Sunday, April 2, 2017

भीष्म साहनी के नाटक


हिंदी नाटक में आधुनिकता के कई चरण रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में एक ओर जहाँ विपरीत ध्रुवों पर खड़े प्रसाद और भुवनेश्वर दिखाई देते हैंवहीं उनसे भी थोड़ा पहले 1916 में लक्ष्मण सिंह चौहान कुली प्रथा’ जैसा गठा हुआ यथार्थवादी नाटक लिख चुके थे। लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आजादी का एजेंडा हासिल हो जाने से आधुनिकता की नई प्रवृत्तियाँ सामने आईं। एकाएक व्यक्ति यहाँ प्रमुख हो गया था। वह व्यक्ति जो खुद को दूसरों से खास समझता था पर था उनके जैसा ही। फिर यह आधुनिकता कई तरह के प्रयोग करना चाहती थी। मंच को दर्शक दीर्घा तक ले जाया गयाया दर्शकों को मंच पर उतार दिया गया।....वगैरह। इस सारे कोलाहल के बीच भीष्म साहनी को हम एक ऐसे रचनाकार के रूप में पाते हैं जिनकी आधुनिकता ठेठ भारतीय परंपरा से उपजी है। इसे हम इस तरह समझ सकते हैं कि पश्चिम में दो-दो महायुद्धों ने व्यक्ति और उसके अस्तित्व के सवाल को जिस तरह केंद्र में ला दिया था वह उस तरह हमारी समस्या नहीं थी। (बावजूद इसके कि इन पश्चिमी प्रवृत्तियों का प्रभाव हिंदी में कई रचनाकारों पर काफी गहरा था; और कुछ ने इसे फैशनेबल ढंग से भी पकड़ा हुआ था।) हमारी समस्या उस समाज की समस्या थी जिसे आजादी के बाद अभी एक रूप हासिल करना था। जिसे नागरिक समाज की बहुत सी बुनियादी समस्याओं को अभी हल करना बाकी था। भीष्म साहनी के नाटक इसी समाज के द्वंद्वों और सवालों के नाटक हैं। वह समाज जो सांप्रदायिकता और सत्ता के अतिचारों के सवाल से जूझ रहा था। जहाँ एक ओर अभी अतीत के सामंती मूल्य अपनी पकड़ बनाए थे, वहीं कई तरह के समांतर प्रतिरोध भी सक्रिय होने लगे थे। इस नजरिये से जब हम देखते हैं तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भीष्म साहनी के यहाँ कालजयी होने की कोई हसरत नहीं हैउनके नाटक पूरी तरह सार्वजनिक वर्तमान के नाटक हैं भले ही कई बार ये वर्तमान किसी ऐतिहासिकता के कलेवर में हों। उदहरण के लिए उनके प्रहसन मुआवजे’ को देखें। मुआवजे’ का हास्य रटंतू पात्रों के रवैये से निकलता है। इन पात्रों का अपने आचरण के बारे में कोई विचार नहीं हैलेकिन इस व्यवस्था की प्रक्रियाएँ उन्होंने सीख रखी हैं। नाटक में एक ही आदमी तमाम नेताओं के भाषण लिखता है। उसके भाषण राजनीति का एक कर्मकांड हैं जहाँ अंत्येष्टि के अवसर पर विवाह के श्लोक पढ दिए जाने जैसी गलतियाँ होती रहती हैं। लोकतंत्र के इस प्रहसन में दंगा होना एक दस्तूर है और अम्न की कार्रवाइयाँ भी एक दस्तूर हैं। यह लोकतंत्र प्रक्रियाओं को तो जानता है पर उनके प्रयोजन को नहीं। इसीलिए जो मुआवजा जिंदगी को बचाने के लिए दिया जाना चाहिए उस मुआवजे के लिए उल्टे लोग जिंदगियाँ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। भीष्म साहनी एक ओर व्यवस्था की मूर्खताओं की खिल्ली उड़ाते हुए एक हास्य रचते हैं वहीं वे उसकी अमानवीयता से बनते स्थिति के विद्रूप को सामने लाते हैं—जिस विद्रूप में एक जीता-जागता आदमी मुआवजे की रकम के लिए लाश हो जाने को तैयार है। नाटक 'मुआवजेएक बहुत संतुलित और तीखा हास्य है। समकालीन हिंदी नाटक में उसके मुकाबले की व्यंग्यात्मकता नजर नहीं आती। यह पोलिटिकली करेक्ट वो भारतीय यथार्थ है जहाँ भाड़े का हत्यारा आखिर खुद ही राजनेता बन जाता है। 1992 में लिखा गया यह नाटक हमारी परवर्ती राजनीति में से मानो एक बानगी पेश करता है। नाटक की भूमिका में भीष्म साहनी ने लिखा था- 'गंभीर विषयवस्तु और उसकी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। न तो हँसी-मजाक को इतना तूल दिया जाए कि नाटक प्रहसन न रहकर भड़ैती बन जाएऔर न ही उसकी गंभीर विषयवस्तु पर इतना अधिक बल दिया जाए कि वह सांप्रदायिकता पर लिखे एक दस्तावेज का रूप ले ले।' ऐसा कहकर वे समकालीन हिंदी रंगमंच की एक प्रवृत्ति को चिह्नित कर रहे थे। उनका नाटक उस प्रवृत्ति के लिए एक चुनौती खड़ी करता है।
उनका नाटक 'कबिरा खड़ा बजार में' रंगकर्मियों के बीच हमेशा से काफी लोकप्रिय रहा है। यों कबीर हमेशा से ही हिंदी साहित्य और नाटक की एक प्रिय शख्सियत रहे हैं, लेकिन भीष्म साहनी के कबीर में एक विलक्षण सादगी है। कबीर तो जैसे हैं वैसे हैं ही, लोई का उनके बारे में खयाल सुनिये- न घर, न दुआर, बापू ने हमें कहाँ लाकर झोंक दिया...एक पगलेट साधु के पास। नाटक में लोई की जिज्ञासाएँ इतनी मासूम और दिलचस्प है कि सुनने वाला सुनता ही रह जाए। लोई पूछती है- तुम झगड़ा-वगड़ा नहीं करते तो तुम्हें पीटते क्यों हैं? हमें कोई गाली दे तभी न हम उसे पीटते हैं! राह जाते को कोई थोड़े ही पीटता है। ......गली-बजार के लोग यह भी कहते हैं कि कबीर जोलाहा पगला गया है।’  और कबीर की सफाई कि मैं तुम्हें पागल नजर आता हूँ लोई कहती है- लोग-लुगाई यों ही थोड़े कहते फिरते हैं। पूरे पागल नहीं तो आधे पागल होगे। आधे पागल भी तो होते हैं। भीष्म साहनी की साहित्यिक अभिव्यक्ति में भले ही कमी-बेशी निकाली जा सकती हो, पर उनके यथार्थ में कोई खोट नहीं है। उनके कबीर ने अपने विचारों के लिए बहुत कुछ खोया और झेला है। उन्हें पानी में डुबोया गया, उनका घर जला दिया गया। नाटक के कबीर सब कुछ झेलते हुए भी मानो यह जानते हैं कि उनकी साधारणता ही उनकी असलियत है। उनकी ख्याति और वास्तविकता को आलेख में बहुत ही अच्छी तरह से बुना गया है। कबीर से कायस्थ का संवाद कथानक में नाटकीयता के लिहाज से एक काफी ठोस स्थिति है, जो कबीर को छंद-अलंकार सीखने की राय देता है; और कवि के रूप में अच्छा कैरियर बनाने के लिए बड़े-बड़े उमरा-वुजरा से मिलने की सलाह देता है। नाटक में कबीर की छवि एक ओर म्यूजिकल की संभावनाएँ लिये हुए है, वहीं उसे शहरी यथार्थवादी ढंग से भी बार-बार मंचित किया गया है।
भीष्म साहनी के रचनाकर्म में स्थितियों के विवरण काफी इत्मीनान से जगह बनाते हैं। इस महादेश में कहानी कहने की परंपरा के इस खास अवयव से वे आधुनिकता के आशयों को कहते हैं। लेकिन उनके दो नाटक हानूश और माधवी इस लिहाज से उल्लेखनीय हैं कि उनमें यह डिटेलिंग ही उनकी कमजोरी बन गई है। खास तौर से माधवी में एक छोटा कथ्य अपने दोहरावों और विस्तार में ऊब पैदा करता है, भले ही रंगकर्मी प्रायः आसान संरचना के कारण इस नाटक की ओर आकर्षित होते रहे हों। यों भी हिंदुस्तानी रंगमंच में पौराणिकता का आकर्षण हमेशा से रहा है। माधवी के कथा-बिंदुओं में ययाति का अहं भी एक कथा-बिंदु है, जो बहुत स्थूल ढंग से सामने आया है। ययाति वानप्रस्थ में भी इससे उबर नहीं पाए हैं। वे अपने शाही अहं की तुष्टि के लिए अपनी बेटी को दान में दे देते हैं। नाटक ययाति के अहं से शुरू होता है और गालव की लालसा तक को दिखाता है। माधवी चौतरफा पुरुष वर्चस्व की शिकार है, लेकिन नाटक का अंत उसके प्रतिकार को दिखाता है। नाटक की समस्या है कि उसकी विवरणात्मकता उसके रूपक पर हावी है और वह पौराणिक संदर्भ का एक साधारण आख्यान होकर रह जाता है। न सिर्फ इतना, बल्कि ययाति जैसा पात्र लेखकीय मंतव्य की पूर्ति के लिए इकहरे ढंग का किंचित बनावटी भी नजर आता है।  हालाँकि हानूश, जो एक चेक दंतकथा पर आधारित है, में यह समस्या उस स्तर पर नहीं है। हानूश ने वर्षों की मेहनत के बाद एक घड़ी बनाई है। यह घड़ी नगर की उपलब्धि है। पर्यटक इसे देखने आएँगे तो राज्य की आय बढ़ेगी; लेकिन निरंकुश राजा हानूश को अंधा करवा देता है। हानूश की अब एक ही चिंता है कि उसके आविष्कार के ज्ञान को उसी के साथ खत्म नहीं हो जाना है, कि कैसे इस ज्ञान को बाकी समाजों और पीढ़ियों के लिए बचाया जाए।  
नाटक में परिवेश की एक फाँक है, पर एक माहौल भी साथ-साथ विस्तार पाता है। नाटक में एक दंतकथा की जाहिर सरलता ही उसकी सीमा है। राजा हानूश को अंधा करवा देने का हुक्म देता है। उसके क्रूर आदेश में कोई युक्ति नहीं है, सिवाय उसकी जालिमाना मंशा के। हानूश में हम किसी जटिल या नई सच्चाई को नहीं देख रहे होते। उसका पूरा ढाँचा एक पुराने किस्म की कहानी के उतार-चढ़ावों से बना है। लेकिन भीष्म साहनी के अन्य नाटकों की तरह हानूश भी रंगकर्मियों को मंचीय यथार्थ में गहराई उत्पन्न करने के काफी मौके देता है। एक अपरिचित माहौल की इस कहानी से गुजरते हुए यह साफ देखा जा सकता है कि भीष्म साहनी मंचीय दृश्य के एक कुशल कारीगर हैं। उनके नाटक के पाठक को सहज ही यह महसूस होता है कि जिन दृश्यों से वह गुजर रहा है उनके विजुअल कितनी अच्छी तरह लेखक के दिमाग में बने हुए होंगे। हानूश का दृश्य विधान रंगकर्मियों के लिए निश्चित ही एक चुनौती पेश करता है।
भीष्म जी के नाट्यलेखन के सिलसिले में उनके एक कम चर्चित लेकिन महत्त्वपूर्ण नाटक रंग दे बसंती चोला की चर्चा भी जरूरी है। रंग दे बसंती चोला जालियाँवाला बाग की घटना पर आधारित नाटक है। नाटक में उक्त घटना से जुड़े तथ्यों, स्थितियों, मनोदशाओं और भावनाओं को एक कथात्मक सूत्र में बाँधा गया है, और यह एक बहुत ही कुशल और वस्तुनिष्ठ नैरेटिव का उदाहरण है। बावजूद इसके कि यह नाटक किसी वृत्त नाटक की तटस्थता में नहीं लिखा गया है यह महत्त्वपूर्ण है कि इसमें किसी तटस्थता का उल्लंघन भी नहीं किया गया है। नाटक से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है मानो जालियाँवाला बाग की घटना सत्ता और शासित के मध्य संघर्ष मात्र का नहीं बल्कि दो सभ्यताओं के संघर्ष का परिणाम हो। नाटक के किरदार डायर और ओड्वायर के तर्कों में जालियावालाँ बाग से दो रोज पहले एक क्रिश्चियन मिशनरी महिला पर हुए जानलेवा किस्म के हमले की घटना का हवाला भी है। वहीं हिंदुस्तानियों में तत्कालीन देशभक्ति के जज्बे के बहुत सुंदर चित्र नाटक में खींचे गए हैं। ये दो सभ्यताएँ हैं जिनके नुमाइंदों के ढंग बिल्कुल अलग हैं, जिन्हें नाटक साफ-साफ पेश करने की कोशिश करता है। नाटक में उल्लेख है कि उक्त घटना के बाद आठ साल जीवित रहे जनरल डायर ने बार-बार इस घटना को फर्ज को अंजाम देना बताया। आश्चर्य है कि यह नाटक अब तक अधिक क्यों नहीं खेला गया। जबकि यह भीष्म जी की नाट्य रचनाओं में एक पाए की कड़ी है।
भीष्म साहनी ने फूजियामा नाम के एक रूसी नाटक का अनुवाद भी किया था। यह कम्युनिस्ट नैतिकता का एक संवाद-बहुल नाटक है, जिसमें जटिल स्थितियों में निजी नैतिकता के सवाल की परख की गई है। लेकिन क्योंकि हर व्यक्ति में अलग-अलग डिग्री के स्वार्थ और आदर्श होते हैं इसलिए झूठ और सच की यह लड़ाई निरंतर पेचीदा होती जाती है। नाटक का मंच एक कृत्रिम संरचना है— एक पहाड़ का अलक्षित सुरम्य शिखर, जहाँ पात्रगण पिकनिक मनाने के लिए जमा हुए हैं; और अतीत वहाँ एक विसंगति के रूप में चला आया है। हर पात्र के अतीत में नैतिकता की कोई न कोई खोट है। सामान्य हिंदी दर्शकों के लिए यह नाटक इसलिए थोड़ा मुश्किल मालूम देता है कि निजी नैतिकताओं में झाँकने का इस तरह का चलन अपने यहाँ नहीं है। जे.बी. प्रीस्ले के एन इंस्पेक्टर काल्स की तरह फूजियामा के पात्रों की सफाइयाँ और द्वंद्व भी दरअसल उनकी अपनी नैतिक चूकों के वाकये हैं। यह हमसे आगे की सिविल सोसाइटी है जहाँ के मौकापरस्त पात्र भी दूसरों को सफाइयाँ देने से पहले खुद को उस सफाई से सहमत कराते हैं।
भीष्म जी के एक अन्य नाटक आलमगीर में वरिष्ठ नाट्य आलोचक जयदेव तनेजा ने प्रायः वही त्रुटि चिह्नित की है जिससे मिलता-जुलता जिक्र यहाँ ऊपर भी किया गया। उन्होंने इस नाटक को सूचनात्मक और शब्दाश्रित बताया है, जिस वजह से इसे नहीं खेला गया। हमें यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि एक नाटक में नाटकीयता का बाहरी तामझाम तब तक असर नहीं करता जब तक कि भीतरी द्वंद्व ठीक से पैबस्त न किए गए हों, जिस वजह से अंधा युग जैसा रेडियो नाटक भी भारतीय रंगमंच की शीर्ष कृतियों में शुमार हुआ। अगर विहंगम रूप से देखें तो भीष्म साहनी के नाटकों की सबसे बड़ी खूबी और सीमा यही है कि उनमें समकालीन यथार्थ की फिक्रें हमेशा दिखाई देती हैं। वे एक हिंदुस्तानी दारियो फो हैं। क्या नाटक मुआवजे का व्यंग्य किसी भी तरह दारियो फो के चुकाएँगे नहीं से कम है? हालाँकि भीष्म जी अपने व्यक्तित्व में उतने तीखे नहीं हैं, पर उनकी रचनाएँ हमेशा तीखी हकीकतों को उठाती रही हैं। उनके नाटक उन दर्शकों के लिए लिखे गए हैं जिन्हें किस्सागोई में बातें सुनने-पढ़ने का लंबा अभ्यास है। यही वजह है कि उनके नाटक लगातार खेले जाते हैं और लंबे समय तक वे प्रासंगिक बने रहेंगे। 

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