Sunday, August 7, 2016

उज्जैन में 'आधे अधूरे'

जयंत देशमुख सिनेमा के जाने-माने सेट डिजाइनर हैं। उनका यह हुनर एमपीएसडी के छात्रों के लिए निर्देशित नाटक ‘आधे अधूरे’ में भी पूरे उरूज पर नुमाया था। मोहन राकेश की सुझाई सीमित सज्जा से परे उनका मंच तरह-तरह के मध्यवर्गीय सामानों से खचाखच भरा हुआ है। काले कोट वाला आदमी कम से कम आधा दर्जन स्विच ऑन करके इस भरे-पुरे मंच को रोशन करता है। असली स्विच की तरह असली वाशबेसिन और उसमें टोंटी से आता असली पानी और असली ड्रैनेज पाइप। दीवारें भी ऐसी हैं कि उनकी पुताई पुरानी होने से धब्बे उभर आए हैं। फिर किताबों की रैक, डाइनिंग टेबल...और न जाने क्या-क्या! पूरा मंच अपने में ही एक इंस्टालेशन की तरह है। छात्रों से बातचीत के सत्र में उन्होंने इस सेट का एक ‘रेप्लिका’ भी प्रदर्शित किया, जिसके जरिए चीजों को किस स्केल में कैसे बरता जाए आदि बातों की चर्चा हुई। जो भी हो, यह सेट ‘आधे अधूरे’ के यथार्थवाद पर काफी भारी था। निर्देशक ने नाटक के यथार्थ पर तो नहीं लेकिन अभिनेताओं पर उसके हावी होने की बात को कबूल किया, पर यह भी बताया कि इस छात्र-प्रस्तुति में सेट खुद ही एक प्रयोजन के रूप में था।
जयंत देशमुख ने नाटक को सामयिक बनाने की चेष्टा भी की है। सिंहानिया इसमें 50 हजार की तन्ख्वाह उठाता है और बिन्नी ऑटोवाले को देने के लिए 50 रुपए माँगती है। जगमोहन का किरदार कुछ यूँ है कि वह एक घोषित फ्लर्ट की तरह चाबी नचाते हुए आता है, और एक दृश्य में सावित्री के साथ इतना अंतरंग है कि अचानक आई बिन्नी अवाक रह जाती है। नाटक का सिंहानिया भी सोने की चेनें और गोगल्स पहने लंबे बालों वाला किंचित सिनेमाई है, जो अफसर कम पुराने दिनों का रियल एस्टेट कारोबारी ज्यादा लगता है। जयंत देशमुख की यह प्रस्तुति ‘आधे अधूरे’ का एक काफी मौलिक वर्जन है, जिसके एस्थेटिक्स में इसी तरह यहाँ-वहाँ उन्होंने अपने कुछ फुँदने लगाए हैं। दृश्य की समाप्ति यहाँ अक्सर एक आलाप में होती है, जिनमें कई बार सायास पॉज को भी नत्थी किया गया है। ये सब ‘आधे अधूरे’ के स्टैंडर्ड प्रारूप की चीजें नहीं हैं। जयंत ने पात्रों को भी कई बार ज्यादा नाटकीय बनाया है, मसलन अशोक और सिंहानिया की बातचीत में। लेकिन इन फुँदनों के अलावा परस्पर संवादों का तनाव आखिर तक बना रहा है। इस लिहाज से ‘आधे अधूरे’ की इधर के सालों में देखी यह शायद सबसे ज्यादा कसी हुई प्रस्तुति थी, जिसमें पचास साल पहले के मध्यवर्गीय घर की टेंशन को उज्जैन के दर्शक आखिर तक बैठे देखते रहे। (मंचन- 10 जुलाई 2016, कालिदास अकादमी, उज्जैन)

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