Tuesday, April 21, 2015

अदम गोंडवी की याद

पिछले से पिछले हफ्ते की बात है, गोविंद यादव ने जब बताया कि वह अदम गोंडवी की कविता चमारों की गली का मंचन करने जा रहे हैं तो मैंने इसकी इत्तेला अदम गोंडवी के भतीजे दिलीप सिंह को भी दे दी। चमारों की गलीसन 1965 में गाँव के एक ठाकुर द्वारा एक दलित लड़की से बलात्कार और उससे जुड़े अन्याय की सच्ची घटना पर लिखी गई लंबी कविता है। इसे लिखने के बाद अदम गोंडवी, जिनका असल नाम रामनाथ सिंह था, को बिरादरी और टोले में अलग-थलग कर दिया गया था, और यह स्थिति आजीवन बनी रही। प्रस्तुति के बाद प्रेक्षागृह से बाहर आते हुए मैंने दिलीप से पूछा कि कविता के पात्रों के अब क्या हाल हैं। उन्होंने बताया- कृष्णा अभी हैं, लेकिन मंगल की मौत हो चुकी है;  और सुखराज सिंह का डंका आज भी गाँव में बोलता है। दिलीप ने अपनी जेब से सौ का नोट निकालते हुए मुझसे पूछा कि हमारे पास ज्यादा तो नहीं है पर क्या हम ये सौ रुपए आभारस्वरूप या पुरस्कारस्वरूप उस लड़की को दे दें जो मंच पर एकल अभिनय कर रही थी। मैंने उन्हें मना किया कि इसका कोई तुक नहीं है।
अदम जी का निधन 18 दिसंबर 2011 को लखनऊ के पीजीआई अस्पताल में हुआ था। अस्पताल वालों ने उन्हें भर्ती करने से इनकार कर दिया था। लेकिन मीडिया में खबर बनने और कई लोगों द्वारा आर्थिक मदद देने के बाद उन्हें भर्ती कर लिया गया। तब तक अन्ना आंदोलन शुरू हो चुका था। अस्पताल के बिस्तर से ही अदम जी ने लिखा- ये महाभारत है, जिसके पात्र सारे आ गए/ योगगुरु भागे तो फिर अन्ना हजारे आ गए।
दिलीप ने बताया कि उनके जीवन के अंतिम वर्षों में घर के हालात बहुत कष्टपूर्ण थे। ऐसे अभाव थे कि कई बार फाकाकशी तक की नौबत आ जाती थी। गाँव के दबंगों के अन्याय अदम जी की कविता के रमसुधी को ही नहीं खुद उन्हें भी झेलने पड़े थे। जमीन या तो बिकती रही या सीलिंग का बंजर उनके हिस्से में आता रहा। जमीन को बेचा जा सकता था पर जमीर का क्या करते! अदम जी हिंदी की मुख्यधारा के साहित्यकार नहीं थे। मुख्यधारा का साहित्यकार पुरस्कारों और सच्ची-झूठी प्रशंसाओं वगैरह से बहला रहता है, पर अदम जी के लिए वह मुमकिन नहीं था। उनके जैसे व्यक्ति के भीतर जीवन का यथार्थ इतने ठोस तरह से व्याप्त होता है कि उसके विद्रूप से मुँह फेरकर निजी हसरतों में लीन रहना उनके लिए संभव नहीं होता। यशःप्रार्थिता उनकी चीज नहीं थी और न ही कविता के क्षेत्र में उन्हें कभी किसी अनुमोदक या समीक्षक की जरूरत हुई। उनकी कविता इतनी आवेगशील और इतनी दो टूक थी कि पाठक/श्रोता को सीधे अपने असर में लेती थी। लेकिन इस वजह से मिली लोकप्रियता भी उन्हें कोई भुलावा नहीं दे पाई, क्योंकि कहीं कुछ बदल नहीं रहा था बल्कि राष्ट्रीय और सामाजिक हालात और बदतर होते जा रहे थे। ऐसे में एक ही चीज उनके लिए बचती थी, वह थी—शराब। उन्होंने खुद को उसी के सिपुर्द कर दिया।
दिलीप को लगता है कि वो अपने चाचा की लीगेसी को कैसे बनाए रखें। लीगेसी यानी अदम जी की पक्षधरता को। बावजूद इसके कि प्रशासन आदि की मदद से घर के हालात आज बहुत सुधर गए हैं, यह द्वंद्व आज भी उनके लिए जस का तस है।    



1 comment:

  1. adam gaundvi ke sambandh me nishpaksh roop se likha aapka aalekh pasand aaya .

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