था। इसे सही समय पर और सही ढंग से एक ही व्यक्ति ने पहचाना, जो थे माओ के बाद के चीन के शीर्ष नेता देंग श्याओ पिंग। उन्होंने अस्सी के दशक में ही वे प्रक्रियाएँ शुरू कीं जिन्होंने चीन को आज वाली रफ्तार दी। चीन में समाजवाद के राजनीतिक और पूँजीवाद के आर्थिक तंत्र का फ्यूजन है। लेकिन चीन का मॉडल क्या सोवियत मॉडल का एकमात्र विकल्प है? क्या यह चीन फिर से कभी समाजवाद की ओर लौट पाएगा? ये ऐसे सवाल हैं जो भूत की तरह आज दुनिया के सोचने-समझने वालों के सिर पर सवार है। 
सोवियत विघटन की परिघटना का ये संदेश है कि विचारों को भावुकतावादी और रटंतू होने से बचना चाहिए, क्योंकि जडता का आरंभ यहीं से होता है। उसे वैयक्तिकता और व्यक्तिवाद के बीच के फर्क को समझना चाहिए। अगर सोवियतों ने ये समझा होता तो उन्हें अपनी ही जनता की जासूसी करने के बजाय अपनी आंतरिक ग्रोथ पर खर्च करने के लिए ज्यादा वक्त मिलता। और यह भी कि भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में बहुत फाँक करके देखना ठीक नहीं। लोगों को अपने आत्मिकता की तरह भौतिकता में भी निरंतर ग्रोथ की आवश्यकता होती है।   

भूमंडलीकरण ने मार्क्सवाद में वर्णित श्रम और वर्ग विभाजन को बेहद जटिल और भ्रष्ट कर दिया है। ऐसे में सोवियत पतन का असली सवाल यही है कि क्या सामूहिकता के लक्ष्य के लिए की गई कार्रवाइयाँ वाकई रसेल का कहा शुद्धतावाद ही हैं, जो छोटे वक्त के लिए तो कारगर हो सकती है, पर उसे किसी व्यवस्था का स्थायी आधार नहीं बनाया जा सकता। और यही वो बिंदु है जिसका कोई ठोस सैद्धांतिक प्रत्युत्तर सोवियत विघटन के बाद मार्क्सवादी पेश नहीं कर पाए हैं। यह निरुत्तरता मौजूदा वैश्विक अर्थशास्त्र के उपभोक्तावादी कोलाहल, बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी और वंचनाओं की एक नई बनती दुनिया में कितनी सांघातिक है इसे सहज ही समझा जा सकता है। 

Friday, June 2, 2017

रीवा में रंग-अलख

रीवा में मनोज मिश्रा ने एक बैंक्वेट हॉल को प्रेक्षागृह की शक्ल दे दी है। मशक्कतों से तैयार किया गया इसका स्टेज अच्छा-खासा किंतु अस्थायी है। शादियों के सीजन में उसे उखाड़ देना पड़ता है। रंग-अलख नाट्य उत्सव में इसी स्टेज पर मंडप आर्ट्स की प्रस्तुति ‘एक विक्रेता की मौत’ देखने को मिली। कुछ साल पहले बघेली में ‘वेटिंग फॉर गोदो’ कर चुके मनोज ने आर्थर मिलर के इस नाटक को भी बघेली भाषा में ही मंचित किया है। मुख्य किरदार का नाम यहाँ रमधरिया है और उसके बेटों का बुधी और सुक्खी। यह एक शहरी हकीकत की आंचलिक भाषा में प्रस्तुति ही नहीं है, बल्कि आज की उत्तरआधुनिकता में एक खारिज होती जा रही जीवन शैली के मूल्यों का पाठ भी है। अपने बारे में जरूरत से ज्यादा सोच रहा आज का इंसान अचानक से रिश्तों की एक दुनिया में जा पहुँचता है, जहाँ हालात के अपने बहुत से द्वंद्व एक मारक यथार्थ रचते हैं। अमरीकियों द्वारा लिखे गए नाटकों में जॉन स्टीनबैक के ‘ऑफ माइस एंड मेन’ की तरह ही ‘डेथ ऑफ ए सेल्समैन’ भी यथार्थ की उन अंतर्भूत त्रुटियों को दिखाता है जहाँ से एक नियति गहरे संवेदनात्मक रूप में प्रकट होती है।
यह प्रस्तुति का प्रारंभिक शो था। इस तरह के खालिस यथार्थवादी नाटकों में अच्छा अभिनय एक ऐसी चीज है जो अपने तईं ही प्रस्तुति की बाकी कमियों को ढँक देता है, और यही निर्देशक ने किया भी है। मुख्य दोनों भूमिकाओं में विपुल सिंह गहरवार और पुनीत तिवारी ने पात्रों की इमेज और स्थिति के तनाव को बहुत अच्छी तरह सँभाले रखा है। इसके अलावा बाकी पात्र भी अपने चरित्रांकन में काफी ठोस हैं। हालाँकि मंच के यथार्थ में ऐसा कुछ खास नहीं है, पर स्थितियों में एक निरंतरता है, जिससे पाठ की स्पष्टता दर्शक के लिए बनी रहती है। रमधरिया यूँ नाटक में टोकरी और सूप बेचने का काम करता है, पर प्रस्तुति के कुल स्वरूप में भाषा के अलावा आंचलिकता के तत्त्व अलग से दिखाई नहीं देते।
नाट्योत्सव में नीरज-रोशनी की ‘कर्णभारम्’ भी कुल मिलाकर तीसरी बार देखी, और फिर से इसका मुरीद हुआ। हालाँकि रीवा के दर्शकों को बताए जाने की आवश्यकता है कि नाटक के दौरान बेवजह ताली पीटना अच्छी बात नहीं है।
मंडप आर्ट की रंग-अलख ने रीवा में युवा कलाकारों की एक अच्छी-खासी तादाद तैयार कर दी है। नाटकों को देखने के लिए शहर के चित्रकार-मूर्तिकार सुधीर सिंह, नाटककार योगेश त्रिपाठी, संगीत संयोजक अभिषेक त्रिपाठी आदि भी आए हुए थे जिनसे मुलाकात हुई और बातें भी।

ग्वालियर में तीन नाटक


ग्वालियर के नाट्य मंदिर प्रेक्षागृह में जाने से लगता है मानो आप वक्त के किसी लंबे वक्फे का हिस्सा हों। यहाँ की दीवारों, कुर्सियों, पंखों तक में कई दशक पुराना माहौल आज भी अक्षुण्ण है। प्रेक्षागृह का स्वामित्व आर्टिस्ट कंबाइन नाम की जिस 75 साल पुरानी संस्था के पास है उसके साथ मिलकर योगेन्द्र चौबे ने यहाँ तीन नाटकों का एक समारोह आयोजित किया। योगेन्द्र चौबे अभी डेढ़ साल पहले ही शहर की मानसिंह तोमर यूनीवर्सिटी के ड्रामा विभाग प्रमुख मुकर्रर हुए हैं। वे जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में छात्र थे तब उनका जो काम देखा था वह अब तक भूल भाल गया था। लेकिन इस समारोह में अपने छात्रों के लिए निर्देशित दो नाटकों में योगेन्द्र डिजाइन के बिल्कुल नए तेवरों के साथ नमूदार हुए। पहली प्रस्तुति ‘युगद्रष्टा’ में उन्होंने हिंदी की कुछ कविताओं को एक थीम में बाँधा है। प्रारंभिक दृश्य में लंबे सफेद कपड़े के आरपार व्यास जी और गणेश जी बैठे हैं। इस तरह शुरू हुई कथा चीरहरण के दृश्य की उत्तेजक बहस ‘उठो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएँगे‘ की काव्यात्मकता तक पहुँचती है। संवादों में अच्छी वक्रोक्तियाँ हैं, जिनमें धर्म को निर्वस्त्र कहा गया है, और हस्तिनापुर के लोगों को अविश्वसनीय। फिर एक सूत्रधार प्रकट होता है जो आधुनिक कोट-पैंट वाली वेशभूषा में है। और अच्छी बात ये है कि इन सब चीजों के साथ एक अच्छी रवानगी भी बनी हुई है। इसमें गीता का उपदेश देते चार कृष्ण हैं, जो बड़े सलीके से कर्म, अकर्म, विकर्म की व्याख्या करते हैं। और फिर ‘हर पंचायत में पांचाली अपमानित है’, ‘राजा बने कोई प्रजा को तो रोना है’ जैसे यथार्थवादी मिसरे भी हैं। ‘जो सीमेंट से नहीं बनाया गया’ उससे पूछा जाता है- ‘बीड़ी पियोगे द्वारपाल?’ और फिर बड़े ही प्रयोगात्मक तरह से पूरे दृश्य पर आड़ी-तिरछी गिरती विजुअल्स की एक श्रृंखला है। इस भरी-पुरी प्रयोगात्मक प्रस्तुति के अलावा तीसरे रोज न दिखने वाले वस्त्र पहने नंगे राजा के अदना से कथानक पर तैयार ‘ग्लोबल राजा’ भी अच्छा दिलचस्प नाटक है। कहानी को खींचा अवश्य गया है, पर पर्याप्त चुटीलेपन के साथा। राजा को झाँसा देने वाले लोग यहाँ अमरीकी हैट लगाए किसी पश्चिमी मुल्क से आए हैं, और इस बात से हतप्रभ हैं कि राजा का मंत्री उनसे भी घूस खा गया। दोनों ही प्रस्तुतियों में डिजाइन और अभिनय की अच्छी चमक थी और रोशनी, वस्त्रभूषा, स्टेज डिजाइन और दृश्य-तरकीबों की अच्छी योजनाएँ भी। 
तीसरी आर्टिस्ट कंबाइन संस्था की प्रस्तुति ‘कहे ईसा सुने मूसा’ में स्टेज बिल्कुल खाली था। विजय मोडक निर्देशित विभु कुमार का ये नाटक किताबी ढंग से कुछ जरूरी बातें कहता है। उसके एक संवाद के मुताबिक ‘कोई कुछ सोच नहीं रहा है, पर लोग सोचने का ढोंग कर रहे हैं’। हर फेडआउट के बाद अभिनेताओं की टोली अलग-अलग वेशभूषा में आकर कभी अस्पताल का, कभी बस के भीतर का, कभी कॉलेज का दृश्य बनाती है। ऐसा वे थोड़ा-बहुत भंगिमाओं और ज्यादातर संवादों के जरिए करते हैं। नाटक में हकीकतबयानी की जो चमक शुरुआत में दिखती है वह थोड़ी देर बाद घटनाविहीन दोहरावों में बुझ जाती है। हालाँकि प्रस्तुति के सपाटपन के बावजूद अभिनेताओं की टीम अच्छी ऊर्जा के साथ मंच पर थी। 
 नाटकों के अलावा ‘रंगमंच में वैश्विकता बनाम स्थानीयता’ विषय पर दो दिवसीय एक सेमिनार का आयोजन भी किया गया। अन्य वक्तागण तो विषय से इधर-उधर की बातें ज्यादा करते रहे, पर रानावि निदेशक वामन केन्द्रे ने विषय पर कायम रहते हुए कहा कि कोई अभिव्यक्ति वैश्विक हो ही नहीं सकती (यानी वह मूलतः स्थानीय ही होती है)। और यह कि शेक्सपीयर को ब्रिटिश ने सोच-समझकर दुनियाभर में पहुँचाया, लेकिन शेक्सपीयर में दम था इसलिए वह टिक पाया, पर संस्कृत नाटक पश्चिम में क्यों नहीं पहुँचा! क्या हमने यह कोशिश की? नहीं की, इसलिए संभावना होते हुए भी हम स्थानिक रह गए। उन्होंने कहा कि वैश्विकता की राजनीति को समझने की आवश्यकता है और यह भी कि टेक्नालाजी इसमें किस तरह अपनी भूमिका अदा कर रही है। उन्होंने कहा कि अनुकरण का मतलब वैश्विक हो जाना नहीं है, जबकि हमारे यहाँ के तो फिल्म अवार्ड समारोह भी ऑस्कर की कॉपी मालूम देते हैं। वामन ने कहा कि हमें अपनी स्थानीयता को दूसरों के जरिए जानने की जरूरत नहीं है। वामन केन्द्रे से एक रोज पहले इस विषय पर बोलते हुए जो कुछ मैंने कहा उसका आशय यह था कि रंगमंच और हमारी सभ्यता का मूल स्वभाव ही स्थानीयता का है। रंगमंच का तो प्रारंभ ही स्थानीयता से होता है, और हमारी सभ्यता, जैसा कि अल बरूनी ने पाया था, अपनी स्थानीयता में प्रसन्न एक सभ्यता थी। इसीलिए भारतीयों को कभी बाहर जाने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। और यह कि सिनेमा मुनाफे की गरज से एक वैश्विक संवेदना की तलाश करता है। लेकिन जिस हॉलीवुड ने ये काम सबसे ज्यादा किया वही (दूसरी सभ्यताओं का मर्दन करके बना ‘विश्ववादी’) अमेरिका आज राष्ट्रवाद की स्थानीयता की ओर लौट रहा है। ऐसी ही कुछ और बातें।
समारोह में भोपाल से आए पत्रकार-बुद्धिजीवी गिरजा शंकर, दिल्ली से आए अजित राय, शिवकेश मिश्र, नागपुर से आईं रंगमंच की अध्यापिका संयुक्ता, जम्मू से आए नाट्य विशेषज्ञ मक्खनलाल सर्राफ, भोपाल से आए पत्रकार विकास शर्मा आदि ने भी अपनी-अपनी बातें रखीं। अच्छी बात यह थी कि यूनिवर्सिटी की कुलपति लवली शर्मा प्रायः सत्रों में उपस्थित थीं। सरकारी तंत्र वही होता है, पर अचानक किसी एक इंसान की ऊर्जा उसी तंत्र को कुछ ज्यादा गतिशील बना देती है। यही काम यहाँ योगेन्द्र चौबे ने अपने युवा साथी हिमांशु द्विवेदी के सहयोग से किया। लगता है आने वाले दिनों में थिएटर के परिदृश्य में ग्वालियर एक अहम मुकाम बनने वाला है।

वसंत काशीकर की प्रस्तुतियाँ

जबलपुर के दिनेश ठाकुर स्मृति प्रसंग में वसंत काशीकर की प्रस्तुति ‘खोया हुआ गाँव’ देखी। वसंत काशीकर में आंचलिकता की अच्छी सूझ है। उनकी पिछली प्रस्तुति ‘मौसाजी जैहिंद’ में तो फिर भी पड़ोस के बुंदेलखंड का परिवेश था, पर इस बार तो बिल्कुल ही बेगानी जगह कश्मीर को दिखाया गया है। मोतीलाल केमू के इस नाटक में पाँच गाँवों के डाकघर में सारंगी का शौकीन एक नया डाकिया आया है। डाकिए की लोककलाकारों के उस गाँव में बड़ी रुचि है जहाँ कोई चिट्ठी नहीं आती। वह वहाँ जाने की तरकीब निकालता है। इसी बीच एक प्रेम कहानी भी नत्थी होती है। कहानी तो जो है सो है, पर असली चीज है उसकी छवियाँ। प्रस्तुति के पात्र कुछ लोककथानुमा हैं। डाक को इकट्ठा करने में तन्मय डाक बाबू उम्र की ताजगी लिए नए डाकिये को चारों गाँवों के बारे में बता रहा है। फिर रास्ते में डाकिये को भेड़ों का रेवड़ लिए आ रहा एक चरवाहा मिलता है। चरवाहे को आँख मिचमिचाने की आदत है। कपड़ों के मुखौटों के पीछे उसकी भेड़ों की व्यग्रता भी देखते ही बनती हैं। चरवाहा जब उन्हें समेटकर विंग्स की तरफ ले जा रहा है तो एक उनमें से निकलकर औचक भाग खड़ी हुई है। साइकिल पर जा रहे डाकिये को अपनी बेटी को पीट रहा एक पिता मिलता है, जिससे उसकी बहस होती है। डाकिए के आने से गाँव वालों में अपने अधिकारों की जागरूकता आ जाती है, और इस तरह उनके आंदोलन-प्रदर्शन के कुछ दृश्य प्रस्तुत होते हैं। हालाँकि कथानक का सिलसिला नाटक में बहुत युक्तिसंगत नहीं है, पर वसंत काशीकर तरह-तरह के दृश्यों में उसे रुचिकर बनाए रखते हैं। समूह नृत्य में कोरियोग्राफी और संगीत काफी सुंदर, कर्णप्रिय और ताजगीपूर्ण है। उनके पात्र किसी सुनाए जा रहे किस्से की सी आभा लिए हैं। यह भावों की एक दुनिया है, जहाँ वेशभूषा और देहभाषा पर काफी अच्छे से काम किया गया है। नाटक का मुख्य पात्र बताता है कि उसके अंदर ‘इंसानी हमदर्दी है, मदद करने का जज्बा है।’ इसी हमदर्दी से वह बूढ़े से ब्याही जा रही लड़की का भला करता है।
वसंत काशीकर की पिछली प्रस्तुति में उन्होंने खुद से झूठ बोलने वाले मौसाजी की भी अच्छी छवि बनाई थी। उदयप्रकाश की कहानी में किरदार की झूठी लंतरानियों में उसकी विस्थापित ईगो ज्यादा दिखाई देती है, पर प्रस्तुति मौसाजी को एक ठेठ गँवई किरदार में तब्दील करती है। इस तरह वे मंच पर ज्यादा स्वाभाविक मालूम देते हैं, और पात्र की आंतरिक विडंबना ज्यादा प्रामाणिक बन पाती है। निर्देशक वहाँ पात्र की मार्फत ही एक माहौल बनाते हैं। इस माहौल में मौसाजी अपने महत्त्व की एक खोखली दुनिया रचता है जो दूसरों के लिए (यहाँ तक कि दर्शकों के लिए भी) रंजक बन जाती है। मौसाजी के किरदार में खुद वसंत ही मंच पर थे, और क्या खूब उन्होंने पात्र के दारुण को मंच पर रचा था।
‘खोया हुआ गाँव’ में वसंत काशीकर कई मुश्किल दृश्यों को काफी सलीके से हैंडल करते हैं। हाकिम, उसके गुर्गों और गाँव वालों से उनकी मुठभेड़ का दृश्य इस लिहाज से यकीनन मुश्किल था। लेकिन उन्होंने पात्रों के आपे और दृश्य की टेंशन को कभी भी अनुपातहीन नहीं होने दिया है। स्थितियों के मिजाज का यह संतुलन उनके निर्देशन की बड़ी चीज है। ब्रजेश अनय की प्रकाश योजना में प्रस्तुति के प्रायः दृश्य फ्रीज के पुराने ढंग पर समाप्त अवश्य होते हैं, पर काफी व्यवस्थित तरह से।

मल्लाह टोली

मल्लाह टोली
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नीलेश दीपक की प्रस्तुति ‘मल्लाह टोली’ एक बस्ती का वृत्तचित्र है। ‘कैमरा’ यहाँ ठहर-ठहरकर कई घरों के भीतर जाता है, और एक छोटे से परिवेश में तरह-तरह के किरदारों से बनी एक दुनिया को दिखाता है। यह मिथिलांचल के तीन बड़े कथाकारों में से एक राजकमल चौधरी की कहानी है, जिसमें एक आम यथार्थ के भीतर कुछ खास पात्र दिखाई देते है। ये पात्र अचानक कोई ऐसी हरकत कर बैठते हैं कि उससे एक घटना पैदा होती है। हट्टा-कट्टा महंता अपने खास दोस्त से मारपीट कर उसकी नई ब्याहता को हड़प लेता है। सब शराब के साथ मछली खाते हुए जश्न मना रहे हैं कि उसकी उपेक्षित हस्ती ऐसा उबाल मारती है कि वो जाकर पिरितिया से लिपट जाता है और छुड़ाने आए उसके पति को उठाकर पटक देता है। ऐसी एक्शनपैक्ड स्थितियों से जो रुचि बनती है उसे नीलेश ने लोक संगीत के साथ नत्थी कर एक निरंतरता बनाए रखी है। कहानी में एक ओर दबंग की बीवी होने को मजबूर पिरितिया है, तो वहीं अपने अशक्त पति की सेवा-सुश्रूषा में पूरी मोहब्बत से जुटी केतकी भी है, जो काफी लंबे अंतिम दृश्य में तिरपित मिसिर की गुप्ती उसी के पेट में उतार देती है। प्रस्तुति में नए-नए पात्रों और स्थितियों की यह आवाजाही शुरू से अंत तक बनी रहती है।
मछली पकड़ने के बड़े-बड़े जालों से मंच पर परिवेश का अच्छा संकेत बनाया गया है। इसी तरह फूस वगैरह की कारगुजारी से घरों के संकेत। नाव, नदी, मछली के जाल फेंकने वगैरह के दृश्यों में भी अच्छी मेहनत और युक्ति दिखाई देती है। इसी युक्ति से केतकी के बेहद कामचलाऊ घर में ब्रा और ब्लाउज को काफी प्रमुखता से टाँग दिया गया है। कारण ये है कि अगले दृश्य में कामातुर तिरपित मिसिर उन्हें सूँघेगा। जो भी हो इन्हीं सब कारणों से नीलेश की ये प्रस्तुति अपनी बुनावट में कुछ अलग तरह की है। किरदारों में भी उन्होंने नाटकीयता और हकीकत का अच्छा पुट दिया है। बीमार बच्चे का इलाज करने वाला डॉक्टर इस लिहाज से काफी रोचक है, और कमली के किरदार में भी उसके भलेपन और हीन हैसियत का अच्छा समावेश है। हालाँकि बीमार पति की पत्नी केतकी के बनाव-श्रृंगार का तुक कुछ स्पष्ट नहीं होता, पर दृश्य बना कुछ ऐसा है कि दर्शक इसमें भी अटका रहे। अभिनय प्रस्तुति में यूँ ठीकठाक है, पर रिहर्सल की कमी कुछेक जगह दिखाई देती है। प्रस्तुति का नाट्यालेख इस विधा के विशेषज्ञ सुमन कुमार ने तैयार किया है, जो कथानकों के रूप परिवर्तन का ये काम लगातार किए जा रहे हैं।

रायपुर में सखाराम बाइंडर

रायपुर में 20 से 23 मई तक आयोजित ‘रंग-जयंत’ में शामिल प्रस्तुतियों में ‘सखाराम बाइंडर’ सबसे नई थी। यह इसका दूसरा ही शो था। निर्देशक जयंत देशमुख ‘आधे अधूरे’ के बाद एक बार फिर इसमें मंच-सज्जा की एक विशद विवरणात्मकता के साथ मौजूद थे। सखाराम के घर में दो कमरे हैं। छोटा कमरा रसोई है। वहाँ रखी लोहे की अँगीठी में छोटी-छोटी लकड़ियाँ ठुँसी हुई हैं, जिसपर रखे भगोने से धुआँ उठ रहा है। लक्ष्मी जब जलती हुई तीली लकड़ियों में डालती है तो अँगीठी में हिलती हुई लाल रोशनी दिखने लगती है। मैंने विदेशी नाटकों में तो देखा है, पर हिंदुस्तानी थिएटर में इस किस्म की डिटेलिंग एक दुर्लभ चीज है। रसोई में घड़ा, ड्रम, डालडे का पुराना डिब्बा, थाली-बर्तन आदि बहुत कुछ है। एक मुख्य दरवाजा और उसके बाहर एक टप्पर है, जहाँ बारिश की एक रात लक्ष्मी आसरा पाती है। एक लंबे अरसे में इकट्ठा हुआ बहुत सा जरूरी-गैरजरूरी सामान सखाराम के इस घर में पैबस्त है, और इस सज्जा का प्रस्तुति के कुल यथार्थ में एक गहरा दखल है। कमरे और रसोई की खिड़कियों के बाहर भी एक बस्ती, लोग और चिड़िया-कौए आदि हैं, जिनके आभास अनायास (और कई बार प्रत्यक्ष) प्रस्तुति में दाखिल हुए रहते हैं। विजय तेंदुलकर के नाटकों में ‘सखाराम’ अपनी यथार्थपरकता में जितना सर्वथा त्रुटिहीन नाटक है, जयंत देशमुख की यह प्रस्तुति भी उसी अनुपात में 24 कैरेट सॉलिड है। और यह भी कि यह हिंदी की नहीं बल्कि बुंदेली भाषा की प्रस्तुति है। नाटक के भदेस को बनाए रखने के लिए निर्देशक ने इसे बुंदेली में रूपांतरित करवाया। और जिस तरह यह रूपांतरण उसी तरह सटीक चरित्रांकन मिलकर इसे एक ऊँचे दर्जे की प्रस्तुति बनाते हैं। यह एक बेधक यथार्थ है जिसके पात्र दुनियादारी के लिहाज में ज्यादा नहीं पड़ते। ऐसे बेलिहाज पात्रों के तौर तरीकों की एक अपनी ही नाटकीयता है जहाँ देह में लिप्त या उससे निढाल सखाराम और चंपा देर तक बेपरवाह टाँगें फैलाए लेटे दिखाई देते हैं। लेकिन पूजापाठ करने वाली लक्ष्मी का सताया हुआ वजूद अपने लिए एक शुचिता ढूँढा करता है। और सखाराम के साथ चिलम की दिव्य दोस्ती निभाने वाला दाऊद है। कश मारने के बाद दोनों बोलते हैं बमबमबम। गणपति बप्पा की क्या मजाल कि इस दोस्ती में दखल दें-- ये साली लक्ष्मी ढोंग करती है। चिलम की आग इसी हाथापाई में गिर गई है। लक्ष्मी उसे उठा रही है। दर्शक देखते हैं कि ये सचमुच के सुलगते हुए कोयले हैं। 
 अभिनय जब छवि में तब्दील होता है तो एक सच्चा किरदार निकलकर आता है। यहाँ सभी किरदार इसी पाए के हैं। अपनी जैविकी में दो टूक ढंग से जीने वाले सखाराम को शायद याद भी नहीं कि दाऊ मुसलमान है। लक्ष्मी के खोखले दुराव पर उसकी नफरत देखते ही बनती है। उसकी जरूरियात बिल्कुल स्पष्ट हैं--- उसे एक औरत चाहिए, बदले में वह उसे जिंदा रहने का सामान मुहैया कराता है। यह बात खोखले वजूद वाली लक्ष्मी को कभी समझ नहीं आती, पर चंपा को आती है। कुल मिलाकर यह निम्नवर्गीय जीवन की वैसी ही असंतुष्ट दुनिया है जैसी कि ‘आधे अधूरे’ के मध्यवर्गीय पात्रों के जरिए एक रोज पहले भी ‘रंग जयंत’ में नमूदार हुई थी। जयंत देशमुख निर्देशित ‘आधे अधूरे’ की यह प्रस्तुति जब पहले देखी थी तब भी अच्छी लगी थी, पर इस बार यह और ज्यादा कसी हुई थी। काफी ब्योरों में विन्यस्त प्रस्तुति का सेट यहाँ भी पूरी शिद्दत से मौजूद था। अलबत्ता इस बार सावित्री बनी गरिमा मिश्रा अपनी ऊर्जा में अलग से नजर आईं। हालाँकि यही बात सखाराम बाइंडर के बारे में नहीं कही जा सकती-- वहाँ सभी अभिनेता-- शोबित खरे, लता साँगड़े, अजय श्रीवास्तव, बिशना चौहान-- अपने अपने प्रभाव के साथ मौजूद थे। बिशना चौहान ने इसका रूपांतरण भी किया था।