Wednesday, May 6, 2015

पति, पत्नी और साजिश

मंच पर जवानी पार चुका एक बंदा अपनी जवान बीवी के साथ मौजूद है। दोनों सोफे पर बैठे ड्रिंक ले रहे हैं और पास में ही बार सजी है। दोनों रह-रह कर एक-दूसरे की बाबत अपनी मोहब्बत की ताईद कर रहे हैं। मतलब साफ है कि रिश्ते के भीतर कहीं कोई लोचा है। पति को चौथा पेग गले से नीचे उतारने में दिक्कत आ रही है, यानी सेहत ठीक नहीं रहती। इसी दरम्यान बीवी का मोबाइल बजता है जिसपर उसका होनहार प्रेमी संवाद बोलता है- चिड़िया घर से निकल चुकी है, जल्द ही पहुँचने वाली है। इस तरह एक सस्पेंस नाटक में शुरू होता है।
बंगाल के राजनेता-रंगकर्मी बृत्य बसु के नाटक चतुष्कोण का यह सस्पेंस मुकाम तक पहुँचने से पहले कई उतार-चढावों से होकर गुजरता है। नाटक में कुल तीन पात्र हैं और कुछ गफलतें। इनमें सबसे दिलचस्प गफलत तीसरे पात्र की है, जो खुद को इंटेलिजेंट और कलाकार समझता है; लिहाजा उसे हमेशा धंधे और पैसे की बात करने वाले नायिका के पति से नफरत हो गई है। वह उन इकहरी शख्सियत वाले लोगों का नुमाइंदा है जो किसी जुमले के स्टीरियोटाइप में अपने लिए विचार खोज लेते हैं। अपनी खोखली नफरत के बूते वह हत्या करने जा रहा है। निर्देशक सुरेश भारद्वाज की प्रस्तुति में यह दृश्य काफी चुस्ती के साथ मौजूद है। मरने वाला और मारने वाला दोनों बुरी तरह डरे हुए हैं। रमेश मनचंदा ने तो यह किरदार वाकई काफी मन से किया है। यह रूटीन से जुदा किरदार है। वह बिजनेसमैन जरूर है पर उसके अलावा एक सरल व्यक्ति है। फिल्म बनाने के मसले में अवैध संबंध की थीम में उसे मुनाफा दिखता है, पर अपनी बीवी के अवैध संबंध की थीम पर आशंका के बावजूद वह ज्यादा तवज्जो नहीं दे सकता। जाहिर है उसकी उम्र की अपनी मजबूरियाँ हैं। सुगर बढ़े हुए मरीज के तौर पर मौत को सामने खड़ा देख उसका चेहरा बुरी तरह थरथरा रहा है। इस पूरे घटनाचक्र की सूत्रधार यानी उम्रदराज बिजनेसमैन की बीवी के पात्र में निधि मिश्रा रंगमंडल के अपने दिनों से अब काफी बदल चुकी हैं। अब वे काफी स्वाभाविक, परिपक्व और आत्मविश्वास से परिपूर्ण मालूम देती हैं। एक क्षण को उन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। पात्र के दोहरे चरित्र से उत्पन्न नाटकीय स्थितियों को उन्होंने मंच पर काफी अच्छे से निभाया है, जो मोबाइल पर अपने प्रेमी से बात करते हुए उसे ढाबे वाले के रूप में संबोधित कर रही है।
सुरेश भारद्वाज की प्रस्तुतियों में मंच हमेशा ही काफी सुकूनदेह होता है। वे प्रायः शहरी ढाँचे की प्रस्तुतियाँ ही करते हैं, जहाँ आवश्यक चीजें बड़ी ही दुरुस्तगी के साथ मंच सज्जा में पैबस्त होती हैं। यहाँ भी ड्राइंगरूप के दृश्य में न कुछ अतिरिक्त है, न कुछ कम। दूसरी चीज, जिसके वे विशेषज्ञ ही माने जाते हैं, यानी लाइट्स का शांत इस्तेमाल भी यहाँ आहिस्ता से नत्थी है।
लेकिन इन सारी बातों के बावजूद इस नाटक के कथ्य को पूरी तरह फ्लॉलेस नहीं कहा जा सकता। यह बात गले नहीं उतरती कि एक धनी और आशंकित पति अपनी जवान बीवी को एक जवान आदमी के साथ छोड़कर ढाबे से खाना लेने जैसे मामूली काम के लिए निकल जाएगा।

Monday, May 4, 2015

कोई बात चले उर्फ मोहब्बत की वर्तनी


रामजी बाली लिखित, निर्देशित, अभिनीत प्रस्तुति कोई बात चले को देखते हुए विजय तेंदुलकर के नाटक पंछी ऐसे आते हैं की याद आती है। पर यह एक लाइट कॉमेडी है। इसका नायक कन्हाईलाल बंसीप्रसाद 35 साल की उम्र में एक बीवी की तलाश में है। उसकी शर्तें बहुत मामूली हैं, जो जल्दी-जल्दी बदलती रहती हैं। कभी उसे गाल पर तिल वाली लड़की चाहिए, फिर वह इसमें आँखों में चमक की शर्त जोड़ देता है। मैरिज ब्यूरो का पंजाबी लहजे वाला प्यारेलाल शर्मा शरीफ आदमी है जो उसकी हर डिमांड के मुताबिक लड़कियाँ ढूँढ़ निकालता है। इनसे मिलने की जगह कभी तीस हजारी मेट्रो स्टेशन के नीचे फिक्स होती है कभी किसी रेस्त्राँ में। रेस्त्राँ में ड्रिंक ले रही लड़की अपना नाम प्रियांका बताती है और नायक को भूल में बार-बार बंसीप्रसाद के बजाय मुरलीप्रसाद बुलाती है; और उनकी विवाह संबंधी चर्चा नामों की वर्तनी और व्याकरण में ही उलझकर दम तोड़ देती है।
नायक की दिक्कत है कि वो काफी देसी इंसान है। पसंद की लड़की से मोहब्बत के इजहार में उसके तोते उड़े रहते हैं। अपने देसीपन में जब वह खालिस हिंदीनिष्ठ संवाद बोलता है तो एक अच्छी नाटकीयता बनती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वह कोई वैसा गँवारू देसी नहीं है जैसे सायास किरदार आजकल कॉमेडी के मकसद से काफी रचे जाते हैं। इस किरदार की अपनी पसंद-नापसंद काफी स्पष्ट है। प्रस्तुति देखते हुए मालूम देता है कि अभिनेता यशपाल शर्मा से ज्यादा फिट इस रोल के लिए कोई नहीं हो सकता। मात्र चेहरे-मोहरे में ही नहीं, अपने कुल व्यक्तित्व में भी। मैं उनसे एक-दो मौकों पर मिला हूँ। हर बार वे इतने ओरिजिनल व्यक्ति मालूम दिए कि लगा किसी भी तरह की ढोंगपूर्ण स्थिति उनके लिए मुसीबत खड़ी कर देती होगी। बहरहाल इन्हीं सब हालात के बीच नाटक में सिचुएशन के मुताबिक ओ मेरी हंसिनी, भीगी-भीगी रातों में और किसी शायर की गजल...ड्रीम गर्ल वगैरह गाने भी सुनाई देते हैं और एक प्रवाह बना रहता है।
लेखक के तौर पर रामजी बाली ने भाषा की लच्छेदारी में अच्छी महारत हासिल कर ली है; और खास बात यह कि ऐसा करते हुए वे जुमलेबाजी में प्रायः नहीं फँसे हैं। पिछले सालों के दौरान उन्होंने कुछ साहित्यिक शख्सियतों पर भी नाटक तैयार किए हैं, जिनमें वे कई बार पाठ की भाषा के चंगुल में फँसे दिखाई दिए थे। साहित्यिकता की वैसी त्रुटि से यह प्रस्तुति प्रायः बरी है। अलबत्ता मंच पर खुद प्यारेलाल शर्मा की भूमिका में वे पूरा खुल नहीं पाए हैं। वे थोड़ा मुखर होते तो यह किरदार कुछ ज्यादा दिलचस्प हो सकता था। वरना वेशभूषा और पंजाबी लहजे में यह एक ठीकठाक रोचक किरदार है। इनके अलावा एक-दूसरे से पूरी तरह जुदा स्त्री भूमिकाओं में ऋतु शर्मा भी प्रस्तुति में अच्छी एनर्जी के साथ थीं।  

यह प्रस्तुति करीब साल भर पहले भी एक बार देखी थी। लेकिन इस बार यह ज्यादा बाँधने वाली लगी।