Sunday, March 24, 2013

गणिकागृह में एक रात


ज्ञानपीठ से पुरस्कृत कन्नड़ नाटककार चंद्रशेखर कंबार के नए नाटक शिवरात्रि को उनका सबसे अच्छा नाटक भी माना जा रहा है। चिदंबरराव जांबे निर्देशित मैसूर के निरंतर थिएटर ग्रुप की इसकी प्रस्तुति भारत रंग महोत्सव में देखी थी. किसी वजह से इसपर लिखा नहीं जा सका, पर तब से कहीं न कहीं यह दिमाग में अटकी रही है। इसका कथानक बारहवीं सदी के कल्याण राज्य के एक वेश्यालय में शिवरात्रि की रात को घटित होता है। कोठे की मुखिया साविंतरी के पास संगैय्या नाम का साधु-युवक आया है जिसे कोठे की सबसे सुंदर वेश्या कामाक्षी के साथ उसी के बिस्तर पर शिवलिंग-पूजा का अनुष्ठान करना है (इस पूजा के संदर्भ को समझने के लिए बारहवीं सदी में कर्नाटक में हुए शरणा आंदोलन को समझना होगा, जिसके जनक वासवन्ना ने शिवलिंग के एक प्रकार इष्टलिंग को ईश्वर के एक प्रतीक के रूप में हर मनुष्य की देह में अवस्थित माना, जिसकी वजह से कोई भी अस्पृश्य नहीं है। शरणा आंदोलन जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के विरोध का आंदोलन था)। यह पता चलने पर कि कामाक्षी कोठे की सबसे महंगी गणिका है, संगैय्या एक महंगा हार प्रस्तुत करता है। इस तरह उसके इच्छित अनुष्ठान का बंदोबस्त होता है। यह हार राजा के महल से ब्राह्मण हरिहर के पुत्र दामोदर ने शरणभक्त का भेस धर के चुराया था। चुराने के बाद प्रहरी के पीछा करने पर छुपते हुए वह एक घर में जा घुसा, जो एक दलित का था। उसने उनसे इस हार को रख लेने को कहा। पर घर के मेहनतकश लोगों के लिए यह हार एक मरे हुए चूहे के समान था, क्योंकि उसे श्रम से अर्जित नहीं किया गया था इसलिए उन्होंने इसे स्वीकार नहीं दिया। यह हार गणिकागृह भी ले जाया गया, पर वहां से उसे इसलिए स्वीकार नहीं किया गया, कि उसकी कीमत किसी भी वेश्या की एक रात की कीमत से काफी ज्यादा है। हालांकि बाद में वे इसी हार को साधु-युवक संगैय्या से स्वीकार करती हैं.
दृश्य में पीछे की ओर संगैय्या की पूजा-अनुष्ठान चल रही है, कि तभी आगे की ओर राजा बिज्जला वेश्यालय में प्रवेश करता है। अपनी प्रिय गणिका कामाक्षी के किसी और के साथ होने की बात सुनकर वह गुस्से में आगबबूला हो गया है। तब साविंतरी उसे कहती है कि किसी पुरुष का स्त्री देह से एक विशेष स्पर्श उन्हें प्रेम के संबंध में जोड़ता और अधिकार भाव देता है; लेकिन एक वेश्या के लिए उसके सभी ग्राहक एक जैसे हैं, इसलिए कामाक्षी को लेकर उसके अधिकारभाव का कोई औचित्य नहीं है। नाटक ऊंच-नीच से भरी सामाजिकता में जीवन की गरिमा की आकांक्षा को सामने लाता है। इस आकांक्षा के कई उपाख्यान हैं, जिन्हें शरण आंदोलन के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में अच्छे से कथानकबद्ध किया गया है। नाटकीय संरचना भी इस लिहाज से खासी पाए की है कि वह प्रमुखतः संवादों और मंचीयता के एक कसे हुए पारंपरिक आस्वाद में सामने आती है। प्रस्तुति के बिल्कुल शुरू में खाली मंच पर एक विशाल धवल चादर में से नगरदेवी का एक बड़ा-सा मुखौटा उभरा दिखाई देता है। मंच के दोनों सिरों पर तेलमालिश किए उघारे बदन दो बंदे अपनी मांसपेशियां दिखाते खड़े हैं। पीछे की ओर चलती पूजा और आगे बिज्जला-साविंतरी संवाद एक अच्छी दृश्य युक्ति है। प्रस्तुति में कई किस्म के पात्र हैं, जिनका निर्देशक चिदंबरराव जांबे ने अच्छा चित्रण किया गया है। साविंतरी की भूमिका में शीला एस. और बिज्जला की भूमिका में लिंगाराजू आर. दृश्य में ज्यादा समय दिखते हैं। दोनों ही अभिनेताओं में किरदार की अच्छी ऊर्जा दिखाई देती है। नाटक का  हिंदी में अनुवाद किया जाना चाहिए।

Sunday, March 17, 2013

क्यों बेशर्म हैं पात्र ?


पिछले दिनों हुए साहित्य कला परिषद के युवा नाट्य उत्सव में रोहित त्रिपाठी निर्देशित प्रस्तुति 'खामोश अदालत जारी है' का मंचन किया गया। विजय तेंदुलकर के इस नाटक की सीमा उसके परिवेश की पुरानी नैतिकताएं हैं, जिनमें वह अपने जमाने का स्त्री-विमर्श खड़ा करता है। उसकी दूसरी सीमा उसकी कृत्रिम मंचीय संरचना है। रिहर्सल के लिए जमा हुए पात्र असली के बजाय खेल खेल में एक नाटक खेलते हैं, जिसमें एक वास्तविक पात्र मिस बेणारे पर मुकदमा चलाया जाता है। उसका बुनियादी ढांचा इतना बनावटी है कि कथ्य की सारी उत्तेजना याकि उदघाटन वास्तविक शिद्दत के साथ खप पाने में एक दिक्कत महसूस करते हैं। हर पात्र उसमें अपने दुनियादार कलेवर से बाहर आया हुआ है. क्यों?आखिर क्यों वह मिस बेणारे की फजीहत के लिए खुलेआम बेशर्म हो गया है? विजय तेंदुलकर अपने एक जबरिया मुहावरे के लिए पात्रों के अंदरूनी किरदार को बाहरी के तौर पर पेश करते हैं, जो कि कभी भी बहुत सहज मालूम नहीं देता। इसीलिए आज तक देखी खामोश अदालत…’ की तमाम प्रस्तुतियां कभी भी बहुत आश्वस्तकारी महसूस नहीं हुईं। लेकिन युवा निर्देशक रोहित त्रिपाठी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपनी काट-छांट और अच्छे चरित्रांकन के जरिए अपनी प्रस्तुति को पर्याप्त चुस्त बनाया है। आजादखयाल बेणारे के प्रोफेसर दामले से संबंध को लेकर नाटक के मध्यवर्गीय पात्रों की छिछोरी उत्सुकता को उन्होंने इस चरित्रांकन में बहुत खूबी के साथ बांधा है। नाटक शुरू से अंत तक प्रायः एक ही दृश्य-स्थिति में घटित होता है। ऐसे में पात्र अगर ठीक से अलग-अलग न दिखें तो सारा कुछ बहुत जल्दी अ-रोचक हो उठता है। रोहित मिस बेणारे के एक संवाद ये बीसवीं शताब्दी के बचे हुए मानव अवशेष हैं, इनके अंदर अतृप्त वासनाएं भरी हैं की ही अपने पात्रों में अलग-अलग किस्म की व्यंजना करते हैं। उसमें टांग हिलाता, कान खोदता जज बना काशीकर और धोती को ऊपर तक चढ़ाए उसकी बीवी है, बार-बार अपने बालों पर हाथ फेरता वकील सुखात्मे है; नहीं-नहीं और हां-हां के असमंजस में फंसा और आधी सच्ची आधी झूठी कहानी बताता सकपकाया हुआ चपड़ासी रोकड़े उर्फ बालू है। सीधा-सादा सामंत है। मिस बेणारे की भूमिका में चंद्रकांता एन त्रिपाठी भी किरदार की बेबसी की बहुत अच्छी रंगतें अपने अभिनय में लाई हैं। एक किरदार जिसकी शख्सियत की सारी आजादी और खुशी एक हुजूम के आगे बेहद लाचार और बेवजूद है। सिवाय सामंत के कोई नहीं है जो उसकी पीड़ा से थोड़ी-बहुत ही सही सहानुभूति रखता हो।
यह प्रस्तुति थिएटर में अभिनय की ताकत की भी तस्दीक करती है। पात्रों का संजीदा अभिनय बेवजह तालियां पीटने वाले दर्शकों को भी तनाव के उस साधारणीकरण तक ले जाता है कि वे तालियां पीटने से बाज आते हैं। ऐसा नहीं कि इसमें आलेख का अपना योगदान नहीं रहा हो। परिवेश और संरचनागत सीमाओं के बावजूद नाटक में ऐसे प्रखर संवाद हैं जो उसके तंज को सार्वभौम मुहावरे में तब्दील करते हैं। स्त्री क्षणकाल की पत्नी और अनंतकाल की माता है। दरअसल यह नाटक कृत्रिम स्थितियों में एक भीषण यथार्थ पेश करता है। रोहित त्रिपाठी इस यथार्थ के तनाव को बगैर लड़खड़ाए मंच पर पेश करते हैं। वे संजीदा अभिनय, अच्छी प्रकाश योजना आदि के चुस्त संयोजन से देखने वालों को पाठ की गिरफ्त में लेते हैं। अपनी-अपनी ग्रंथियों में परपीड़ा का सुख लेते पात्रों के बरक्स एक विपरीत यथार्थ में अपने सुख को बटोरने की कोशिश करती बेणारे का निर्जीव सा कटघरे में पसर जाना इसी क्रम में धीरे धीरे देखने वालों को घेरता है। कलंक के डर में जीने वाली नायिका का यह चेहरा चाहे आज थोड़ा पुराना लगे, पर रोहित उसके पुराने दुख की मंच पर एक सच्ची शक्ल बनाते हैं।

Monday, March 4, 2013

नाटक का पात्र है वातावरण

कुछ नाटक अपनी प्रकृति में ही बहुत नफीस और नाजुक होते हैं। जरा-सा भी बेलिहाज छूने से उनकी त्वचा में पड़ा निशान बिल्कुल साफ दिखने लगता है। जैसे कि नाटक आषाढ़ का एक दिन। चेखव के नाटकों की तरह वह एक वातावरण के साथ दर्शक की चेतना में प्रवेश करता है। फिल्म राशोमन के उत्तरार्ध में जैसे तेज बारिश का धीरे-धीरे थमना कहानी सुन और सुना रहे पात्रों के मानसिक विरेचन की एक व्यंजना जैसी जान पड़ती हैउसी तरह यहां बादलों की गड़गड़ाहट और बारिश का बैकड्रॉप विषयवस्तु के द्वंद्व को थोड़ा तरल बनाता है। एक द्वंद्व जिसे हम वातावरण की स्निग्धता के पार से देख रहे होते हैं। सूप, आंगन, अलगनी, घड़ा, चौकी- ये सब साधारण चीजें इसे बहुत स्वाभाविकता से आकार देती हैं। लेकिन फिर भी इस सारे वातावरण को सक्रिय करने वाला तत्त्व उसके संवाद ही हैं। मोहन राकेश ने कभी कहा था- रंगमंच में बिंब का उदभव शब्दों के बीज से होता है। यह नाटक इसका एक सही उदाहरण है। दृश्यविधान के सीमित अवयव यहां शब्दों के जरिए जीवित होते हैं। भाषा का एक सही और सटीक चयन, जिसमें कोई असंयम या अतिरिक्तता का कोई नुक्स दिखाई नहीं देता। वह धीरे-धीरे बेहद सादगी से लेकिन ठोस ढंग से अपने दर्शकों को घेरती है। ग्राम्य प्रांतर में रहने वाले कालिदास की साहित्यिक ख्याति उज्जयिनी तक फैल चुकी है। उसे वहां से बुलावा आया है। अपने द्वंद्व और बाहरी दबावों में उज्जयिनी जाकर कालिदास से मातृगुप्त हुए कालिदास के व्यक्तित्व परिवर्तन और अपरिवर्तन की कथा है यह नाटक। अपने बाहरी कलेवर में मल्लिका को भूलकर कश्मीर का शासक बनने का प्रलोभन भी उसे कितना बदल पाया! इस प्रलोभन की सच्चाई और अपनी वास्तविकता से जुड़े रहने के उसके द्वंद्व के बरक्स मल्लिका को कोई भी प्रलोभन आकर्षित नहीं करते।
पिछले दिनों दिल्ली के श्रीराम सेंटर में हुए साहित्कय कला परिषद के युवा नाट्य उत्सव में भूपेश जोशी निर्देशित आषाढ़ का एक दिन में बीच-बीच में चूकें दिखाई देती हैं, लेकिन यह नाटक की अपनी ताकत है जो रंगकर्मियों को संभाल लेती है। भूपेश खुद बहुत अच्छे अभिनेता हैं, लेकिन कालिदास के चरित्र के साथ वे ठीक से एकाकार नहीं हो पाए हैं। कालिदास अपने द्वंद्व से अलावा भी कहीं गुम मालूम देता है। हालांकि मल्लिका के किरदार में ज्योति पंत निश्चित ही काफी बेहतर थीं। उनके अभिनय में किरदार की लय अंत तक काफी मुकम्मल थी। एक मौके पर महारानी के आगमन से पूर्व रंगिनी और संगिनी नामक दो परिचारिकाओं का आधुनिक ढंग की साड़ी में मंच पर प्रवेश बेहद खटकने वाला पहनावा था। शुरू के दृश्य में घायल हिरन को ले जाने आया शिकारी भी आवश्यकता से कुछ अधिक सजा-धजा हुआ है। अंतिम दृश्यों में पियक्कड़ हो चुका विलोम भी अधिक लाउड नजर आता है। आशीष शर्मा जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता को दर्शकों की तालियों के व्यामोह में नहीं फंसना चाहिए। हालांकि अंततः उनकी स्वाभाविक अभिनय क्षमता ही उन्हें बचा पाती है। संभवतः आषाढ़ का एक दिन के किरदार खुद को आत्मसात किए जाने की उम्मीद रखते हैं। मेथड एक्टिंग का ढंग शायद यहां बहुत कारगर नहीं है। एक संवेदनशील आलेख संवेदना की ज्यादा गहराई की दरकार रखता है। वैसे अन्य भूमिकाओं में पात्रगण प्रायः दुरुस्त थे और प्रस्तुति की एक अच्छी बात यह भी थी कि दृश्य-संयोजनों के कुछ व्यतिक्रमों के बावजूद कथ्य की लय वहां आद्योपांत बनी रहती है। भूपेश जोशी ने नाटक के मूल ढांचे में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की है, और काफी हद तक वे उसकी सादगी बनाए रख पाए हैं।   
वैसे श्रीराम सेंटर में हुआ यह प्रदर्शन दर्शकों की संख्या के लिहाज से पूरी तरह सफल कहा जाएगा। हर मुमकिन जगह पर बैठे-खड़े ये दर्शक ताली बजाने के आसान काम को वजह-बेवजह काफी मुस्तैदी से अंजाम दे रहे थे। मोहन राकेश की आत्मा कहीं होगी तो ताली बजाने की इस आतुरता ने उनकी उदासी को जरूर चकित कर दिया होगा। बावजूद इसके कि उनका नाटक हर शोरशराबे के खिलाफ डटकर खड़ा रहता है।