Sunday, February 3, 2013

एक जैसा एशिया


अजरबैजान की प्रस्तुति मस्यर जोर डान एंड दरवेश मस्ताली शेख उन्नीसवीं सदी के ईरानी नाटककार एम. एफ अखुनद्जादेह का नाटक हैजिन्हें ईरान में आधुनिक साहित्यिक आलोचना का शुरुआतकर्ता माना जाता है। वे साहित्य में यथार्थवाद के हिमायती थेऔर उन्होंने तत्कालीन पर्शियन साहित्य को अपने वक्त की जरूरतों को संबोधित करने में नाकाम रहने के लिए जमकर कोसा था। फिरुद्दीन महारोव निर्देशित यह प्रस्तुति देखते हुए किसी को यह गलतफहमी हो सकती है कि यह कहीं कोई भारतीय प्रस्तुति तो नहीं। पूरा एशिया एक जैसी फितरतों में बंधा हुआ है। नाटक में एक फ्रेंच वैज्ञानिक महाशय डोन जान अजरबैजान के काराबाख में एक जड़ी के अनुसंधान के लिए आया हुआ है। यहां उसकी दोस्ती गाटमखान आगा के भतीजे शाहबाज बेक से हो जाती है। वह उसे उच्च शिक्षा के लिए फ्रांस ले जाना चाहता है। पर गाटमखान की बीवी को इसपर सख्त ऐतराज है क्योंकि उसकी बेटी की शादी शाहबाज बेक से होने वाली है। उसने पेरिस की ऐसी तस्वीरें देखी हैं जिनमें बेशर्म फ्रेंकिशऔरतें सिर और चेहरा उघाड़े मर्दों के साथ बैठी हैं। अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख वह दरवेश मस्ताली शेख को बुलाती है जिसका दावा है कि वह अपने जादू-टोने से पूरे पेरिस को ही नष्ट कर देगा। प्रस्तुति एक प्रहसन की तरह कुछ अतिचरित्रों के जरिए एक माहौल बनाती है। मंच पर कई दरवाजों की शक्ल में कई परदे लटके हैं। इसके अलावा कास्ट्यूम आदि के जरिए भी मंच पर एक रंग-बिरंगापन दिखाई देता है। दृश्य की रोचकता यहां किरदारों के वैविध्य से बनती है। दकियानूस अड़ियल बीवी, लाजवंती दुल्हन, विचित्र वेशभूषा वाले ओझा की कारगुजारियां आदि हिंदुस्तानी समाज के भी काफी जाने पहचाने किरदार हैं। इन पात्रों के अलावा चेहरे पर रंग पोते, बाल फैलाए तीन किरदार और भी दिखते हैं। उनके हिस्से में कोई संवाद नहीं हैं, लेकिन वे स्थिति में किसी उत्प्रेरक या समीक्षक की तरह हाथों और शरीर को मटकाते हुए मौजूद हैं। हालांकि उनकी उजबक उपस्थिति ज्यादा रोचकता नहीं बना पाती।
इधर बेगूसराय के युवा रंग निर्देशक प्रवीण कुमार गुंजन कछेक सालों से काफी प्रयोगपूर्ण किस्म की प्रस्तुतियां करते आ रहे हैं। भारत रंग महोत्सव में ही एक-दो साल पहले उनकी प्रस्तुति हेमलेट देखी थी, जिसमें एक प्रखरता स्पष्ट थी।  इस बार एलटीजी प्रेक्षागृह में उनकी प्रस्तुति जर्नी टु फ्रीडम देखने को मिली। प्रस्तुति साहित्य के अकविता नुमा किसी मुहावरे की तरह बहुत कुछ को किसी निश्चित सिलसिले के बगैर कहने की कोशिश करती है। प्रवीण में मंच पर स्थितियों को एक अपने ही ढंग से आकार देने की समझ तो है, पर इस बार वे खिलवाड़ करते ज्यादा दिखाई देते हैं। थिएटर में इन दिनों एक चलन ऐसा बढ़ा है जहां किसी भी ऊटपटांग चीज को थिएटर की संज्ञा दी जा सकती है। तमाम पात्र और संवाद प्रायः इतने असंबद्ध हैं कि वे किसी शैली से ज्यादा एक बेढब संरचना हो जाते हैं। प्रवीण एक किस्म की अराजकता को मुहावरे की शक्ल देने की कोशिश करते नजर आते हैं। प्रस्तुति में किसी अभिव्यक्ति की तुलना में निर्देशक का आत्मविश्वास निश्चित ही ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है।

2 comments:

  1. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
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  2. ईरानी नाटक की अज़रबैजान में मंचीय प्रस्तुति के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा. यह कहना उचित है कि तमाम एशियाई देशों की संस्कृति, परम्परा और रूढ़ियाँ अक्सर समरूप दिखाई देती हैं. तभी ओ कई रचनाओं का असर सार्वभौम पाया जाता है. धन्यवाद.

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