Thursday, May 30, 2013

ऊबे हुए सुखी

पोलैंड की रहने वाली तत्याना षुर्लेई से मैंने पूछा कि उन्हें भारत में सबसे अनूठी बात क्या लगती है। उन्होंने मुश्किल सवाल है कहकर आधे मिनट तक सोचा, फिर बोलीं- यहां कोई किसी नियम-अनुशासन की परवाह नहीं करता, फिर भी सब कुछ चलता रहता है, यह बहुत यूनीक है... लेकिन अच्छा है। मुझे याद आया कि कुछ सप्ताह पहले दफ्तर में आए एक अमेरिकी गोरे युवक जॉन वाटर ने भी कहा था- वस्तुनिष्ठता फालतू चीज है’। मैंने तत्याना से कहने की कोशिश की कि अपने समाज की नियमबद्धताओं की ऊब के बरक्स वे दिल्ली के एक छोटे से हिस्से की जिंदगी के सहनीय केऑस को देखकर मुग्ध न हों, क्योंकि परवाह न करने की आदत से पैदा हुए नरक उन्होंने अभी नहीं देखे हैं। उदाहरण के लिए मैं उन्हें बताना चाहता था कि मैं जिस रिहायशी कॉम्प्लेक्स में रहता हूं वहां काम करने वाले गार्डों को साढ़े पांच हजार रुपए वेतन में रोज बारह घंटे और सातों दिन नौकरी करनी होती है; और यह कि ऐसे सैकड़ों परिसरों, दफ्तरों, फैक्ट्रियों में हजारों की तादाद में ऐसे गार्ड और गार्डनुमा लोग काम करते हैं और इस मुल्क में कोई नहीं है जो उनकी जीवन स्थितियों की परवाह करे। लेकिन तत्काल ही मुझे अपनी कोशिश की व्यर्थता का अहसास हुआ और लगा कि मनुष्य के स्वभाव की मूलभूत चीज उसकी ऊब है, और किसी को उसके अनुभव से इतर संसार के बारे में कुछ समझाया नहीं जा सकता। इंसान को जो कुछ मिला होता है, उससे वह ऊब जाता है और किसी भी तरह की भिन्नता में अपना सुख खोजने लगता है। मैंने सोचा भारतीय सभ्यता वाकई अदभुत है जिसमें कोई ऊब नहीं है। बारह घंटे और सात दिन काम करने वाले गार्ड को इसी सभ्यता ने ही तो सिखाया है कि ऊबो मत, जीवन को कसकर पकड़े रहो; बाहरी दबाव बढ़ें तो अपने भीतर की ओर घूमकर सिमट जाओ और वहीं कहीं दुबके पड़े रहो। हर कुछ दशकों में अपनी ऊब में क्रांतियां कर डालने और मारकाट पर उतारू रहने वाली पश्चिमी सभ्यता के नुमाइंदे सैकड़ों सालों से चली आ रही इस ऊब-हीनता को देखकर मुग्ध न हो जाएं तो क्या करें!
ऊबे हुए सुखी पर्यटक हमारे यहां की तल्लीनता देखकर गदगद हो जाते हैं। वाह क्या मंजर है! जिंदगी में इस कदर मसरूफ लोग कि उन्हें खुद अपने ही बारे में ही सोचने की सुध नहीं। दर्जनों न्यूज चैनल, सैकड़ों की तादाद में अखबार और पत्रिकाएं तरह-तरह की गतिविधियों में व्यस्त करोड़ों लोगों के बीच घटने वाली खबरें दोहराया करते हैं। हर साल बाढ़, हर दूसरे साल सूखा, हर चौथे रोज घोटाला, नित्यप्रति के बलात्कार, लगभग रोज ही होने वाले सैकड़ों जश्न। हर रोज बहुत कुछ घटता है हर रोज सब कुछ भूल जाया जाता है। तरह-तरह के वैचारिक इन तेजी से घटती घटनाओं में जल्दी-जल्दी नई-नई वैचारिकियां पेश करते हैं। सोसाइटी का गार्ड जिस बीच अपनी नौकरी में मसरूफ हुआ करता है, उस बीच सोसाइटी में रहने वाले बुद्धिजीवी जल्दी-जल्दी सेकुलरिज्म वगैरह की बौद्धिकता का बाजार गर्म रखने की जुगतें किया करते हैं। उसी तरह जैसे पहले के दिनों में मोची पुराने हंसते हुए जूते में कीलें ठोंककर  पालिश मारकर उसे नए जैसा बना देते थे, या कलईगीर कलई चढ़ा कर पीतल के बर्तनों की रंगत बदल देते थे। मसरूफ रहना जीवन जीने का एक तरीका है। बुद्धिवादी, लुहार, लकड़हारा या साइकिल के पंचर जोड़ने वाला मिस्त्री नहीं सोचते कि रिटायर होने के पहले और बाद में राष्ट्रपति की सुविधाओं का खर्चा कौन वहन करता है, क्योंकि उनकी संलग्नता उनका ध्येय है। संलग्न रहने से ऊब का कोई खतरा नहीं है। वे बगैर ऊबे निरंतर अपने काम में जुटे हैं। सरकार उन्हें संलग्न रखने के लिए नौकरियों की तादाद बढ़ाने पर चर्चा किया करती है। सब कुछ तेजी से बढ़ रहा है। अमीर-गरीब, अपराध और कानून, खर्चे और आबादी सब इस बढ़ने में शामिल हैं। बढ़ती आबादी में औरत-मर्द सवर्ण-दलित-मुसलमान सब अपने-अपने अनुपात में जीभ लपलपाते हुए बढ़ रहे हैं। सब कुछ इतनी तेजी से बढ़ रहा हो तो ऊब कहां से होगी। सब कुछ बढ़ने के इस समय में किसी एनजीओ को चाहिए कि वह पुराने वक्त की खो रही चीजों का संग्रहालय बनाए, जिसमें रखा हो पीतल का पुराना स्टोव, चेलपार्क की स्याही और दावात, एलपी रेकॉर्ड्स और अंगीठी और अंगरखा और बेचैनी।
राजेंद्र जी की किताब स्वस्थ आदमी के बीमार विचार में उन्होंने टीवी की छवियों का जिक्र किया है। यथार्थ और टीवी पर दिखते चेहरे आपस में गड्डमड्ड हुआ करते हैं। टीवी ज्यादातर ऊब मिटाने के लिए देखा जाता है। इस तरह लोग एक पुरानी ऊब से निकलकर नई ऊब में प्रवेश करते हैं। इसी में सब कुछ गड्डमड्ड हुआ रहता है। इधर के वर्षों में पनपे फ्लैटों में रहने वाले मध्यवर्ग ने पश्चिम के रंग-ढंग के साथ उसकी ऊब को भी अपना लिया है। याद आया, एक मित्र ने कभी कहा था कि हमारे मुल्क में जो भी परंपरा है वह गरीबी के कारण बची है, जिस दिन गरीबी खत्म हो जाएगी, हिंदुस्तान हिंदुस्तान नहीं रहेगा। जाहिर है गरीबी अपने कारणों से हमेशा बची रहेगी, लेकिन साधनसंपन्न वर्ग की ऊब मिटाने के लिए जश्न हमेशा चाहिए होंगे। इस धीरे-धीरे रीतते वक्त में जश्न ही हमें बचाया करेंगे। गरीबी के लोटे पर जश्नों की कलई एक नई रंगत बनाएगी। हकीकत और आभास के इस घालमेल से बहुत से नए विषय निकलेंगे। बहसें होंगी। संलग्नता बढ़ेगी। नए जज्बे पैदा होंगे, नए धंधे पैदा होंगे। इस तरह जीडीपी बढ़ेगी, और हम बगैर ऊबे आगे बढ़ते चले जाएंगे।  

Wednesday, May 22, 2013

हूबहू जीवन की सच्ची कहानी

प्रेमचंद सहजवाला का उपन्यास नौकरीनामा बुद्धू का’ पढ़ते हुए सहज ही उसके आत्मकथात्मक होने का अनुमान होता है. यह उसके नायक बुद्धू उर्फ समर्थ के लड़कपन से लेकर रिटायरमेंट तक की बहुतेरे रोजनामचों में फैली जीवनकथा हैजिसमें छोटे-छोटे प्रसंगों की भी काफी शिद्दत  से डिटेलिंग की गई है. ऐसा लगता है कि लेखक ने बगैर संपादन किए डायरियों में दर्ज अपने ही जीवन को एक सिलसिले में पेश कर दिया है. इसमें कोई कहानी नहीं बुनी गई हैलेकिन यह काफी कुछ हूबहू जीवन खुद ही ऐसी दिलचस्प कहानी है कि उपन्यास शुरू करने के बाद उसे छोड़ते नहीं बनता. प्रेमचंद सहजवाला एक दुनियादारी के भीतर से घट रही स्थितियों और दिख रहे लोगों को करीब जाकर और काफी इतमीनान से देखते हैंऔर इस क्रम में तरह-तरह की जुगतों में लगे लोग कॉमिक्स के किरदारों की तरह निकल-निकलकर आते रहते हैं. खुद बुद्धू भी इसका अपवाद नहीं है. वो जनसंघी नेता बलराज मधोक के भाषण के दौरान बेवजह इंदिरा गांधी जिंदाबाद’ का नारा लगा देता है और पुलिस वाले उसे पकड़ कर थाने ले जाते हैं. जिंदगी के जिस बेतुकेपन (absurdity) को समझने-समझाने में कई पश्चिम के लेखकों ने अच्छी-खासी माथापच्ची की है वह इस उपन्यास में अनंत छवियों में अनायास बिखरा पड़ा है. बुद्धू की निजी और दफ्तरी जिंदगी की मार्फत यह उपन्यास बेतुकेपन में जीवन जीने के हिंदुस्तानी ढंग का एक वृत्तांत है और सरकारी नौकरियों के तंत्र का एक कच्चा चिट्ठा भी है. इस तंत्र के तामझाम काफी विशाल हैंपर उत्पादकता का कोई निश्चित ध्येय नहीं है. इस तरह पैदा हुए एक विशाल परजीवी वर्ग और उसकी कार्यप्रणाली’ में विन्यस्त निठल्लेपन की संस्कृति को लेखक ने काफी बारीकी से लेकिन मजे लेते हुए इस उपन्यास में पेश किया है. इस परिदृश्य में ऐसे रोचक मनुष्यों की भरमार है जिनकी बुद्धि अपने निजी फायदों से अलहदा कुछ भी देखने को व्यर्थ मानती है और अपनी घटिया बेमुरव्वती को अपनी काबिलियत समझती है. खुद भी एक सरकारी दफ्तर में रहे प्रेमचंद सहजवाला बगैर किसी कल्पना या फंतासी के अपनी लेखकीय सूझ का मैग्नीफाइंग ग्लास लिए गौर से इन रोचक चेहरों को अपने उपन्यास में देखा करते हैं.बुद्धू में नायक वाला कोई गुण नहीं है. वह एक सतर्क सांसारिक है,  और अपने को बचाते हुए हालात में फिट किए रहता है. उसका पंजाब के आउटस्टेशन में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जहाँ दफ्तर में शराब की महफिल लगती है. शराब पीता हुआ इंजीनियर कह रहा है- हमने खूब खा लिया. हमें सस्पेंड करना है कर लो. हमारा ये पकड़ लो....लो’.  इन दफ्तरों में पुलिसवालों की मदद से लड़कियों का धंधा भी होता है और जुआ भी खेला जाता है. बुद्धू लोगों के लालच और कमीनगी को थोड़े कौतुक से देखा करता है. उसकी विशेषता है कि उसे चीजों के संज्ञान में आनंद आता है. यथार्थ कैसे घटित हो रहा है, वह इसे लगातार परखता रहता है. तरह-तरह से जिंदगी जीते तरह-तरह के लोग. उन्हें इस बात तक का इल्म तक नहीं कि दरअसल वे कितने बड़े मूर्ख हैं. उसके दफ्तर का साथी बत्रा उससे कहता है- मुंशी प्रेमचंद के बाद अगर कोई काम का राइटर पैदा हुआ है न, तो वह है गुलशन नंदा. और बुद्धू उसकी बात सुनकर बहुत तकलीफ से अपनी हँसी रोकता है. बुद्धू खुद भी एक नमूना है. दफ्तर में खुद की हिंदी की ड्राफ्टिंग की तारीफ किए जाने पर वह कहना चाहता है कि मैं तो अंग्रेजी की भी बहुत अच्छी ड्राफ्टिंग कर लेता हूँ, मैं तो हीरा हूँ हीरा. अपने आसपास के ऊटपटांग यथार्थ में वह कई बार खुद को मुसीबतों में घिरा हुआ पाता है. दिल्ली के दफ्तर के घटिया माहौल से राहत पाने के लिए वह पड़ोस के सोनीपत में अपनी पोस्टिंग करवाता है. लेकिन वहाँ के और विकट हालात में छोटे से दफ्तर का एकमात्र चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नफे सिंह दफ्तर में ही घर बनाए हुए है. इस तरह दफ्तर में चूल्हा-चौका और प्रेमलीला की झलकियाँ दिखती रहती हैं. नफे सिंह स्थानीय बंदा है, इसलिए उसकी अपनी दबंगई है और मकान मालिक रिसाल सिंह से साठगाँठ है. रिसाल सिंह की शख्सियत कुछ यों है कि वह बुद्धू के बारे में यह सोचता हुआ लगता है कि आखिर यह शख्स इतनी शराफत का करता क्या होगा! लिहाजा तरह-तरह के समझौतों से गुजरने के बावजूद एक रोज बुद्धू की सरेआम पिटाई करवा दी जाती है. पीटने वाला उसे जिंदा जमीन में गाड़ देने की धमकी दे रहा है और बुद्धू गर्दन झुकाए अपमान के इतने गरल को पीता-सा उस जमीन की तरफ देखने लगा जिसमें उसे गाड़ दिया जाएगा.प्रेमचंद सहजवाला के नैरेटिव में स्थितियों को बयान करने की एक ऐसी तल्लीनता है कि पाठक के जेहन में वे एक भरी-पुरी इमेज की तरह दिखाई देती हैं. उनका उपन्यास स्थितियों की बहुत-सी बारीक और विस्तृत छवियों की एक लंबी श्रृंखला है. यहाँ जीवन अपनी तमाम रंगतों के साथ मौजूद है. इसमें दिल्ली के सरकारी दफ्तर का चिढ़ पैदा करने वाला बेहूदा माहौल है, तो हैदराबाद के आगे किसी कस्बे का जिक्र भी, जहाँ अपनी झोंपड़ियों में लालटेन जलाए औरतें मात्र एक रुपए में देह बेचने के लिए किसी ग्राहक की प्रतीक्षा में हैं; और सहज ही दिखाई देता है कि इस मुल्क में कौन है जो दूसरों का हिस्सा खा-खा के फूल रहा है. यहाँ एक वेश्यालय में बुद्धू को शहजान मिलती है, जो एक हैसियतदार बीडीओ की बेटी थी और जिसे एक रोज स्कूल जाते वक्त पाँच बदमाशों की करतूत ने यहाँ ला पटका. वह अब यहाँ के जीवन की अभ्यस्त हो चुकी है. लेकिन बुद्धू ने यह सब सुनने के बाद अपनी आँखें बंद कर ली हैं. वह कल्पना कर रहा है कि वह इस लड़की को बुर्के में छुपाकर उसके बाप के पास ले गया है... पर हकीकत में शहजान उसे पुकार रही है, उसके दिए पचास रुपयों को चुकाने के लिए एक-एक कपड़े उतार रही है- साहब कुछ करके जाओ ना!बार-बार याद आऊँगी मैं तो... पर बुद्धू के कुंद हो गए शरीर के साथ जुड़कर अंततः दो निस्पंद शरीर ऐसे हो गए मानो जीवित ही न हों.उपन्यास में कोई प्लॉट नहीं होने से यहाँ-वहाँ बेढब ढंग से पसरा जीवन अपनी स्वाभाविक बेतरतीबी में मौजूद है. इसमें तरह-तरह की असंगतियों और विसंगतियों के साथ-साथ बाज दफा कोई स्फुलिंग या शख्सियत की कोई अनजानी शै अचानक दिखाई देती है. जैसे कि बुद्धू ने देखा वही बूढ़ी जमादारनी क्वार्टर में पोचा मार रही है. क्वार्टरों में भी उसी को झाड़ू-पोंचे के काम सबने दे रखे थे. बुढ़िया जमीन पर उकड़ूँ बैठी हाथ से पोचा इधर-उधर घुमाती अपनी जगह बदलती जा रही है और बुद्धू क्वार्टर में चारपाई पर लेटा छत की तरफ देखे जा रहा था. पर बीच-बीच में उसकी नजर बुढ़िया पर चली जाती. उसके पुराने से ब्लाउज के ऊपर के हुक उखड़ चुके थे और इधर-उधर पेंडुलमों की तरह उसकी खोखली-सी छातियाँ हिलती नजर आती थीं. बुद्धू को इस खोखले-से लगते दृश्य से भी तन-बदन में आग-सी महसूस होने लगी, पर फिर वह जल्द ही करवट बदल कर लेट गया. उसे स्वयं से नफरत होने लगी. शायद वह इस दुनिया में चलने लायक व्यक्ति नहीं है. बुढ़िया तीनों कमरों का पोंचा लगा कर पतली, अस्तित्वहीन-सी आवाज में बोलती है- जा री ऊँ....वस्तुतः यह उपन्यास बुद्धू की नौकरियों और ट्रांसफरों के बहाने अलग-अलग दफ्तरों के भीतर-बाहर की दुनिया का एक वृत्तांत है, जिसके साथ मोहब्बत, तलाक और शादी का एक सहवृत्त भी नत्थी है. दुनिया भर के बेढंगेपन की छवियाँ देखता बुद्धू इस प्रसंग में खुद भी एक बेढंगी छवि की तरह दिखाई देता है. तमाम दुनियावी अड़ंगों को जानते हुए भी ऋजु से उसकी जज्बाती मोहब्बत और शादी; फिर संतान होने के बावजूद तलाक के नतीजे तक पहुँचता उतना ही तीव्र विमोह उसे हर चीज को नजदीक के चश्मे से देखने वाला एक किरदार साबित करते हैं. दीर्घकालिकता के विवेक से रिक्त और तात्कालिकता के स्फुरणों में खुद से और दूसरों से धोखा करता एक चरित्र. वह इस त्रासदी को बनाने वाला और उसकी बेबसी को जानने के बावजूद अपनी फितरत से असहाय है.  
बुद्धू का किरदार यथार्थ को टटोलते रहने वाला है, पर इसके सच में दखल देने की उसकी कोई मंशा नहीं है, या कहीं है भी तो अत्यंत क्षीण. यानी कभी-कभी वह कल्पनाजीवी तो हो सकता है, पर संकल्पनाजीवी कतई नहीं है. फिर भी इस टटोलने के लंबे अभ्यास में उसे चीजें साफ-साफ दिखाई देती हैं. उपन्यास में पाँचवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने से पहले का मंजर इस लिहाज से पढ़ने लायक है. विभाग के कर्मचारियों में भारी उत्तेजना है. वे बुद्धू को वित्त मंत्रालय में काम करने वाले उसके भाई के जरिए नए वेतनमानों का ब्योरा लाने भेजते हैं. ब्योरा लेकर आया बुद्धू उनसे कहता है- मेरी तनख्वाह इस समय नौ हजार है और जो वेतनमान मैं लाया हूँ उसके मुताबिक रातोंरात मेरी तनख्वाह हो जाएगी अट्ठारह हजार! क्या हम लोगों के पास इतना काम है? अगर हम लोगों की तनख्वाहें रातोंरात डबल हो गईं तो सरकार आखिर वह नया घाटा कैसे पूरा करेगी? क्या ऐसा नहीं होगा कि सरकार को अपने सारे विकास कार्य रोकने पड़ें? और अगर केंद्र सरकार ने वेतन इतने बढ़ा दिए तो राज्य सरकारें कहाँ पीछे रहेंगी!’ लेकिन बुद्धू का यह पागलाना उवाच पूरे दफ्तर में इतना प्रसिद्ध हो गया कि हर जगह से उसे गालियाँ सुननी पड़ रही थीं.उपन्यास पिछली सदी के आखिरी तीन दशकों के समय-परिवेश में घटित होता है. यह निरा आख्यान नहीं बल्कि एक देश की सामाजिक चाल का जीता जागता व्याख्यान भी है. इसमें काफी महीन ब्योरों के जरिए बनने वाला एक वृहत्तर दृश्य लगातार दिखाई देता है. यह यथार्थ के भीतर घुसकर उसे विभिन्न छवियों की रंगतों में परखने वाले ठोस गद्य है. जीवन के टेढ़े मेढ़ेपन के समांतर चलते हुए वह हमारे राष्ट्रीय यथार्थ की उजबक सच्चाई का एक बयान है. प्रकाशन के कई महीनों बाद भी अभी तक प्रायः गुमनाम इस उपन्यास को उन लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए, जो अपने आसपास को राजनीतिक-साहित्यिक जुमलों से परे जाकर देखने के इच्छुक हों. यह हिंदी की परंपरा से अलग एक अपने ही मुहावरे का उपन्यास है.
प्रकाशक : नमन प्रकाशन, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2; मूल्य : 550 रुपए

Sunday, May 12, 2013

अरसे बाद कैदे हयात


मिर्जा गालिब के जीवन पर आधारित सुरेंद्र वर्मा का नाटक कैदे हयात हिंदी के श्रेष्ठ नाटकों में शुमार होने के बावजूद काफी कम खेला गया है। इसे हिंदी का नहीं बल्कि उर्दू का नाटक कहना चाहिए; और मुमकिन है कि भाषा की यह कठिनाई उसे हिंदी के रंगकर्मियों के लिए थोड़ा मुश्किल भी बनाती है। जो भी हो, इस भाषा में एक गहरी संपृक्ति और अर्थवत्ता की अच्छी लय है। ऐसा इसलिए है कि गालिब की मुफलिसी और मोहब्बत को यहां किसी रूमान में फंसने नहीं दिया गया है। जिंदगी की मजबूरियों में फंसे वे एक आधे-अधूरे गृहस्थ की तरह हालात से उबरने के रास्ते तलाशा करते हैं। यह रास्ता है गवर्नर जनरल की काउंसिल में अपनी विरासत पर हासिल होने वाली पेंशन के मुकदमे के लिए कलकत्ता जाना। इस जाने और लौटने के दौरान हालात और बदतर हुए हैं। पहले महाजनों के तकाजे ही होते थे, अब ये तकाजे घर से निकलते ही उनकी गिरफ्तारी का सबब बन चुके हैं। ऐसे में दुनिया को बाजीचा-ए-अशफाल की तरह देखने वाला शायर घर की चौहद्दी में बेबस इस बेबसी को महसूस किया करता है। कातिबा से उनका संबंध भी दुनियादारी से बेजार अपनी-अपनी बेचैनियों की वजह से है। गालिब बीमार कातिबा को देखने नहीं जा सकते। उसकी मौत नाटक में सतत दिखने वाली उदासी की मानो एक इंतेहा है। नाटक में पात्रों के भीतर और बाहर घट रही गाढ़ी तल्ख हकीकत युवा निर्देशक दानिश इकबाल के निर्देशन में चंद रोज पहले हैबिटाट सेंटर के स्टीन ऑडिटोरियम में हुई प्रस्तुति में लगातार मंच पर महसूस होती रहती है। इस तरह के विषय में जो  एक जुमलेबाजी की गुंजाइश काफी बनी रहती है, वह न नाटक के आलेख में है और न ही इस प्रस्तुति में।
करीब दशक भर पहले राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक हुए दानिश इकबाल की पहचान अभी तक प्रायः एक अभिनेता की रही है, पर यह प्रस्तुति एक निर्देशक के रूप में उनकी काबिलियत को भी काफी पुख्ता ढंग से साबित करती है। मुख्य भूमिका में खुद दानिश के अलावा शेष किरदारों में भी पात्र-चयन और अभिनय काफी दुरुस्त है। नाटक की विशेषता यह है कि स्थितियां उसमें काफी डिटेलिंग के साथ पेश होती हैं, और कहीं भी उनका कोई अपव्यय नहीं किया गया है। कातिबा के घर जाने के रास्ते में एक टूटी दीवार पड़ती है, जिससे रास्ता छोटा हो जाता है। पर नौकर बताता है कि दीवार शायद अब बन गई है। इस तरह जल्द से जल्द जाकर कातिबा का हालचाल लाने के मसले में यह दीवार नाटक के यथार्थवाद में अचानक बहुत अहम हो आई है। इसी तरह घर में आने वाला शायर यासीन गालिब से पूछता है कि मिर्जा, लफ्जों का ऐसा इस्तेमाल क्यों करते हो कि मानी खेंच कर निकालना पड़ता है’;और गालिब बताते हैं कि खुद के सही होने का इल्म गजलख्वानी की लंबी जद्दोजहद के बाद आता है. शुरू के दृश्यों में टोपी लगाए आने वाला पड़ोस का शायर परवेज (जिसकी ढाई सौ गजलें सही तखल्लुस न मिलने की वजह से अधूरी पड़ी हैं, क्योंकि तखल्लुस नहीं तो मक्ता नहीं और मक्ता नहीं तो गजल नहीं) बाद के दृश्यों में शायरी छोड़ चुकने की वजह बताता है कि फिक्रे सुखन और फिक्रे रोजगार साथ-साथ नहीं चल सकते।
मंच पर ज्यादा कुछ नहीं है. पीछे एक लंबे परदे के अलावा एक दीवान और चौकी वगैरह मामूली चीजें ही हैं। कास्ट्यूम और इन चीजों की मदद से दानिश एक माहौल बनाते हैं।लेकिन इस माहौल की केंद्रीय चीज एक सुघड़ चरित्रांकन और साफ-सुथरा दृश्यविधान ही है।मंच पर अतीत का यह यथार्थ इतना गहन है कि नाटक को मुस्लिम परिवेश के सजावटी क्लीशे में अटकने से बचाता है। इस यथार्थ में पात्र आ रहे हैं जा रहे हैं, पर एक उदासी है कि टलने का नाम ही नहीं ले रही। कातिबा की भूमिका में निधि मिश्रा और यासीन की भूमिका में सदानंद पाटिल जैसे रानावि के स्नातकों सहित अन्य भूमिकाओं में वसुंधरा बोस, शादां अहमद, आयुषी मिश्रा, आमिर खान, विशाल चौहान का काम भी प्रस्तुति में काफी अच्छा था।  

Friday, May 3, 2013

मन और मंच के खालीपन में प्रेम


मृत्युंजय प्रभाकर निर्देशित प्रस्तुति ख्वाहिशें’ एक बिल्कुल खाली मंच पर तीन पात्रों के दरमियान घटित होती है। यह बिल्कुल नए फ्लेवर का दो प्रेमी और एक प्रेमिका वाला प्रेम त्रिकोण है। नए जमाने के प्रेमी बगैर भावुकतावादी झामे के बिल्कुल दो टूक हैं। वे आपस में तू-तड़ाक करके बात करते हैं और सुविधा के मुताबिक झूठ भी बोलते हैं। नाटक को लिखा भी मृत्युंजय ने ही हैऔर स्पष्ट ही अपने वक्त की नब्ज को पकड़ने की अच्छी कोशिश की है। इसकी प्रेमिका जींस पहनने वाली वैसी उच्च-अभिलाषीगर्वीलीएकल और स्वतंत्र नौकरीपेशा है जो देवदास नुमा प्रेमियों को लात मारकर भगा देगी। उसका प्रेमी प्रकटतः अपने आत्मविश्वास में जमाने को ठोकर पर रखने वाला लेकिन शराब पीकर अपनी देहाती अंतर्वस्तु की वजह से कुंठित हो जाने वाला बिगड़ैल है। इनके बीच एक लो प्रोफाइल तीसरा किसी सुदूर गांव से आ टपका हैजिसके पास खुद को साबित करने का एक ही अचूक हथियार है- उसकी देहाती विनयशीलता। इस तरह इन तीन पात्रों के बीच करीब डेढ़ घंटे तक कुछ-कुछ चलता रहता है। ऐसा लगता है कि मृत्युंजय डेढ़ घंटे तक एक स्थिति को ही बुनते रहते हैंजिससे प्रकट अर्थों में कुछ भी निकलकर आता दिखाई नहीं देता। न कोई विडंबना, न कोई त्रासदी, न खोखलापन। फिर भी जो निकलकर आता है वह है बात को कहने का एक मुहावरा।
इस मुहावरे में प्रॉपर्टी के जरिए बनाया गया कोई माहौल नहीं हैनाटकीयता की कोई मैथड तरकीब नहीं है। अभिनेतागण अपनी वेशभूषादेहभाषा और बोली जा रही भाषा में इतने सहज-स्वाभाविक हैं कि लगता है मानो वे अपने ही किरदार पेश कर रहे हों। इस मुहावरे में कहीं कोई प्रयास किया जाता नहीं दिख रहा। इसकी स्वाभाविकता काफी मौलिक और नई चीज मालूम देती है, जिसमें एमेच्योर किस्म के झोल नहीं हैं और कथानक की अच्छी-खासी विवरणात्मकता का निबाह है। बिगड़ैल प्रेमी तीसरे कोण यानी लो प्रोफाइल देहाती शायर को थप्पड़ मार देता है। वह अपनी प्रेमिका को समझाने के लिए आधी रात को उसके फ्लैट पर आ धमकता है। प्रेमिका लो प्रोफाइल बंदे से प्रेम नहीं करतीऔर वस्तुतः उसकी चेंपपंती’ से परेशान हैपर अपने वास्तविक’ प्रेमी के निमंत्रण को ठुकराकर उसके साथ शाम बिताने जाती है और आधी रात को उसे घर से निकाल बाहर करती है। मोहब्बत के इस सिलसिले में असली इमोशन शराब पीने के बाद पैदा होता है। पुराने प्रेमियों की तरह यहां कोई घुटता नहीं रहता है। इसका प्रेम त्वचा के भीतर के बजाय उसकी सतह पर रहता है। ऐसे में उसका सारा खटराग अंत की ओर पहुंचते हुए तीन एकालापों के निष्कर्ष तक पहुंचता है। अपने लिए जीने का इकहरा व्यक्तिवादी ढंग अंत में एक अकेलापन बुनता है, जिसे इन एकालापों में दिखाया गया है। लेकिन इस अकेलेपन की खोह में और गहरे तक घुसने की सूझ नाटककार में नहीं रही है, इसलिए वह इसका उत्सव मनाने का संदेश छोड़कर चलता बनता है।    
मंच पर दृश्यात्मकता का प्रतीकात्मक विधान मात्र इतना है कि फ्लैट के दृश्य में एक गद्दा है, रेस्त्रां के दृश्य में दो कुर्सियां और एक अदना सी टेबल, बस। बाकी ज्यादातर दृश्यों में यह भी नहीं है। यहां तक कि प्रकाश योजना की कोई युक्तियां भी नहीं हैं और कुल मिलाकर इतना खालीपन है कि वह अलग से दिखने लगता है। मृत्युंजय इस खालीपन को अभिनय की गतियों से भरने की एक काफी मुश्किल कोशिश करते हैं और ऐसा करते हुए वे इस अभिनय की लय पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देते। अपनी पिछली प्रस्तुति जी हां हमें तो नाटक खेलना है’ में भी उनकी यह पद्धति दिखाई दी थी, जो सामयिक रंगमंच की प्रवृत्तियों में अपने ढंग से काफी मौलिक है। पिछले दिनों दिल्ली के मुक्तधारा प्रेक्षागृह में हुई इस प्रस्तुति के तीनों अभिनेताओं आकांक्षा, प्रियांशु और आशीष को उनकी सहजता के लिए बधाई दी जानी चाहिए।