Thursday, February 27, 2014

भाव-आडंबर की लयकारी

पिछले महीने हुए भारत रंग महोत्सव की शुरुआत इसी प्रस्तुति से हुई थी। कावलम नारायण पणिक्कर निर्देशित प्रस्तुति छाया शाकुंतल। पणिक्कर संस्कृत की उस शास्त्रीयता के सबसे बड़े रंगकार माने जाते हैजो कई तरह की आलंकारिकताओं का एक संयोजन होती है। उदयन वाजपेयी के रूपांतरण पर आधारित इस प्रस्तुति में छोटी-छोटी स्थितियां देर-देर तक मंथर फैलाव में चलती रहती हैं। इस चाक्षुष यज्ञ में हाथों का लहराया जाना है; नेत्रों की चतुर-चपल-कारुणिक भंगिमाएँ हैं; सखियों की मधुर ठिठोली और नायिका की सलज्ज मुद्राएं हैं रौद्र रस वाले दुर्वासा और विशाल दाढ़ी वाले कण्व ऋषि हैं। शास्त्रीय का अर्थ है—रस सिद्धांत के रसों का संयोजन। मनुष्य-स्वभावों का कोईकन्फ्लिक्ट या द्वंद्व यहां नहीं है। कथावस्तु का एकमात्र द्वंद्व या पंगा है- नायक का अपनी प्रेमिका को भूल जाना। यह भूल जाना भी यथार्थ की किसी वजह से नहीं बल्कि दुर्वासा के शाप के कारण है। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। बात यह है कि कथावस्तु का महत्त्व ही यहां निमित्त मात्र के तौर पर है। असली चीज है इस निमित्त का बनाव श्रृंगार। कथ्य के दुख, वियोग, सौंदर्य सब इस शास्त्रीयता में करीने से सजाए हुए हैं। यह वास्तविकता से परे जीवन की एक आभासी संकल्पना है, जिसे भारतीय शास्त्रीय परंपरा कहा जाता है। कालिदास भारत की इस रेटॉरिक आधारित परंपरा के सबसे बड़े कवि-नाटककार हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सिपुर्द बहुत से कामों में से एक इस परंपरा के संरक्षण का भी है, जिसके अधीन विद्यालय रंगमंडल ने इस प्रस्तुति को तैयार किया।
इस शास्त्रीयता में भाव-आडंबर की लयकारी ही उसकी पराकाष्ठा है। शुरू के दृश्यों में तबले की थाप के समांतर एक लय में दौड़ती सलज्ज नायिका और पीछे-पीछे नायक दिखाई देते हैं। हरी चोली, हरे कबंध और केशों में गुलदाउदी की वेणी लगाए शकुंतला गुहार लगा रही है- सखियो अनुसूया...प्रियंवदा, मुझे इस भंवरे से बचाओ!’ मटके उठाए हुए सखियां गेंदे के फूलों की माला और वेणी पहने हैं। नायिका की इस दशा पर वे चुहुल कर रही हैं कि तभी भौंरे से छुटकारा दिलाने की मार्फत नायक दुष्यंत का प्रवेश होता है। मंच पर प्रापर्टी लगभग कुछ भी नहीं है। सारा माहौल गतियों, भंगिमाओं और वेशभूषा पर आश्रित है। इसी क्रम में हिरण शावक बनी अभिनेत्रियों की पुतलियों और चाल में दिलचस्प चपलता है। ऐसे माहौल में नायिका को काम-ज्वर ने तपा डाला है, तो नायक तो उसमें जल ही गया है। दूसरी ओर राजा का मित्र विदूषक है, जो राजा के आश्रम में गए होने के दौरान एक नाटकीय एकालाप में व्यस्त है; और मोदक की कल्पना करके जीभ लपलपा रहा है। लेकिन वस्तुतः इस विदूषक की तमाम हरकतें कोई हास्य पैदा नहीं कर पातीं। अलबत्ता कई जगह पर भावों की दीर्घ शास्त्रीय अभिव्यक्ति का लास्य जरूर असंगत सामयिकता में हास्य की वजह बना नजर आता है। दुर्वासा के प्रवेश का दृश्य इस लिहाज से बेहतर बना है, जिसमें लाल दाढ़ी, वस्त्रों और रोशनी में वे नक्कारे की धमक के समांतर रौद्र कदमों से अपने प्रेमी की यादों में खोई शकुंतला की परिक्रमा करके चले जाते हैं।
प्रस्तुति में शैली का बंधापन अभिनेताओं के लिए भले ही एक चुनौती की तरह होता हो, लेकिन दर्शकों के लिए इसमें कुछ विशेष रुचिकर नजर नहीं आता। इसकी वजह है समकालीनता से इसका रत्तीभर तालमेल न होना। एक भाववादी सौंदर्यशास्त्र की रचना को नितांत भौतिकतावादी समय की गतियों में घिरे हम बहुत दूर से देख रहे मालूम देते हैं। उसपर उदयन वाजपेयी के रूपांतरण में उसने पुट्ठों को गर्दन की ओर घुमा लिया है जैसी काव्य पंक्तियां या इसका शरीर बेहद कमजोर लग रहा है. इसे ज्वर है. जैसे संवाद मानो रस-वैचित्र्य का निर्माण करते हैं। वैसे शकुंतला की भूमिका में तीतस दत्ता का स्वर और गायकी जरूर अलग से ध्यान खींचते हैं।

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