Thursday, July 30, 2015

हिमाचल की वादियों में करियाला

यह हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले का कुठाड़ इलाका है। यहाँ के दाड़वा नाम के गाँव में लोक नाट्य करियाला के कलाकार जुटे हुए हैं। जून के महीने में भी रात को इतनी ठंड है कि दो तरफ के घेरे में बैठे दर्शकों ने ऊनी दुशाले लपेटे हुए हैं। करियाला सोलन, शिमला और सिरमौर जिलों का लोक नाट्य है। इसकी प्रस्तुति रात-रात भर चलने का दस्तूर रहा है, जो कुठाड़ रियासत के ईष्टदेव ब्रजेश्वर महादेव को समर्पित होती हैं। एक वक्त था जब रियासत में श्राद्धों के अवसर पर राजा के दरबार हाल में करियाला की प्रस्तुतियों के लगातार 16 दिनों तक प्रदर्शन होते थे, और यह आयोजन दशहरा उत्सव को संपन्न होता था। अब न राजा रहा, न राजा का दरबार, पर करियाला की परंपरा आज भी बची हुई है। राजा का महल भी बचा हुआ है, पर उसे अब कुठाड़ पैलेस रिजॉर्ट के तौर पर जाना जाता है। काफी ऊँचाई पर स्थित इस पैलेस से दिन में दूर तक वादियों की हरियाली दिखाई देती है, और रात को शिमला और कसौली की रोशनियाँ।
माइक लगाया जा चुका है। अभिनेतागण मंच पर आ चुके हैं। हारमोनियम, ढोलक, नक्कारे और थोड़े छोटे आकार की शहनाई, जिसे नपीरी कहा जाता है, के साथ साजिंदे भी तैयार हैं। दर्शकों में औरतें, बच्चे, पुरुष सभी हैं। अलबत्ता कि महिलाओं का कलाकार होना करियाला में निषिद्ध है, लिहाजा स्त्री पात्र भी पुरुष कलाकारों के ही जिम्मे है। जय-जय-जय जगदंबे माता का गायन शुरू हो चुका है। माँ जगदंबे के नारी वेश में खूब सजा-धजा पुरुष कलाकार एवमस्तु की मुद्रा में हाथ उठाए हुए गोल-गोल घूम रहा है। बाकी कलाकार सामान्य वेशभूषा में माँ जगदंबे की आरती उतार रहे हैं। साथ-साथ गणपति, भवानी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश का स्तुति-गायन भी चल रहा है। सब कुछ पूरी तरह अनगढ़ है। दृश्य का उपसंहार होते ही साधु वेश में एक पात्र का मंच पर प्रवेश होता है। पीला कुर्ता, सिर पर जटाजूट, विचित्र ढंग से नाक के नीचे दाढ़ी बाँधे। फिर तरह-तरह के भयानक मुखौटों वाले पात्रों का प्रवेश होता है। उनमें से एक राक्षस दर्शकों को डराता है। सारे पात्र भयानक स्वर निकालते हैं। यह करियाला की प्रस्तुति का दूसरा चरण है, यानी साधु का स्वांग। गुरुजी और पूरबनाथ में संवाद हो रहा है। गुरुजी के हालचाल लेने गया पूरबनाथ उनका अपमान कर देता है। उनके भस्म कर देंगे को पूरबनाथ खसम कर देंगे समझ रहा है। गुरुजी को पूजन सामग्री चाहिए- करवा, कमंडल, जौ, कपड़ा और जल। पूरबनाथ को इनका इंतजाम करना है। प्रलाप की हद तक पहुँची यहाँ-वहाँ की बतकही में प्रस्तुति आगे बढ़ती है। एक पात्र छड़ी के साथ आया है। छड़ी फटकारते हुए वह गुरुजी के ज्ञान को परखता है। एक क्या है? --ओंकार, गुरुजी बताते हैं। तीन...त्रिलोक, चार... दिशाएँ, नौ...ग्रह। फिर सब मिलकर गाते हैं—भजो रे मन राम गोविंद हरे...मोहमाया के सारे बंधन झूठे, सच्चा नाम हरि। माइक में सारे स्वर दूर तक पहाड़ों में गूँज रहे हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी लोकेंद्र त्रिवेदी कान के पास आकर बताते हैं—पहले यह स्वांग पूरी तरह धार्मिक था, अब कॉमेडी हो गया है।
इस दरम्यान मिस अंजलि मंच पर नमूदार हुई हैं। उनका लटके-झटके वाला डांस देखने लायक है— कोई ले गया रे बईमान, मेरा दिल कोई ले गया। इकहरी काठी वाली मिस अंजलि एक मुकम्मल स्त्री-छवि के साथ हैं। उन्होंने एक पुराना गाना कंकड़िया मार के जगाया भी सुनाया, और जाने से पहले कहा- मैं ब्रजेश्वर महादेव से कामना करती हूँ कि यहाँ पधारे अतिथि और मेरे भाई-बहन सदैव खुश और परिपूर्ण रहें। 
करियाला पहले शादी, मुंडन या अन्य धार्मिक-सामाजिक उत्सवों के मौकों पर आयोजित किया जाता था। शाम होते-होते करियालची गाँव पहुँच जाते। उनकी शहनाई और नगाड़े के स्वर दूर-दूर तक उनके आने और रात के स्वांग का ऐलान कर देते और लोगबाग तैयार होकर प्रस्तुति स्थल पर पहुँच जाते। आयोजन स्थल तीन तरफ से दरियों, कुर्सियों और गद्दों वगैरह के जरिए दर्शकों के लिए मुकर्रर होता है और चौथी तरफ मंच और उसके पीछे वो कमरा, जहाँ अभिनेतागण मेकअप वगैरह करते हैं। पूरा लोक नाट्य दो-तीन चरणों में संपन्न होता है। पहला, चंद्रावल स्वांग (जिसमें शिव और शक्ति को मंचस्थ किया जाता है), फिर साधु का स्वांग, अंग्रेज का स्वांग, नंबरदार का स्वांग। अंग्रेज का स्वांग अंग्रेजी राज के दौरान और बाद में लोकप्रिय रहा। नंबरदार के स्वांग में एक नटी को लेकर दो नटों में विवाद हो रहा है। फैसले के लिए दोनों में लड़ाई होने लगती है। यह काफी दिलचस्प लड़ाई है। दोनों एक दूसरे पर गिर रहे हैं। आखिर में फैसला नंबरदार को करना है। नंबरदार को आवाज लगाई जाती है। लेकिन नंबरदार के बजाय एक गोरखन आई है। वह बताती है कि नंबरदार कहीं गया हुआ है। पूरी प्रस्तुति का कोई आलेख नहीं है। कथानक के नाम पर महज एक स्थूल सूत्र है, जिसपर देर तक इधर-उधर का गपशप नुमा नाटकीय वार्तालाप चला करता है। इस वार्तालाप का सारा रस गोरखा बने जियालाल ठाकुर और गोरखन बने भुवनेश आनंद की अभिनय प्रतिभा से सृजित होता है। दोनों ही ऊँचे दर्जे के कलाकार हैं। न सिर्फ अभिनय में बल्कि गायकी में भी। उनकी गायकी में शास्त्रीयता का पुट है—वे बाकायदा बाखबर हैं कि कौन सा राग कहाँ पर इस्तेमाल किया जाना है।
संक्षेप में कहें तो करियाला परंपरा से जुड़े रहने की चाहत, सामुदायिकता के भदेस और शास्त्रीयता की आकांक्षा की कला है। उसका शास्त्र महज एक मोटी रूपरेखा के तौर पर है। उसके कलाकार आशु-कलाकार हैं, और उसका शिल्प सतत चलने वाले इंप्रोवाइजेशन से आकार लेता है। सीधे-सादे ग्रामीणों के बीच खेले जाने वाले इस नाट्य का तात्विक गुण उसकी सरलता और अनगढ़पन है। प्रस्तुति चल रही है कि करियाला की परंपरा के वरिष्ठ जानकार पारसराम तोमर अभिनेताओं को रोककर अचानक किसी संदर्भ के बारे में बताने लगते हैं। उनके बता चुकने के बाद अभिनय उसी रुके हुए बिंदु से फिर शुरू हो जाता है। दर्शकों में बच्चे हैं, माताएँ और बहुएँ हैं, अलग-अलग उम्रों के पुरुष हैं। करियाला महानगरों के जटिल तंत्र से दूर इस सीधी-सादी दुनिया का ही नाट्य है।
संगीत नाटक अकादेमी के सहयोग से दिल्ली की संस्था अभिज्ञान नाट्य एसोसिएशन ने स्थानीय संस्था हिमानी कला मंच के साथ इसी जून के शुरुआती हफ्ते में इस कार्यक्रम का आयोजन किया। हिमालयी कला मंच (सोलन), ब्रजेश्वर नाट्य मंडल (शिमला) आदि मंडलियों ने इसमें भाग लिया।    

Tuesday, July 28, 2015

नीलकंठ निराला

हिंदी थिएटर में देशज होने का मतलब है एक तरह की अस्तव्यस्तता। धोती-मुरैठा बाँधे पात्र मंच पर किसी भी छोर से चले आ रहे हैं, जुमलों की तरह के संवाद बोले जाते हैं और वैसी ही स्थितियों की घिचपिच वाला कथानक अंत में किसी लोकगीत के कोरस में निष्पत्ति पाता है। सभ्य भाषा में देशज के इस व्याकरण को अनगढ़पन कहा जाता है। मध्यप्रदेश ड्रामा स्कूल के निदेशक संजय उपाध्याय का यह योगदान माना जा सकता है कि उन्होंने हिंदी रंगमंच में अनगढ़पन के अनपढ़पन के बरक्स देशज संवेदना का प्रभावी परिष्कार किया है। कितनी भी बड़ी टीम हो, कितनी भी जटिल कथावस्तु हो, संजय का मिडास टच मंच पर उसका कुछ-न-कुछ परिपाक कर ही देता है। पिछले सालों में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के छात्रों के साथ किये हृषिकेश सुलभ के नाटक माटी गाड़ी को उन्होंने एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया था, और पीयूष मिश्रा के अपेक्षाकृत बिखरे आलेख गगन दमामा बाज्यो को सामूहिकता की युक्तियों से एक दिलचस्प रंगत दी थी। नाट्य विद्यालय के इस साल जबलपुर में हुए सत्र समापन समारोह में  हुई नीलकंठ निराला भी इसी क्रम में एक संवेदनशील प्रस्तुति थी। नीलकंठ निराला बिहार में लोहासिंह के नाम से मशहूर रहे रामेश्वर सिंह काश्यप का नाटक है। नाटक में निराला की कविताओं और उनके जीवन को कुछ इस ढंग से पिरोया गया है कि यहाँ घटनाओं का कोई निश्चित क्रम नहीं है। नाटक न सिर्फ संवादों में बल्कि अपने मुहावरे में भी एक छंद में आबद्ध मालूम देता है। इस लिहाज से यह निश्चित ही एक मुश्किल नाट्यालेख रहा होगा। लेकिन संजय इसका ऐसा निरूपण करते हैं कि एक घंटा चालीस मिनट दर्शक को हिलने की मोहलत नहीं होती।
प्रस्तुति में संजय एक गुजरे वक्त को, निराला की दग्धता और मुग्धता से युक्त खाँटी छवियों को, कई शहरी और गँवई पात्रों को कुछ यों संयोजित करते हैं कि उनके तमाम छात्र भी उसमें समायोजित हो सकें। निराला हिंदी के आत्महंता, महाप्राण और नीलकंठ हैं। उन्होंने निजी जीवन में जो दुख झेला वह उनकी साहित्यिक छवि में शामिल हुआ। यह नाटक एक दौर की साहित्यिक भावदशाओं का भी पता देता है। नाटक में निराला के घर में चारों ओर अभाव ही अभाव हैं, लेकिन इससे उनका आत्मसम्मान झुकनेवाला नहीं। अपने एक शुभचिंतक की मदद को वे निराला कभी दान नहीं लेता कहकर ठुकरा देते हैं और कहीं से मिले पैसे और घर का एकमात्र कंबल भिखारिन बुढ़िया को दे देते हैं। वे कृतघ्नों की भाषा हिंदी से दग्ध हैं और अंग्रेजी में ही लिखने की बात कहते हैं, और कहते हैं मेरे हस्ताक्षरों का मोल लोग ढाई सौ साल बाद जानेंगे। निराला की विक्षिप्तावस्था के दिनों के इन ब्योरों में निराला के मित्र हजारी पहलवान, मनोहरा, एक अफसर, उसकी साहित्यप्रेमी पत्नी, चायवाला, डाकिया आदि पात्र दिखाई देते हैं। चाय वाला लड़का लेटे हुए निराला के पैर पर सिर रखकर पाँय लागी दादा कहता है। ये छवियाँ निश्चित ही काफी अचूक हैं। खुद आंशिक विक्षिप्त निराला भी, जो अपने वक्त के एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। लोग उनको आयोजनों में निमंत्रित करते हैं, लेकिन निराला की उनमें कोई रुचि नहीं।
संजय उपाध्याय के यहाँ स्टेज पूरी तरह उनके नियंत्रण में दिखता है। वे प्रस्तुति के सुर को जानते हैं। रंगमंच में ये सुर बहुत से अंगों-उपांगों की समांतरता में सधता है। मंच पर छह निराला हैं पर कहीं कोई लड़खड़ाहट नहीं। उनकी खड़ाऊँ है, एक मौके पर वे हजारी से हाथापाई पर उतर आते हैं। प्रवेश-प्रस्थान में कहीं कोई व्यवधान नहीं, न टाइमिंग का कोई अन्य व्यतिक्रम, एक-एक भंगिमा अपनी जगह पूरी तरह दुरुस्त। सरोज स्मृति के प्रसंग में एक जगह मेरे पड़ोस में बैठे हृषिकेश सुलभ चश्मा उतारकर आँसू पोंछते दिखे।   

हिंदी एक भाषा नहीं, भावदशाओं की एक दुनिया है और निराला उसकी तदनुरूप व्याखायाओं के नायक। इस दुनिया में जीने का सुख अनिर्वचनीय है। संभवतः उसके दुख में भी करुणा या वैसा ही कोई रस मौजूद होता है। संजय इस दुनिया को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। उनकी यह संवेदना ही उनकी देशज निपुणता को इतना ठोस बनाती है।