Wednesday, May 22, 2013

हूबहू जीवन की सच्ची कहानी

प्रेमचंद सहजवाला का उपन्यास नौकरीनामा बुद्धू का’ पढ़ते हुए सहज ही उसके आत्मकथात्मक होने का अनुमान होता है. यह उसके नायक बुद्धू उर्फ समर्थ के लड़कपन से लेकर रिटायरमेंट तक की बहुतेरे रोजनामचों में फैली जीवनकथा हैजिसमें छोटे-छोटे प्रसंगों की भी काफी शिद्दत  से डिटेलिंग की गई है. ऐसा लगता है कि लेखक ने बगैर संपादन किए डायरियों में दर्ज अपने ही जीवन को एक सिलसिले में पेश कर दिया है. इसमें कोई कहानी नहीं बुनी गई हैलेकिन यह काफी कुछ हूबहू जीवन खुद ही ऐसी दिलचस्प कहानी है कि उपन्यास शुरू करने के बाद उसे छोड़ते नहीं बनता. प्रेमचंद सहजवाला एक दुनियादारी के भीतर से घट रही स्थितियों और दिख रहे लोगों को करीब जाकर और काफी इतमीनान से देखते हैंऔर इस क्रम में तरह-तरह की जुगतों में लगे लोग कॉमिक्स के किरदारों की तरह निकल-निकलकर आते रहते हैं. खुद बुद्धू भी इसका अपवाद नहीं है. वो जनसंघी नेता बलराज मधोक के भाषण के दौरान बेवजह इंदिरा गांधी जिंदाबाद’ का नारा लगा देता है और पुलिस वाले उसे पकड़ कर थाने ले जाते हैं. जिंदगी के जिस बेतुकेपन (absurdity) को समझने-समझाने में कई पश्चिम के लेखकों ने अच्छी-खासी माथापच्ची की है वह इस उपन्यास में अनंत छवियों में अनायास बिखरा पड़ा है. बुद्धू की निजी और दफ्तरी जिंदगी की मार्फत यह उपन्यास बेतुकेपन में जीवन जीने के हिंदुस्तानी ढंग का एक वृत्तांत है और सरकारी नौकरियों के तंत्र का एक कच्चा चिट्ठा भी है. इस तंत्र के तामझाम काफी विशाल हैंपर उत्पादकता का कोई निश्चित ध्येय नहीं है. इस तरह पैदा हुए एक विशाल परजीवी वर्ग और उसकी कार्यप्रणाली’ में विन्यस्त निठल्लेपन की संस्कृति को लेखक ने काफी बारीकी से लेकिन मजे लेते हुए इस उपन्यास में पेश किया है. इस परिदृश्य में ऐसे रोचक मनुष्यों की भरमार है जिनकी बुद्धि अपने निजी फायदों से अलहदा कुछ भी देखने को व्यर्थ मानती है और अपनी घटिया बेमुरव्वती को अपनी काबिलियत समझती है. खुद भी एक सरकारी दफ्तर में रहे प्रेमचंद सहजवाला बगैर किसी कल्पना या फंतासी के अपनी लेखकीय सूझ का मैग्नीफाइंग ग्लास लिए गौर से इन रोचक चेहरों को अपने उपन्यास में देखा करते हैं.बुद्धू में नायक वाला कोई गुण नहीं है. वह एक सतर्क सांसारिक है,  और अपने को बचाते हुए हालात में फिट किए रहता है. उसका पंजाब के आउटस्टेशन में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जहाँ दफ्तर में शराब की महफिल लगती है. शराब पीता हुआ इंजीनियर कह रहा है- हमने खूब खा लिया. हमें सस्पेंड करना है कर लो. हमारा ये पकड़ लो....लो’.  इन दफ्तरों में पुलिसवालों की मदद से लड़कियों का धंधा भी होता है और जुआ भी खेला जाता है. बुद्धू लोगों के लालच और कमीनगी को थोड़े कौतुक से देखा करता है. उसकी विशेषता है कि उसे चीजों के संज्ञान में आनंद आता है. यथार्थ कैसे घटित हो रहा है, वह इसे लगातार परखता रहता है. तरह-तरह से जिंदगी जीते तरह-तरह के लोग. उन्हें इस बात तक का इल्म तक नहीं कि दरअसल वे कितने बड़े मूर्ख हैं. उसके दफ्तर का साथी बत्रा उससे कहता है- मुंशी प्रेमचंद के बाद अगर कोई काम का राइटर पैदा हुआ है न, तो वह है गुलशन नंदा. और बुद्धू उसकी बात सुनकर बहुत तकलीफ से अपनी हँसी रोकता है. बुद्धू खुद भी एक नमूना है. दफ्तर में खुद की हिंदी की ड्राफ्टिंग की तारीफ किए जाने पर वह कहना चाहता है कि मैं तो अंग्रेजी की भी बहुत अच्छी ड्राफ्टिंग कर लेता हूँ, मैं तो हीरा हूँ हीरा. अपने आसपास के ऊटपटांग यथार्थ में वह कई बार खुद को मुसीबतों में घिरा हुआ पाता है. दिल्ली के दफ्तर के घटिया माहौल से राहत पाने के लिए वह पड़ोस के सोनीपत में अपनी पोस्टिंग करवाता है. लेकिन वहाँ के और विकट हालात में छोटे से दफ्तर का एकमात्र चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नफे सिंह दफ्तर में ही घर बनाए हुए है. इस तरह दफ्तर में चूल्हा-चौका और प्रेमलीला की झलकियाँ दिखती रहती हैं. नफे सिंह स्थानीय बंदा है, इसलिए उसकी अपनी दबंगई है और मकान मालिक रिसाल सिंह से साठगाँठ है. रिसाल सिंह की शख्सियत कुछ यों है कि वह बुद्धू के बारे में यह सोचता हुआ लगता है कि आखिर यह शख्स इतनी शराफत का करता क्या होगा! लिहाजा तरह-तरह के समझौतों से गुजरने के बावजूद एक रोज बुद्धू की सरेआम पिटाई करवा दी जाती है. पीटने वाला उसे जिंदा जमीन में गाड़ देने की धमकी दे रहा है और बुद्धू गर्दन झुकाए अपमान के इतने गरल को पीता-सा उस जमीन की तरफ देखने लगा जिसमें उसे गाड़ दिया जाएगा.प्रेमचंद सहजवाला के नैरेटिव में स्थितियों को बयान करने की एक ऐसी तल्लीनता है कि पाठक के जेहन में वे एक भरी-पुरी इमेज की तरह दिखाई देती हैं. उनका उपन्यास स्थितियों की बहुत-सी बारीक और विस्तृत छवियों की एक लंबी श्रृंखला है. यहाँ जीवन अपनी तमाम रंगतों के साथ मौजूद है. इसमें दिल्ली के सरकारी दफ्तर का चिढ़ पैदा करने वाला बेहूदा माहौल है, तो हैदराबाद के आगे किसी कस्बे का जिक्र भी, जहाँ अपनी झोंपड़ियों में लालटेन जलाए औरतें मात्र एक रुपए में देह बेचने के लिए किसी ग्राहक की प्रतीक्षा में हैं; और सहज ही दिखाई देता है कि इस मुल्क में कौन है जो दूसरों का हिस्सा खा-खा के फूल रहा है. यहाँ एक वेश्यालय में बुद्धू को शहजान मिलती है, जो एक हैसियतदार बीडीओ की बेटी थी और जिसे एक रोज स्कूल जाते वक्त पाँच बदमाशों की करतूत ने यहाँ ला पटका. वह अब यहाँ के जीवन की अभ्यस्त हो चुकी है. लेकिन बुद्धू ने यह सब सुनने के बाद अपनी आँखें बंद कर ली हैं. वह कल्पना कर रहा है कि वह इस लड़की को बुर्के में छुपाकर उसके बाप के पास ले गया है... पर हकीकत में शहजान उसे पुकार रही है, उसके दिए पचास रुपयों को चुकाने के लिए एक-एक कपड़े उतार रही है- साहब कुछ करके जाओ ना!बार-बार याद आऊँगी मैं तो... पर बुद्धू के कुंद हो गए शरीर के साथ जुड़कर अंततः दो निस्पंद शरीर ऐसे हो गए मानो जीवित ही न हों.उपन्यास में कोई प्लॉट नहीं होने से यहाँ-वहाँ बेढब ढंग से पसरा जीवन अपनी स्वाभाविक बेतरतीबी में मौजूद है. इसमें तरह-तरह की असंगतियों और विसंगतियों के साथ-साथ बाज दफा कोई स्फुलिंग या शख्सियत की कोई अनजानी शै अचानक दिखाई देती है. जैसे कि बुद्धू ने देखा वही बूढ़ी जमादारनी क्वार्टर में पोचा मार रही है. क्वार्टरों में भी उसी को झाड़ू-पोंचे के काम सबने दे रखे थे. बुढ़िया जमीन पर उकड़ूँ बैठी हाथ से पोचा इधर-उधर घुमाती अपनी जगह बदलती जा रही है और बुद्धू क्वार्टर में चारपाई पर लेटा छत की तरफ देखे जा रहा था. पर बीच-बीच में उसकी नजर बुढ़िया पर चली जाती. उसके पुराने से ब्लाउज के ऊपर के हुक उखड़ चुके थे और इधर-उधर पेंडुलमों की तरह उसकी खोखली-सी छातियाँ हिलती नजर आती थीं. बुद्धू को इस खोखले-से लगते दृश्य से भी तन-बदन में आग-सी महसूस होने लगी, पर फिर वह जल्द ही करवट बदल कर लेट गया. उसे स्वयं से नफरत होने लगी. शायद वह इस दुनिया में चलने लायक व्यक्ति नहीं है. बुढ़िया तीनों कमरों का पोंचा लगा कर पतली, अस्तित्वहीन-सी आवाज में बोलती है- जा री ऊँ....वस्तुतः यह उपन्यास बुद्धू की नौकरियों और ट्रांसफरों के बहाने अलग-अलग दफ्तरों के भीतर-बाहर की दुनिया का एक वृत्तांत है, जिसके साथ मोहब्बत, तलाक और शादी का एक सहवृत्त भी नत्थी है. दुनिया भर के बेढंगेपन की छवियाँ देखता बुद्धू इस प्रसंग में खुद भी एक बेढंगी छवि की तरह दिखाई देता है. तमाम दुनियावी अड़ंगों को जानते हुए भी ऋजु से उसकी जज्बाती मोहब्बत और शादी; फिर संतान होने के बावजूद तलाक के नतीजे तक पहुँचता उतना ही तीव्र विमोह उसे हर चीज को नजदीक के चश्मे से देखने वाला एक किरदार साबित करते हैं. दीर्घकालिकता के विवेक से रिक्त और तात्कालिकता के स्फुरणों में खुद से और दूसरों से धोखा करता एक चरित्र. वह इस त्रासदी को बनाने वाला और उसकी बेबसी को जानने के बावजूद अपनी फितरत से असहाय है.  
बुद्धू का किरदार यथार्थ को टटोलते रहने वाला है, पर इसके सच में दखल देने की उसकी कोई मंशा नहीं है, या कहीं है भी तो अत्यंत क्षीण. यानी कभी-कभी वह कल्पनाजीवी तो हो सकता है, पर संकल्पनाजीवी कतई नहीं है. फिर भी इस टटोलने के लंबे अभ्यास में उसे चीजें साफ-साफ दिखाई देती हैं. उपन्यास में पाँचवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने से पहले का मंजर इस लिहाज से पढ़ने लायक है. विभाग के कर्मचारियों में भारी उत्तेजना है. वे बुद्धू को वित्त मंत्रालय में काम करने वाले उसके भाई के जरिए नए वेतनमानों का ब्योरा लाने भेजते हैं. ब्योरा लेकर आया बुद्धू उनसे कहता है- मेरी तनख्वाह इस समय नौ हजार है और जो वेतनमान मैं लाया हूँ उसके मुताबिक रातोंरात मेरी तनख्वाह हो जाएगी अट्ठारह हजार! क्या हम लोगों के पास इतना काम है? अगर हम लोगों की तनख्वाहें रातोंरात डबल हो गईं तो सरकार आखिर वह नया घाटा कैसे पूरा करेगी? क्या ऐसा नहीं होगा कि सरकार को अपने सारे विकास कार्य रोकने पड़ें? और अगर केंद्र सरकार ने वेतन इतने बढ़ा दिए तो राज्य सरकारें कहाँ पीछे रहेंगी!’ लेकिन बुद्धू का यह पागलाना उवाच पूरे दफ्तर में इतना प्रसिद्ध हो गया कि हर जगह से उसे गालियाँ सुननी पड़ रही थीं.उपन्यास पिछली सदी के आखिरी तीन दशकों के समय-परिवेश में घटित होता है. यह निरा आख्यान नहीं बल्कि एक देश की सामाजिक चाल का जीता जागता व्याख्यान भी है. इसमें काफी महीन ब्योरों के जरिए बनने वाला एक वृहत्तर दृश्य लगातार दिखाई देता है. यह यथार्थ के भीतर घुसकर उसे विभिन्न छवियों की रंगतों में परखने वाले ठोस गद्य है. जीवन के टेढ़े मेढ़ेपन के समांतर चलते हुए वह हमारे राष्ट्रीय यथार्थ की उजबक सच्चाई का एक बयान है. प्रकाशन के कई महीनों बाद भी अभी तक प्रायः गुमनाम इस उपन्यास को उन लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए, जो अपने आसपास को राजनीतिक-साहित्यिक जुमलों से परे जाकर देखने के इच्छुक हों. यह हिंदी की परंपरा से अलग एक अपने ही मुहावरे का उपन्यास है.
प्रकाशक : नमन प्रकाशन, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2; मूल्य : 550 रुपए

2 comments:

  1. एक कडवा सच कहती हकीकत है

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