Monday, September 23, 2013

फैज के बारे में

फैज अहमद फैज की जन्मशताब्दी के प्रसंग से पिछले एक-डेढ़ सालों में उनपर केंद्रित कई नाटक खेले गए हैं; बावजूद इसके कि फैज के किरदार में कोई नाटकीय पहलू खास नजर नहीं आता। इन प्रस्तुतियों को देखने से जितना समझ आता है वह ये कि वे कोट-पैंट पहनने वाले और अमूमन सुलझी शख्सियत के इंसान थे। न कि दुनिया की बेढंगी चालों से बेजार पी-पी कर अपना कलेजा गर्क करने वाले मंटो की तरह के शख्स। फैज की शायरी भी- जितना मालूम देता है- उदभावनाओं की शायरी है। न वे मजाज हैं, न शमशेर...और भुवनेश्वर तो बिल्कुल ही नहीं; संयोग से जिनकी जन्म शताब्दियाँ भी इधर हाल में बगैर किसी संस्मरण के चुपचाप गुजरी हैं। अपनी रौ में सांसारिकता से बेखुद अदीबाना शख्सियत फैज की नहीं थी। वे एक चुस्त, चौकन्ने, जुझारू, प्रगतिशील और रोमांटिक तबियत के व्यक्ति थे। रामजी बाली लिखित, निर्देशित, अभिनीत प्रस्तुति मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग फैज के जीवन पर देखी कुछ पिछली प्रस्तुतियों से ज्यादा चुस्त मालूम देती है। उन्हें इस साल संगीत नाटक अकादेमी ने नाट्य लेखन के लिए उस्ताद बिस्मिल्ला खां युवा पुरस्कार से सम्मानित किया है। हिंदी में शख्सियत आधारित नाटक अमूमन बायोडाटा से निकले वृत्त नाटक होते हैं। खुद रामजी बाली ने कुछ अरसा पहले आवारा मसीहा की मार्फत शरतचंद्र को इसी शै में पेश किया था। नील साइमन ने जिस तरह चेखव की सिर्फ आठ कहानियों के जरिए उनके संवेदनात्मक विस्तार की एक पूरी रचनात्मक दुनिया आबाद की है वैसा किसी ने नहीं किया। बहरहाल, जो भी हो, रामजी बाली की यह प्रस्तुति हिंदी रंगमंच की बायोडाटा-परंपरा से किंचित अलग है। इसके फैज सीधे मैं शैली में मंच पर मौजूद हैं, जो अपने वालिदे मोहतरम की गुरबत में गुजरी जिंदगी के बारे में बताते हैं, और बताते हैं कि हमारी जिंदगी में एक माशूका भी है’; स्यालकोट और अमृतसर जिनकी परवरिश और रिहायश के शहर रहे कम्युनिस्ट घोषणापत्र पढ़ने से जिनके खयालात में क्रांतिकारी बदलाव आया; जिन्होंने ब्रिटिश शासन के दिनों में सेना में कैप्टेन का पद संभाला। उनके ऐसा करने के पीछे दो तर्क थे। पहला, जापान और जर्मनी सरीखी फासिस्ट ताकतों को रोकने के लिए बरतानिया का समर्थनऔर दूसरा, सेना का हिस्सा बनकर वहां बगावत खड़ी करना। बाद में उन्हें इसी तकाजे से जेल भी जाना पड़ा। प्रत्यक्षतः ये सारा क्रम वृत्त नाटक जैसा ही है, पर वास्तव में प्रस्तुति एक कोलाज जैसी शक्ल में है, जिसमें तथ्यों को ढीले-ढाले ढंग से इकट्ठा करके शायरी के जरिए एक कलात्मक रंगत दी गई है। फैज की भूमिका में रामजी बाली उर्दू के मुश्किल लफ्जों की भी एक अच्छी लय बनाए रखते हैं। न सिर्फ इतना, बल्कि हारमोनियम संभाले राजेश पाठक का सटीक सुरों में गायन भी कुछ मौकों पर प्रस्तुति को काफी संयत किस्म की सांगीतिक आभा देता है। सारंगी और तबला वादन को एक साथ अंजाम देते अनिल मिश्रा के साथ उनकी जोड़ी न सिर्फ इस प्रस्तुति के बल्कि दिल्ली के पेशेवर रंगमंच के ज्यादातर संगीत पक्ष को अपने मजबूत कंधों पर संभाले हुए हैं। प्रस्तुति में शेष अभिनेताओं के लिए मंच पर करने को कुछ खास नहीं है। अभिनय के नाम पर उन्हें कुछ सीधे-सपाट संवाद बोलने हैं, जिनसे फैज के जीवन की एक सरसरी रूपरेखा बनती है; और इस काम को अपने कच्चेपन के बावजूद उन्होंनेतत्परता से अंजाम दिया है। अलबत्ता अपने तईं रामजी बाली ने प्रस्तुति को एक शैली में ढालने की कोशिश की है। वहां तमाम मसलों और मौकों के लिए शायरी का कोई टुकड़ा हाजिर है। इस तरह संगीत नाटक अकादेमी के अष्टावक्र हॉल में डेढ़ घंटे तक मंच पर मुस्तैदी बनी रहती है।
रामजी बाली दिल्ली के थिएटर परिदृश्य के काफी सक्रिय और अलग-अलग तरह का काम करने वाले रंगकर्मी हैं। उनकी एक तीन पात्रीय प्रस्तुति कोई बात चले भी अभी कुछ अरसा पहले ही मंचित हुई थी, जिसमें प्रसिद्ध अभिनेता यशपाल शर्मा एक योग्य बीवी की तलाश में यहां-वहां की खाक छानते प्रौढ़ होने जा रहे बैचलर की भूमिका में थे। इसका निर्देशन और नाट्यालेख रामजी बाली का ही था, जिसमें परिहास के मुहावरे की एक अच्छी समझ दिखाई देती है। कई बार उनका हास्य साहित्यिकता में फंसता मालूम देता है, जब वे कुछ जुमलों से हास्य निकालने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनकी यह प्रस्तुति अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद हल्के-फुल्के हास्य का एक अच्छा उदाहरण कही जा सकती है; और ये दोनों प्रस्तुतियां रामजी के रंगकर्म के वैविध्य की।

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